लेखक परिचय

वीरेन्द्र जैन

वीरेन्द्र जैन

सुप्रसिद्ध व्‍यंगकार। जनवादी लेखक संघ, भोपाल इकाई के अध्‍यक्ष।

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वीरेन्द्र जैन

उन्नीस जुलाई वह तिथि है, जिसने वर्ष 1969 में न केवल राजनीति के क्षेत्र में अपितु आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में भी अपने निशान छोड़े है, यह वह दिन था जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने संसद में अपना बहुमत बनाने के लिए वामपंथी दलों से समर्थन प्राप्त करने हेतु 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, इस अवसर पर उन्होने कहा था कि ‘ भारत में निर्मित हो रहे नये सामाजिक संबंधो को सुदुढ़ करने में वित्तीय और इसके नीति निर्धारक संस्थानों पर सरकारी क्षेत्र का अधिकार और नियंत्रण बहुत महत्वपूर्ण धुरी है। किसी भी समाज के सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वित्तीय संस्थानों का संचालन बहुत केंन्द्रीय महत्व का होता है, जनता की बचत को उचित दिशा देने व उसे उत्पादक कार्यो में लगाने में बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकारण महत्वपूर्ण कदम है, सरकार का विश्वास है कि यह कदम देश के संसाधनों को प्रेरित करने व उनके ऐसे प्रभावशील विनियोजन में उपयोगी होगा, जिससे राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में बड़ी सफलता मिलेगी।” उनका भरोसा सही साबित हुआ था।

हमारे देश में संगठित बैकिंग उद्योग को दो शतक से अधिक हो चुके हैं। सन् 1955 तक सारे बैंक प्राइवेट हाथों में ही थे। वे या तो व्यक्तियों द्वारा स्थापित थे अथवा औद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित थे। सेंन्ट्रल बैक ऑफ इंण्डिया टाटा का था, तो यूको बैक बिड़ला का, बैक ऑफ बड़ौदा, बालचंद हीराचंद का था और ओरियंटल बैक ऑफ कामर्स करमचंद्र थापर का इण्डियन बैक चेटियार का था, सिंडीकेट बैक पईयों का था और दूसरे भी इसी तरह थे, वे लोगों का पैसा जमा करते थे व उसे अपने कामों में लगाते थे। उनके कई काम तो बहुत नासमझी के होते थे, क्योंकि उन पर नियंत्रण के लिए कोई संस्था नही थी, जो जमाकर्ताओ के हितों की रक्षा करती। बैको के मालिक बैक में जमा धन को अपनी मर्जी के अनुसार उपयोग के लिए स्वतंत्र थे, द्वितीय विश्व युद्व के बाद में अविभाजित और विभाजित बंगाल तथा केरल में दर्जनों बैकों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया, जिससे आम जनता बैकों में पैसा करने से घबराने लगी। यही कारण था कि आजादी के बाद सन् 1949 में सरकार को बैकिंग कंपनी नियामक कानून बनाना पड़ा। यह हस्तक्षेप इसलिए अनिवार्य हो गया था क्योंकि निरतंर घटती घटनाओं ने आम आदमी के हितों पर भारी कुठाराघात किये। सन् 1951 में व्यावसायिक बैकों की संख्या 566 थी, जो 1969 में 89 पर आ चुकी थी, अठारह वर्षो में 477 बैक दृश्य से बाहर हो चुके थे। आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने असमानता दूर करने और निचले स्तर पर जीवन जीने वालों को अवसरों की समानता पर लाने का सपना देखा था। उन्हें उम्मीद थी कि बैंक इस सपने को पूरा करने में मदद करेंगे, किन्तु प्रायवेट क्षेत्र के बैकों ने इस ओर निगाह ही नही की। तब ग्रामीण बैकिंग जॉच समिति ने इम्पीरियल बैंक से ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रो में 114 नई शखाएं खोलने को कहा जो पॉच वर्ष के अंदर खुलनी थी, किन्तु 1 जुलाई 1951 से 30 जून 1955 तक कुल 63 शाखाएं ही खोली जा सकीं।

ग्रामीण क्षेत्रो में ऋणों का वितरण शून्य था, इन परिस्थितियों में अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति की सिफारिशों पर 1955 में स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया एक्ट लागू किया गया और इम्पीरियल बैंक को स्टेट बैक ऑफ इंडिया बना दिया गया। रिजर्व बैक ने इसमें 97 प्रतिशत पूंजी लगायी। इसके बाद पॉच वर्षो के अंदर ही चार सौ शाखाऐं खोलने के लक्ष्य के समक्ष स्टेट बैंक ने 415 शखाऐं खोल दीं। यह देखकर 1959 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (सहयोगी बैक) कानून पास किया गया जिसमें स्टेट बैक ने आठ बैकों को अपने सहयोगी बैकों का दर्जा प्रदान किया। दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि सन् 1955 से 1959 के बीच ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों का जन्म हुआ यह वही समय था जब बैंक ऋणों का प्रसार ग्रामीण क्षेत्र में हुआ। इसके साथ ही बैंक शाखाओं का विस्तार भी हुआ। इसी उपलब्धि के प्रकाश में 1968 में सरकार को बैकों के सामाजिक नियंत्रण (सोशल कंट्रोल) के लिए विवश होना पड़ा। बाद में 19 जुलाई 1969 को 14 बड़े बैकों के राष्ट्रीयकरण की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करने में इसी आधार ने विपक्षियों का मुंह बंद किया था। बैकिंग कंपनी बिल (अधिग्रहण एव उपक्रम स्थानातरंण) 1969 अपने उद्देशय को स्पष्ट करते हुए कहता है कि ”हमारा बैकिंग तंत्र लाखों लोगों के जीवन से जुड़ा है और इसे बडे सामाजिक उद्देशयों के लिए काम करना चाहिए जिससे कृषि के तीव्र विकास, लघु उद्योग और निर्यात के साथ साथ रोजगार के अवसरों में वृद्वि तथा पिछड़े क्षेत्रों में विकास की नई गतिविधियॉ संचालित करने जैसे राष्ट्रीय प्राथमिकता के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके इस उद्देशय के लिए यह आवश्यक हो गया है कि सरकार बैकों के प्रसार और कामों में विविधता की दृष्टि से इसकी सीधी जिम्मेवारी अपने हाथ में ले।

राष्ट्रीयकरण के बाद तीन दशकों में हुई प्रगति के आंकडे चौकाने वाले है, जहॉ 1969 में कुल बैंक शखाएं 8262 थीं वहीं आज बैंकों की शाखाओं की संख्या 70000 से अधिक है ग्रामीण क्षेत्र की शाखाओं की संख्या 1833 से बढ़कर 35000 से अधिक हो गयी है। अर्धशहरी क्षेत्र की शखाएं भी 3342 से बढ़कर 16000 से अधिक हो गयी है।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों की शाखाओं को सम्मिलित किये बिना ही शाखाओं की संख्या सात गुना बढ़ गयी है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैक को मिला लेने के बाद तो यह विकास सारी दुनिया में अनूठा है। जहॉ पहले 65000 की आबादी पर एक बैंक शखा हुआ करती थी, वहॉ आज प्रत्येक 15000 की आबादी पर एक शाखा है जबकि आबादी में भी बेतरह बढोत्तरी हुई है। शाखाओं का अधिकतम विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ है। इस विस्तार ने ग्रामीणजनों का भाग्य ही बदल कर रख दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर विकास के समान अवसर उपलब्ध होने से राष्ट्रीय एकता में बहुत मदद हुई है। 1969 के पूर्व जहॉ अमरीका से गेंहू आयात करना पड़ता था, वहीं आज हमारे गोदाम अनाज के भंडारों से भरे हैं। कृषि के क्षेत्र में यह विकास केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों द्वारा दिये गये बैक ऋणों की दम पर ही संभव हो सका है। सिचाई, कृषि उपकरणों और खाद के लिए दिए गए ऋण के सहारे किसानों ने पूरे देश को हरा-भरा कर दिया है। इस उपलब्धि के पीछे बैकों के राष्ट्रीयकरण की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, जो हर हालत में कुल ऋणों का 16 प्रतिशत कृषि के लिए देते हैं।

यद्यपि यह सच है कि बाद में बैंकों का राजनीतिक उद्देशयों के लिए दुरूपयोग किया गया एंव अव्यवहारिक प्रचारत्मक सरकारी योजनाओं में धन और श्रम शक्ति का अपव्यय हुआ, फिर भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक लाभ में रहे, बाद में नयी एकाउंटिंग व्यवस्था लागू कर दी गई, जिससे कुछ बैंको की तत्काल नुकसान दुष्टिगोचर हुआ पर एक-दो वर्ष में ही ये बैंक पुन: लाभ की स्थिति में आ गये। नई आर्थिक नीति में राष्ट्रीयकरण से विनेवेशीकरण की ओर बढा गया। 1998 से 2004 के बीच देश में दल की सरकार रही जिसने बैंको के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया था, इसलिए वह इस फैसले को उलटने के लिए पूरा प्रयास कर रही थी। ब्याज की दरें निरंतर घटायी जा रही थी बैकों के बोर्डो में राजनीतिक नियुक्तियॉ की जा रही थीं। उनके कार्यो में राजनीतिक उद्देशयों के लिए अनुचित हस्तक्षेप किया जा रहा था तथा बडे औद्योगिक घरानों से वसूली के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाये गये। वर्तमान सरकार भी बैंकों के प्राइवेटीकरण की दिशा में तेजी से कदम बढा चुकी है। यदि राष्ट्रीयकरण को उलटने का फैसला किया किया गया तो यह देश के लिए और इसके जमाकर्ताओं के लिए बेहद घातक कदम होगा।

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