लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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tibbet and chinaशैलेन्द्र चौहान

उइगर नेता डोल्कन ईसा के बाद भारत ने दो और असंतुष्ट चीनी नेताओं का वीजा रद्द कर दिया। चीन में लोकतंत्र के समर्थन में हुए थ्येनमान चौक आंदोलन की नेता लू जिंघुआ को न्यूयॉर्क में एयर इंडिया की फ्लाइट पकड़ने से ठीक पहले इसकी जानकारी मिली। हांगकांग निवासी मानवाधिकार कार्यकर्ता रे वोंग का वीजा भी खारिज हो गया। चीन से निष्कासित जानी-मानी थियानमेन स्क्वेयर एक्टिविस्ट लू जिंघुआ को भी 28 अप्रैल को धर्मशाला में हो रही उसी कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेना था, जिसमें डोल्कन ईसा आने वाले थे। मोदी सरकार ने चीन के दबाव के बाद ईसा का वीजा रद्द कर दिया था। इन सभी नेताओं को धर्मशाला में लोकतंत्र के मुद्दे पर हो रहे सम्मेलन में हिस्सा लेना था। यहां वे चीन में लोकतंत्र लाने के प्रयास के संबंध में हो रहे सम्मेलन में भाग लेने आ रहे थे। इस सम्मेलन में कई धर्मों और जातीय समुदायों के नेता शिरकत करने वाले थे। गौरतलब है कि ईसा को पहले वीजा देने और बाद में उसे रद्द करने को लेकर सरकार को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था। चीन ने ईसा को आतंकवादी और सैकड़ों लोगों का हत्यारा बताते हुए उन्हें वीजा दिए जाने का विरोध किया था। ईसा के मामले में सरकार ने कहा था कि रेड कार्नर नोटिस होने की वजह से उन्हें भारत दौरे की इजाजत नहीं दी जा सकती। वोंग पर चीन के नव वर्ष पर मोंग कोक क्षेंत्र में दंगा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद हाल ही में जमानत मिली है। सूत्रों के अनुसार, भारतीय अधिकारियों का कहना है कि तमाम कार्यकर्ता पर्यटन वीजा पर पहले भी भारत की यात्रा करते रहे हैं। परन्तु ईसा का मामला गरमाने के बाद दूसरे नेता भी सुर्खियों में आ गए। गौरतलब है कि बीजिंग के थ्येनमान चौक पर लोकतंत्र के समर्थन में कई महीनो से चल रहे आंदोलन को चीन सरकार ने चार जून 1989 को कुचल दिया था। चीनी सेना की कार्रवाई में सैकड़ों छात्र मारे गए थे।

सन् 1952 में चीन ने तिब्बत में अपनी सेनाएं भेजकर कब्जा कर लिया था। तब तक तिब्बत में दलाई लामा का स्वतंत्र राज्य था, उनकी अपनी मुद्रा थी और स्वतंत्र राट्र था। लेकिन सद्य: स्वतंत्र भारत ने तिब्बत पर चीनी कब्जे का स्वीकार कर लिया और तिब्बत को चीन का अविभाज्य अंग मान्य कर दिया। अमेरिका भी अधिकृत तौर पर तिब्बत को चीन का अंग की मान्यता दे चुका है। 1959 में दलाई लामा तथा उनके हज़ारों अनुयायी चीनी सेना द्वारा परेशान किये जाने पर भारत आए। यहां उन्हें शरण दे दी गई। तब से तिब्बती शरणार्थियों का भारत आने का सिलसिला जारी है। धरमशाला, तिब्बती शरणार्थियों के लिए उनका दूसरा घर है। देश के अन्य भागों में भी वे बसे हुए हैं। दलाई लामा का कहना है कि “चीन के चरमपंथी कम्युनिस्ट तिब्बत की समृद्ध विरासत एवं संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने तिब्बत की कला, संस्कृति और इतिहास के बारे में अध्ययन करने की इच्छा रखने वाले चीनी नागरिकों पर प्रतिबंध लगा रखा है।” वहीँ चीन सरकार इस तथ्य को स्वीकार नहीं करती। उदाहरणस्वरूप चीन ने 1983 से महाकाव्य ‘राजा केसर’ के संकलन और अनुसंधान को प्राथमिकता दी और लोगों को राजा केसर की कहानी की जानकारी देने के लिए तिब्बत के सामाजिक विज्ञान अकादमी ने महाकाव्य ‘राजा केसर’ के रैप संस्करण का तिब्बती भाषाओं से हान भाषा में अनुवाद का काम शुरू किया, जिसका प्रकाशन 2018 में होगा। 30 सालों की कोशिशों द्वारा दुनिया का सबसे लम्बा एवं तिब्बती जाति का एक महत्वपूर्ण महाकाव्य राजा केसर का तिब्बती भाषा में प्रकाशन हुआ है, जिससे केसर और तिब्बत शास्त्र के अनुसंधान के लिए व्यापक ऐतिहासिक आधार प्राप्त होगा। तिब्बत के सामाजिक विज्ञान अकादमी ने इस बात की जानकारी दी है। गौरतलब है कि ‘राजा केसर’ दुनिया का सबसे लम्बा महाकाव्य है। अब तक 1 करोड़ 50 लाख से अधिक शब्दों का संकलन कर चुका है, जिसके कुल शब्दों की संख्या प्राचीन ग्रीस के होमर और भारत के महाभारत से भी ज्यादा है।
वर्ष 1979 में चीन में सुधार और खुले द्वार की नीति लागू करने के बाद से अब तक तिब्बत में बाज़ार अर्थव्यवस्था का लगातार विकास हो रहा है। वर्तमान में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में तिब्बती जाति के व्यापारी व्यापारिक गतिविधियों में सक्रिय है, वो अपने परीश्रम और बुद्धिमत्ता से अपने जीवन की स्थिति बदलने के साथ साथ समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। चीन का दावा है कि ‘हाल के वर्षों में चीन की केंद्रीय सरकार ने तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए अधिक उदार नीतियां अपनाईं हैं, इसके साथ ही तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में निजी अर्थव्यवस्था के विकास को भी प्रोत्साहन मिला है। निजी कारोबारियों के लिए कर वसूलने और संबंधित कार्यसूची को सरल बनाने जैसे कार्यों में अनुकूल स्थिति तैयार हुई है, जिससे निजी अर्थव्यवस्था के विकास को भारी समर्थन मिला है। अब तिब्बत ने एक नए और गतिमय काल में प्रवेश किया है। हमें विश्वास है कि इस नए काल में तिब्बती जनता का जीवन और बेहतर होगा।’

कुछ वर्ष पूर्व तिब्बती युवा त्सेरन चाशी ने “कलान्विका संस्कृति प्रसारण कंपनी” की स्थापना की। कलान्विका बौद्ध धर्म में एक पवित्र पक्षी का नाम है, जिसकी आवाज़ दूसरे पक्षियों से कहीं अधिक सुरीली है। वर्तमान में कलान्विका कंपनी के पास कई युवा तिब्बती गायक और गायिकाएं हैं, जो तिब्बत की राजधानी ल्हासा के युवाओं में अधिक प्रसिद्ध हैं। गत वर्ष श्वेतुन त्योहार, जो तिब्बती लोगों के लिए सबसे शानदार त्योहार माना जाता है, के दौरान इस कंपनी द्वारा प्रसारित वाहन-प्रयोग संगीत सीडी बेची गई, एक ही सीडी का दाम 50 युआन था, जो किसी दूसरी सीडी की तुलना में थोड़ी ज्यादा है। लेकिन 5 हज़ार सीडी को श्वेतुन त्योहार के दौरान सबसे अधिक बेचा गया, जिससे कलाविन्का कंपनी के युवा गायकों और गायिकाओं की लोकप्रियता के बारे में पता चलता है। वर्ष 1951 में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की शांतिपूर्ण मुक्ति के बाद से लेकर अब तक पिछले साठ से अधिक वर्षों में, विशेष कर वर्ष 1979 में चीन में सुधार और खुले द्वार की नीति लागू किये जाने के बाद से लेकर अब तक तिब्बत का आर्थिक विकास तेज़ी से किया जा रहा है। तिब्बत के विभिन्न क्षेत्रों में बेशुमार श्रेष्ठ और सुयोग्य उद्यमी सामने आए हैं। 31 दिसम्बर को तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के आर्थिक कार्य सम्मेलन में यह सूचना दी गई कि आर्थिक विकास के अलावा तिब्बत के विशाल दुर्गम भाग में ल्हासा से शिकाज़े तक रेल पटरियां पूरी तरह बिछाई जा चुकी हैं और इस पर ट्रेन का संचालन वर्ष 2014 में शुरु होगा। ल्हासा से शिकाज़े तक का रेल मार्ग विश्व में समुद्र तल से सबसे ऊंचा रेल मार्ग यानी छिंगहाई तिब्बत रेल मार्ग का विस्तार है, जिसका निर्माण वर्ष 2010 में शुरु हुआ और कुल लम्बाई 253 किलोमीटर है। यह रेल मार्ग तिब्बत की राजधानी ल्हासा से शिकाज़े प्रिफैक्चर तक है। वर्ष 2013 में तिब्बत में बुनियादी निर्माण में गति दी गई है, ल्हासा से शिकाज़े तक के रेल मार्ग पर पटरी बिछाई जाने के अलावा मोथो कांउटी में राजमार्ग यातायात भी शुरू हुआ, इससे चीन की अंतिम कांउटी में राजमार्ग न होने का इतिहास समाप्त हुआ। इसके साथ ही ल्हासा से लीनची तक का हाई-स्पीड राज मार्ग का निर्माण भी किया जा रहा है। तिब्बत के साथ वायु सेवा वाले शहरों की संख्या 29 तक पहुंच गई और विमान लाइन 48 तक हो गई हैं।

तिब्बत की स्वायत्तता के बारे में चीन सरकार ने 12 जनवरी को सम्मेलन में निर्वाचित तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के जन प्रतिनिधियों और राजनीतिक सलाहकार सदस्यों ने राजधानी ल्हासा में वर्ष 2013 तिब्बत की सरकारी कार्य रिपोर्ट पर विचार विमर्श किया। 1000 से अधिक जन प्रतिनिधियों और राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन सदस्यों में अधिकांश लोग तिब्बती जाति के हैं, वे तिब्बत के विभिन्न क्षेत्रों के श्रेष्ठ व्यक्ति और विभिन्न स्तरीय सरकारी निकायों के नेता भी हैं। तिब्बत विश्वविद्यालय के तिब्बती शास्त्र अनुसंधान केंद्र के प्रधान छीतान जाशी का कहना है कि अब तिब्बत के समाज में अधिकाश नेता भूदासों की भावी पीढ़ी से संबंध रखते हैं। आंकड़ों के मुताबिक अक्तूबर 2013 तक 26 विभागों से गठित तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की सरकार में से 25 विभागों के नेता तिब्बत जाति के हैं और वे अधिकांश भूदासों की भावी पीढ़ी के हैं। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के गरीबी उन्मूलन कार्यालय के प्रधान छ्युनि यांगपेई कहते हैं कि वे खुद भूदास की भावी पीढ़ी हैं। उनके पूर्वजों ने कभी नहीं सोचा कि उनकी संतान सिर्फ भूदास नहीं बनेगी, बल्कि सरकारी विभाग के नेता बनेंगे। गौरतलब है कि वर्ष 1959 में तिब्बत में लोकतांत्रिक सुधार किए जाने के बाद सामंती भूदास व्यवस्था समाप्त हुई थी।

इस समय भारत-चीन सीमा लगभग 4 हज़ार कि.मी. लम्बी है। यद्यपि यह भारत के हित में था कि भारत और चीन के मध्य तिब्बत एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थिर रहता, परन्तु आज यह स्थिति नहीं है, अत: लद्दाख से अरूणाचल प्रदेश तक चीन के साथ सटी सीमा और नेपाल में चीन के बढ रहे प्रभाव को देखते हुए वर्तमान परिस्थिति को अपने हित में मजबूत बनाना होगा। यह रास्ता दोधारी तलवार पर चलने के समान है।

संपर्क : 34/242,

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