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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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राजस्थान के हालिया शहरी निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए थोड़ी खुशी और थोड़ा गम वाली रही । सत्तारूढ़ भाजपा ने निकाय के 129 सीटों मे से कुल 43 पर कब्जा जमाया जबकि काँग्रेस के हाथ कुल 16 सीटें ही लगीं, वहीं अन्य के हाथ कुल 12 सीटें लगीं और 57 मे त्रिशंकु स्थिति है यानि किसी भी पक्ष को बहुमत नहीं मिली है। वैसे नतीजे वसुंधरा के लिए ठीक नहीं रहे क्योंकि पार्टी को उनके विधानसभा और गृहक्षेत्र झालावाड़ और झालपाटन मे हार का मुंह का देखना पड़ा है। आंकड़ों के लिहाज से तो वसुंधरा और पार्टी ने बढ़त हासिल कर ली है परंतु सियासी समीकरणों और गणित के हिसाब से उसे सोचने को मजबूर कर दिया है। वैसे निकाय चुनाव नतीजों पर सत्ताधारी दल का प्रभाव रहता है और उसका पलड़ा भाड़ी  होता  है ऐसे में वसुंधरा के लिए स्थिति और भी जटिल हो गयी थी और हर कोई भाड़ी जीत की अपेक्षा कर  रहा था, परंतु नतीजे संतोष करने भर की रही । “ललितगेट ” के साये में हुए इस चुनाव मे वसुंधरा के लिए करो या मरो जैसी स्थिति थी। पूरे प्रकरण ने वसुंधरा राजे को आलाकमान के सामने रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया है। वैसी भी पार्टी आलाकमान वसुंधरा से खुश नहीं है , नाराजगी की अपनी वजह भी है ।

वसुंधरा नें विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को घुटने के बल ला खड़ा किया था, और बार बार पार्टी छोड़ने की धमकी तक दे रही थीं । वो भी सिर्फ इस लिए ताकि तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष गुलाब चंद कटारिया प्रदेश यात्रा पर ना जा पाएँ  जिससे उनकी पार्टी पर पकड़ कमजोर ना पड़े। पार्टी उस समय जैसे तैसे वसुंधरा को मना पाई थी और मजबूरन गुलाब कटारिया को यात्रा रोकनी पड़ी थी।विधानसभा चुनाव और लोकसभा मे मिली अप्रत्याशित सफलता से तो जैसे वसुंधरा को पर लग गए और उन्होने केन्द्रीय कैबिनेट मे बलात्कार के आरोपी निहाल चंद को मंत्री बनाने की मांग कर दी और सरकार को मजबूरन उनकी जिद माननी पड़ी , जिससे पार्टी को भारी फजीहत आज तक झेलनी पड़ रही है।  परंतु प्रदेश भाजपा मे असंतोष के स्वर उभरने और ललित गेट प्रकरण ने भाजपा को वसुंधरा पर नकेल कसने को मजबूर कर दिया। ऊपर से संघ नेतृत्व भी वसुंधरा से खासा नाराज चल रहा था। अंतोगत्वा पार्टी ने खाली संगठन महामंत्री मे पद पर अविनाश राय खन्ना को भेज कर वसुंधरा की नकेल कस दी।  ऐसे मे वसुंधरा को इस  निकाय चुनाव  मे अपने को साबित करने का वक्त था परंतु वह अपेक्षाकृत नतीजे नहीं दिला सकीं और पार्टी  को मामूली बढ़त से संतोष करना पड़ा। पार्टी को भी वसुंधरा को उनके हाल पर छोड़ना पड़ा ताकि नतीजे ही वसुंधरा के गुमान को तोड़ सके। वर्तमान स्थिति ने वसुंधरा राजे को आत्ममंथन को मजबूर कर दिया है । मजबूरन ही सही vasundharaवह  प्रदेश नेतृत्व की ओर रुख करने पर मजबूर हुई हैं। क्योंकि इस हार की वजह भीतरघात और पार्टी नेताओ की मुख्यमंत्री से नाराजगी मानी जा रही है। आने वाले दिन वसुंधरा के लिए और कठिन होंगे और उन्हे अपने कदम फूँक -फूँक कर बढानी होगी।

केशव झा

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