लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

 

संसार की समृद्धतम भाषा संस्कृत भारतीय संस्कृति का आधारस्तम्भ है। देवभाषा के नाम से जानी जाने वाली संस्कृत संसार की समस्त भाषाओं की जननी है। वेद भी संस्कृत भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। संस्कृत शब्द का अर्थ होता है- परिष्कृत, पूर्ण एवं अलंकृत। संस्कृत में बहुत कम शब्दों में अधिक आशय प्रकट किया जा सकता है और इसमें जैसा लिखा जाता है, वैसा ही उच्चारण भी किया जाता है। संस्कृत में भाषागत त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं। संस्कृत का अध्ययन मनुष्य को सूक्ष्म विचारशक्ति प्रदान करता है और मौलिक चिंतन को जन्म देता है। इससे मन स्वाभाविक ही अंतर्मुख होने लगता है। सनातन संस्कृति के सभी मूल शास्त्र वेद,उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, इतिहास, पुराण, स्मृति आदि ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही हैं। अतः उनके रसपान व ज्ञान में गोता लगाने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है।

देवभाषा संस्कृत के उच्चारणमात्र से दैवी गुण विकसित होने लगते हैं। अधिकांश मंत्र संस्कृत में ही हैं। इस भाषा का ज्ञान सभी भारतवासियों को होना ही चाहिए। विद्यालयों में इसकी शिक्षा आवश्यक रूप से सभी बच्चों को मिलनी चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय को सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल ने बताया था कि केन्द्रीय  विद्यालयों में शिक्षा पाठ्यक्रम में 6 से 8 तक संस्कृत ही तीसरी भाषा होगी। जर्मन पढ़ाया जाना गलत है और गलती को जारी नहीं रखा जा सकता। इस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, हमें क्यों अपनी संस्कृति भूलनी चाहिए। संस्कृत के जरिये आप अन्य भाषाओं को आसानी से सीख सकते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। सरकार अगले सत्र से इसे बेहतर तरीके से क्रियान्वित करे। परन्तु खेद की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद सरकार के द्वारा इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई ।

 

sanskritभाषाविदों के अनुसार भी संस्कृत सर्वभाषाओं की जननी है त्तथा विश्व की सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं-न-कहीं संस्कृत से ही जुड़ा हुआ है।यही कारण है कि विभिन्न भाषाओं में संस्कृत के शब्द बहुतायत में पाये जाते हैं। कई शब्द अपभ्रंश के रूप में हैं तो कई ज्यों-के-त्यों हैं। संस्कृत का अखंड प्रवाह पालि, प्राकृत व अपभ्रंश भाषाओं में बह रहा है। चाहे तमिल, कन्नड़ या बंगाली हो अथवा मलयालम, ओड़िया, तेलुगू, मराठी या पंजाबी हो – सभी भारतीय भाषाओं के लिए लिए संस्कृत ही अन्तःप्रेरणा-स्रोत है। आज भी इन भाषाओं का पोषण और संवर्धन संस्कृत के द्वारा ही होता है। संस्कृत की सहायता से कोई भी उत्तर भारतीय व्यक्ति तेलुगू, कन्नड़, ओड़िया, मलयालम आदि दक्षिण एवं पूर्व भारतीय भाषाओं को सरलतापूर्वक सीख सकता है। यही कारण है कि आज ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और कोलम्बिया जैसे प्रतिष्ठित 200 से भी ज्यादा विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ायी जा रही है।

संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। यह सर्वाधिक प्राचीन, पूर्णतः वैज्ञानिक एवं समृद्ध भाषा है। वैज्ञानिकों का भी संस्कृत को समर्थन संस्कृत की वैज्ञानिकता अर्थात बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक खोजों का आधार होने के कारण ही बनी है। वेंकट रमन, जगदीशचन्द्र बसु, आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय, डॉ. मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों को संस्कृत भाषा से अत्यधिक प्रेम था और वे वैज्ञानिक खोजों के लिए ये संस्कृत को आधार मानते थे। प्राचीन वैज्ञानिकों एवं संस्कृत प्रेमियों के अनुसार संस्कृत का प्रत्येक शब्द वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए प्रेरित करता है। प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने विज्ञान में जितनी उन्नति की थी, वर्तमान में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। ऋषि-महर्षियों का सम्पूर्ण ज्ञान-सार संस्कृत में निहित है।

 

भारतीय वैज्ञानिकों के साथ ही पाश्चात्य विद्वानों ने भी संस्कृत की समृद्धता को स्वीकार किया है। सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को एशियाटिक सोसायटी के माध्यम से सारे विश्व में यह घोषणा करते हुए कहा था, संस्कृत एक अदभुत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लैटिन से अधिक समृद्ध और दोनों ही भाषाओं से अधिक परिष्कृत है। यही कारण है कि ब्रिटिश विद्यालयों में संस्कृत अनिवार्य बनता जा रहा है। लंदन के सेंट जेम्स कान्वेंट विद्यालय अर्थात स्कूल, जहाँ बच्चों को द्वितिय भाषा के रूप में संस्कृत सीखना आवश्यक है, का मानना है कि संस्कृत से छात्रों में प्रतिभा का विकास होता है। यह उनकी वैचारिक क्षमता को निखारती है, जो उनके बेहतर भविष्य के लिए सहायक है। याद्दाश्त को भी बेहतर बनाती है । संस्कृत शिक्षाविद् पॉल मॉस के अनुसार संस्कृत से सेरेब्रेल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। किसी बालक के लिए उँगलियों और जुबान की कठोरता से मुक्ति पाने के लिए देवनागरी लिपि व संस्कृत बोली ही सर्वोत्तम मार्ग है। वर्तमान यूरोपीय भाषाएँ बोलते समय जीभ और मुँह के कई हिस्सों का और लिखते समय उँगलियों की कई हलचलों का इस्तेमाल ही नहीं होता, जब कि संस्कृत उच्चारण- विज्ञान के माध्यम से मस्तिष्क की दक्षता को विकसित करने में काफी मदद करती है। डॉ. विल डुरंट के अनुसार संस्कृत आधुनिक भाषाओं की जननी है। संस्कृत बच्चों के सर्वांगीण बोध ज्ञान को विकसित करने में मदद करती है। कई शोधों में यह पाया गया कि जिन छात्रों की संस्कृत पर अच्छी पकड़ थी, उन्होंने गणित और विज्ञान में भी अच्छे अंक प्राप्त किये। वैज्ञानिकों का मानना है कि संस्कृत के तार्किक और लयबद्ध व्याकरण के कारण स्मरणशक्ति और एकाग्रता का विकास होता है।

यह जान कि आधुनिक विज्ञान के लिए संस्कृत वरदानरूप बन सकती है, सारा संसार संस्कृत ज्ञान प्राप्ति के पीछे दौड़ पड़ा है , और हम हैं कि ज्ञान-विज्ञान के इस अथाह भण्डार से मुख मोड़ इसे मृत भाषा बनाने पर तुले हैं । वर्तमान समय में संस्कृत भाषा विश्वभर के विज्ञानियों के लिए शोध का विषय बन गयी है। यूरोप की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका फोर्ब्ज द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार संस्कृत भाषा कम्पयूटर के लिए सबसे उत्तम भाषा है तथा समस्त यूरोपीय भाषाओं की जननी है। अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा का भी इस बात कि पुष्टि करते हुए कहना है कि अंतरिक्ष में सिर्फ संस्कृत की ही चलती है और सूर्य किरणों से स्वतः ॐ शब्द की निष्पति होती रहती है । आधुनिक विज्ञान सृष्टि के रहस्यों को सुलझाने में बौना पड़ रहा है। अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मंत्र-विज्ञान की महिमा से विज्ञान आज भी अनभिज्ञ है। उड़न तश्तरियाँ ,एलियन आदि की कई ऐसी बातें हैं जो आज भी विज्ञान के लिए रहस्यमय बनी हुई हैं। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से ऐसे कई रहस्यों को सुलझाया जा सकता है। विमान विज्ञान, नौका विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हमारे ग्रंथों से प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार के और भी अनगिनत सूत्र हमारे ग्रंथों में समाये हुए हैं, जिनसे विज्ञान को अनुसंधान के क्षेत्र में दिशानिर्देश मिल सकते हैं। वर्तमान में अगर विज्ञान के साथ संस्कृत का समन्वय कर दिया जाय तो अनुसंधान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हो सकती है। हिन्दू धर्म के प्राचीन महान ग्रंथों के अलावा बौद्ध, जैन आदि धर्मों के अनेक मूल धार्मिक ग्रंथ भी संस्कृत में ही हैं।

 

वर्तमान समय में भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार होने के बावजूद भी मानव-समाज अवसाद, तनाव, चिंता और अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त है क्योंकि केवल भौतिक उन्नति से मानव का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं है। इसके लिए आध्यात्मिक उन्नति अत्यंत आवश्ययक है। समाज को यदि पुनः संस्कारित करना हो तो हमें फिर से सनातन धर्म के प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का सहारा लेना ही पड़ेगा। हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथ शाश्वत मूल्यों एवं व्यावहारिक जीवन के अनमोल सूत्रों के भण्डार हैं, जिनसे लाभ लेकर वर्तमान समाज की सच्ची और वास्तविक उन्नति सम्भव है। संस्कृत के शब्द चित्ताकर्षक एवं आनन्ददायक भी हैं, जैसे- सुप्रभातम्, सुस्वागतम्, मधुराष्टकम् के शब्द आदि। बोलचाल में यदि संस्कृत का प्रयोग किया जाय तो हम आनंदित महसूस करते हैं। परंतु अफसोस कि वर्तमान में पाश्चात्य अंधानुकरण से संस्कृत भाषा का प्रयोग बिल्कुल बंद सा हो गया है। यह अत्यंत क्षोभनाक स्थिति है कि सिर्फ दस अगस्त को संस्कृत दिवस के रूप में इस महान भाषा को स्मरण कर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं ।संस्कृत के उत्थान के लिए हमें अपने बोलचाल में संस्कृत का प्रयोग शुरु करना होगा। बच्चों को पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ायी जानी चाहिए। और उन्हें इसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। विद्यार्थियों को वैदिक गणित की शिक्षा दिलाई जाये तो वे गणित के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ सकते हैं। संस्कृत भाषा हमारे देश व संस्कृति की पहचान है, स्वाभिमान है। हमें इस भाषा को विलुप्त होने से बचाना होगा।

 

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2 Comments on "पूर्णतः परिष्कृत, समृद्ध भाषा है सर्वभाषाओं की जननी संस्कृत"

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Laxmirangam
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अशोक जी और सुरेश जी.

बहुत सुदर विचार फरमाए.

हमारे यहाँ यही सबसे बड़ी दुविधा है. हमने राय दे दी. लोग उसे कार्यान्वित करते / कराते रहे. कोई कार्यान्वयन नहीं करना चाहता क्योंकि उसमें ही तो मेहनत लगती है, तकलीफें आती हैं. जब तक उनको झेलकर हल नहीं करेंगे बात आगे नहीं बढ़ेगी. इस देश को मशविरा देने वाले बहुत हैं लेकिन उसे कार्यकारी बनाने वाले नगण्य.

suresh karmarkar
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संस्कृत की एक विशेषता और है। कुछ दिन पूर्व व्हाट्सप्प पर एक जानकारी मिली ,केरल के एक १७वि। शताब्दी लेखक हैं /इन्होने एक पद्य रचना संस्कृत में की है. कुल ५६ शोल्क हैं. २८+२८=५६। सीधे पढ़ते जायँ तो २८ श्लोक रामकथा के और उलटे पढ़ते जाएँ तो कृष्ण कथा बन जाती है। क्या किसी और भाषा में ऐसा संभव है. संस्कृत परिपूर्ण ,परिष्कृत, पुरातन, पुरोगामी, भाषा है.

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