लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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लेखक- एस. गुरूमूर्ति

इस लेख के शीर्षक-प्रश्न के उत्तर की पुष्टि व्यावहारिक प्रमाणों व वैचारिक तर्कों दोनों से देनी होगी और देनी भी पड़ेगी। व्यावहारिक प्रमाणों के बिना आर्थिक मसलों पर दार्शनिक विवेचना विवादित तो होगी ही साथ ही तुच्छ भी समझी जाएगी। इसलिए व्यावहारिक बहस पहले। लेकिन बहस शुरू करने से पहले एक चेतावनी! मामला जटिल है, अतएव सामान्यतया, तमाम आंकड़े व विस्तृत विश्लेषण की जरूरत होगी। खासतौर पर इस प्रश्न की मानक प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग है, जैसा कि लेख की मांग (चर्चा करने की) है। लेकिन यह कोई शोध लेख नहीं है, जहां भारी-भरकम आंकड़ों की जरूरत होगी। अपेक्षाकृत इस संक्षिप्त लेख का उद्देश्य महज दो महत्वपूर्ण ‘व्यावहारिक आंकड़े’ के जरिए उत्तर देना है। इसलिए यह लेख दो अति सांकेतिक लेकिन ठोस व अविवादित तथ्यों पर आधाारित हैं। पहला, क्या यहां के आर्थिक प्रतिरूप में कुछ खास है, जो भारतीय है और वह ऐसे पश्चिमी सामाजिक-आर्थिक मॉडल से भिन्न है, जिसे बतौर ‘वैश्विक’ स्वीकृति मिल रही है और सभी के लिए फायदेमंद बताया जा रहा है?

सर्वप्रथम, भारत में निवेश व बचत की गुणवत्ता को लेते हैं। इस समय घरेलू बचत भारत की सकल राष्ट्रीय आय की 32 प्रतिशत से ज्यादा है और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल यह 34 फीसदी को छू लेगी। इस तरह हमारा देश उन देशों में शामिल है, जहां बचत दर सर्वोच्च है। भारत की संपूर्ण बचत में पारिवारिक बचत का हिस्सा 80 प्रतिशत है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय आर्थिक परिदृश्य में परिवार संस्था का कितना दखल है। लेकिन बचत की राशि से ज्यादा बचत की प्रकृति महत्वपूर्ण है, जो समाज के भौतिक जीवन के नजरिए को स्पष्ट रेखांकित करती है। समस्त बचत का 98 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित बचत है, जो फिक्स्ड रेट सेविंग जैसे- भविष्य निधि व बैंक जमा के रूप में हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि अति प्रचारित स्टाक मार्केट ने भारत की बचत को कितना आकर्षित किया है? महज 2 प्रतिशत। जो इस बात का संकेत है कि देश के बहुत ही कम परिवारों का जुड़ाव स्टॉक मार्केट से है। जबकि अन्य देशों की स्थिति बिल्कुल विपरीत है। एक अनुमान के मुताबिक 55 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों का संबंधा स्टॉक मार्केट से है। इससे बहुत कम परिवार जर्मनी में (अमेरिकी तुलना में आधे) में स्टॉक मार्केट से जुड़े हुए हैं। जहां तक जापान की बात है, वहां अमेरिका की तुलना में एक तिहाई परिवारों का संबंघ स्टॉक मार्केट से हैं।

इसका क्या अर्थ है? बिल्कुल साधारण, पैसे के मामले में समाज उतना रिस्क नहीं लेता। कुछ समाज ज्यादा रिस्क लेते हैं और कुछ समाज उससे कम। उनकी तुलना में भारतीय ‘नो-रिस्क’ की कैटेगरी में आते हैं। इसका एक यह भी अर्थ है कि भारत में जोखिम पूंजी (रिस्क कैपिटल) का निर्माण नहीं होता। बहुत से लोग इसे अल्प विकसित ‘स्टॉक मार्केट’ व परंपरागत तथा रूढ़िगत सामाजिक सोच के रूप में भी उध्दृत करते हैं, जिसे सुधारवादी दूर करना चाहते हैं। दरअसल, ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में निवेश से भारतीयों के कतराने का संबंध देश में नीति-निर्माण से है। लेकिन क्या जोखिम पूंजी का अल्प निर्माण एक कमी है, जैसा की बहुत से लोग सोचते हैं? इस प्रश्न का जवाब तलाशने से पहले हमें दूसरे प्रश्न के उत्तर देने की जरूरत है। क्यों अमेरिकन अपनी बचत को स्टॉक मार्केट में लगाने का जोखिम लेते हैं, जबकि भारतीय ऐसा नहीं करते?

अमेरिकी समाज में भारी उपभोग के चलते अमेरिकन का झुकाव बचत की तरफ कम है। उपभोग को बढ़ाने के लिए ब्याज दर लगातार एक जैसी बनी (कम स्तर पर) हुई है। पहले से ही कम बचत पर ज्यादा लाभ कमाने की जोखिम लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है और दबाव भी डाला जाता है। सरकार की सामाजिक सुरक्षा द्वारा भी अमेरिकियों को ज्यादा उपभोग व कम बचत करने का प्रोत्साहन मिलता है। जब व्यक्ति एक बार आश्वस्त हो जाता है कि रिटायर के बाद उसकी देखरेख सरकार करेगी, या बीमार होने पर उसका इलाज होगा, या उसके बेरोजगार बेटे, बेटी विधावा पत्नी या वृध्द मां-बाप की देखरेख सरकार करेगी, तो स्वाभाविक तौर पर बचत की तरफ उसका झुकाव कम होगा। यदि कोई बचत भी करता है, तो वह स्टॉक मार्केट या अन्य जोखिम भरे क्षेत्रों में निवेश करने का जोखिम लेता है। पश्चिमी देश व अमेरिका में परिवारिक दायित्व राष्ट्रीयकृत हैं। यही वजह है कि वहां पारिवारिक बचत काफी कम है यहां तक कि ‘निगेटिव’ है। आधाुनिकता के दवाब मसलन- तलाक, सम-लैंगिक विवाह, फेमिनिज्म और सम-लैंगिकता के कारण परंपरागत परिवारों की संख्या काफी कम है। आधो से अधिक परिवार ‘सिंगल पैरेंट्स फैमिली’ हैं और ज्यादातर परिवार उधार व क्रेडिट कार्ड पर जी रहे हैं। अमेरिका में समस्त क्रेडिट कार्डों की संख्या वहां की वयस्क आबादी की चार गुना है, जिसके फलस्वरूप जो भी बचत होती है उसका बड़ा हिस्सा जोखिम भरे स्टॉक मार्केट में चला जाता है। यही वजह है कि ज्यादा परिवार स्टॉक मार्केट से जुड़े हैं। इस प्रकार अमेरिकी स्टाक मार्केट का रोजाना सूचकांक अमेरिका के आर्थिक स्वास्थ्य को दर्शाता है। इसके अलावा यहां की ‘मासिक खुदरा ब्रिकी’ आंकड़े अमेरिका के खपत स्तर को बताते हैं। लेकिन जो देखने में आ रहा है वह यह कि अमेरिका की सामाजिक सुरक्षा अमेरिकी सरकार को दिवालिया बना रही है। यही नहीं, अमेरिकियों में बचत को असंगत बनाने में इसकी प्रमुख भूमिका है। इस तरह अति सक्रिय और बहु-व्यापक स्टाक मार्केट ‘सामाजिक सुरक्षा दायित्वों’ की उपज है, जिसकी जिम्मेदारी राज्य ने परिवार से लेकर राष्ट्रीयकृत कर दिया है।

यहां स्थिति पूर्णतया अलग है। भारतीय परिवार सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर परिवार अपने बुजुर्गों, बेरोजगार बेटे, बेटियों आदि की देखरेख करते हैं। यह किसी आर्थिक दवाबवष नहीं, बल्कि पारिवारिक, सांस्कृतिक व धार्मिक कर्तव्य के कारण है। इस अर्थ में भारत विश्व की सबसे बड़ी निजीकृत अर्थव्यवस्था है, क्योंकि यहां पश्चिम का सबसे बड़ा लोक दायित्व- यहां की जीवन शैली में रची-बसी संस्कृति के कारण-परिवार यानी निजी हाथों में है, वह भी बिना किसी कानून या सरकारी आदेशों के। खास तौर पर अमेरिका पिछले कई सालों से अपनी कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को निजीकरण करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन वह ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि वहां भारतीय समाज जैसा कोई पारिवारिक सिस्टम नहीं है, जो इन दायित्वों का निर्वाह कर सके। यदि यहां कोई राज्य सहाय्यित सामाजिक सुरक्षा है, तो वह केवल सरकारी कर्मचारियों की पेंशन योजना है। लेकिन यह केवल सीमित योजना है, बहु-व्यापक नहीं। भारतीय परिवारों की अधिकांश बचत सावधि योजनाओं या सुरक्षित प्रतिभूतियों में निवेश होती है। अतएव भारतीय स्टॉक मार्केट न तो भारतीय समाज की समृध्दि दर्शाते हैं और न ही वे भारतीय निवेशकों के विश्वास को प्रदर्शित करते हैं, जैसा कि पश्चिमी देश के स्टॉक मार्केट करते हैं। हालांकि यह (भारतीय स्टॉक मार्केट) पश्चिमी निवेशकों के विश्वास को दर्शा सकता है। लेकिन स्टॉक मार्केट की जो महत्ता अमेरिकी या अन्य देशों में है, वैसी ही महत्ता हमारे आर्थिक विचारकों, लेखकों व अन्य लोगों द्वारा भारतीय स्टॉक मार्केट को देना कुछ और नहीं बल्कि साफ बरगलाने की कोशिश है।

स्टॉक मार्केट में सामान्य भारतीय की अरूचि को देखते हुए वर्तमान वित्तमंत्री ने बार-बार भारतीय निवेशकों से आग्रह किया कि वे बैंकों के बजाय शेयर बाजार में पैसा लगाएं, लेकिन भारतीय परिवारों ने इस एक्सपर्ट सलाह पर गौर नहीं किया। वहीं, भारतीय परिवार आधुनिक आर्थिक विचारकों की राय के विपरीत, सोना पर ज्यादा विश्वास करते हैं, न टीसीएस या इंफोसिस जैसी कंपनियों के शेयरों पर। वे विश्व के समस्त स्वर्ण उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा खरीदते हैं, जिसकी कीमत उनके द्वारा खरीदे गए स्टॉक की कीमत से कहीं ज्यादा है। पश्चिमी आर्थिक विचारक तथा यहां पर उनकी कार्बन कॉपी, सोने की खरीद को उपभोग व शान-शौकत की वस्तु मानते हैं। लेकिन सामान्य भारतीय, चाहे पढ़ा-लिखा हो या अशिक्षित हो, इसे विश्वसनीय निवेश मानता है। साथ ही वे इसे आभूषण के तौर पर इसे इस्तेमाल भी कर लेते हैं। वे यह जानते हैं कि दलाल स्ट्रीट में खरीदे गए शेयर उनके शरीर की शोभा नहीं बढ़ा सकते हैं और वे यह भी समझते हैं कि सोने ही एक मात्र निवेश है, जिसका मूल्य नहीं गिरता। आर्थिक विश्लेषक इसे निवेश का प्राचीन मॉडल कर कह आलोचना कर सकते हैं। सोने के प्रति ललक के कारण टिकाऊ व गैर टिकाऊ वस्तुओं के प्रति झुकाव कम होता है। आखिरकार, सुरक्षित बचत, कम उपभोग और सोने की ललक के क्या संकेत हैं। इन सभी को यदि समेकित रूप से देखें तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था की स्त्रीगत विशेषता है। हां, भारतीय अर्थव्यवस्था का यह अनाक्रमक आयाम, इसकी पारिवारिक विशिष्टता व भारतीय परिवार की खूबियों के कारण से है, जिन पर महिलाओं का अत्यधिक दबदबा है। इस प्रकार, भारतीय आर्थिक मॉडल का प्रथम अंग ‘परिवार’ है।

दूसरा महत्वपूर्ण सांकेतिक सांख्यकीय आंकड़ा, हालांकि यह पूर्णतया आर्थिक नहीं है, लेकिन इसका राजनैतिक अर्थशास्त्र पर गहरा असर है, वह यह है कि 2004 के अंत तक भारत में गांवों की संख्या लगभग 7 लाख थी, लेकिन पुलिस स्टेशन की संख्या केवल 12,404 ही थी। फिर भी यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर संसार में सबसे कम अपराधा हैं। कुछ गुमराह लोग तर्क देते हैं अभिलिखित अपराधा इसलिए कम हैं, क्योंकि अपराधों का पता नहीं चलता और उनकी रिपोर्ट नहीं प्राप्त होती।

दरअसल, पुलिस की कम जरूरत की असली वजह भारतीय समाज की विशिष्टता है। भारतीय समाज अविश्वसनीय रूप से जटिल है। यदि हम संसार को एक तरफ रख दें और भारतीय समाज का दूसरी तरफ, तब भी भारतीय समाज ज्यादा जटिल दिखाई पड़ेगा, क्योंकि भारतीय समाज तमाम समुदायों, संप्रदायों, अनेकों देवी-देवता, विभिन्न भाषाएं, रीति-रिवाज से ओत-प्रोत है। फिर भी हम एक राष्ट्र व एक राज्य है और हमारी अर्थव्यवस्था भी एक है। क्योंकि, उदाहरण के तौर पर, हम लोग करोड़ों देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, लेकिन भारतीय देवता आपस में झगड़ते नहीं हैं। नतीजतन, करोड़ों देवी-देवताओं के पुजारी आपस में उनके नाम पर संघर्ष नहीं करते। आखिर इस विशाल व अति जटिल परंपरागत समाज का (संपूर्ण मानवता का छठां हिस्सा) आधुनिक भारतीय संवैधानिक व आर्थिक व्यवस्था में क्या भूमिका है? इसका उत्तर विशिष्ट भारतीय आर्थिक मॉडल के अस्तित्व का पूर्ण संकेत दे देगा।

पश्चिमी की अवधारणा के नजरिए से देखें तो भारत स्वशासित ज्यादा है, बजाय राज्य द्वारा शासित होने के। स्वशासित होने की योग्यता का विकास भारतीय परपंरा व रीति-रिवाजों के तहत विकसित अनुशासन की वजह से है, जो भारत के परिवार व समाज को शासित करती है। भारत की विविधाता इसमें मदद करती है और अनुशासन के परंपरागत नियमों को बरकरार रखने की क्षमता को मजबूत करती है। दरअसल, यहां ग्रामीण समुदाय की भूमिका (यहां तक की जाति व्यवस्था की भूमिका भी, जिसे कई कारणों से तुच्छ प्रमाणित किया गया, जिसकी चर्चा हम लेख के अंत में करेंगे) पुनर्विचार की मांग करती है। इस लेख का मत है कि जातिगत चुनावी राजनीति के घालमेल के कारण सामाजिक-राजनीतिक मोर्चा पर काफी भ्रम हुआ। स्वदेशी अकादमी परिषद् द्वारा कराए गए एक पांच साला सर्वेक्षण से (जिसमें 30 से अधिक समुदाय आधारित औद्योगिक समूह शामिल हैं) यह तथ्य उजागर हुआ कि यूपी, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिनाडु के औद्योगिक संकुल के विकास में स्थानीय जातियों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। गौरतलब है कि इन स्थानीय जातियों जिसमें अगड़ी और पिछड़ी जातियां शामिल हैं। आगरा व कानुपर में अनुसूचित जातियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

इन औद्योगिक संकुलों का विकास सामुदायिक प्रतियोगिता व आपसी सहयोग के मिलेजुले प्रभाव के कारण हुआ, जिसे 19वीं शताब्दी में एमाइल दरखाइम ने सोशल कैपिटल कहा और 21वीं शताब्दी में फ्रांसिस फुकुयामा भी इस बात को अनेकों बार दुहराया। ये संकुल इस बात के प्रमाण हैं कि समुदाय और जातियां भारत की सोशल कैपीटल हो सकती है, जैसा कि स्वामीनाथन अंकलेश्वर अय्यर ने एकोनॉमिक टाइम्स ( वर्ष 2000) में लिखे अपने लेखों से स्पष्ट किया है। एकोनॉमिक पावर हाउस के रूप में जाति की अवधारणा पर जोर गुरूचरण दास ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया अनबाउंडेड’ में भी किया है।

स्वदेशी एकेडमी कौंसिल द्वारा किए अधययन यह पता चलता है कि जहां राजनीतिक वर्गों द्वारा समुदाय व जातियों को राजनीति में हिस्सेदारी के बदले राज्य समर्थित लाभ (State-conferred benifits) के लिए प्रेरित किया गया, वहां वे वोट बैंक के रूप में परिवर्तित हो गए और राज्य पर उनकी निर्भरता बढ़ गई। जब वे वोट बैंक के रूप में परिवर्तित हो गए और राज्य पर उनकी निर्भरता बढी, तब विकास के स्थान पर उनकी अवनति हुई। वहीं दूसरी तरफ स्वदेशी एकेडमी कौंसिल ने अपने अधययन में पाया कि जो समुदाय या जातियां अपने व्यवसाय व उद्योग में लगी रहीं, उनका विकास तेजी से हुआ। बाद में चलकर इन जातियों व समुदायों ने राजनीतिक मामलों में भी जमकर हिस्सेदारी ली। आखिर इन महत्वपूर्ण विषयों पर वस्तुपरक अधययन क्यों नहीं हो रहे है? इसका जवाब इतिहास की ओर इशारा करता है। दरअसल, इसका कारण बौध्दिक सुस्ती और वर्तमान राजनीतिक व बौध्दिक रूप से तथाकथित सही के खिलाफ अलग राय रखने की बौध्दिक हिचकिचाहट है।

आइए हम भारतीय समाज व इसकी परंपरा (जिसमें जातियां भी शामिल हैं) के खिलाफ कल्पित बातों के इतिहास पर नजर डालते हैं। यदि हम पश्चिमी समाज से इसकी तुलना करें तो भारतीय समाज का बाह्य रूप अराजकतापूर्ण है। चर्चिल ने कहा था कि यदि भारत में लोकतंत्र लाने का प्रयास किया जाता है तो वह अराजकता में बदल जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यदि वे कुछ दिन और जिंदा रहते तो उन्हें अपनी बातों को वापस लेना ही पड़ता। 1950 के दौरान भारत में अमेरिकी राजदूत केनिथ गालब्रेथ ने उपहासपूर्ण ढंग से भारत को Functioning anarchy कहा था, जिसको उन्होंने हाल ही में इस तरह संशोधित किया कि मेरा मतलब यह था कि भारतीय राज्य पर निर्भर नहीं थे और यह भारतीय समाज की ताकत थी, जो भारत को विकास की प्रक्रिया पर ले गई। भारतीय समाज का बाह्य रूप विश्व के प्रमुख लोगों को धोखे में क्यों रखता है कि वे सत्य से परे जाकर अपने विचार देते हैं।

इसका कारण यह है कि भारतीय समाज काफी हद तक संबंधों पर आधारित समाज है (एमाइल दरखाइम) और बहुत कम हद तक समझौते पर आधारित समाज (रूसो)। लेकिन भारत का संविधानवाद जो पूर्णतया एंग्लो-सैक्सन अनुभवों व ऐसे राजनीतिक तथा आर्थिक बहसों पर आधारित है, जो भारत की मूल विशेषता की अनदेखी करता है। आपसी संबंधों पर निर्भर रहने के कारण भारतवासी की सामूहिक रूप से सामाजिक समझौते द्वारा निर्मित राज्य पर निर्भरता कम है। वे परिवार, जाति व ग्राम्य स्तर के तमाम अंगों पर ज्यादा निर्भर हैं।

ये सब कुछ वे ही तत्तव हैं, जो संबंधों पर आधारित समाज में मिलते हैं और जिन पर एमाइल दरखाइम जैसे जर्मन परंपरावादियों से लेकर फ्रांसिस फुकुयामा जैसे आधुनिक विचारकों ने चर्चा की है। अति आधुनिक लोगों के उपहास (इन लोगों द्वारा नैतिक-सामाजिक निगरानी) के बावजूद बहुसंख्यक भारतीय-परिवार, जाति और समुदाय की निगरानी से लाभान्वित हैं। इसलिए उन्हें राज्य द्वारा निगरानी की कम जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि यहां पुलिस थानों की संख्या कम है। एक चीज निश्चित है। मनुष्य को निगरानी की जरूरत पड़ती है। मसला यह है कि इस मामले में परिवार, माता-पिता या समाज ज्यादा बेहतर है या पुलिस थाने का पुलिस इंस्पेक्टर। इससे राज्य को राहत मिलती है, लेकिन इससे राजनीतिक वर्ग का स्व-निर्भर व स्वशासित समाज के साथ असहज महसूस करना स्वाभाविक है, क्योंकि वे राजनीतिक वर्ग पर निर्भर नहीं रहेंगे। स्वशासित व स्वप्रबंधान की शक्ति कहां से आती है? चर्चिल व गालब्रेथ को भारत की मुख्य विशेषता को न समझ पाने के लिए माफ किया जा सकता है, लेकिन भारत के ‘अंग्रेजीदां’ को कैसे माफ किया जा सकता है, जो न केवल भूल करते हैं, बल्कि भारत के मूल तत्तव को समस्या कहकर उपहास उड़ाते हैं?

यह हमें भारत की सामाजिक-आर्थिक या स्वदेशी के विस्तृत दार्शनिक आधार की ओर ले जाती है। महात्मा गांधी ने कहा था कि स्वदेशी सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों का मिश्रण है। पंडित दीन दयाल ने कहा कि ‘यह एकात्म संकल्पना है, जिसे ठीक ही गांधीजी ने पहले ही बहुत स्पष्ट भाषा में कहा है। इन दो महात्माओं ने जो कहा है उसका सार तत्तव यह है: सामाजिक अर्थशास्त्र-व्यक्तिगत, सामूहिक व व्यक्ति को प्रभावित करने वाले उन आदर्शों के बीच का संतुलन है, जो व्यक्तिवाद की वकालत नहीं करते। जैसा कि पूंजीवादी व मार्क्सवादी आर्थिक विचारों में मिलता है।

भारत के वर्तमान इतिहासकार व आर्थिक विचारक जो भारत की सामाजिक आर्थिक समस्या की जड़ भारत की परंपरा को मानते हैं, वे दरअसल, जर्मन दार्शनिक मैक्स वेबर की पुस्तक ‘द् सोशियोलॉजी ऑफ इकोनामिक्स’ से प्रेरणा लेते हैं। वेबेरियन का मत है कि आधुनिक पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था, प्रोटेस्टेंट ईसाई मत की देन है, जिसने व्यक्तिवाद को जन्म दिया, ईसाई जगत में पुनर्जागरण को प्रोत्साहित किया और स्वतंत्र सोच को विकसित किया। ‘कांन्टे्र सोशल मॉडल’ को उध्दृत करते हुए पिछली शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में वेबर ने भी स्वीकार किया था कि हिन्दू और बौध्द (भारत और चीन पढ़े) कर्म और पुर्नजन्म में विश्वास और भारत में जाति व्यवस्था के कड़ापन के कारण प्रोटेस्टेंट समाज की तरह विकास नहीं कर सकते। फलस्वरूप, समस्त भारतीय सामाजिक विचार व आर्थिक सिध्दांत इस संकल्पना से उत्पन्न हुए कि जब तक भारत के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को धवस्त नहीं किया जाएगा, तब तक भारत का विकास व आधुनिकीकरण नहीं हो सकता। इस तरह भारतीय सामाजिक सुधारकों, सामाजिक-आर्थिक चिंतकों खास तौर पर माक्र्सवादी व समाजवादी विचारकों ने भारतीय व्यवस्था को निरपेक्ष, व्यक्तिवादी बनाने तथा समुदाय, ग्राम्य व्यवस्था को तोड़ने पर जोर दिया। साथ ही, बड़े पैमाने पर गांवों से पलायन कर शहरों में बसने के लिए (शहरीकरण) प्रेरित किया और समेकित रूप से इसे आधुनिकता का पर्याय माना गया।

भारतीय समाज पर वेबर के विचार पूंजीवादी दृष्टिकोण पर आधारित हैं, जबकि बेबर से लगभग 70 साल पहले अपने लेखों में कार्ल माक्र्स ने भारतीय समाज की सामाजिक नजरिए से व्याख्या की (न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में 25 जून 1853 को प्रकाशित)। साधारण शब्दों में कार्ल मार्क्स के विचार ये हैं: ग्राम्य अर्थतंत्र या भारत के गणतंत्र पूंजीवादी व्यवस्था की तुलना में कम शोषणकारी हैं। वे भारत की शक्ति भी हैं और उनकी कमजोरी भी। माक्र्स के शब्दों में, ‘सभी गृह युध्द, आक्रमण, क्रांतियां, विजय व अकाल अत्यधिक जटिल व विधवंसकारी तो दिखाई पड़ते हैं, लेकिन इनका असर सतह से नीचे नहीं हुआ। इंग्लैंड ने समस्त भारतीय सामाजिक ढांचे को तोड़ दिया, वह भी बिना किसी पुनर्संरचना के संकेत के, जो अभी भी नजर नहीं आते।’ लेकिन वे कहते हैं, ‘उन्होंने (ब्रिटिश) स्थानीय उद्योग को चौपट करते हुए स्थानीय समुदाय को भंगकर इसे (भारत) नष्ट कर दिया और स्थानीय समाज की सभी उत्कृष्ट व उन्नत चीजों को खत्म कर दिया।’ साथ ही, वह यह भी कहते हैं, ‘इंग्लैंड, सच्चे अर्थों में, हिंदोस्तान में एक सामाजिक क्रांति ला रहा है, लेकिन वह केवल अपने स्वार्थी हितों के कारण..।’ मार्क्स इस विधवंस को सही ठहराते हैं और कहते हैं कि इस तरह की विधवंस की जरूरत है, क्योंकि भारत का स्थिर ग्राम्य समाज, क्रांति के मूल तत्तवों को अपनाने की इजाजत नहीं देता और क्रांति के बिना, जैसा कि मार्क्स का विश्वास है, मानवता के सपने पूरे नहीं होंगे। आखिर में मार्क्स ने कहा कि इंग्लैंड का यह अपराधा इतिहास का वह छिपा औजार है जो क्रांति लाने में सहायक होगा। जर्मन कवि गोथे को उध्दृत करते हुए यहां तक कहा कि ब्रिटिश द्वारा विनाश स्वागतयोग्य है, क्योंकि यह सुखद है। (गोथे- ‘ Should this touture then torment us, since it bring us greater pleasure. ‘)

वेबेरियन व मार्क्स की दोनों विचारधाराएं, प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियन सामाजिक मॉडल की समानांतर उत्पाद हैं। यदि इसे धार्मिक संदर्भ में देखें तो यह चर्च के खिलाफ एक विद्रोह था, जो व्यक्तिवाद का हिमायती था। दोनों का विश्वास था कि भारतीय समाज व इसकी पंरपरा को तोड़ना चाहिए और इसी विखंडन को आधुनिकता के रूप में प्रेषित किया। कुल मिलकार पूंजीवादी व माक्र्सवादियों का यह कहना है कि भारतीय ग्राम्य-समुदाय मॉडल को नष्ट किया जाना चाहिए, ताकि वेबर की बाजार आधारित अर्थव्यवस्था व पूंजीवाद तथा माक्र्स की सामाजिक क्रांति का रास्ता खुल सके। जब तक ग्राम्य-समुदाय व्यवस्था जीवित है-जो आज भी जीवित है- तब तक भारत में न तो पूंजीवादी और न ही साम्यवादी मॉडल स्वीकार है। क्योंकि भारत में जाति, समुदाय और समाज को नष्ट कर व्यक्तियों को झुंड के रूप में नहीं बदला जा सकता।

वहीं दूसरी तरफ, पूंजीवादी और साम्यवादी दोनों ने सामाजिक ढांचे को नष्ट कर दिया, साथ ही, परिवार संस्था को भी विखंडित कर दिया। जब माक्र्स व वेबर अपने सिध्दांतों को विकसित कर रहे थे, तो वे समुदाय की शोषण वृत्ति पर विचार तो किया, लेकिन परिवार पर उस तरह नहीं सोचा। लेकिन जब समाज की निगरानी से मुक्त व्यक्तिवादी सोच का प्रभाव फैला तो इसका असर परिवार भी पड़ा। आज प्रोटेस्टेंट तथा पूर्व साम्यवादी समाज में सबसे बड़ी आर्थिक समस्या परिवार की बिखराव है। इस पारिवारिक टूटन के आर्थिक नतीजे -सामाजिक सुरक्षा दायित्व व पारिवारिक बचत का ह्रास- समाज को दिवालिया बना रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ कैथोलिक समाज मसलन-इटली, स्पेन, आयरलैंड और फ्रांस अपेक्षाकृत बेहतर हैं, क्योंकि इन लोगों ने परिवार व मुख्यतया समुदाय मॉडल को सुरक्षित रखा है।

यहीं व्यावहारिक प्रमाण व दार्शनिक संकल्पना- जिसकी चर्चा लेख के शुरू में हुई है-मिलते हैं और यहीं महात्मा गांधी व दीनदयाल द्वारा प्रवर्तित भारतीय मॉडल वेबर (पूंजीवाद) और मार्क्स (साम्यवाद) के मॉडल से पूर्णतया भिन्न है। गांधीजी और दीनदयालजी का सिध्दांत व्यक्ति का परिवार, समाज और समुदाय के साथ एकात्म पर टिका है। साथ ही, गांधीजी व दीनदयालजी दोनों अपने आर्थिक मॉडल में सांस्कृतिक व सभ्यतागत तत्तवों का समावेश करते हैं। यह सांस्कृतिक व सभ्यतागत तत्तव समाज, समुदाय और परिवार के साथ व्यक्ति के संबंधों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। एक अर्थों में पश्चिम व्यक्तिवादिता पर जैसा जोर देता है, वैसा जोर भारत में नहीं है और व्यक्तिवाद की जैसी अवधाारणा भारत में है, वैसी अवधारणा पश्चिम व साम्यवादी देशों में नहीं है। गांधीजी और दीनदयालजी, दोनों में से किसी ने भी कार्ल माक्र्स की तरह दार्शनिक अवधारणा का प्रतिपादन नहीं किया। वे व्यावहारिक जीवन से प्राप्त अनुभवों के आधार पर अपने सिध्दांत प्रस्तुत किए। भारत का समाज ही (परिवार, समुदाय व समाज के साथ व्यक्ति का एकात्म) भारत की सबसे अहम संस्था है और इसका सामूहिक प्रभाव भारत की सामाजिक पूंजी है।

पूर्व में उल्लिखित मामलों के अतिरिक्त भारत में उच्च बचत के लिए परिवार का योगदान सर्वाधिक है, जो इस वक्त सकल राष्ट्रीय आय की 34 फीसदी है और इसमें देश के 80 प्रतिशत परिवारों का योगदान है। वहीं, इसके विपरित प्रोटेस्टेंट व पूर्व-साम्यवादी समाजों में अल्प पारिवारिक बचत है। इन परिवारों पर केवल कर्ज हैं। अमेरिकी में 21 करोड़ वयस्क आबादी के 57 करोड़ क्रेडिट कार्ड के चलते अमेरिकी परिवारों पर 2 ट्रिलियन डालर से ज्यादा का कर्ज है, जो 90 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। अमेरिकी में प्रति व्यक्ति पर चार क्रेडिट कार्ड हैं। जबकि एकीकृत समाजों में उपभोग व बचत में संतुलन बना रहता है और जिसका प्रभाव बचत पर पड़ता है। वहीं व्यक्तिनिष्ठ समाज में इस तरह का संतुलन नहीं दिखता, नतीजतन बचत की बजाय ऋण व खर्च पर जोर रहता है। उसका परिणाम यह रहा कि पिछले 6 सालों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था उधार पर चल रही है। अमेरिका ने भारत समेत लगभग सभी देशों से कर्ज ले रखा है। परिवार खंडित समाजों में सामाजिक सुरक्षा का दायित्व राज्य पर होता है, जबकि भारत में सामाजिक सुरक्षा की सभी जिम्मेदारी का निर्वहन परिवार करता है।

इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत विश्व की सबसे बड़ी निजी अर्थव्यवस्था है। खासतौर पर पश्चिम में सरकार पर सबसे बड़ा भार सामाजिक सुरक्षा का है। विशेषज्ञों के अनुसार 2020 तक जाते-जाते अमेरिकी स्वास्थ्य सुरक्षा अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दिवालिया बना देगी। इसके ठीक विपरित, भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायित्व भारतीय परिवार उठाते हैं। यहीं वजह है कि वे सुरक्षित निवेश की तलाश करते हैं और स्टॉक मार्केट में निवेश करने से कतराते हैं।

अब कोई भी समझ सकता है कि अमेरिकी स्टॉक मार्केट में पूंजी क्यों लगाते हैं और भारत के लोग सुरक्षित फिक्स्ड रेट सिक्योरिटी व बैंक डिपाजिट में अपना धान जमा करते हैं? आखिर इस अंतर के क्या नतीजे हो सकते हैं? परिवार-खंडित समाजों की तुलना में भारत की ब्याज दर ज्यादा होना निश्चित है। लेकिन यहां कम ब्याज दर की मांग है, जो इस बात का संकेत है कि सुधार प्रक्रिया जारी है।

दूसरा, पश्चिम में उद्योगों की वित्तीय जरूरतें ज्यादातर इक्विटी से पूरी हो जाती है और वे कर्ज पर कम निर्भर रहते हैं। यदि बड़ी इक्विटी से सुरक्षित उद्योग की बैंक देय-राशि बाकी है, तो ‘बेसल नॉर्म’ के तहत बैंक उसे गैर-कार्यशील पूंजी (Non-Preforming Asset) घोषित कर सकता है। लेकिन भारतीय उद्योगों में अपेक्षाकृत कम इक्विटी फाइनेंस है, इसलिए पश्चिम की तरह ‘गैर-कार्यशील पूंजी’ का नियम यहां पर लागू नहीं हो सकता। लेकिन यहां पर, परिस्थितियों में अंतर किए बिना सुधार प्रक्रिया के नाम पर पश्चिम के सभी नियामक नियमों की अंधी नकल जारी है। परिवार-खंडित पश्चिम समाज में सड़क, रेलवे, जल-वितरण, हवाई अड्डे, बंदरगाहों को सरकार ने निजी हाथों में सौंप दिए हैं और पारिवारिक दायित्व से जुड़े मामलों- मसलन-वृध्दों की देखरेख, बेरोजगार पारिवारिक सदस्यों को सहायता आदि-का राष्ट्रीयकरण कर परिवार से राज्य को हस्तांतरित कर दिए गए।

भारत में स्वदेशी या भारतीय दृष्टिकोण को सुरक्षित रखने की जरूरत है और यह भी प्रयास होने चाहिए कि परिवार व समाज के कार्य राज्य को न सौंपे जाय। साथ ही यह भी कोशिश होनी चाहिए कि व्यक्ति को राज्य या बाजार के हवाले न कर दिया जाय। अतएव, हम समझ सकते हैं कि परिवार, समुदाय और समाज से जुड़े एकात्म मानव की अर्थव्यवस्था सफल है, जबकि परिवार व समाज से विखंडित व्यक्तिवादी अर्थव्यवस्था कार्य-संस्कृति को नष्ट करती है। पूर्ववर्ती व्यवस्था ही भारतीय मॉडल है और इसी का भारत में चलन है। लेकिन सच यह है कि भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया में इस बात की पहचान आर्थिक, सामाजिक व पारिवारिक संदर्भ में नहीं की गई। यह संतुलन कानून द्वारा किस तरह भंग किया जा सकता है, इसका अनुमान ‘घरेलू हिंसा कानून’ से कर सकते हैं। इस कानून के जरिए राज्य व पुलिस का हस्तक्षेप हर आंगन में होगा। यह कानून पश्चिम की सामाजिक व पारिवारिक स्थित का अंधानुकरण है। किसी भी दल ने इस कानून के विरोधा का साहस नहीं दिखाया, क्योंकि इसे महिलाओं को सुरक्षित करने के रूप में देखा गया।

लेकिन कानून का पारित करने से पहले इस बात पर गौर नहीं किया गया कि विश्व की सर्वाधिक सशक्त (Empowerment) स्वीडेन की महिलाएं-जिनकी उद्योग, राजनीति, व्यवसाय, सरकार व अन्य तमाम क्षेत्रों में पुरूषों के साथ बराबर की हिस्सेदारी है- सर्वाधिक त्रसित महिलाओं में से हैं। एक अनुमान के अनुसार यहां की 40 फीसदी महिलाओं के साथ साल में कम से कम एक बार पीटने की घटना होती है।

लेकिन एक अंतर है, ये पति द्वारा नहीं, बल्कि अपने ‘ब्यॉव फ्रेंड’ द्वारा प्रताड़ित होती हैं। यहां के तीन-चौथाई पुरुष-स्त्री बिना विवाह किए एक साथ रहते हैं। इसलिए भारत में सामाजिक मसलों पर बहस के दौरान इस बात पर गौर नहीं किया जाता कि सरकार द्वारा उठाए गए सामाजिक उपायों का आर्थिक मामलों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। ऐसा पश्चिम का अंधानुकरण के कारण है, जबकि यहां की सामाजिक स्थित पश्चिम से बिल्कुल भिन्न है। इसी को गांधीजी व दीनदयालजी ने सांस्कृतिक भिन्नता के रूप में व्याख्या दी और निश्चित रूप से इस बात को समझने में भारतीय राजनीतिक व बौध्दिक प्रतिष्ठान पूर्णतया असफल रहा।

भारतीय राजनीतिक प्रतिष्ठान ने गांधीजी को प्रत्येक शहरों व कस्बों की सड़कों को नामकरण कर उन्हें गलियों में भेज दिया, लेकिन इस बात को सुनिश्चित किया उनके नाम पर कोई केंद्रीय शिक्षण संस्था नहीं खोली जाय। जिसका तात्पर्य यह है गांधाीजी का नाम गलियों में है और उनके विचार भी गलियों तक सीमित हैं। उनके विचारों को शैक्षिक संस्थाओं व घरों में प्रवेश करने से रोका गया। फलस्वरूप, भारतीय युवा वर्ग यह नहीं जानता कि भारत में अपना ही सामाजिक- आर्थिक मॉडल सफल हो सकता है। इसके लिए देशी मस्तिष्क की जरूरत है, जो शहरों में उपजे विचारों से मैले न हों। ऐसा लगता है कि वर्तमान राजनीतिक प्रतिष्ठान ऐसे मस्तिष्क को बड़ी संख्या में लाने के अक्षम है।

एक खुले मस्तिष्क को आसानी से समझाया जा सकता है कि एकात्म चरित्र वाली भारतीय अर्थव्यवस्था ही सफल हो सकती है, जिसका दीनदयालजी ने अपनी पुस्तक में ‘एकात्म मानववाद’ तथा गांधीजी ने स्वधर्म सिध्दांत पर आधारित स्वदेशी अवधारणा में प्रस्तुत किया है।

(लेखक स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े है)

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3 Comments on "क्या यह आर्थिक मॉडल वास्तव में भारतीय है?"

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डॉ. मधुसूदन
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व्यक्तिकेंद्री पश्चिम और परिवार केंद्री भारत, अधिकार ग्रस्त पश्चिम, और कर्तव्य परायण भारत…….. लेखक यह अंतर, सही सही समझते हैं|
पर, भारत के नकलची, अधूरे, पढ़त-मूर्ख लीडर इस मौलिक सच्चाई को नहीं समझे; और पश्चिम की नक़ल करने में लगे हैं, जो हमारी प्रकृति से मेल नहीं खाता| अभागा भारत, जो उसे सारे ब्रेन वाश्ड नेता ही मिले, और हमारी स्वतन्त्रता में “स्व” है ही नहीं|
बहुत बहुत मौलिक लेख|

Kunnu
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ईतना लंबा लेख की पढने से पहले ही मन भर जाए। 🙂

प्वाईंट आदी भी होता तो आसानी से समझ मे आ जाता (सिर्फ सुझाव है आपके साईट के विजीटर्स का)

arun
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s.gurumurti & govindacharya both are the best thinker of India.The public of India like them very much.

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