लेखक परिचय

सिद्धार्थ झा

सिद्धार्थ झा

स्वतंत्र पत्रकार एवं कंसल्टेंट लोकसभा टीवी

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tigerशिकार खेलने और देखने का शौक की भारत में सदियो पुरानी परम्परा रही है।मोटे तौर पर आदमी के विकास के साथ साथ ये प्रक्रिया निरंतर विकसित हुई कभी सिर्फ पेट भरने का माध्यम बना तो कभी पेट भरने के साथ आदि मानव के खेल का अहम् हिस्सा बना और ये सिलसिला बदस्तूर लंबे मानव काल में जारी रहा।इस क्रम में न जाने कितनी ही प्रजातियों ख़त्म हुई और विलुप्ति की कगार पर पहुंची।भारत सरकार ने समय रहते इसको न सिर्फ गैरकानूनी घोषित किया बल्कि जंगली जानवरो को सरक्षण भी दिया।लेकिन न जाने क्यों कोतूहल आज भी हम सब में है अपने वन्य जीवो और जानवरो को जान्ने समझने का।और अगर बात बाघ की हो तो उसको खुले सैकड़ो एकड़ जंगल में ढूंढ कर देखने का आनंद भी शायद किसी आखेट से कम नही।दिखाई दिया तो समझिये आपने आँखों से शिकार कर लिया और बदकिस्मती से नही भी दिखा तो भी उसको ढूँढने के आनंद को बयान कर पाना मुश्किल है।इसलिय लाखो पर्यटक प्रतिवर्ष राजाजी उद्यान,नंदन कानन,कान्हा,बांधवगढ़ ,ज़िम कॉर्बेट के जंगलो की ख़ाक छाना करते है एक उम्मीद और जज्बे के साथ। भारतीय रेल ने भी उन लाखो बाघ के शौकीनों की मूलभूत जरूरत को समझा और उनकी मदद करने के मकसद से उम्मीदों के सफ़र की नीव रखी।आपको याद होगा हाल ही के बजट सत्र में रेलमंत्री ने एक ऐसे स्पेशल ट्रेन की घोषणा की थी जिसका मकसद आमलोगों को जंगलो तक पहुंचाने की थी।इससे ना सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा मिलता बल्कि जंगल और वन्यप्राणियों क प्रति जिज्ञासा और कर्तव्यों का भी बोध होता।हाल ही में 5 जून को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर रेल मंत्रालय ने आम आदमी के उस सपने को साकार किया जब दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर भारत की इस तरह की पहली सेमि लक्ज़री ट्रेन टाइगर एक्सप्रेस खड़ी थी।आम लोगो में कोतूहल था इस ट्रेन के नाम और सफ़र को लेकर। इस ट्रेन के सञ्चालन की जिम्मेदारी आईआरसीटीसी को दी गई जो भारतीय रेल से जुडी एक संस्था है और मिनी नवरत्न होने का गौरव भी प्राप्त है ।हांलाकि ये संस्थान कई रूट्स पर इस तरह की धार्मिक और पर्यटन स्थलो पर इस तरह की ट्रेन का सञ्चालन कर रही है जैसे बुद्ध सर्किट पर,राजस्थान के कई हिस्सों में ,हाल ही में गतिमान एक्सप्रेस में भी इसकी भूमिका रही है।वाइल्ड लाइफ और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत में पहली बार टाइगर एक्सप्रेस नाम से एक ट्रेन चलाई जा रही है। टाइगर एक्सप्रेस अपनी बहुत सारी विशेषताओ के लिए जाना जाएगा / 5 दिन और 6 रातो के इस खास टूर का हिस्सा बनकर आप खुद को काफी रोमांचित महसूस करते हैं/ खास तरह के कलेवर मे रंगी ये ट्रेन न सिर्फ बाहर से आम और खास लोगो के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी बल्कि सबके मन मे कोतूहलता थी की आखिर क्या खास है इस ट्रेन मे/बाहर से तरह तरह के बाघ और अभूतपूर्व डिज़ाइन बरबस ही सबका मन मोह ले रही थी/ खैर निश्चित समय पर इस ट्रेन की पहली ऐतीहासिक यात्रा करने का गौरव मुझे भी प्राप्त हुआ लगभग 35-40 मुसाफिरो और पत्रकारो के साथ ये ट्रेन विश्व पर्यावरण दिवस के मोके पर पूरे तांम झाम और साज सज्जा के साथ दिल्ली के सफदरजग स्टेशन से रवाना हुई. भारतीय रेल के वरिष्ठ अधिकारी , सांसद एवं अनेक गण्मान्य लोगो की उपस्थिती मे रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने मुंबई से इंटरनेट के जरिये इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई. इस ट्रेन के 5 दिन और 6 रातो का कुल यात्रा खर्च लगभग 38 हज़ार से 49 हज़ार रु के आसपास बैठता है वातानुकूलित एसी 2 और 3 मे , जिसमे इस दौरान सभी तरह का खाना पीना , सड़क मार्ग का व्यय, और 3 स्टार होटल या कॉटेज का भाड़ा एवं बांधवगढ़ वन और कान्हा मे कुल तीन जंगल सफारी शामिल है. यानि अगर आपको कहीं कुछ ख़रीदारी न करनी हो तो आप बगैर पैसो के भी सी ट्रेन मे बैठ सकते है इतना जरूर है कहीं भी आपका एक रुपया भी खर्च नहीं होता. मुझे लगा कि ये राशि थोड़ी अधिक क्योंकि फिलहाल माध्यम वर्ग या उच्च माध्यम वर्ग ही इस ओर आकर्षित हो सकता है इसली भाड़ा थोड़ा कम होना चाइए फिलहाल इस ट्रेन की कुल यात्रियो की क्षमता 200 यात्रियो के आसपास है मगर उम्मीद कर सकते है भविष्य मे यात्रियो की संख्या बढ्ने पर इसके भाड़े मे निश्चित तौर पर कमी आएगी. हालाकि इस ट्रेन की कोशिश है की इसमे सिर्फ विदेशी मुसाफिर ही नहीं देशी मुसाफिरो की भी संख्या बढ़ाए जाये. इस पहली ट्रेन मे हमे सिर्फ एक विदेशी यात्री स्टीवन दिखे जो बाघो और जंगलो के शोकीन है और अमरीका से खास तौर पर कान्हा वन का भ्रमण करने के लिए आए थे. इस ट्रेन के संचालन से जुड़ी तैयारियां बहुत ही कम समय मे पूरी हुई थी महज 3 महीने से भी कम समय मिला होगा. आईआरसीटीसी को इससे जुड़े सभी योजनाओ को बनाने के लिए .
लेकिन इन सब के बावजूद इस टीम ने कमाल का काम किया है जो निसंदेह यात्रियो के मन मे अगले कई दशको तक उसकी यादें ताज़ा रहेगी. जहा तक बात इस ट्रेन के बोगियो की है शानदार एहसास आपको दिलाती है लेकिन जब मुझे ये पता चला की इसमे कोई आम कोच नही बल्कि कई मायनो मे खास है. ये एक ऐसी गाड़ी के डिब्बे थे जो सालो से कहीं यार्ड या पटरियो पर जंग खाने का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन रेलवे की सूझबूझ और कारीगरी के कारण न सिर्फ ये बिलकुल नई ट्रेन हो गई बल्कि इससे बेहतर ईस्टमाल काब मे खड़े एक डिब्बे का ओर हो ही नहीं सकता था/ इस ट्रेन मे लागभग 13 बोगिया थी जो पूरी तरह से वातानुकूलित थी इसमे से 4 डब्बो का उपयोग यात्रियो के लिए होना था जबकि बाँकी सभी को सर्विस के लिए आरक्षित किया गया था. इस ट्रेन की यूं तो कई खासियत है एक एक को गिनना मुश्किल है लेकिन सभी लोगो के आकर्षण का केंद्र बिन्दु इसका डाइनिंग कार था जो किसी अच्छे खासे रेस्टोरेन्ट की तर्ज़ पर था . बार काउंटर की भी व्यवस्था थी लेकिन उसमे मद्यपान परोसने की व्यवस्था नहीं थी मगर सॉफ्ट ड्रिंक जैसे आइटम के लिए बनाया गया है. इस तरह के डाइनिंग कार मे यात्री अपने आप को काफी सहज महसूस कर रही थे उसका ज़्यादातर वक़्त आपस मे बातचीत करते हुए बीता. एक बार और अगर इसकी अंदरूनी साज सज्जा की बात की जाये तो जंगल थीम को ध्यान मे रखकर इसको बनाया गया है जगह जगह बाघो और दूसरे जंगली जानवरो की तस्वीरे और उनसे जुड़ी सूचनाए तस्वीरों की शक्ल मे लटकी हुई थी. मुझे लगा शायद इतना ही होगा मगर थोड़ा आगे बढ्ने पर एक मिनी लाइब्रेरी भी दिखाई दी जिसमे वन्यप्रयानियों से संबन्धित तरह तरह की शानदार लेखको की किताबे मोजूद थी. इस गाड़ी मे एक ऑफर खासियत मेरा इंतज़ार कर रही थी वो थीं इसका बाथरूम जहां नहाने के लिए एक अत्याधुनिक बाथरूम भी बनाया गया था. जहां तक खाने पीने का सवाल है बेहतरीन खाना पीना और सार्विस से किसी को कोई शिकायत नहीं थी. 6 तारीख की खुशनुमा सुबह ट्रेन कटनी स्टेशन पहुंची जहां से हमे बांधवगढ़ के जंगलो के लिए प्रस्थान करना था. स्टेशन से निकलते ही बाहर गाड़िया हंसब का इंतज़ार कर रही थी और लगभग 2 घंटे की खूबसूरत से यात्रा के बाद हम सब बांधवगढ़ के जंगलो से गुज़र रहे थे. यात्रा के दौरान पानी से लेकर हल्के खान पान की भी पूरी तैयारी कार के अंदर ही थी. थोड़ी देर मे ही हम आईआरसीटीसी द्वारा पहले से ही बूक किए हुए मोगली रिज़ॉर्ट मे थे / चारो ओर जंगल के बीच ये रिज़ॉर्ट अपनेयाप मे बहुत खूबसूरत था जिसमे सभी सुख सुविधाए थी जैसे आरामदायक रेसोर्ट्स के साथ तरणताल, जिम, और जो आम तौर पर आज सभी होटल्स मे दिखते है / दोपहर के लच के बाद शाम 3 बजे बांधवगढ़ मे सफारी का प्रबंध किया गया था / बांधवगढ़ के बारे मे बता दु की ये काफी खुला मगर छोटा जंगल का इलाका है जिसमे ज्यादा मशक्कत न करने पर भी आपको बाघ के दर्शन हो जाएंगे/यह भारत का एक प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान हैं। बाघों का गढ़ 448 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। इस उद्यान में एक मुख्य पहाड़ है जो ‘बांधवगढ़’ कहलाता है। 811 मीटर ऊँचे इस पहाड़ के पास छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं। पार्क में साल और बंबू के वृक्ष प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं। बाँधवगढ़ का वन क्षेत्र विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों और जन्तुओं से भरा हुआ है। जंगल में नीलगाय और चिंकारा सहित हर तरह के वन्यप्राणी और पेड़ हैं।
इस राष्ट्रीय उद्यान में पशुओं की 22 और पक्षियों की 250 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। जहां तक बाघो का सवाल है /उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में कान्हा, बांधवगढ़, पन्ना, बोरी-सतपुड़ा, संजय-डुबरी और पेंच में कुल छह टाइगर रिजर्व हैं। यहां तकरीबन 257 बाघ हैं। बांधवगढ़ के जंगलो मे शाम को तिगर सफारी करना अपने आप मे अप्रतिम एहसास देता है/ बारहसिंघा और चेतलों का झुंड बेफिक्र और निर्भय होकर हमारे चारो तरफ चहल कदमी कर रहे थे /इससे पहले भी मैं कई बार जिम कॉर्बेट और कान्हा आया था लेकिन कभी बाघ के दर्शन नहीं हुए थे इसली बर्ष सिंघा, चीतल,सियार, सांभर इत्यादि देखकर ही मन की शांति कर ली थी/ और आज भी हम सब अलग अलग जोने मे जाकर बाघ को ढूँढने की कोशिश कर रहे थे हम सब 3 घंटे ढूँढने के बाद मायूस होकर लोटने की सोच ही रहे थे हमे सामने पहाड़ियो से कोई धारीदार जानवर दहरता हुआ पानी की तालाब के किनारे जाकर बैठ गया और लगा तरह तरह के पोज देकर अपनी तस्वीरे खिचवाने/ थोड़ी ही देर मे हमारे आसपास और भी सफारी गाड़ियो की भीड़ लग गई लोग कोतूहलता से इस कुदरत के सबसे शानदार करिश्मे को निहार रहे रहे थे /ये अपनेआप मे भरापूरा जंगल था / शाम 7 बजे के बाद हमे सी जंगल से बाहर निकलना था इसलिय हमने जल्द ही सभी वनप्राणियों के साथ विदा ली और अपने रेसोर्ट्स मे लौट आए/ इस दौरान यात्रियो के बीच एक खास किस्म का पारिवारिक रिश्ता भी पनपा मसलन साथ खाना चाय पीना एक दूसरे के साथ लोगो मे काफी मित्रता हो गई ऐसा लगा की मानो ये सब एक परिवार का हिस्सा हो/ यात्रियो मे हर आयु और वर्ग के लोग थे 6 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुग दंपति भी इसका हिस्सा थे/आईआरसीटीसी के कुछ अधिकारी निरंतर लोगो के साथ संवाद बनाए हुए थे जिससे किसी को कोई तकलीफ न हो/ अगली सुबह चाय के बाद हमे कान्हा वन विहार मे जाना था जहां पर हमे अगले 2 दिन के लिए रुकना था / बांधवगढ़ से कान्हा का सड़क मार्ग से रास्ता लगभग 6 घंटे का है जिसके बीच मे हमे मंडला मे आधे घंटे नाश्ते और चाय पानी के लिए रुकना था/ हालाकी हमलोग थोड़ी देर के लिए नर्मदा नदी के किनारे दिन के करीब डेढ़ बजे हम कान्हा के जंगल मे स्थित रिज़ॉर्ट मे थे जो खटिया गाँव के आसपास था /मध्य प्रदेश के दो जिलों मंडला और बालाघाट के बीच स्थित कान्हा राष्ट्रीय उद्यान का कुल क्षेत्रफल 1945 वर्ग किलोमीटर है। कान्हा को सन् 1879 में संरक्षित वन का स्थान दिया गया था और सन् 1955 में इसे राष्ट्रीय पार्क का दर्जा दिया गया था। 1973 में जब प्रोजेक्ट टाइगर प्रारंभ हुआ तो भारत में जो सबसे पहले 9 टाइगर रिजर्व घोषित हुए थे, कान्हा उसमें से एक था।कान्हा गोंडवाना या गोंडों की भूमि का हिस्सा है। यहां पर दो जनजातियाँ गोंड और बैगा मुख्यतया निवास करती हैं। कान्हा शब्द कनहार से बना है जिसका स्थानीय भाषा में अर्थ है चिकनी मिट्टी। कान्हा से कुल 27 गाँवों को हटाया गया है। विस्थापित समुदाय में से कुछ को कोर एरिया में कुछ को बफर में बसाया गया है, तो कुछ गांव काफी दूरी पर है। इस इलाके की दो प्रमुख नदियां हैं बंजर और हालोन। यहाँ तकरीबन 105 से अधिक बाघ निवास करते है जिसमे मुन्ना,बबलू और नीलम पर्यटको के लिए आकर्षण का केंद्र बिन्दु है/टाइगरों का यह देश परभक्षी और शिकार दोनों के लिए आदर्श जगह है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता खुले घास का मैदान हैं जहां काला हिरन, बारहसिंहा, सांभर और चीतल को एक साथ देखा जा सकता है। बांस और टीक के वृक्ष इसकी सुन्दरता को और बढा देते हैं।रूडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध किताब और धारावाहिक जंगल बुक की भी प्रेरणा का स्थल भी कान्हा ही है/ये वन घने और ठंडे महसूस होते है जून की गर्मी मे भी पसीना न के बराबर बह रह था / हम सभी सफारी गाड़ियो पर खुद को आखेटक सा महसूस कर रहे थे जिशे तरह तरह के वन्यप्रयनी की दिख जाने पर भी बहुत खुशी मिल रही थी/ हम भी बालू या मुन्ना को ढूंढ रहे थे बहुत से लोगो ने तरीफे की थी उनकी।/ हमे बाघ दिखा जरूर लेकिन कोन ये पता नहीं/ क्योंकि दूर से झलक मात्र देखी थी/अनेक तरह के वनयपरनी जीव जन्तुओ को देखा बहुत से के तो नाम भी याद नहीं मगर बहुत सुखद एहसास था / अगली सुबह भी हमे 4 बजे एक बार फिर वनविहार्ट यही आकार करना था/ रात को एक पर्यावरणविद के साथ मुलाक़ात भी रखी गई थी जो हमारी बहुत सारी शंकाओ का समाधान करते/खैर अगली सुबह हम फिर जंगलो मे थे और ज़ी भर कर जंगलो का आनंद लिया /शाम को आसपास गाँव मे बाज़ार मे घूमने का अवसर मिला / इस दौरान मै कुछ गाँव वालों से भी मिला जो बैगा जाती से संबन्धित थे जिनहे वन विभाग ने बफर जोन मे बसाया हुआ था / आज यहा 2000 से भी ज्यादा लोगो का व्यवसाय इन पर्यटको पर निर्भर है जो बाघो को देखने लाखो की तादाद मे हर साल यहा आते हैं/ ये लोग यहा चालक , वन रक्षक, गाइड , होटल कर्मचारी के रूप मे अपनी आजीविका कमा रहे है और मोजूदा हालात मे काफी खुश भी है/ आम तौर पर पहले ये अवधारणा थी की बैंगा और गोंडा जनजाति के लोग शिकारियो की मदद करते है मगर ये सिर्फ एक मिथक है/ क्योंकि ये जंजातीय बाघ को अपना भगवान मानती है जिसकी वजह से इनकी रोज़ी रोटी चलती है/ बहुत सुखद लगता है ये सुनना की मानव हमारा अहित कर सकता है लेकिन जंगली जानवर नहीं क्योंकि हम एक दूसरे की जरूरत होने के साथ साथ अच्छे दोस्त भी है/ हमारे बीच कभी कोई संघर्ष नहीं हुआ है/ अगली सुबह हमे जबलपुर की तरफ रवाना होना था जहां से हमे फिर से टाइगर एक्सप्रेस की यात्रा करनी थी/ हालाकी इसके बीच मे जबलपुर मे भी हमे भेडाघात का विश्वप्रसिद्ध धुआंधार जलप्रपात भी देखना था जो की पूर्व निर्धारित था / शाम तक सभी ने भेड़ाघाट पर खूब मस्ती और नौकायान किया और उसके बाद हमारा कारवां जबलपुर स्टेशन पर पहुंचा /कोई भी नहीं चाहता था की ये मस्ती का सफर इतनी जल्दी खत्म हो मगर इस सफर को भी यही खत्म होना था ओर हमारी टैगर एक्सप्रेस हम सबको लेकर दिल्ली की तरफ रवाना हुई / यात्रियो ने न सिर्फ एक दूसरे की बहुत सारी तस्वीरे खींची और फिर मिलने के वादे से अपने गंतव्य की तरफ रवाना हुए/ 5 जून से शुरू हुई यात्रा 10 जून की दोपहर को खत्म हो चुकी थी/ फिलहाल टाइगर एक्सप्रेस भी अक्तूबर तक स्थगित रहेगी क्योंकि 15 जून से अक्तूबर तक कान्हा और दूसरे वन विहार मानसून के दौरान बंद कर दिये जाते है पर्यटको के लिए/ उम्मीद की जानी चाहिए की रेल मंत्रालय की आम लोगो को जंगलो तक निर्बाध बिना किसी रुकावट के पहुचाने की ये योजना अवश्य पूरी होगी /
सिद्धार्थ झा

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1 Comment on "टाइगर एक्सप्रेस"

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डॉ. मधुसूदन
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सुन्दर यात्रा वर्णन!

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