लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अब तक राजा था, अब महाराजा है। ए राजा ने अपनी चहेती कंपनियों को लाइसेंस दिए और देश के पौने दो लाख करोड़ रुपए का नुकसान किया, लेकिन सरकारी संगठन ‘इसरो’ ने देवास मल्टीमीडिया को एस-बेंड की लीज दी और पूरे दो लाख करोड़ रुपए का नुकसान कर दिया। राजा ने अपनी रेवड़ियां दर्जनों कंपनियों को बांटीं, जबकि ‘इसरो’ ने अकेली एक ही कंपनी को निहाल कर दिया। वह थी सौ सुनार की और यह है एक लुहार की!

इतना बड़ा घोटाला हुआ कैसे? ‘द हिंदू’ द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन से पता चला है कि इस घोटाले के सूत्रधार हमारे नौकरशाह हैं। ‘इसरो’ यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन। बेंगलुरू स्थित इस संगठन के एक पूर्व सचिव डॉ चंद्रशेखर ने 2004 में एक कंपनी बनाई, देवास मल्टीमीडिया और उसने ‘इसरो’ से एक समझौते के तहत अंतरिक्ष में दो उपग्रह छोड़ने का समझौता किया। 2005 में हुए समझौते के अनुसार ‘देवास’ को एस-बेंड स्पेक्ट्रम की 70 मेगाहट्र्ज तरंगों के इस्तेमाल का अधिकार अपने आप मिल गया। यह ‘लीज’ 20 वर्ष के लिए थी। इसके बदले ‘देवास’ ने ‘इसरो’ को 1000 करोड़ रुपए देना तय किया।

अब जरा हम यह देखें कि ‘देवास’ जैसी निजी कंपनी के मुकाबले सरकारी कंपनियों – बीएसएनएल और एमटीएनएल – को ये ही तरंगें किस भाव बेची गई हैं। उन्हें सिर्फ 20 मेगाहट्र्ज के लिए 12,487 करोड़ रुपए देने होंगे। पिछले साल सरकार ने इन्हीं तरंगों की नीलामी की तो सिर्फ 15 मेगाहट्र्ज पर उसे 67,719 करोड़ रुपए मिले। यदि यह नीलामी 70 मेगाहट्र्ज की होती तो उसे कितने करोड़ मिलते? ढाई-तीन लाख करोड़ से कम क्या मिलते यानी ‘इसरो’ और ‘देवास’ ने मिलकर देश को दो लाख करोड़ से भी ज्यादा का चूना लगा दिया। इतना ही नहीं, ‘इसरो’ के पूर्व सचिव और देवास के वर्तमान चेयरमैन चंद्रशेखर ने समझौता कुछ इस ढंग से लिखवाया कि वह 20 साल की ‘लीज’ कभी खत्म ही न होने पाए। यानी भारत के संसाधनों की लूट अनंत काल तक चलती रहे।

राजा ने 2जी स्पेक्ट्रम की जो तरंगें बांटी थीं, उसके मुकाबले ए-बेंड की ये तरंगें कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। अंतरिक्ष विज्ञान में आगे बढ़े हुए दुनिया के प्रगत राष्ट्र अपने इंटरनेट, मोबाइल फोनों तथा अन्य दूरसंचार सुविधाओं के लिए इन्हीं तरंगों का इस्तेमाल करते हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत काफी आगे बढ़ चुका है। यदि अपनी इस तरंग-क्षमता को वह विविध जरूरतमंद देशों को बेचने लगे तो अरबों रुपए कमा सकता है, लेकिन यदि हमारे अपने नागरिक अपनी ही संस्थाओं को लूटने में लग जाएं तो देश का अल्लाह ही मालिक है।

डॉ चंद्रशेखर का कहना है कि 2005 में उन्होंने जब यह समझौता किया तो ठेकों की नीलामी की प्रथा थी ही नहीं। उनके अलावा किसी ने एस-बेंड के लिए आवेदन किया ही नहीं। इसीलिए यदि उन्हें यह ठेका मिल गया तो इसमें गलत क्या है? मोटे तौर पर चंद्रशेखर की बात ठीक मालूम पड़ती है, लेकिन क्या यह सत्य नहीं है कि उन्होंने ‘इसरो’ के अंदरूनी आदमी होने का लाभ उठाया? यदि वे ‘इसरो’ के वैज्ञानिक सचिव नहीं रहे होते तो क्या उन्हें पता होता कि एस-बेंड के फायदे क्या-क्या हो सकते हैं और उन्हें 2005 में ही कैसे भुनाया जा सकता है? यदि वे ‘इसरो’ के उच्च पद पर नहीं रहे होते तो क्या ‘इसरो’ के अफसरों से ऐसे पक्षपातपूर्ण समझौते पर दस्तखत करवा सकते थे? उनके सेवानिवृत्त होने के बाद जो अफसर ‘इसरो’ में उच्च-पदों पर नियुक्त हुए होंगे, क्या उनमें से कई उनके मातहत नहीं रहे होंगे? यदि उस समझौते पर दस्तखत करते समय उनके आंख-कान खुले रहे होंगे तो उन्हें पता रहा होगा कि एस-बेंड की महत्ता क्या है और दुनिया में उसकी कीमत कितनी है?

2009 में इसी बेंड को नीलाम करने पर दुनिया के कई देशों ने अरबों डॉलर कमाए हैं। ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देश इन्हीं तरंगों को खरीदने के लिए लालायित हैं। जब चंद्रशेखर ने ये तरंगें खरीदने का सौदा किया, तब उनकी कंपनी की हैसियत क्या थी? 2007 तक भी शेयर होल्डरों की राशि सिर्फ 67.5 करोड़ थी, लेकिन 2010 में वही कूदकर 8 गुना यानी 578 करोड़ रुपए हो गई। यदि यह सौदा रद्द नहीं हुआ तो कुछ ही वर्षो में ‘देवास’ दुनिया की बड़ी कंपनियों में गिनी जाने लगेगी। ‘इसरो’ के साथ सौदा होते ही इस कंपनी में चार चांद लग गए।

यह ठीक है कि चंद्रशेखर ने कोई गैरकानूनी काम नहीं किया है और अपनी तरफ से उन्होंने भारत सरकार को धोखा भी नहीं दिया है, लेकिन क्या ‘इसरो’ को हम निदरेष मान सकते हैं? यह भी संभव है कि 2जी स्पेक्ट्रम सौदे की तरह एस-बेंड सौदे में कोई रिश्वतखोरी नहीं हुई हो, लेकिन क्या यह शुद्ध लापरवाही का मामला नहीं है? देश की संपत्ति और देश की आमदनी के प्रति लापरवाही का मामला! जैसे ही चंद्रशेखर ने अपनी तिकड़म भिड़ाई, ‘इसरो’ के अधिकारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय को सतर्क क्यों नहीं किया और जैसे ही बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय को इसका पता चला, उसने इसके विरुद्ध सीधी कार्रवाई क्यों नहीं की? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जिम्मेदारी किसके माथे पर डाली जाए?

विरोधी दल प्रधानमंत्री से जवाब मांग रहे हैं, क्योंकि ‘इसरो’ सीधे प्रधानमंत्री के मातहत है। यहां यह कल्पना करना भी कठिन है कि डॉ मनमोहन सिंह जैसा सीधा-सच्चा और भोला-भाला व्यक्ति नौकरशाहों की सांठ-गांठ में शामिल हो सकता है। यह भी संभव है कि उन्हें इस सौदे की भनक ही न लगी हो। खबर है कि सरकार इस सौदे की समीक्षा कर रही है और महालेखा परीक्षक इसकी जांच कर रहे हैं। समीक्षा और जांच तो होती रहेगी, लेकिन सौदे को रद्द करने में सरकार जितनी देर लगाएगी, उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही तेजी से पेंदे में बैठती चली जाएगी। आदर्श सोसायटी, राष्ट्रकुल खेल और राजा घोटालों के मुकाबले ये महाराजा घोटाला है। इस घोटाले के तार किसी मंत्री या मुख्यमंत्री से नहीं, सीधे प्रधानमंत्री से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

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2 Comments on "ये महाघोटालों का मौसम है"

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AJAY AGGARWAL
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MANMOHAN JI KO हम PAK SAF KESE KAH SAKTE है, या तो बिनानी है या लापरवाही, दोनों HI गलत है…………….

मई तो कहता HU की एक LAW BANA देवे की जो भी DEAL HO उस के टेंडर LIYE जय, उसके बिना KOI भी सेल/PURCHASE न की जाई, ये ही बेह्टर होगा, LEKIN HAMAM मई SAB NANGAI है, KOI भी नेता ये कानून पास नहीं होने देगा, अब MANMOHAN जी तो KATHPUTLI है, वो बेचारे मस्सूम बन जिगे……………..

मनमोहन जी, अगर अप्प MERI आवाज़ सुन रहे है तो कुछ तो ACHA कर जाओ…………………..

हरपाल सिंह
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आप से मुलाकात हुए काफी दिन हो गए है आजकल भ्रष्टाचार पे बढ़े बेमेल गठजोड़ बन रहे है सुना है पार्टी बन रही है देस के सारे बेईमान आज कल विकेकानन्द बनने का ख्वाब देखा रहे है

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