लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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sanandप्रस्तुति: अरुण तिवारी

प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।

मां गंगा के संबंध मंे अपनी मांगों को लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सांनद द्वारा किए कठिन अनशन को करीब सवा दो वर्ष हो चुके हैं और ’नमामि गंगे’ की घोषणा हुए करीब डेढ़ बरस, किंतु मांगों को अभी भी पूर्ति का इंतजार है। इसी इंतजार में हम पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सांनद जी से की लंबी बातचीत को सार्वजनिक करने से हिचकते रहे, किंतु अब स्वयं बातचीत का धैर्य जवाब दे गया है। अतः अब यह बातचीत को सार्वजनिक कर रहे हैं। हम, प्रत्येक शुक्रवार को इस श्रृंखला का अगला कथन आपको उपलब्ध कराते रहेंगे; यह हमारा निश्चय है।

इस बातचीत की श्रृंखला में पूर्व प्रकाशित कथनों कोे पढ़ने के लिए यहंा क्लिक करें।
चौथा कथन आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए प्रस्तुत है:
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स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – चौथा कथन
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18 जून को ऊर्जा सचिव, मेरे लिए उत्तराखण्ड सरकार का पत्र लेकर आये। मैने उन्हे धन्यवाद किया; लिखा कि यदि उत्तराखण्ड ने यह बलिदान किया है, तो इसकी एवज् मंे उत्तराखण्ड को कम्पनसेट करना चाहिए। मैं भी उसमें कन्ट्रीब्यूट करने को तैयार हूं। इसी क्रम में 20 जून की दोपहर डैम समर्थकों का एक समूह आया। ठेकेदार लोग थे। उन्होने मारपीट करने की कोशिश की। मेरा सारा परिवार वहां था; सो मारपीट तो नहीं कर पाये, लेकिन गाली-गलौच तो उन्होने की ही।

दिल्ली शिफ्ट करने का निर्णय और साथी

जैसा कि मैने पहले तय किया था, पत्र मिलने के बाद मैने आगे का अनशन दिल्ली में जारी रखने की निश्चय
दोहराया। यह निर्णय मेरा था, लेकिन मेरे इस निर्णय पर आदरणीय शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी, राजेन्द्र सिंह जी इससे खुश नहीं थे। मेहता जी, चोपङा जी, गिरधर जी.. ये सभी इस बात से नाखुश थे कि चिदानंद मुनि..हंसदेवाचार्य के हाथों आये पत्र पर निर्णय कैसे ले सकते हैं। लेकिन मैं तो दिल्ली शिफ्ट करने का निर्णय ले चुका था। हम चले, तो परमार्थ निकेतन रुके। परिवार के लोग खुश थे; ये लोग खुश नहीं थे। उधर मुझे अखरा कि उत्तरकाशी के बाद मुझसे अलग हो गये। वे स्वरूपानंद जी के यहां रुके। वे साधुओं को स्वरूपानंद जी के साथ रखना चाहते थे और बाकी को अलग। फिर कहा कि तरुण भारत संघ के साथी मुझसे मिलना चाहते हैं। उनसे मीटिंग की जगह, हर की पौङी तय कर दी।

मेरा झुकाव

मुझसे मेरा झुकाव पूछा था, जो सचमुच हिंदुत्व की ओर है और कांग्रेस ने इसे ( हिंदुत्व ) कभी सपोर्ट नहीं किया।
इसलिए मैं कांग्रेस के पक्ष में नहीं था, लेकिन खिलाफ भी नहीं हूं। जहां उनके निर्णय अच्छे दिखते हैं, मैं समर्थन
करता हूं। मैं मानता हूं कि कोई भी धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता। सर्वधर्म समान हो सकता है। मेरे दोस्त मुसलिम हैं। मैं उनके घर आता हूं, जाता हूं..खाता हूं।

खैर, ये लोग मुझे रामदेव से भी मिलाने लेे गये। रामदेव ने फोन किया शिंदे को। शिंदे ने कहा कि वह बाहर हैं; दिल्ली पहुंचकर बात करेंगे।

भाजपाई होने का ठप्पा

दिल्ली पहुंचकर मैने अनशन जारी रखा। तब तक यह हो गया कि मैं भाजपा के पाले में हूं। भाजपा के लोग मिलने आने लगे। उसके बाद चिदांनद मुनि और हंसदेवाचार्य ऊर्जा मंत्रालय से एक पत्र लेकर आ गये पत्र, हंसदेवाचार्य को संबोधित था। पत्र में लिखा था कि भागीरथी पर सभी जगह पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित किया जायेगा। इसके लिए हाईपावर कमेटी का गठन किया जायेगा। उसमें हंसदेवाचार्य के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। मुझसे कहा गया कि इस शर्त पर मैं अपना उपवास खोल दूं।

अनशन पर राजनीति

30 जून (2008) को उपवास खोलने का समय आया, तो अशोक सिंघल, मदनलाल खुराना..कई आ गये। काफी समय साथ रहे। अनशन खुल गया। मैने राजेन्द्र को कहा कि साथ जायेंगे; उन्होने इंकार कर दिया। अगले दिन, एक जुलाई
को पता चला कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद व माधवाश्रम भी दिल्ली आ गये हैं। गोविंदाचार्य जी भी आयेे। वही मुझे स्वामी स्वरूपानंद जी के पास लेकर गये। मुझे अच्छा लगा कि भाजपा का होने का बावजूद, उन्हे स्वरूपानंद जी के पास जाने में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। स्वरूपानंद जी ने कहा – ’’आपने जल्दबाजी कर दी। थोङे दिन ठहर जाते, तो सम्मानपूर्वक उपवास तोङते।’’

हाई पावर कमेटी

खैर, मैं एन्वायरोटेक (स्वामी जी के छात्र रहे श्री एस के गुप्ता जी की ओखला, दिल्ली स्थित कंपनी) में रुका। हाई पावर कमेटी के चेयरमैन ओ पी शर्मा, जो कि एन टी पी सी के चेयरमैन भी थे; वह एन्वायरोटेक आये। उन्होने मुझसे
कहा कि आप हंसदेवाचार्य जी के प्रतिनिधि बनकर कमेटी में शामिल हो जाइये। उन्होने एक खत दिया। हंसदेवाचार्य जी ने उनसे पूछा कि कमेटी मंे सरकार के कितने सदस्य रहेंगे। उन्होने कहा – छह। हंसदेवाचार्य जी ने कहा – ’’ हमारे भी छह रहेंगे।’’ उन्होने छह नाम दिए। मुझसे कहा कि एन्वायरमेंटल फ्लो आप समझाइयेगा। मैंने कहा कि एक टेªनिंग आर्गनाइज कीजिए।

गंगा सम्मेलन की आश्वासन

फरवरी, 2009 तक रिपोर्ट आनी थी और चिदानंद मुनि व रामदेव जी अमेरिका चले गये थे। तय हुआ कि जब लौटेंगे, तो जब लौटेंगे तो कानपुर में गंगा सम्मेलन होगा। विश्व हिंदू परिषद और भाजपा करेंगी। सितम्बर तक एन्वायमेंटल फ्लो की बात भी आगे बढ़ जायेगी। स्वास्थ्य लाभ की इच्छा हुई; सो, जुलाई-अगस्त में दिल्ली रुका। अगस्त अंत मंे चिदानंद मुनि जी और रामदेव जी आ गये। दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित गुरुद्वारे मंे सभा हुई। मुझे और एस. के. गुप्ता जी को सम्मानित किया गया। कमेटी बनी। यह सोचकर कि चिदानंद जी और हंसदेवाचार्य ने मुख्य भूमिका निभाई है, मैं पूरा सितम्बर और आधा अक्तूबर, उनके परमार्थ निकेतन में रुका।

पुनः अनशन का निर्णय

उधर हाई पावर कमेटी कोई काम नहीं कर रही थी। इस कमेटी में हंसदेवाचार्य जी के प्रतिनिधि के रूप में परितोष त्यागी, स्वरूपानंद जी के प्रतिनिधि के रूप में…. राजेन्द्र सिंह आदि थे। वे मुझे भी चाहते थे। मैं चाहता था कि वे या
तो मुझे कमेटी का कोर्डिनेटर बनायें या चेयरमैन; सो, मैं नहीं था। मेरी तरफ से रवि चोपङा (लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून) आॅब्जर्वर के रूप में जाते थे। वही अकेले थे, जो एन्वायरमेंटल फ्लो जानते थे। लेकिन कुछ हो नहीं रहा था। तीन महीने बाद कुछ नहीं हुआ, तो मैने फिर अनशन का निर्णय लिया।

दूसरा झटका

चिदानंद जी ने कहा कि इस बार का अनशन मैं परमार्थ निकेतन में ही करूं। बात जुबानी थी, किंतु उन्होने संकल्प
दिया था। हंसदेवाचार्य जी के सामने बात हुई थी। जब मैने लिखकर दिया, तो चिदानंद जी ने कहा कि परमार्थ
निकेतन में अनशन की इज़ाजत नहीं दे सकते। यह मेरे लिए दूसरा झटका था।

तीसरा झटका

कोई कहे कि रामदेव जी को क्यों नहीं कहा; उन्हे भी कहा। फिर एक डेलीगेशन रामदेव जीके नेतृत्व में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से मिला। गंगा जी को भारतीय धरोहर घोषित करने की मांग की। आगे अक्तूबर में एक डेलीेगेशन
स्वामी स्वरूपानंद जी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री जी से मिला। उसे राजेन्द्र और प्रोफेसर बी. डी. त्रिपाठी (पादप विज्ञान विज्ञान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ) भी थे। प्रधानमंत्री जी ने आश्वासन दिया कि गंगा, नेशनल रिवर होगी और एनजीआरबीए (नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथाॅरिटी) बनेगी। चार नवंबर, 2008 को प्रेस रिलीज जारी हुई। कहा गया कि नोटिफाई करने के लिए एक कमेटी बनाई जायेगी। कहा गया कि संतों के प्रतिनिधि भी कमेटी में होंगे। मुझे बताया गया कि प्रधानमंत्री जी ने कहा – ’’गंगा तो मेरी मां है।’’ किंतु दिसंबर बीत गया और गंगा जी के संबंध में कोई नोटिफिकेशन नहीं आया। आई आई टी, रूङकी के प्रोफेसर आई एक मिश्रा मुझसे मिले। उन्होने बताया कि रूङकी आई आई टी को नोटिफिकेशन ड्राफ्ट करने को कहा गया है। मुझे लगा कि सरकार ने क्या कहा, आश्वासन क्या था और कर क्या रही है। यह मेरे लिए एक और झटका था।

(संवाद के इस चौथे कथन से आप समझ सके होंगे कि श्रेय की राजनीति किसी को नहीं छोङती। वह गंगा के पाले में खङे एक अनशनकारी को भी दलगत पाले में घसीटने में शर्म नहीं करती। ऐसे में मुद्दे और तर्क की बजाय, निर्णय का आधार अक्सर यह हो जाता है कि मुद्दे के पक्ष-विपक्ष में कौन खङा है। – अ.ति.)
संवाद जारी…

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