लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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crimeअरविंद जयतिलक

राजनीति के आपराधिकरण पर लगाम कसने के उद्देश्य से देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा प्रधानमंत्री एवं राज्य के मुख्यमंत्रियों को ताकीद किया जाना कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले दागी लोगों को मंत्री पद न दिया जाए लोकतंत्र की शुद्धिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। सर्वोच्च अदालत ने दो टुक कहा है कि भ्रष्टाचार देश का दुश्मन है और संविधान की संरक्षक की हैसियत से प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री नहीं चुनेंगे। पर इस नसीहत का केंद्र व राज्य सरकारों पर कोई असर होगा यह कहना अभी कठिन है। ऐसा इसलिए कि सर्वोच्च अदालत ने दागी सांसदों और विधायकों को मंत्री पद के अयोग्य मानने में हस्तक्षेप के बजाए इसकी नैतिक जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ दिया है। यहां जो गौर करने वाली बात है वह यह कि न्यायालय का सुझाव सरकारों के लिए बाध्यकारी नहीं बल्कि एक उपदेश भर है जिसका पालन करना उनकी मर्जी पर निर्भर है। ऐसे में उम्मीद कम ही है कि केंद्र व राज्य सरकारें इस सुझाव पर गंभीरता से विचार करेंगी। याद होगा पिछले दिनों जब सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के जरिए दोषी सांसदों व विधायकों की सदस्यता समाप्त करने और जेल से चुनाव लड़ने पर रोक लगायी तो राजनीतिक दलों ने किस तरह वितंडा खड़ा किया था। उनके हैरतअंगेज दलील से देश हैरान रह गया। बता दें कि दागियों पर अदालत का मौजूदा सुझाव नौ साल पुरानी एक याचिका पर दिया गया है जिसमें कैबिनेट से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को हटाने की मांग की गयी थी। देखना दिलचस्प होगा कि अदालती सुझाव के बाद केंद्र व राज्य सरकारें दागियों के सिर से मंत्री पद का ताज छिनती हैं या बरकरार रखती हैं। बहरहाल किसी से छिपा नहीं है कि 16 वीं लोकसभा में भी बड़े पैमाने पर दागी चुनकर आए हैं। एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स यानी एडीआर के आंकड़ों पर गौर करें तो 16 वीं लोकसभा के लिए चुने गए 185 यानी 34 फीसदी माननीयों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले हैं। दुर्भाग्यपूर्ण कि 2009 के मुकाबले इस बार दागियों की संख्या बढ़ी है। दूसरी ओर ऐसे माननीयों की भी संख्या बढ़ी है जिनपर हत्या, हत्या के प्रयास और अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2009 के आमचुनाव में ऐसे सदस्यों की संख्या तकरीबन 77 यानी 15 फीसदी थी जो अब 16 वीं लोकसभा में बढ़कर 112 यानी 21 फीसदी हो गयी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि दागियों को गले लगाने के मामले में कोई भी दल दूध का धुला नहीं है। सबके चेहरे एक जैसे हैं। दलगत आधार पर देखें तो भाजपा के सर्वाधिक 98 यानी 281 विजेताओं में से 35 फीसदी सांसदों ने अपने शपथ पत्र में अपने खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने की घोषणा की है। इसी तरह कांग्रेस के 44 में से 8 यानी 18 फीसदी, अन्नाद्रमुक के 37 में से 6 यानी 16 फीसदी, शिवसेना के 18 में से 15 यानी 83 फीसदी, और तृणमूल कांग्रेस के 34 सांसदों में से 7 यानी 21 फीसदी पर गंभीर आरोप हैं। अगर दागी मंत्रियों पर नजर डालें तो राजग सरकार के 45 में से 12 यानी 27 फीसदी मंत्रियों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से 8 पर तो बेहद गंभीर मामले लंबित हैं। गौर करें तो केंद्र में ही नहीं राज्य सरकारों में भी दागी मंत्रियों की फौज है। दागियों की इतनी बड़ी संख्या अगर संसद और विधानसभाओं में पहुंच रही है तो यों ही नहीं है। दरअसल राजनीतिक दलों को विश्वास हो गया है कि जो जितना बड़ा दागी है उसके चुनाव जीतने की उतनी ही बड़ी गारंटी है। पिछले कुछ दशक से इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है। देखा भी जा रहा है कि दागी चुनाव जीतने में सफल हो रहे हैं। लेकिन इसके लिए सिर्फ राजनीतिक दलों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जनता भी बराबर की कसूरवार है। जब देश की जनता ही साफ-सुथरे प्रतिनिधियों को चुनने के बजाए जाति-पांति और मजहब के आधार पर बाहुबलियों और दागियों को चुनेगी तो स्वाभाविक रुप से राजनीतिक दल उन्हें टिकट देंगे ही। नागरिक और मतदाता होने के नाते जनता की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह ईमानदार, चरित्रवान, विवेकशील और कर्मठ उम्मीदवार को अपना प्रतिनिधि चुने। देश की जनता को समझना होगा कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में नेताओं के आचरण का बदलते रहना एक स्वाभावगत प्रक्रिया है। लेकिन उन पर निगरानी रखना और यह देखना कि बदलाव के दौरान नेतृत्व के आवश्यक और स्वाभाविक गुणों की क्षति न होने पाए यह जनता की जिम्मेदारी है। देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तरक्की के के लिए जितनी सत्यनिष्ठां व समर्पण राजनेताओं की होनी चाहिए उतनी ही जनता की भी। दागियों को राजनीति से बाहर खदेड़ने की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों के कंधे पर डालकर निश्चिन्त नहीं हुआ जा सकता। उचित होगा कि केंद्र व राज्य की सरकारें सर्वोच्च अदालत के सुझाव को अमलीजामा पहनाएं और जनता भी दागियों को चुनने का मोह छोड़े।

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