लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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देश में सत्ता के घोषित केंद्र (प्रधानमंत्री डॉ. मन मोहन सिंह) और अघोषित केंद्र (कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी) के बीच इन दिनों रार ठनती दिखाई दे रही है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है। नेताओं और अफसरान की जुगलबंदी की पोल नित ही इससे खुलने से आतंक बरपा है। इसमें बदलाव को लेकर 07 रेसकोर्स रोड और 10 जनपथ के बीच तलवारें खिचती दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी चाहतीं हैं कि सूचना के अधिकार कानून में बदलाव की अभी आवश्यक्ता नहीं है। सोनिया के करीबी सूत्रों ने बताया कि बीते साल 10 नवंबर को प्रधानमंत्री को लिखे खत में सोनिया ने साफ कहा है कि अभी यह कानून महज चार साल पुराना ही है। इसमें अभी बदलाव की गुंजाईश नहीं है, जरूरत इस बात की है कि इसके मूल उद्देश्यों पर कडाई कायम रहे। उधर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के सूत्रों ने बताया कि 24 दिसंबर को प्रधानमंत्री ने सोनिया को जवाबी खत लिखा जिसमें कहा गया है कि आरटीआई कानून में बदलाव के बिना कुछ होने वाला नहीं है। इसमें मुख्य सूचना आयुक्त का पद अचानक रिक्त होने की दशा में कोई वैकल्पिक प्रावधान नहीं है, इसके साथ ही साथ इसके लिए पीठ के गठन का भी कहीं उल्लेख नहीं है। कुल मिलाकर सोनिया गांधी और मनमोहन दोनों ही एक दूसरे को आईना दिखाने में लगे हैं कि किस तरह बिना होमवर्क के सोनिया की टीम के मैनेजर मामला पकाते हैं और जबरिया सरदार मनमोहन सिंह को उसे लागू करने को कहते हैं, दूसरी ओर सोनिया भी सिंह को जता रहीं हैं कि अभी भी सत्ता की चाभी उन्हीं के कमरबंद में खुसी हुई है।

टि्वट टि्वट से बाज नहीं आ रहे थुरूर

सोशल नेटवर्किंग वेवसाईट के दीवाने हो चुके भारत गणराज्य के विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर हैं कि अपने टि्वटर के पथ को छोडना ही नहीं चाह रहे हैं। लाख लानत मलानत झेलने के बाद भी वे अपनी मनमानी पर पूरी तरह उतारू हैं। वे अपने इस कृत्य को पूरी तरह सही ठहराने में कोई कसर भी नहीं रख छोड रहे हैं। देश के हृदय प्रदेश भोपाल में वन प्रबंधन संस्थान के एक समारोह में गुलामी के लबादे को उतार फेंकने के बाद फिर शशि थुरूर चर्चा में आ गए हैं। उन्होंने इसमें भी अपनी टिप्पणी दे डाली है। बकौल शशि थुरूर, जब तक गाडन का इंडियन वर्जन (भारतीय संस्करण) तैयार नहीं हो जाता, तब कि इमें वेस्टर्न वर्जन (पश्चिमी संस्करण) पहनने में कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं वे तो कहते हैं कि वे दीक्षात समारोहों में इस तरह के गाउन अवश्य ही पहनेंगे। अपनी जिंदगी का सत्तर फीसदी समय पश्चिमी देशों में बिताने वाले शशि थुरूर के दिल दिमाग से भातरीय संस्कृति पूरी तरह विस्मृत हो गई लगता है, तभी वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खादी के परिधानों को भूल चुके हैं। वैसे भी क्या जरूरत है लबादे के हिन्दुस्तानी संस्करण की। हम अपनी लाईन खुद खींचें न, क्यों खिची खिचाई लाईन से अपनी तुलना करे। अब किया भी क्या जा सकता है, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी भी इटली मूल की जो ठहरीं जिन्हें भारतीय संस्कृति का बहुत ज्यादा अंदाजा नहीं है।

नमक से मंहगा पानी!

कहते थे कि नमक सबसे सस्ती पर बहुत ताकतवर चीज है। महात्मा गांधी ने भी नमक सत्याग्रह कर ब्रितानियों को झुका दिया था। आजाद भारत में नब्बे के दशक के बाद नमक से मंहगा बिक रहा है पानी, जी हां यह सच है। भारतीय रेल में जनता खाना महज 10 रूपए में मिलता है, पर अगर बोतल बंद पानी रेल में खरीदा जाए तो वह 12 से 15 रूपए के बीच मिलता है। और उपर से तुर्रा यह कि जिस ब्रांड के सप्लायर द्वारा आईआरसीटीसी के ठेकेदार को कमीशन ज्यादा दिया जाता है, उसी कंपनी का पानी पीना पडता है। भारतीय रेल ने देर आयद दुरूस्त आयद की तर्ज पर रेल में पानी की बोतल 6 से सात रूपए में बेचने की योजना बनाई है। इसके लिए तिरूअनंतपुरम, अमेठी, अंबाला, नासिक फरक्का में बाटलिंग प्लांट का काम आरंभ हो गया है। यह योजना कब परवान चढ पाएगी पता नहीं किन्तु जिन रेल गाडियों में रेल्वे द्वारा सिक्का डालकर स्वच्छ पेयजल की मशीने लगाईं हैं, वे खराब पडी हैं, और वे यात्रियों का सामान रखने के काम ही आ रही हैं।

. . . मतलब शिव की आग में जलीं माया

शिक्षा के अधिकार को लेकर केंद्र सरकार से इसको लागू करने के लिए पैसों की मांग की तो मीडिया की सुर्खियां बन गईं। लोग कहने लगे कि मायावती के पास बेहतरीन बाग बगीचे बनवाने और उनमें जीते जी अपनी प्रतिमाएं लगवाने के लिए पैसा है, पर बच्चों को पढाने के नाम पर वे अपने खाली खजाने का रोना रो रहीं हैं। मायावती को जैसे ही मीडिया ने झेला वे एकाएक बैकफुट पर आ गईं, और उन्होंने कहा कि उन्होंने तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तर्ज पर केंद्र सरकार को पत्र लिखा था। उन्होंने कहा कि 11 सितम्बर 2009 को शिवराज ने केंद्र को पत्र लिखकर इस कानून के लागू होने पर राज्य पर तीन सालों में खचर् होने वाले नो हजार करोड रूपए मांग लिए थे। मायावती भी इससे प्रेरित हो गईं। 26 अक्टूबर को मायावती ने भी केंद्र सरकार को खत लिखकर इसके क्रियान्वयन के लिए तत्काल 18 हजार करोड रूपए और फिर हर साल 14 हजार करोड रूपए की मांग रख दी। शिवराज से प्रेरणा लेकर कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब, बिहार सहित आधा दर्जन सूबों ने केंद्र सरकार से इस मद में पैसे क मांग कर ही डाली।

आडवाणी को हाशिए में ढकेलती भाजपा

अतिमहात्वाकांक्षा पाले राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी का शनि एक बार फिर भारी होता दिख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद से हटने के बाद अब भाजपा के कुछ नेता उन्हें पर्दे के पीछे लाने की जुगत में लग गए हैं। दिल्ली प्रदेश भाजपा द्वारा भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में भाजपा के सुप्रीम कमांडर नितिन गडकरी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज और राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली को आमंत्रित किया, पर भाजपा के भविष्य के प्रधानमंत्री एल.के.आडवाणी को आमंत्रित करने से चूक गई। इसमें से गडकरी और जेतली समारोह में पहुंचे और अपना उद्बोधन दिया, पर सुषमा इससे कन्नी काट गईं। और तो और सीडी कांड के कारण भाजपा से रूखसत होने वाले संजय जोशी तक इस कार्यक्रम में थे, जिनका मंच से सम्मान भी किया गया। आडवाणी को वहां संबोधित करने न बुलाने की बात भले ही भाजपा नेताओं को छोटी लग रही हो पर आडवाणी जैसे राजनेता इस इशारे को भली भांति समझ चुके हैं, यही कारण है कि उनकी कीर्तन मण्डली अब उमाश्री भारती को भाजपा में वापस लाने की चालें चल रही है, ताकि भारती की तलवार से अनेक शत्रुओं का शमन हो सके।

पितृत्व मामले में सख्त हुआ न्यायालय

अय्याशी के आरोप में राजभवन से रूखसत हुए 83 वर्षीय वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नारयण दत्त तिवारी की मुसीबतें कम होती नजर नहीं आ रहीं है। पितृत्व मामले में अब कोर्ट का रवैया भी बहुत ही सख्त हो गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने नारायण दत्त तिवारी से पूछा है कि उनके जैविक पुत्र होने का दावा करने वाले रोहित शेखर की सत्यता जानने के लिए क्यों न उनका डीएनए टेस्ट करवाया जाए। न्यायमूर्ति जे.आर.मिर्घा ने कहा है कि तिवारी की उस हर तस्वीर के बारे में जिसमें वे रोहित और उसकी मां उगावला शर्मा के साथ दिख रहे हैं, अलग अलग जवाब दाखिल किए जाएं। कोर्ट ने तिवरी से एक माह में जवाब तलब किया है। अगर तिवारी की ओर से जवाब समय सीमा में नहीं दिया जाता है तो उन्हें व्यक्तिगत तैर पर कोर्ट में उपस्थित होना पडेगा। कोर्ट पहले भी तिवारी के अनुरोध को ठुकरा चुकी है जिसमें उन्होंने कहा था कि जन्म के 31 सालों बाद रोहित उनके चरित्र पर कीचड उछाल रहा है।

‘ताई’ ने उमेठे ‘भैइया’ के कान

लोकसभा में इंदौर का प्रतिनिधित्व करने वाली सुमित्रा महाजन ”ताई” ने मध्य प्रदेश में पांव पांव वाले ”भईया” के नाम से विख्यात मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ खुली जंग का एलान कर दिया है। इंदौर की उपेक्षा उन्हें खल रही है। इसी के मद्देनजर उन्होंने शिवराज को एक पाती लिखी है। बताते हैं कि अपने खत में सुमित्रा ताई ने लिखा है कि आप (शिवराज) पत्र पत्रिकाओं और भाषणों में यह कहते नहीं थकते कि इंदौर उनके सपनों का शहर है। शिवराज को कडा उलाहना देते हुए ताई कहतीं हैं कि उनका अनुभव है कि सपने अक्सर नींद में देखे जाते हैं, और आंख खुलने के बाद या तो सपने टूट जाते हैं या बिखर जाते हैं। ताई ने शिवराज की लगाम कसते हुए विनम्र भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि अगर मुख्यमंत्री मानते हैं कि इंदौर वास्तव में देश के हृदय प्रदेश का सांस्कृतिक, शैक्षणिक, व्यवसायिक और सबसे अधिक कर देने वाला शहर है तो इसे प्रशासनिक, व्यवसायिक, शैक्षणिक एवं अन्य सभी तरह से व्यवस्थित करना मध्य प्रदेश के हित में ही होगा। ताई महिला हैं और उनकी सर्वाधिक पीडा शराब ठेकों को लेकर है। इंदौर में शराब ठेकों का राजस्व 100 करोड से बढकर 300 करोड जा पहुंचा है। वैसे भी सूबे में अगर पचास फीसदी महिलाएं किसी शराब दुकान का विरोध करें तो वह उस मोहल्ले में नहीं खुल सकती है।

कहां है मानवाधिकार के ठेकेदार

छत्तीसगढ में 83 पुलिस के जवान नक्सलियों के हमलों में हाथों अपनी जान गंवा चुके हैं। इसके बाद एक मातम का माहौल पूरे देश में पसर गया है। कुछ यक्ष प्रश्न लोगों के दिलो दिमाग में घुमड रहे होंगे। छोटे मोटे मामलों में शहरों को बंद कराने वाले राजनैतिक दल भी सदमे में हैं, जो उन्होंने भारत बंद का आव्हान नहीं किया। मानवाधिकार का ठेका लेकर दुकानदारी करने वाले संगठन गमजे में हैं, वे भी इस मामले में सामने नहीं आएंगे। किसी सांसद या विधायक के निहित स्वार्थ का मामला होता तो हमारे ”जागरूक जनसेवकों” का गला संसद या विधानसभा में चीख चीखकर रूंध जाता, पर अफसोस वे भी गमजदा हैं। देश सेवा, पीडित मानवता के सहारे अपनी रोजी रोटी कमाने वाले संगठन भी मुंह पर पटट्ी बांघे बैठे हैं। सोचना पडेगा आखिर क्या हो गया है हमारे देशवासियों को। जो जवान देशवासियों की जान माल की हिफाजत के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं, उनकी याद में आंसू तो छोडें, मोमबत्ती जलाने के लिए भी देशवासियों के पास समय नहीं है। अगर यही बात वेलंटाईन डे की होती तो आप बाजार में एक फूल के लिए तरस जाते पर . . .। सच ही कहा है :-

कहां तो चिरागां तय था हर एक घर के लिए!

कहां चिराग भी मयस्सर नहीं शहर के लिए!!

राजमाता के नाम पर फर्जीवाडा

कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के नाम से फर्जीवाडे का एक प्रकरण प्रकाश में आया है। हुआ यूं कि बीते माह के अंतिम दिनों में कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) से एक फोन काल देश की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के कार्यालय पहुंची कि राजमाता तत्काल महामहिम से एक जरूरी मीटिंग करना चाह रहीं हैं। महामहिम के मिनिट टू मिनिट के प्रोग्राम को देखने से पता चला कि इस तरह की कोई मीटिंग का अस्तित्व ही नहीं है। इसके उपरांत उसी नंबर से महामहिम के सचिव को भी फोन आया और फोन काट दिया गया। इसकी शिकायत डीसीपी राष्ट्रपति भवन को की गई। महामहिम आवास के सूत्रों का कहना है कि फोन करने वाला कोई शैलेंद्र नाम बता रहा था और जो नंबर डिस्पले हो रहा था वह कांग्रेस प्रजीडेंट के आवास का ही था। इस घटना से दिल्ली पुलिस और खुफिया एजेंसी की नींद में खलल पड गया है। आला अधिकारी यह जानने में जुटे हुए हैं कि आखिर महामहिम राष्ट्रपति के आवास पर महामहिम कांग्रेस प्रेजीडेंट के घर के नंबर से कैसे फोन काल आई जबकि वहां से हुई ही नही है।

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

प्रख्यात व्यंगकार शरद जोशी का व्यंग्य संग्रह ”हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे” अचानक ही जेहन में जीवंत हो गया, जब महामहिम राष्ट्रपति के द्वारा पदम सम्मान से अनेक विभूतियों को नवाजा गया। वे इस सम्मान के हकदार थे, या नहीं या इस सम्मान को चुनने के लिए क्या मापदंड तय किए गए थे, यह बात तो सरकार जाने पर मीडिया ने भी इसमें इक तरफा भूमिका ही निभाई है। दरअसल प्रवासी भारतीय संत सिंह चटवाल को इस सम्मान से नवाजे जाने पर बहस आरंभ होना लाजिमी है। अमेरिका में व्यवसाय करने वाले संत सिंह चटवाल को महामहिम ने राष्ट्रपति भवन के अशोक हाल में पदम सम्मान से सम्मानित किया। चटवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार में शह देने के अनेक मामलों में जांच लंबित है। यह सच है कि जब तक उन पर आरोप सिध्द नहीं हो जाते तब तक उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता है, पर वे आरोपी हैं इस बात को भारत सरकार को सोचना चाहिए था और एसी कौन सी दुनिया समाप्त होने वाली थी। टीवी चेनल्स की माने तो 2012 में दुनिया समाप्त होगी, इस लिहाज से अभी दो साल थे, सरकार चाहती तो जांच जल्दी पूरी कर अगले साल चटवाल को सम्मान से नवाज सकती थी।

अब मातृभाष के लिए अनुमति!

हिन्दी देश की मातृभाषा है, यह पाठ बचपन से ही पढते आ रहे हैं, पर मातृभाषा में बातचीत के लिए अनुमति की आवश्यक्ता पडेगी वह भी आजाद भारत के गणराज्य में यह कभी सोचा भी न था। जी हां यह सच है दिल्ली हाईकोर्ट में एक अधिवक्ता को हिन्दी में जिरह करने के लिए बाकायदा अनुमति लेनी पडी। और तो और अनुमति लेने के लिए अंग्रेजी में आवेदन और याचिका भी दाखिल करना पडा। है न आश्चर्य की बात। शेयर खरीदने और बेचने को लेकर हुए करार के एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में एक अधिवक्ता को अंग्रेजी में आवेदन कर हिन्दी में बहस की अनुमति लेनी पडी। उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति रेखा शर्मा ने वकील से पूछा कि उसकी याचिका तो अंग्रेजी में है, फिर हिन्दी में बहस की अनुमति क्यों! वकील ने बडी ही मासूमियत से जवाब दिया, ”हुजूरेआला, याचिका अंग्रेजी में तैयार करना मजबूरी था, क्योंकि हिन्दी की याचिका उच्च न्यायालय के पंजीयक द्वारा स्वीकार नहीं की जाती। इस तरह उडती है ”हिन्दी की चिंदी” भारत गणराज्य में सखे।

पुच्छल तारा

उत्तर प्रदेश के बस्ती शहर के दमाद पंकज शर्मा पेशे से वकील हैं। वे सानिया मिर्जा और शोएब की शादी की किस्सगोई मीडिया में देखते और पढते आ रहे हैं। मीडिया के उतावलेपन से वे उकता गए हैं। हमें ईमेल भेजते हुए वे कहते हैं कि अब मीडिया दोनों की शादी की तारीख पर तारीख दिए जा रहा है अब खबर आई है कि सानिया की शादी 15 अप्रेल को होगी। पंकज मीडिया के नुमाईंदो से पूछते हैं कि यह बताया जाए कि यह सानिया की शादी की तारीख है या कोर्ट में हमेशा बढाई जाने वाली पेशी की तारीख।

-लिमटी खरे

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