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अनिल त्यागी

कहावत पुरानी है कि अकेला चना भाड नहीं फोड सकता। मानने में कोई बुराई भी नहीं पर क्या करे बहस जो छेडनी है। इसकी टक्कर पर गुरूदेव की उक्ति ‘ एकला चलो रे ‘ को भी अर्थहीन नहीं माना जा सकता। इन सबसे ऊपर एक पक्ति और लिख देनी चाहिये। एक अकेला भ्रष्टाचार के आरोपों से मंडित सी वी सी पूरे हिन्दुस्तान को नचा सकता है। यकीन न हो तो देख लीजिये आज सुप्रीम कोर्ट हो या केन्द्र सरकार मीडिया हो या जनता सब जगह एक ही चर्चा है टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला।

कोई भला आदमी ऐसा नजर नहीं आता जो छाती ठोक कर कह सके कि ऐ में देश के बहसबाजों जरा दिमाग से काम लो, एक अकेला सी वी सी जिस की सारी उम्र आरोप झेलते झेलते गुजर गई उसकी कथनी पर पूरे देश का समय और सम्मान क्यों बरबाद कर रहे हो।

उन्होंने तो बडे आराम से गुणा भाग कर बता दिया कि राजा ने टू जी स्पैक्ट्रम आवटित करने में एक लाख छियत्तर हजार करोड का घोटाला किया है इतना बडा धोटाला इतनी बडी राशी कि शायद ही कोई सांसद इकाई दहाई करके भी इसे अंको में लिख नहीं सकता आम लोगों की तो बात ही छोड दें।

इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले तो इस पर किस्म किस्म के मुंह बना कर गला फाड फाड कर सबसे पहले खबर हमने दी के दावे के साथ मुखातिब है तो प्रिंट मीडिया भी पीछे नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो संसद का व्यवहार है नेता विपक्ष को वैसे तो सी वी सी थामस की नियुक्ति पर आपत्ति थी पर अब पता नहीं कैसे वे थामस की रिपोर्ट को संसद में लडाई का हथियार बना कर देश को बदनाम करने पर तुली हुई है। श्रीमती स्वराज का मतलब सिर्फ संसद को ठप्प करना नहीं होना चाहिये यदि आपको सी वी सी रिपोर्ट में कुछ नजर आता है तो उसे संसद के सामने लायें देश को बतायें कि यह एक लाख छियत्तर हजार करोड रूपये गये तो कहॉ गये घोटाला हुआ तो किसकी जेब में गया। इसे सरकार की शराफत कहें या मजबूरी जो आपने शोर मचाया और राजा जी को इस्तीफा देना पडा और बेचारे रंक हो गये। विपक्ष हो या मीडिया कोई भी बताने को तैयार नहीं है कि स्पैक्ट्रम पुराने रेट पर आवटित किये गये तो नये रेट क्या थे कब और किसने तय किये थे?

एक अजीब तर्क दिया जा रहा है कि फलानी कम्पनी को स्पैक्ट्रम आवटित हुआ तो उसने ढिकानी कम्पनी को मंहगे रेट मे हिस्सेदारी बेच दी और इतना कमा लिया मेरे माननीय शोर मचाऊ सम्मानित सदस्यों और लोकतंत्र मे चौथाई हिस्सेदार मीडिया मैनेजरो जरा ये तो बताओ जब ये खरीद बिक्री हो रही थी तब आप क्या कर रहे थे या कही से कुछ का इतजार कर रहे थे।क्या हिन्दुस्तान में कोई ऐसा कानून है कि कोई कम्पनी लाभ नहीं कमा सकती।और इसमें जो हेराफेरी हुई हो तो उसके लिये क्या देश में कोई ऐसी एजेन्सी नहीं जहॉ इसकी रिपोर्ट दर्ज हो सके?

थॉमस जी ने तो रायता बिखराया और अब अपने आप को जॉच से अलग कर लिया। इसे कहते है बडे लोगों की बडी बात अब पूरा देश इस विवाद में ऊलझ गया जब तक देश इस नशे से बाहर होगा तब तक थामस जी का कार्यकाल पूरा हो जायेगा फिर कराते रहिये जॉच पामोलीन घोटाले की या किसी और हेर फेर की। हो सकता है तब थामस जी किसी पार्टी के प्रत्याशी बन चुनाव मैदान में हो ऐसा पहले आई ए एस रावत कर चुके है उन्होने एक जमाने में वी0 पी0 सिंह के खिलाफ लखनऊ में धरने तक दियेऔर बाद में उन्ही के प्रत्याशी बन कर संसद का चुनाव हारे।

संसद चले ना चले इस बात का किसी को कोई अफसोस भी नहीं करना चाहिये अब लोहिया जैसे योग्य सांसद कहॉ जो लम्बी बहस कर सके वाजपेयी और फर्नांडिज जैसे लोग भी नहीं जिनकी आवाज और तर्क देश की जनता को भले लगे। संसद ऐसे नेताओं के हाथ में है जो कभी सिर मुंडाने की बात करते है तो कभी अपनो के भ्रष्टाचार को सरक्षण देते नजर आते हैं।सुब्रहमण्यम स्वामी जैसे लोग भी नहीं जो आपात काल के हीरो रहे पर बाद को जीरो हो गये। संसद नहीं पहुच पाये तो क्या सुप्रीम कोर्ट जाने से कोई रोक तो नहीं सकता।और जहॉ तक संसद में काम काज की बात है वो तो होते ही रहते है और इस बार भी हो चुके संसद पन्द्रह दिन ठप्प रहे या पन्द्रह महीने क्या फर्क पडता है।

और जहां तक हिन्दुस्तान की अदालतों की बात है उस की आलोचना या टिप्पणी तो अवमानना के दायरे में आती है। उच्चतम न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में खींचतान शुरू है और फिर शान्ति भूषण जी जैसे दिल गुर्दे वालो की कोई कमी नहीं है। युद्ध जारी है तो कभी न कभी समाप्त भी होगा ही।

आम लोगों को अपने प्रतिनिधियों माननीय सांसदों से निवेदन करना चाहिये कि कृपया शोर न करे अफसरशाही के ऐसे बहकावे मे आकर एक दूसरे की टॉग खींचते रहेंगे तो देश का क्या होगा। नेता कभी भ्रष्ट पैदा नहीं होता उसे भ्रष्ट बनाने में अफसरों का सबसे बडा हाथ होता है।

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