लेखक परिचय

राजीव रंजन प्रसाद

राजीव रंजन प्रसाद

लेखक मूल रूप से बस्तर (छतीसगढ) के निवासी हैं तथा वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी में प्रबंधक है। आप साहित्यिक ई-पत्रिका "साहित्य शिल्पी" (www.sahityashilpi.in) के सम्पादक भी हैं। आपके आलेख व रचनायें प्रमुखता से पत्र, पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में प्रकशित होती रहती है।

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 राजीव रंजन प्रसाद

Protestors-in-New-Delhi-burतहलका प्रकरण किसी एक व्यक्ति या एक संस्था पर प्रश्नचिन्ह नहीं है। यह गढ़ों और मठों के टूटने की कड़ी में एक और महत्वपूर्ण घटना है। वैचारिक असहिष्णुता और विचारधारात्मक अस्पृश्यता के वातावरण में जब यह घटना घटी तो अनायास ही इसके सम्बन्ध समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र से जुड़ने लगे। एक आम अपराधी और एक खास अपराधी द्वारा किये गये समान कृत्य की विवेचना, अन्वेषण तथा बचाव के तरीकों में पूंजीपति और सर्वहारा वाली सभी परिभाषायें कैसे साक्षात हो जाती हैं, इसे तेजपाल प्रकरण से समझा जा सकता है। एक खास अपराधी ही कह सकता है कि मुझे राजनीति ने फसाया, मैं अलाना धर्म अथवा फलाना जाति का हूँ इसीलिये शिकार बना, लेकिन एक आम अपराधी? आम अपराधी सालों जेल में सड़ता है, किये गये अपराध से अधिक सजायें भुगतता है, कई बार तो वह निरपराध होने का अपराधी सिद्ध हो जाता है। तहलका प्रकरण खास होने की प्रक्रिया का भी उदाहरण है और खास अपराधी होने की भी महत्वपूर्ण अध्ययन कथा है जिसका इशारा उन गढ़ों और मठों की ओर है जिससे सुरक्षा प्राप्त की जाती है। जिन्हें दुनिया बदलनी है, जो व्यवस्था बदलने का सपना देखते हैं अथवा जिनके सरोकारों में आम जन हैं उन्हें तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब।

रातो रात आम से खास आदमी बनने का अप्रतिम उदाहरण हैं तरुण तेजपाल। खुफिया कैमरों से मचाये गये तहलकों ने उन्हें अकस्मात एक एसा नायक बना दिया जो आम सरोकारों का पैरोकार था तथा उसके पास व्यवस्था को बदलने का कोई शास्त्रीय दृष्टिकोण उपलब्ध था। इस व्यक्ति के तहलके अंतत: संस्था बन गये और शनै: शनै: एक मठ पनपने लगा। इस मठ को दरकाने की कोशिशे भी होती रही तथा कई बार यह आरोप लगे कि एक खास राजनैतिक दल के इशारे पर यह व्यक्ति कार्य कर रहा है, अधिकतम खुफिया कैमरे खास राजनैतिक दल के पीछे ही लगाये गये थे अर्थात यह कि भांति भांति के पूर्वाग्रह का आरोप तहलका पर लगाया जाता रहा किंतु समर्पित पत्रकारों और आंचलिक संवाददाताओं की टीम ने सश्रम बटोरी गयी कहानियों और समाचारों से इस संस्था को गरिमा तथा पराकाष्ठा प्रदान की। एक दु:खद सुबह संयुक्त मेहनत और सारे समर्पण पर खुद तहलका के संस्थापक ने पानी फेर दिया जब अपने जघन्यतम अपराध के लिये वे अनूठा और शर्मनाक प्रायश्चित करते नजर आये जिसके लिये स्वयं को उन्होंने छ: महीने तक के लिये कार्यालय से हटा लिया था। इस हास्यास्पद प्रायश्चित के बाद जैसे जैसे आलोचना बढ़ी उनके बयान बदलने लगे। पहले अदालत में अग्रिम जमानत के लिये अर्जी लगी जिसके परिणाम विपरीत जाने की आशंका को देखते हुए किसी कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उसे वापस ले लिया गया। पुलिस के सामने समर्पण के लिये वक्त माँगा गया। यह स्पष्ट है कि स्वयं को बचाने के कानूनी तरीके तेजपाल द्वारा खुल कर आजमाये जा रहे हैं। इस विन्दु पर ठहर कर एक और मठ की चर्चा कर लेते हैं। आशाराम और नारायण स्वामी प्रकरण भी हजारो-लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास पर चोट का ठीक वैसा ही उदाहरण है जैसा कि तेजपाल प्रकरण। अंतर केवल यही है एक मठ धार्मिक आवरण पहन कर समाज को धोखे में रखता है तो दूसरे का चोला कथित प्रगतिशील है। मेरे एक सहकर्मी आशाराम के बड़े भक्त रहे थे तथा उसकी गिरफ्तारी के बाद कई दिनो तक असहज रहे। असल समस्या घर में थी जहाँ उनके बच्चों ने पूजाघर मे रखी आशाराम की तस्वीर को बाहर निकालने के लिये बगावत कर दी थी। आस्था की जड़ें गहरी होती हैं और आशंकाओं ने अनेक सवाल उनके भीतर पैदा कर दिये। रोज आ रही खबरों के बीच कभी नारायण स्वामी कहते कि यह तो बापू की लीला है और वे जब चाहेंगे जेल से बाहर आ जायेंगे तो दूसरी ओर आशाराम इसे एक खास राजनैतिक दल की साजिश निरूपित कर रहे थे। घर के भीतर होने वाले विरोध को न झेल सकने वाले मेरे सहकर्मी को अंतत: आशाराम की तस्वीर को अपने पूजाघर से विदा करना ही पड़ा और तब जा कर नयी उम्र और नयी सोच के बच्चों ने अपने तर्क के बाण चलाने बंद किये। इस बीच जो कुछ हुआ वह सर्वविदित है; लीला करने वाले लोग अंतर्ध्यान होने लगे और उनकी अब तक छिपी सच्चाईयाँ जाहिर होने लगीं। अवैध रूप से इकट्ठा की गयी जमीने सरकार अपने कब्जे में लेने लगी, स्कूल और संस्थाये बंद होने की स्थिति में आ गयी। साथ ही साथ यह भी हुआ कि रसूख तथा प्रभाव से डर कर जो लोग अब तक चुप बैठे थे वे सक्रिय हुए और अपने आरोपो और शिकायतों के साथ बाहर आने लगे। यह एब बहुत बड़े मठ के दरकने की शुरुआत थी।

मठ कैसे बन जाते हैं? हिन्दी साहित्य जगत भी मठों और गढ़ों से अटा पड़ा है। यहाँ स्थिति और भी भीषण है चूंकि झगड़े विचारधाराओं के हैं। लेखन के शुरुआती दौर में मेरे अनेक मार्गदर्शक रहे जिन्होंने कभी गांठ बाँधने के लिये कहा तो कभी पत्थर की लकीर की तरह मुझे बताया कि किस विचारधारा से जा कर सटो, कौन कौन सी किताबें चाटो, किस नारे को रटो और किस संस्था से जुडो। यह तक बताया गया था कि कौन कौन सी पत्रिकाओं में छपने के बाद लेखक कहलाया जाता है, कौन कौन व्यक्ति यदि आपके लेखन और किताबों पर चर्चा करेंगे तो आपके उपर ‘मानक लेखक’ होने का ठप्पा लगेगा यहाँ तक कि किस प्रकाशन से पुस्तक बाहर आयेगी तभी लेखकों की जमात में आपके चेहरे की गिनती आरंभ की जायेगी। ये बहुत मजबूत गढ़ हैं लेकिन अब ढ़हने लगे हैं। गड़े मुर्दे उखाड़ने से बेहतर है कि कुछ हालिया घटनाओं की चर्चा की जाये। मंगलेश डबराल प्रकरण ने हिन्दी की मठाधीशियत की वास्तविकता और उसकी ताकत को सबसे पहले उजागर किया। कुछ समय पहले ‘भारत नीति प्रतिष्ठान’ ने ‘समांतर सिनेमा का सामाजिक प्रभाव’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ वामपंथी कवि मंगलेश डबराल ने की थी। इस आयोजन का विषय न तो साम्प्रदायिक था न ही असामाजिक; यह अवश्य था कि आयोजनकर्ताओं का सम्बन्ध दक्षिणपंथी विचारों के साथ रहा है। मंगलेश डबराल के पास यह विकल्प अवश्य रहा होगा कि वे अध्यक्षता स्वीकार ही नहीं करते यदि वे वैचारिक अस्पृश्यता को इतना अधिक मानते हैं। उनके पास यह विकल्प भी था कि मंच से खुल कर अपनी बात कहते चाहे वह आयोजक अथवा आयोजन की भावना के विरुद्ध जाती…..लेकिन काली बिल्ली तो रास्ता काट गयी थी सो उनका जमकर विरोध वाम-कट्टरपंथियों ने किया जिसके बाद मंगलेश डबराल ने अपनी उपस्थिति को एक चूक निरूपित कर दिया और गृह-शांति करवा ली। यह इस बात पर मुहर था कि हर कोई अपने अपने खेमे में बोलेगा और अपने अपने लोगों से ही ताली बजवायेगा; खबरदार जो एसी बहसों में विमुख विचारों से साथ संलिप्तता भी हुई। इस बात को आगे बढ़ाया अरुन्धति राय और वरवर राव ने जो हंस जैसी वामपंथी विचारों की प्रवर्तक पत्रिका के कार्यक्रम मे बोलने से इसलिये पलायन कर गये क्योंकि वहाँ गोविन्दाचार्य और अशोक बाजपेयी भी अपनी बात रख रहे थे। पुनश्च क्या कोई बात वहीं रखी जानी चाहिये जहाँ इस बात की आश्वस्ति हो कि सामने सारे समर्थक ही बैठे हैं? राजेन्द्र यादव तो अपने जीवन के अंतिम दिनो में हंस जैसा मठ भी दरका कर चले गये जब ज्योति कुमारी प्रकरण में उनके पास रहस्यमयी चुप्पी को छोड़ कर कोई उत्तर नहीं था। मामला कत्तई व्यक्तिगत नहीं था चूंकि करनी और कथनी का किसी जिम्मेदार व्यक्ति से अंतर अपेक्षित नहीं। यह आशा की जा रही थी कि हंस के नवम्बर अंक में राजेन्द्र यादव अपने उस स्त्री विमर्श पर बात रखेंगे जिसका सम्बन्ध उनकी खामोशी से है तो न केवल निराशा हाथ लगी बल्कि दबे छुपे अपने आखिरी सम्पादकीय में राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि “किसी स्त्री की आत्मकथा लगभग उसके व्यक्तिगत कमरे में झांकने जैसा प्रयास है। आजकल तो बाथरूम से ले कर शयन कक्ष तक सब जगह स्त्री अपने आपको देखे जाने की सुविधा देती है, पहले एसा नहीं था। पहले वह अपने अध्ययन कक्ष तक ही आने की अनुमति देती थी”। इस वाक्यांश को मैने डॉ, धर्मवीर भारती द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘सीमंतनी उपदेश’ से जोड़ कर देखने की कोशिश भी की जिस पुरातन संदर्भ की आड़ ले कर राजेन्द्र जी ने संपादकीय में आज का स्त्री विमर्श जोडा है। यह एक सामान्यीकरण है तथा उस पुरुषवादी लुलुपता को रेखांकित करने वाला वाक्य है जो किसी स्त्री को बाथरूम और शयनकक्ष मे ही देखना चाहता है, अध्ययन कक्ष में नहीं। यह बहस का विषय हो सकता है कि राजेन्द्र जी के इन वाक्यों के क्या मायने निकाले जायें? अभी तो नामवर सिंह के उस कार्यक्रम के भी मायने निकालने का समय है जिसमे वे कुख्यात पप्पू यादव की पुस्तक का विमोचन करने पहुँचे थे। कई हिन्दी के लेखक बिचारे घिस जाते हैं कि नामवर सिंह उनके लिये दो मिनट का ही समय निकाल लें लेकिन पप्पू यादव की बात अलग है। शायद यह नये किस्म की प्रगतिशीलता है और नामवर सिंह जल्दी ही उसके तत्वों से साहित्यिक समाज को अवगत करा देंगे।

साहित्यिक मठों की बात हो रही है तो यह भी जोड़ना होगा कि अनेक विचारवान लोग सोशल मीडिया पर मुखर हो कर तहलका प्रकरण पर बात कर रहे हैं। हिन्दी कहानी का बहुत बड़ा नाम हैं उदय प्रकाश, जिन्हें तरुण तेजपाल से विशेष सहानुभूति प्रतीत होती है। अपनी एक टिप्पणी में उन्होंने जो अंग्रेजी में लिखा उसका लब्बोलुआब यह है कि “एक वैज्ञानिक के बारे में सोचें जिसने चालीस साल प्रयोग शाला में असीम समर्पण के साथ अपना भोजन, अपने परिजन और अपने सुखों का परित्याग कर काम किया, जिससे कि वह एक जानलेवा बीमारी का समाधान तलाश सके जो हजारो लोगों को मार रही है…उन चालीस वर्षों के विषय में सोचें…और एक दिन किसी एक पल में…क्षणिक आवेग में वह कुछ गलत कर जाता है…वह अपनी गलती स्वीकार करता है और उसे लोगों के समक्ष अंगीकार करता है…क्या आप उसकी सभी उपलब्धियों को नकार देंगे?….क्या आप उस दवा को लेना बंद कर देंगे जिसका कि उसने आविष्कार किया है और फिर स्वयं मरना पसंद करेंगे…क्या उसे एक पेशेवर अपराधी मानेंगे…? यह एक चिंताजनक पल है…महज जोर जोर से चिल्लाना वस्तुत: ‘पागलपन’ की निशानी है…..” जब मैने यह पढ़ा तो मुझे स्वीकार करने में कई पल लगे कि इसे वाकई मेरे प्रिय कहानीकार उदय प्रकाश ने ही लिखा है। कुछ मिलते जुलते स्वर मंगलेश डबराल और जावेद अख्तर ने भी उठाये थे। वही बात कि मैं एक स्थापित लेखक हूँ इसलिये मेरी बात और सोच पत्थर की लकीर वाली प्रवृत्ति, जिसके लिये चाहे थोथे तर्क की क्यों न देने पड़ें? न यह मामला क्षणिक आवेग का है न ही किसी व्यक्ति की उपलब्धी को नकारे जाने का। इसे समझने के लिये कल्पना कीजिये कि किसी स्वेटर से ऊन का बस एक धागा निकला है जिसे अगर खींचा जायेगा तो सब कुछ उधड़ जायेगा। उधड़ ही रहा है, गोवा के माईनिंग माफिया की खबर रुकवाना, महत्वपूर्ण खबर लाने वाले पत्रकारों के काम को औसत घोषित करना, संस्था के बडे नामधारियों द्वारा तहलका के शेयरों से मुँहमांगा पैसा बनाना, पॉटी चड्ढा और तेजपाल का क्लब प्रकरण, नैनीताल में एक रेस्टहाउस का बिना अनुमति चलना आदि आदि जो कुछ भी बाहर छन छन कर आ रहा है, वह वैसा ही है जैसा आशाराम और नारायण स्वामी के प्रसंग में बाहर आ रहा है। हर दिन नये आरोप और हर दिन नयी जानकारियाँ।

सवाल यह नहीं कि तहलका को बचना चाहिये या मिट जाना चाहिये, सवाल यह भी नहीं कि कानून क्या रास्ता लेने वाला है और सवाल यह भी नहीं कि तरुण तेजपाल कौन हैं? ये सभी बाते अब गौण हैं क्योंकि असल सवाल वह है जिसपर बहस हो ही नहीं रही। सर्वहारा की बात कहते कहते कैसे व्यक्ति फूल-फल कर मठ बन जाते हैं, कैसे करोडो की सम्पत्तियाँ पत्रकारिता करने वाले संस्थान उगाहते हैं और फिर समाज के उस वर्ग के हाथों में अपना नियंत्रण सौंप देते हैं जो कठपुतलियों को बेहतर नचाना जानती है। वह बाबाओं के मठ हों या प्रगतिशीलता के गढ इन्हें निर्ममता से ढहाना ही होगा, चाहे इसके लिये कुछ तस्वीरों को मंदिरों से बाहर करना पडे या कुछ कथित महान व्यक्तियों के लिखे हुओं के आगे लाल स्याही से प्रश्न लगाना पडे; तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब।

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1 Comment on "तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब"

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गंगानन्द झा
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अत्यन्त विचारोत्तेजक एवम् ,सामयिक आलेख

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