लेखक परिचय

तारकेश कुमार ओझा

तारकेश कुमार ओझा

पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में तारकेश कुमार ओझा का जन्म 25.09.1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। हालांकि पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे। साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की। कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 9 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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-तारकेश कुमार ओझा-
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केंद्र की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की संभावना के बीच ओड़िशा के सत्तारूढ़ बीजू जनता दल द्वारा संभावित मोदी सरकार को शर्तों पर समर्थन देने की पेशकश सचमुच हैरान कर गई। यूं तो बीजू जनता दल एक समय भाजपा नीत राजग का घटक दल था। लेकिन राजग के सत्ता से हटने के बाद ही इस पार्टी ने अपनी खिचड़ी अलग पकानी शुरू कर दी। बहुत ज्यादा आक्रामक न होने के बावजूद एेसी संभावना कम ही थी कि कभी यह पार्टी भाजपा की हमराही बन सकती है। क्योंकि कांग्रेस नीत यूपीए-2 से भी समान दूरी बना कर चलने वाले इस दल का सरोकार सिर्फ अपने प्रदेश से था, औऱ हर साल बजट पेश होने के बाद ओड़िशा की कथित उपेक्षा के अारोपों पर रेल रोको व बंद जैसे कार्यक्रमों को छोड़ यह पार्टी साल भर अमूमन चुप्पी ही साधे रहती। संभावित मोदी सरकार के प्रति नरमी का रुख तो शरद पवार वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी देखा जा रहा है। लेकिन बीजू जनता दल का रवैया सचमुच आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा। हालांकि पूरे पत्ते खुलने के इंतजार में बैठे तमाम राजनीतिक पार्टियां अभी किंतु-परंतु का दांव चल भ्रम की स्थिति बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन संभावना यही है कि केंद्र में जैसे ही नई सरकार के गटन का मार्ग प्रशस्त होगा। कई पार्टियां अपने रुख से बिल्कुल विपरीत जा कर नई लाइन पकड़ते हुए अपनी स्वार्थ सिद्धि के उपाय शुरू कर देंगी।

वैसे देखा जाए तो समय व परिस्थिति को देखते हुए पलटी मारने का भारतीय राजनीति में इतिहास कोई नया नहीं है। कभी सोनिया गांधी के विदेशी मूल को मुद्दा बना अलग रास्ता पकड़ने वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तमाम नेताओं ने उसी सोनिया गाधी के नेतृत्व में चलने वाले यूपीए सरकार में पूरे 10 साल तक सत्तासुख भोगा। उत्तर प्रदेश के अजीत सिंह के बारे में तो यह समझ में ही नहीं आता कि वे कब किसके साथ रहते हैं और कब अलग हो जाते हैं। आज धर्मनिरपेक्ष राजनीति का झंडा उठाए चल रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी के साथ चले। अगर कहा जाए कि भाजपा के बगैर नीतिश के लिए बिहार से लालू प्रसाद यादव को सत्ता से बेदखल करना संभव न हो पाता, तो शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन प्रदेश की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत होते ही नीतिश को धर्म निरपेक्षता की याद सताने लगी। उन्हें भाजपा में खोट नजर आने लगा। कुछ यही हालत पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की भी है। हाल तक चले चुनाव प्रचार के दौरान राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नरेन्द्र मोदी के मामले में एेसी तल्खी दिखाई, जिसकी अपेक्षा आजम खान से भी नहीं की जा सकती है। वैसे सच यह है कि तृणमूल कांग्रेस भी दो-दो बार भाजपा के साथ राजग का हिस्सा रह चुकी है। एेसे में यह समझना मुश्किल है कि आखिर हमारे राजनीतिक दलों की असली विचारधारा क्या है। वे दोस्त या दुश्मन अपनी नीतियों के अनुरूप तय करते हैं या परिस्थित जन्य स्वार्थों की खातिर। राजनीतिक दलों से इसकी अपेक्षा तो बेमानी ही है कि वे एेसे सवालों का देश की जनता को सही जवाब देंगे। देशवासी बस अनुमान लगा सकते हैं क्योंकि शायद राजनीति इसी का नाम है…।

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