लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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लिमटी खरे

गांधी ने कोसा गांधी को!

नेहरू गांधी के नाम पर आधे दशक से अधिक सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस के खेवनहारों को असली गांधी (महात्मा गांधी) के पड़पोते तुषार गांधी ने जमकर कोसा है। हालिया कैबनेट विस्तार के बाद तुषार ने ट्विट किया है कि संप्रग सरकार ने महात्मा गांधी के हत्यारों को कैबनेट में स्थान दिया है। उनका कहना है कि हाल ही में कैबनेट में शामिल किए गए जितेंद्र सिंह अलवर राजघराने से हैं और यह वही राजघराना है जिसने बापू के हत्यारे नाथूराम गोडसे को संरक्षण दिया था। गौरतलब है कि बापू के अवसान के बाद कांग्रेस ने उन्हें भले ही राष्ट्रपिता का दर्जा दिया हो पर उनके परिवार को एकदम किनारे कर दिया है। बापू के परिवार का हाल जानने किसी को फुर्सत नहीं है। वैसे यह कटु सत्य है कि आजादी के परवानों में जवाहर लाल नेहरू के वारिसान के अलावा और किसी को कांग्रेस ने सहेजा ही नही है।

रील लाईफ से रियल लाईफ में उतरी पेज थ्री

पेज थ्री सिनेमा ने अखबार में तीसरे नंबर के पेज की मांग को बढ़ाया है। साथ ही इसमें बम ब्लास्ट के दौरान अफसरान को पार्टी मनाते दिखाया है। यह रील लाईफ थी, किन्तु देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 13 तारीख को हुए बम ब्लास्ट के बाद एसा ही कुछ नजारा रियल लाईफ में देखने को मिला। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बम धमाकों के लगभग छः घंटे बाद जब देश शोक और सदमे में डूबा था तब एक फैशन डिजायनर के शो में केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय, भाजपा के राष्ट्रीय सचिव अशोक प्रधान और दिल्ली की पूर्व मेयर आरती मेहरा ने शिरकत की। सहाय, प्रधान और मेहरा का तर्क कि उन्हें जानकारी नहीं थी, गले नहीं उतरता। आज संचार क्रांति के इस दौर में जब पत्ता खड़कता है तो सबको खबर हो जाती है, एसी परिस्थिति में घटना के छः घंटे बाद भी इन शीर्ष राजनेताओं को इसका पता न चले यह संभव ही नहीं हो सकता है।

एमपी को प्रायारिटी से उतारा कांग्रेस ने

एक समय था जब देश के हृदय प्रदेश पर कांग्रेस हुकूमत किया करती थी। 2003 में राजा दिग्विजय सिंह ने इसके ताबूत में आखिरी कील ठोंकी और फिर कांग्रेस का संगठन यहां दम तोड़ गया। सुभाष यादव और सुरेश पचौरी जैसे कुशल प्रबंधक और प्रशासक भी कांग्रेस को सूबे में नहीं जिला पाए। अब कमान कांति लाल भूरिया के हाथों में आई है। भूरिया के कामन संभालते ही उपचुनाव में कांग्रेस औंधे मुंह गिर गई। आलाकमान को अब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वापसी की कोई उम्मीद की किरण दूर दूर तक दिखाई नहीं पड़ रही है। यही कारण है कि केंद्र के हालिया फेरबदल में मध्य प्रदेश के खाते के चार ताज में से दो कांतिलाल भूरिया और अरूण यादव के सर से उतार लिए गए हैं। भूरिया पहले ही प्रदेश में कांग्रेस की पतवार थामे हैं और यादव को केंद्र में संगठन में स्थान दिया गया है। सुरेश पचौरी अभी कतार में ही हैं। मौके का फायदा शिवराज ने उठाया और कह दिया कि कांग्रेस ने एमपी से अब उम्मीद छोड़ दी है।

महंत के ‘चरण‘ में जनसंपर्क विभाग

संयुक्त मध्य प्रदेश के गृह मंत्री रहे चरण दास महंत अब छत्तीसगढ़ से सांसद हैं और हाल ही में कैबनेट विस्तार में राज्य मंत्री भी बनाए गए हैं। महंत की ‘चरण वंदना‘ में मध्य प्रदेश सरकार के दिल्ली स्थित एक कार्यालय के अधिकारी की दिलचस्पी आश्चर्यजनक है। महंत के मंत्री बनने से लेकर उनके कार्यभार ग्रहण करने तक की पेपर क्लिपिंग्स को मध्य प्रदेश सरकार की छवि चमकाने के लिए पाबंद जनसंपर्क विभाग के दिल्ली कार्यालय ने सहेजकर महंत तक पहुंचाया। विभाग के सूत्रों ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि शिवराज सिंह चौहान सरकार से पगार पाने वाले इस कार्यालय के अधिकारी द्वारा कांग्रेस के सांसद में एसी क्या दिलचस्पी। बताया जाता है कि इसके पूर्व यह कार्यालय मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष और राज्य सभा सांसद प्रभात झा के कार्यालय के बतौर काम कर रहा था। मीडिया असमंजस में है कि यह सरकारी दफ्तर है या संसद सदस्य प्रभात झा अथवा केंद्रीय मंत्री चरण दास महंत का कार्यालय!

क्या यह अनुशासनहीनता नहीं!

मध्य प्रदेश पर दस साल राज करने के बाद दस साल का वनवास की घोषणा कर उसे भोगने वाले कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह बेलगाम हो गए हैं। मध्य प्रदेश के चुनावों में अभी दो साल से ज्यादा का वक्त है। राजा केंद्र में महासचिव हैं, अभी चुनाव अभियान समिति तो छोड़िए मध्य प्रदेश के कांग्रेसी निजाम कांतिलाल भूरिया ने अपनी टीम भी नहीं बनाई है तब राजा दिग्विजय सिंह ने सामंतशाही तौर तरीकों को आगे बढ़ाते हुए अपने पुत्र जयवर्द्धन सिंह को राघोगढ़ से उतारने का एलान कर दिया है। क्या यह अनुशासनहीनता की श्रेणी में नहीं आता? राजा कभी राहुल की ताजपोशी की पैरवी करते हैं तो कभी अपने पुत्र को विधायक बनाने की बात करते हैं। देश में प्रजातंत्र है या राजशाही कि एलान किया जाए कि फलां अब राजकाज संभालने के लिए तैयार हो गए हैं। रही बात ‘‘मैनेज्ड‘‘ भाजपा की तो वह भी राजा के इस कदम पर मौन अख्तिायार किए हुए है।

गौतम ने रूलाया गड़करी को!

उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी का भाजपा में विलय हो गया। इसके विलय के अवसर पर भाजश अध्यक्ष संघप्रिय गौतम ने अपने महत्व को रेखांकित करते हुए लगभग बीस मिनिट तक भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी को सांसें थामने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली में आयोजित इस प्रोग्राम में उमा भारती और नितिन गड़करी ने बेहद अच्छा और ममस्पर्शी उद्बोधन देकर तालियों की गड़गड़ाहट से पंडाल को गुंजायमान कर दिया। जब बारी भाजश अध्यक्ष संघप्रिय की आई तो उन्होंने ‘‘मैं भाजश का भाजपा में विलय करता हूं,।‘‘ की घोषणा के पहले अपने और अटल आड़वाणी के संस्मरण सुनाने आरंभ कर दिए। बार बार उमा और गड़करी के चेहरे पर आते जाते भाव साफ जाहिर कर रहे थे कि संघप्रिय की भाषणबाजी से वे व्यग्र थे। अंत में जब उमा भारती ने उन्हें आंखें दिखाईं तब जाकर गौतम ने पार्टी के विलय की घोषणा की।

राहुल के कारण गई सिपाही की जान!

कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के सुरक्षा घेरे के चलते एक सिपाही को असमय ही काल के गाल में समाने पर मजबूर होना पड़ा। राहुल पिछले दिनों कानपुर दौरे पर थे, उन्हें जिस मार्ग से गुजरना था वहां कर्फ्यू जैसे हालात बना दिए गए थे। राहुल की सुरक्षा में लगे एसपीजी के जवानों ने एक घायल पुलिस के सिपाही को अस्पताल में दाखिल होने से रोक दिया गया क्योंकि राहुल गांधी का काफिला वहां से गुजरने वाला था। घाटम पुर तहसील के जाजपुर गांव के सिपाही धर्मेंद्र कुमार सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया था। जैसे ही उसे अस्पताल ले जाया गया वहां एसपीजी ने उसका रास्ता रोक लिया। देरी के चलते धर्मेंद्र ने दम तोड़ दिया। इसके पहले प्रधानमंत्री के काफिले की सुरक्षा व्यवस्था के चलते अमन नामक बच्चे ने दम तोड़ा था। अतिविशिष्ट की श्रेणी में शामिल लोगों की सुरक्षा का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़े इस तरह की आजादी से तो गुलामी की जंजीरे ही बेहतर थीं।

भरपेट पैसा फिर भी भूखे!

एमपी के निजाम शिवराज सिंह चौहान सदा ही कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पर उपेक्षा के आरोप जड़ते आए हैं। उधर केंद्र का कहना रहा है कि वह मध्य प्रदेश के प्रति उदार है, और पर्याप्त सहायता देती है। यह मामला उजागर हुआ वन एवं पर्यावरण विभाग से। केंद्र सरकार द्वारा 11113.75 लाख रूपए मध्य प्रदेश के टाईगर रिजर्व के लिए प्रदान की थी, इसमें से राज्य सरकार द्वारा महज 9519.23 लाख रूपए ही खर्च किए। इसमें पेंच के लिए स्वीकृत राशि 796.69 में से 597.79 ही व्यय हो पाए। करोड़ों अरबों रूपए खर्च करने के बाद भी टाईगर रिजर्व में न तो वन्य जीवों का अवैध शिकार रोका जा सका है और न ही बेशकीमती लकड़ियों को काटने का काम। बारिश में हर साल करोड़ों रूपए मैंटिनेंस के नाम पर पानी में बहा दिए जाते हैं। एक समय था जब टाईगर रिजर्व में पोस्टिंग को पनिशमेंट पोस्टिंग माना जाता था किन्तु अब तो यह मलाईदार हो गई है।

फेरबदल बनाम असंतोष का उबाल!

कमजोर प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने पांच संपादकों की टोली के सामने खुद को मजबूत जतलाने का प्रयास किया। कुछ समय तक लगा मानो वे सच कह रहे हों। हाल ही में एक बार फिर साबित हो गया है कि पीएम कमजोर ही नहीं वरन् चाबी से चलने वाले गुड्डे के मानिंद हैं। जैसा सोचा जा रहा था, वैसा नहीं रहा यह विस्तार। कैबनेट विस्तार से असंतोष की स्वर लहरियां उभरकर सामने आ गई हैं। आदिवासी बाहुल्य मध्य प्रदेश से किसी भी आदिवासी नेता को लाल बत्ती नहीं दी गई। बचे दो मंत्री कमल नाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सामान्य वर्ग के हैं। गुरूदास कामथ त्यागपत्र दे चुके हैं, तो पीएम इसे अपना अंतिम विस्तार बता रहे हैं। वहीं दो सीट गठबंधन धर्म के कारण खाली भी रखी गई है। अगर इसे भरा जाता है तो यह विस्तार अंतिम कैसे हुआ। सच है कांग्रेस के लिए ‘गठबंधन धर्म‘ वाकई ‘राष्ट्रधर्म‘ से बढ़कर है।

जनजातीय मंत्री की जाति पर ही शक!

मनमोहन सरकार के जनजातीय मंत्री व्ही.किशोर चंद्र देव के आदिवासी होने पर ही शक किया जा रहा है। लोकसभा की आरकु आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के मामले में कोर्ट में एक मामला दायर किया गया था। वैसे भी आदिवासी मामलों का मंत्रालय जमीन से जुड़े किसी आदिवासी के पास होने से ही उनका उद्धार संभव माना जा रहा है। इसके पहले राजघरानों से संबंध रखने वाली उर्मिला सिंह और सूट बूट वाले आदिवासी मामा कांतिलाल भूरिया के हाथों रही है इसकी लगाम। अब देव आदिवासी हैं या नहीं यह भी साफ नहीं है, वहीं इस विभाग के राज्य मंत्री जाति के जाट हैं। कांग्रेस के आदिवासी सांसदों का आरोप सही है कि आदिवासियों के विकास की जवाबदारी सदा से ही राजघरानों के कांधों पर सौंप दी जाती है। भला सामंतशाही के बीच पले बढ़े राजा गरीब आदिवासी की व्यथा कैसे समझेंगे।

तम्बाखू के ब्रांड एम्बेसेडर बने राहुल गांधी!

आजादी के पहले कहा जाता था कि इंदिरा गांधी के दादा मोती लाल नेहरू के कपड़े विलायत से घुलकर आते थे। यही बात साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वे कितने अमीर थे। उसके बाद उनकी विरासत जवाहर लाल फिर उनकी पुत्री इंदिरा, के बाद राजीव और संजय के परिजनों ने संभाली। एक के बाद एक सत्ता और शक्ति के केंद्र का हस्तांतरण एक ही परिवार तक सिमट कर रह गया। बीते दिनों राहुल गांधी तम्बाखू के ब्रांड एम्बेसेडर के रूप में नजर आए। एक समारोह में मंच पर हुक्के को स्वीकार किया राहुल ने। सिगरेट एण्ड अदर टुबेके प्रोडेक्ट एक्ट 2003 में तम्बाखू के किसी भी उत्पाद को प्रोत्साहित करना प्रतिबंधित है। कांग्रेसी मानें न मानें पर राहुल गांधी अभी परिपक्व नहीं हो पाए हैं। राहुल के खिलाफ कोई कार्यवाही इसलिए भी नहीं होगी क्योंकि ‘‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं।‘‘

सहेजेंगे वालीवुड़ की विरासत

केंद्र सरकार ने भारत गणराज्य में आजादी के पहले से अब तक की फिल्मों की विरासत को सहेजने की अभिनव योजना बनाई है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा लगभग साढ़े छः सौ करोड़ रूपयों की लागत की पहली किश्त से इस काम को अंजाम दिया जाएगा। विभाग द्वारा पुरानी मशहूर फिल्मों के प्रिंट, मनमोहक पोस्टर्स, अनारकली की सलवार कमीज, गब्बर के अलग हटकर पहने कपड़ों जैसे कास्टयूम, पुराने कैमरे, ग्रामोफोन, पटकथाएं, पांडुलिपि, रिकार्डस, कैसेट्स, सीडी, अनमोल तस्वीरें, सेट डिजाईन आदि को सहेजकर रखा जाएगा। इसमें आठ हजार से ज्यादा खराब हो रही फिल्मों, चालीस हजार से ज्यादा पटकथाओं और दो लाख से ज्यादा पोस्टर्स और तस्वीरों के डिजिटलीकरण के साथ ही साथ वेशभूषा को भी सहेजकर रखा जाएगा। अगर यह योजना परवान चढ़ी तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह बेहद ममस्पर्शी हो सकता है।

जेपीसी के लिए नए चेहरों की तलाश

2 जी स्पेक्ट्रम की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के लिए अब तीन नए चेहरों की तलाश आरंभ हो गई है। दरअसल इसमें शामिल तीन सांसदांे के मंत्री बनने के बाद यह खोज आरंभ की गई है। संसदीय नियम कहते हैं कि मंत्री बनने के बाद सदस्य इसकी बैठक में हिस्सा नहीं ले सकते हैं। देव, नटराजन और घटोवर मंत्री बन गए हैं, जो जेपीसी के मेम्बर थे। वी.किशोर चंद देव को जनजातीय मंत्री, जयंती नटराजन को वन एवं पर्यावरण तथा पवन घटोवर को पूर्वाेत्तर मामलों का मंत्री बनाया गया है। जेपीसी में अब इन तीनों का स्थान तीन कांग्रेस के ही सदस्य ले पाएंगे। इसके लिए सांसदों द्वारा अपने अपने आकाओं को सिद्ध करना आरंभ कर दिया है। कहा जा रहा है कि सांसदों ने कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह और सोनिया के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल की देहरी पर सर रगड़ना आरंभ कर दिया है।

पुच्छल तारा

राजनेता, जनसेवक, लोकसेवक सारी उमर पैसों के बीच खेलने के बाद भी उसके पीछे ही भागते रहते हैं। शरद पवार केंद्र में मंत्री हैं, फिर भी देश सेवा से बढ़कर उनके लिए क्रिकेट का पद है, क्योंकि इसमें मलाई ज्यादा है। शरद पवार की इस फितरत को महाराष्ट्र से विपिन ने एसएमएस भेजकर साफ करते हैं। विपिन लिखते हैं -‘‘ब्रेकिंग न्यूज . . .। शरद पंवार ने अब सारे काम धाम छोड़ दिए हैं। पवार आजकल मलयाली सीख रहे हैं और वे योजना बनाने में व्यस्त हैं कि किस तरह पदम्नाभन मंदिर के खजांची का चुनाव लड़ें और जीत सकें।‘‘

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