लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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mnregaपहली बार महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की वर्षगांठ पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (सप्रंग) सरकार ने इसके गुण-दोष की विवेचना की है। यह भी पहली बार हुआ है जब कांगेस पार्टी की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने सार्वजनिक रुप से स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार के कारण मनरेगा की छवि धूमिल पड़ रही हैै। विदित हो कि मनरेगा सप्रंग सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है। पिछले आम चुनाव में सप्रंग सरकार की जीत में इसकी अहम भूमिका रही थी। भारत जैसे विकासशी देश में, जहाँ अधिकांश लोग बेरोजगारी और भूखमरी का दंश झेल रहे हैं, वहाँ मनरेगा जैसी रोजगारपरक योजना से ग्रामीणों की तकलीफ कम हो रही है, लेकिन बीते सालों भ्रष्टाचार के कारण सरकार की अच्छी-खासी फजीहत हुर्इ है। वह जानती है कि अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर थेथरर्इ दिखाना उसे महँगा पड़ सकता है।

मनरेगा पहले नरेगा के नाम से जाना जाता था। इस महत्वपूर्ण योजना का शुभारम्भ 2 फरवरी, 2006 से आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिला में किया गया था। पहले सत्र में इस योजना को 200 जिलों में लागू किया गया, जिसे पाँच साल के अंदर पूरे देश में अमलीजामा पहनाया गया। अधिनियम के तहत ग्रामीण भारत के हर बालिग व्यकित को पूरे साल में 100 दिन तक अकुशल स्वरुप के रोजगार को मुहैया करवाने की गारंटी दी गर्इ है। इस योजना का लाभ लेने की बहुत ही सरल प्रकि्या है। सबसे पहले इच्छुक बालिग व्यकित को ग्राम सभा में निबंधन करवाना होता है। आवेदनों की जाँच ग्राम पंचायत के द्वारा की जाती है। जाँच में मोटे तौर पर यह देखा जाता है कि क्या आवेदक बालिग है? यदि है तो क्या वह संबंधित गाँव का निवासी है? दोनों शर्तों की कसौटी पर खरे उतरने वाले आवेदकों का निबंधन कर लिया जाता है। तदुपरांत उन्हें जाब कार्ड निर्गत किया जाता है। जाब कार्ड धारक सादे कागज पर लिखा आवेदन ग्राम पंचायत या ब्लाक स्तर पर कार्यक्रम अधिकारी के पास समर्पित करके रोजगार की माँग कर सकता है।

इस बाबत आवेदक आवेदन प्रापित की रसीद भी संबंधित कर्मचारी या अधिकारी से माँग सकता है। आवेदन जमा करने की तिथि के 15 दिनों के बाद रोजगार उपलब्ध करवाने की माँग की जा सकती है। इसके बरक्स ध्यान देने योग्य बात यह है कि वैसे जाब कार्ड धारक, जो पहले से काम कर रहे हैं, वे भी इस अधिनियम के तहत रोजगार की माँग कर सकते हैं। रोजगार उपलब्ध करवाने में महिलाओं को तरजीह देने की वकालत योजना में की गर्इ है। प्रदान किये जाने वाले रोजगार में एक तिहार्इ महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करना जरुरी होता है। सप्ताह में 6 दिनों तक काम मुहैया करवाने का प्रावधान है, जिसे 14 दिनों तक लगातार उपलब्ध करवाया जा सकता है। प्रस्तावित लाभुकों को ग्राम पंचायत या कार्यक्रम अधिकारी के द्वारा रोजगार के स्वरुप, दिनांक, स्थान आदि की सूचना व्यकितगत तौर पर दी जाती है या फिर ग्राम पंचायत या ब्लाक के नोटिस बोर्ड पर लाभार्थियों की सूची को चस्पां किया जाता है। अगर कोर्इ किसी कारण वश निर्धारित तिथि को काम पर नहीं पहुँचता है तो वह रोजगार प्राप्त करने के लिए तत्कालिक तौर पर अयोग्य मान लिया जाता है। पुन: रोजगार पाने के लिए उसे फिर से आवेदन दाखिल करना पड़ता है। अधिनियम में आवेदक को उसके गाँव या निवास स्थान के 5 किलोमीटर के दायरे में रोजगार उपलब्ध करवाने की बंदिश है। इस नियम का अनुपालन नहीं करने पर आवेदक को आवागमन के मद में होने वाले खर्च को दृषिटगत करके 10 प्रतिशत अधिक मजदूरी का भुगतान करना पड़ता है। महिलाओं और बुर्जगों के मामले में 5 किलोमीटर के दायरे में रोजगार उपलब्ध करवाने के नियम का कड़ार्इ से अनुपालन किया जाता है। मजदूरों को मजदूरी संबंधित राज्य के कृषि मजदूरों के बराबर दिया जाता है। सामान्यत: हर राज्य में राज्य सरकार कृषि कार्य से जुड़े मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण करती है। मजदूरी का भूगतान प्रत्येक सप्ताह किया जाता है। विशेष परिसिथति में काम करने वाले दिन से 15 दिनों के अंदर मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान करना पड़ता है। रोजगार के लिए आवेदन देने के बाद भी यदि किसी आवेदक को काम नहीं मिलता है तो उसे अधिनियम के प्रावधानों के तहत बेरोजगारी भत्ता देने का प्रचलन है। 30 दिनों तक तय मजदूरी का 25 प्रतिषत बेरोजगारी भत्ता के रुप में भुगतान किया जाता है। उसके बाद भत्ता को बढ़ाकर 50 प्रतिषत कर दिया जाता है, जिसे 100 दिनों तक रोजगार पाने की पात्रता के अनुसार चालू वित्त वर्ष में उपलब्ध करवाना होता है। कार्यस्थल पर ठेकेदार के द्वारा मजदूरों के लिए पीने योग्य पानी, आराम करने के लिए आश्रयस्थल, फस्र्ट एड बाक्स आदि की व्यवस्था की जाती है। दुघर्टना की सिथति में मजदूरों का समुचित र्इलाज संबंधित राज्य सरकार के द्वारा करवाया जाता है। अस्तपताल में भर्ती करवाने पर दवार्इ एवं र्इलाज का इंतजाम भी राज्य सरकार के द्वारा किया जाता है। साथ ही, उक्त अवधि में 50 प्रतिषत मजदूरी का भुगतान दुघर्टना ग्रस्त मजदूर को किया जाता है। कार्यस्थल पर पूर्ण रुप से अपंग या मृत्यु होने की सिथति में संबंधित मजदूर या उसके वारिस को 25000 हजार रुपये हर्जाने के तौर पर प्रदान किया जाता है। सामान्य तौर पर इस अधिनियम के तहत भूजल संरक्षण, वनीकरण, भूमिसुधार, परम्परागत जल सा्रेतों के नवीनीकरण, बाढ़ नियंत्रण, सड़क निर्माण आदि से जुड़े हुए काम मजदूरों से करवाये जाते हैं।

जाहिर है मनरेगा की संकल्पना रोजगारपरक होने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र के संपूर्ण विकास से जुड़ा हुआ है, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण इस योजना का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। भ्रष्टाचार की परत मोटी हो चुकी है, जिसकी शुरुआत ग्राम सभा से होती है। आवेदन जमा करने से लेकर उसकी जाँच की प्रकि्रया को पूरा करने के क्रम में खुलेआम अनियमितता बरती जाती है। एक ही व्यकित का निबंधन आसपास के कर्इ गाँवों की ग्राम सभाओं में हो जाता है। बेजा लाभ कमाने के लिए फर्जी व्यकितयों, जिनका हकीकत में कोर्इ असितत्व नहीं होता है का निबंधन सरपंच और सचिव की मिलीभगत से किया जाता है। बैंक के माध्यम से लाभार्थियों को उनकी मजदूरी का भुगतान करने की व्यवस्था करने के बाद से सरकारी धन के दुरुपयोग में कमी आर्इ है। फिर भी मजदूरों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है। इसके बाबत भ्रष्टाचारियों ने एक नर्इ विधा को विकसित किया है। अनपढ़ मजदूर बैंक से अपनी मजदूरी की निकासी तो जरुर करते हैं, लेकिन बिचौलिया जबर्दस्ती उनसे अपना कमीशन ले लेता है। कार्य को संपन्न करवाने वाली एजेंसी या संस्था कागजों पर कार्यों को पूरा करने में माहिर होते हैं। बकायदा फर्जी मजदूरों को बैंकों के माध्यम से मजदूरी का भुगतान किया जाता है। तालाब व कुएँ खोदने और पुनष्च: उसी को भरने जैसे कर्इ मामले प्रकाश में आये हैं। इस परिप्रेक्ष्य में बैंकों में फर्जी खाते खुलने जैसी सच्चार्इ से इंकार नहीं किया जा सकता है। बैंकरों के ऐसे मामलों में मिलीभगत भी हो सकती है। कर्इ मामलों में यह पाया गया है कि सरपंच एवं सचिव ने फर्जी दस्तखत के द्वारा आवंटित राशि का गबन किया है। भ्रष्टाचार का यह खेल कभी समाप्त नहीं होता है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार ब्लाक स्तर के कार्यक्रम अधिकारी से लेकर अन्यान्य समस्त प्रशासनिक अधिकारी योजना के मद में आवंटित राशि के बंदरबाँट में शामिल हैं। स्वभाविक रुप से इस काले धन में सबसे बड़ा हिस्सा नेताओं व मंत्रियों का होता है। आज तकरीबन सभी राज्यों में मनरेगा के लिए आवंटित फंड का व्यापक पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है। इस संदर्भ में उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड, छतीसगढ़, ओडिसा आदि राज्यों का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। सरकार फिलहाल जीडीपी का तकरीबन एक प्रतिषत इस योजना पर खर्च कर रही है। भ्रष्टाचार पर अंकुष लगाने के लिए सभी राज्यों में सामाजिक अंकेक्षण करवाने की सरकार की योजना है। विगत वर्षों में इसकी मदद से भ्रष्टाचार के अनेकानेक बड़े मामले प्रकाश में आये हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में मनरेगा में व्याप्त खामियों का खुलासा सामाजिक अंकेक्षण के दरम्यान ही हुआ था। दूसरे राज्यों में भी इस प्रणाली के द्वारा भ्रष्टाचार उजागर हो रहा है। उल्लेखनीय है कि आंध्रप्रदेश के माडल पर सामाजिक अंकेक्षण को पूरे देश में लागू करने का प्रस्ताव है। इसके अंतगर्त देश के हर राज्य में एक स्वतंत्र इकार्इ की स्थापना की जाएगी। इस इकार्इ को डायरेक्टरेट आफ स्टेट के नाम से जाना जायेगा, जिसके अध्यक्ष नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक होंगे। इस बाडी में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के अलावा चार्टड एकाउंटेंटस एवं गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। होने वाले खर्च को केंद्र सरकार वहन करेगी। मनरेगा के आलोक में ग्राम सभा के स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले में तेजी आने के कारण सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए ग्राम सभा को पूर्व में प्रदत्त विषेशाधिकार से वंचित कर दिया गया है। गौरतलब है कि पहले ग्रामीण स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण का काम सरपंच करते थे। इसके पीछे यह अवधारणा थी कि मनरेगा से संबंधित विवादों का निपटारा ग्रामीण स्तर पर ही कर लिया जाएगा। इस कार्य को अंजाम देने के लिए इस अधिनियम के अनुच्छेद 1 की कंडिका 13 बी को हटाया गया है। इस परिप्रेक्ष्य में ग्रामीण मंत्रालय चाहता है कि हर राज्य सामाजिक अंकेक्षण का कार्य अपने स्तर पर पूरा करके मंत्रालय को छह माह के अंतराल पर रिपोर्ट भेजता रहे, ताकि मंत्रालय मनरेगा के तहत चल रही हर गतिविधि पर अपनी नजर रख सके और माहौल बिगड़ने पर समयानुसार कदम भी उठा सके।

रोजगार उपलब्ध करवाने की गारंटी वाली इस योजना की सातवीं वर्षगांठ पर सप्रंग सरकार ने इसके हर पहलू की समीक्षा की है। इसके बरक्स चिंता की बात यह है कि आहिस्ता-आहिस्ता इस योजना की लोकप्रियता में कमी आ रही है।

जानकारों के मुताबिक खराब प्रदर्षन करने वाले राज्यों में पैसों की कमी सबसे बड़ी रुकावट है। चालू वित्त वर्ष के जनवरी, 2013 तक बेरोजगारों को औसतन 34.65 दिनों तक ही काम मिला है। वित्तीय वर्ष 2009-10 में कार्यदिवसों की संख्या 53.99 दिन थी, वहीं वित्तीय वर्ष 2010-11 में यह 46.79 दिन था और वित्तीय वर्ष 2011-12 में यह आँकड़ा महज 42.43 दिन था। मनरेगाा के तहत राज्यवार प्रदर्षन के मामले में वित्तीय वर्ष 2011-12 में आंध्रप्रदेश में सबसे अधिक औसतन 57 दिन ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध करवाया गया, वहीं सबसे कम काम पषिचम बंगाल में दिया गया। वहाँ वित्तीय वर्ष 2011-12 में 31 दिन काम उपलब्ध करवाया गया, वहीं वित्तीय वर्ष 2011-12 में यह आँकड़ा महज 26 दिन था। चालू वित्त वर्ष में इस राज्य में जनवरी, 2013 तक केवल 25 दिन काम उपलब्ध करवाया गया है। इस संदर्भ में राजस्थान का प्रदर्षन वर्ष, 2010 तक अच्छा रहा था। वहां उस साल ग्रामीणों को 52 दिन काम दिया गया था, जो चालू वित्त वर्ष में जनवरी, 2013 तक घटकर 37 दिन रह गया है। कर्नाटक में भी कार्यदिवसों की संख्या घटकर 50 से 24 हो हो गर्इ है। पड़ताल से स्पष्ट है कि वर्ष, 2010 तक कार्यदिवसों के मामले में तकरीबन सभी राज्यों का प्रदर्षन अच्छा रहा था। इस योजना के लिए सरकार द्वारा आवंटित की जाने वाली राशि में भी भारी कमी आर्इ है। वित्तीय वर्ष 2010-11 में मनरेगा के लिए 39377 करोड़ रुपये खर्च किये गये, जबकि वित्तीय वर्ष 2011-12 में यह राशि 37637 करोड़ रुपये थी। चालू वित्त वर्ष 2012-13 में जनवरी, 2013 तक मनरेगा के लिए सिर्फ 26508 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं। न्युनतम मजदूरी के निर्धारण में भी भारी विवाद रहा है। राजस्थान में कृषि मजदूरों को 147 रुपया भुगतान किया जा रहा है, जबकि मनरेगा के अंतगर्त 133 रुपया बतौर मजदूरी देने का प्रावधान है। हाल ही में राजस्थान के जयपुर जिले के डुडू ब्लाक में मनरेगा के तहत प्रतिदिन सिर्फ 1 रुपये से 15 रुपये तक मजदूरी देने का मामला प्रकाश में आया है। संबंधित कार्य को करवाने वाले कनीय अभियंता के अनुसार उक्त कार्य के लिए मजदूरी के तौर भुगतान की गर्इ राशि प्रर्याप्त थी। मजदूरी के भुगतान में देरी, आवेदन देने के बाद भी रोजगार या बेरोगार भत्ता का नहीं मिलना, राज्य के द्वारा निर्धारित मजदूरी से कम मजदूरी का भुगतान करना, संपत्ति का निर्माण नहीं हो पाना जैसी समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। देश के लगभग सभी राज्यों में चल रही इस तरह की समस्या के कारण मनरेगा अपनी मौत की ओर अग्रसर हो रहा है, जबकि इसपर सरकार के द्वारा अब तक 1.3 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।

बावजूद इसके राजस्थान में इस अधिनियम के अंतगर्त साल में 100 दिन के बजाए 200 दिन रोजगार मुहैया करवाने की गारंटी की माँग की जा रही है।

loading-8aa2b6eacbefaa48b2fe11708bf81610तमाम खामियों के बावजूद मनरेगा के फायदों को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। इस योजना की बदौलत बहुत सारे राज्यों में मजदूरों के पलायन में कमी आर्इ है। बिहार ऐसा ही एक राज्य है। इस तथ्य का पता इससे भी चलता है कि धीरे-धीरे पंजाब एवं हरियाणा जैसे राज्यों में कृषि मजदूरों की तेजी से कमी हो रही है। सप्रंग सरकार मनरेगा की महत्ता से अच्छी तरह वाकिफ है। वह जानती है कि तमाम तरह के भ्रष्टाचार के मामलों में आकंठ डुबे होने के बावजूद मनरेगा के बलबूते वह वर्ष, 2014 में होने वाले आम चुनाव की वैतरणी को पार कर सकती है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार के मामले पर हमेशा मौन रहने वाली कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने भ्रष्टाचार की गंभीरता पर अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने अपने बयान में इसे विश्व की सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना बताते हुए कहा कि इसकी सहायता से दूसरी हरित क्रांति शुरु की जा सकती है। इस सपने को साकार करने के लिए आज भ्रष्टाचार के भूत को भगाने के साथ-साथ मनरेगा के मद में की जा रही राशि के आवंटन में इजाफा करने की भी जरुरत है।

सतीश सिंह

 

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