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दीपिका कुमारी 

सेहत प्रकृति का दिया अनमोल उपहार है। कहा भी यही जाता है कि एक स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ समाज और एक स्वस्थ समाज ही विकसित देश की कल्पना को साकार कर सकता है। यही कारण भी है कि स्वास्थ्य के प्रति विश्वद के सभी देशों की सरकारें संवेदनशील हैं। लोगों को स्वास्थ्य के प्रति आगाह करने के लिए अनेक स्तरों पर कार्य किए जाते हैं। यूरोप और अमेरिका जैसे विकसीत देशों में स्वास्थ्य के प्रति सरकार की चेतना का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि किसी दूसरे देश में बीमारी का प्रकोप बढ़ता है तो वह अपने नागरिकों को उस देश में यात्रा नहीं करने की चेतावनी तक जारी कर देते हैं। अंतरराष्ट्रीतय स्तर पर भी कई सरकारी और गैर सरकारी ऐजेंसियां स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। भारत में भी स्वास्थ्य के प्रति गंभीरता को समझते हुए केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक विभिन्न योजना संचालित कर रही हैं। पोलियो और चेचक जैसी बीमारियों का खत्म होना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

दूसरी ओर सभी को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करवाने के मकसद से सरकार की ओर से प्रयास किए जाते रहते हैं। इसके अंतर्गत गरीबों, महिलाओं, अनुसूचित जाति व जनजाति और बीपीएल परिवारों को बड़े बड़े अस्पतालों में भी मुफ्त ईलाज की सुविधाएं उपलब्ध करवाईं जाती हैं। लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में गरीबी रेखा से उपर रहने वाले बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो सिर्फ इसलिए अस्वस्थ्य रह जाते हैं क्योंकि उनके पास इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होते हैं। आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे ही कमज़ोर लोगों के लिए हुकुमत ने सरकारी अस्पतालों की स्थापना कर रखी है। जहां अत्यंत ही कम फीस पर बेहतर ईलाज की सुविधाएं मुहैया की जाती हैं। सरकार की ओर से ऐसी सुविधाएं उपलब्ध करवाना कल्याणकारी राज्य के अंतर्गत आता है। लेकिन सिर्फ अस्पतालों के निर्माण से ही सरकार अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकती है। इसके लिए आवश्यपक है कि इन अस्पतालों में बेहतर से बेहतर ईलाज की सुविधाएं मुहैया करवाई जाएं। परंतु सच्चाई यह है कि आज भी कई गरीब रोज़ाना केवल इसलिए मौत के शिकार हो जाते हैं क्योंकि उनके पास निजी अस्पतालों में ईलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होते हैं और उन्हें सरकारी अस्पतालों में बेहतर ईलाज की सुविधा नहीं मिल पाती है। इन सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाईयों की बात कही तो जाती है लेकिन जब मरीज के परिजन काउंटर पर दवा लेने जाते हैं तो उन्हें बताया जाता है कि दवाईयां उपलब्ध नहीं हैं। इस तरह उन्हें अस्पताल के बाहर निजी मेडिकल स्टोर से दवाईयां खरीदने की सलाह दी जाती है। मानो इन कर्मचारियों को मुफ्त दवाईयां देने के लिए नहीं बल्कि प्राइवेट मेडिकल स्टोर का रास्ता बताने की तनख्वाह दी जाती है।

ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों की जो स्थिती है उनमें बिहार के दरभंगा स्थित मेडिकल काॅलेज को प्रमुख उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। जहां की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत ही दयनीय है। यदि डॉक्टर मरीज का चेकअप कर भी ले तो उसके ईलाज से संबंधित दवाईयां अस्पताल में मौजूद नहीं होती हैं। ऐसी परिस्थिती में आर्थिक रूप से कमजोर मरीज को किस प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता होगा इसका हम केवल अंदाजा ही लगा सकते हैं। अस्पताल के अंदर जितनी परेशानियां हैं उससे कहीं अधिक बाहर होती हैं। अस्पताल के आसपास गंदगियों का अंबार लगा रहता है। जिससे गुजर कर मरीज और डॉक्टर रोजाना आना जाना करते हैं। आलम यह है कि मरीज एक बीमारी का ईलाज कराने आते हैं और इन गंदगियों के बदौलत दस और बीमारियों की सौगात लेकर जाते हैं। लेकिन अस्पताल प्रशासन को इससे कोई गुरेज़ नहीं है। बात सिर्फ ईलाज में कोताही की नहीं है बल्कि यहां आने वाले मरीजों को सरकार द्वारा दिए जाने वाली सुविधाओं को बताने में भी कोताही बरती जाती है। सरकार की ओर से गर्भवती माताओं को प्रसव के बाद बच्चों की देखभाल के लिए रकम दिए जाते हैं। लेकिन शायद ही किसी गर्भवती महिलाओं को इसके लाभ के बारे में सूचनाएं दी जाती हैं। अलबत्ता सरकारी रिकार्डों में उन महिलाओं का नाम सुविधाओं का लाभ उठाने वालों की सूची में अवष्य दर्ज रहता है। यह गोरखधंधा किस प्रकार चल रहा है यह तो जांच के बाद ही सामने आ सकता है। लेकिन इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि सरकारी अस्पतालों में सरकार की ओर से दी जानी वाली सुविधाओं को ईमानदारीपूर्वक लागू किया जाए तो वह देश के किसी भी उत्कृश्ट निजी अस्पतालों को टक्कर दे सकते हैं। लेकिन यह सारी बातें ईमानदारी पर आकर समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न यह उठता है कि यदि सरकार की ओर से सरकारी अस्पतालों को सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाए जाने का दावा किया जाता है तो आखिर मरीज को निजी नर्सिंग होम में ईलाज की आवश्यककता क्यूं पड़ती है? इस प्रश्ना का उत्तर केवल सरकार को ही नहीं बल्कि समाज को भी सामूहिक रूप से तलाशना है। यदि सरकारी अधिकारी अथवा डॉक्टर अपने कार्य के प्रति लापरवाही बरतता है तो इसके लिए किसी न किसी प्रकार से हम भी जिम्मेदार हैं। जो सरकार द्वारा प्रदत सूचना का अधिकार जैसे अन्य अधिकारों का उपयोग नहीं करते हैं। हालांकि बिहार देश का पहला राज्य जिसने अपने नागरिकों को फोन के माध्यम से सूचना का अधिकार के उपयोग की सुविधा प्रदान कर रखी है। इसके अतिरिक्त सेवा का अधिकार समेत कई सेवाओं से संबंधित टोल फ्री नंबर प्रदान कर रखे हैं ताकि आम जनता इसके लाभ उठा सके। परंतु जागरूकता और साक्षरता में कमी के कारण हम इसका भरपूर लाभ नहीं उठा पाते हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार के अतिरिक्त कई गैर सरकारी संगठन भी कार्य कर रहे हैं जो आम जनता को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए टोल फ्री नंबर प्रदान करती है। ताकि एक स्वस्थ्य समाज के माध्यम से स्वस्थ्य भारत का निर्माण हो सके। उदाहरण के तौर पर महिलाएं अपने स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के जानकारी के लिए 18001800555 अथवा 18001800556 पर संपर्क कर सकती हैं। इस टोल फ्री नंबर के माध्यम से महिलाएं बच्चों में अंतर और उसके लिए किए जाने वाले उपायों पर बात कर सकती हैं। ऐसे कई उदारहण है जहां सरकार और गैर सरकारी संगठन स्वस्थ्य समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रही हैं। लेकिन यह उस वक्त तक अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकता है जबतक समाज जागरूक नहीं होता है। अन्यथा लापरवाही का सिलसिला ऐसी ही अनवरत जारी रहेगा। (चरखा फीचर्स)

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