लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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संभव है जब आप पहली अप्रैल को इस देश के सबसे खूबसूरत प्रेस क्लब, चंडीगढ़ में जाएँ तो आपको वहां दारु न मिले. क्लब के गम इतने ज़्यादा बढ़ गए हैं कि गम गलत करने वाली ‘बार’ आपको वहां हमेशा हमेशा के लिए बंद मिल सकती है. क्लब की बार का लायसेंस रिन्यू होने की संभावना न के बराबर है और इसकी वजह है क्लब के पास इस जगह की कोई लीज़ या किसी तरह की कोई किराएदारी न होना. अलबत्ता ये पहले भी कभी न होने के बावजूद लायसेंस का नवीनीकरण हो जाता रहा है. मगर इस बार बात कुछ अलग है.

इस बार हाईकोर्ट में एक याचिका है. जिसमे कहा गया है कि क्लब के पास करीब सौ करोड़ रूपये बाजारी मूल्य की इस सरकारी ज़मीन पे होने का कोई अधिकार नहीं है. न किरायेनामा, न कोई लीज़. हाई कोर्ट से अब तक मिले तीन मौकों के बावजूद क्लब ऐसा कोई दस्तावेज़ दिखा नहीं सका है. जबकि प्रशासन एक आरटीआई के जवाब में मान चुका है कि उस के पास ज़रूर ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है जिस से माना जा सके कि ये ज़मीन कभी चंडीगढ़ प्रेस क्लब को लीज़ या किराए पे कभी दी गयी थी. जहां तक अदालत में याचिका का सवाल है तो क्लब को अब 15 मार्च तक अपनी स्थिति स्पष्ट कर देनी होगी. लेकिन इस बीच एक तो आबकारी विभाग मलकीयत या किरायेदारी का सबूत लेने की शर्त पूरी हुए बिना क्लब को लायसेंस देने की गलती दोहराने के मूड में नहीं है. दूसरे, नगर निगम ने क्लब से वो एक मोटा टैक्स भी वसूल लिया है जिस से क्लब अभी तक बचा या बचता आ रहा था.

क्लब को निगम से मिले एक नोटिस के बाद निगम के दफ्तर में छ: लाख साढ़े छियासठ हज़ार रूपये जमा कराने पड़े हैं. प्रापर्टी टैक्स और उस पे अब तक के जुर्माने के रूप में. प्रापर्टी टैक्स चंडीगढ़ में दिसम्बर, 2004 से लागू हुआ. क्लब को लेट फीस तब से ही देनी पड़ी. क्लब के पास पैसे नहीं थे. क्लब प्रबंधन ने बैंक में पड़ी एफडी तुड़वा कर ये रकम जमा कराई. इतनी बड़ी रकम खर्च करने से पहले न तो क्लब पदाधिकारियों ने सदस्यों से पूछा, न उनको बताया ही. इस बारे कोई मेल तक जारी नहीं की गयी.

इस बीच खबर है कि निगम क्लब से वो करीब एक एकड़ ज़मीन भी वापिस ले लेने फिराक में है जो क्लब को पड़ोस के कम्युनिटी सेंटर से मिली थी. मिली जानकारी के मुताबिक़ निगम इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है. इसके पीछे एक कानूनी दलील भी है. सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम् फैसले में कहा है कि जो सरकारी ज़मीन किसी ख़ास मकसद से किसी संस्था को किसी ख़ास उद्देश्य के लिए दी जाए वो उस से लेकर किसी और को किसी अन्य कार्य के लिए नहीं दी जा सकती. किसी तरह की व्यावसायिक गतिविधि के लिए तो बिलकुल नहीं. सुप्रीम कोर्ट का वो अहम् फैसला फरीदाबाद क्रिकेट स्टेडियम वाली ज़मीन के सन्दर्भ में आया. सरकार ने वो ज़मीन लेकर जिसे दी वो वहां पे खानपान का काम और उसके लिए टेंट भी लगाते थे. खानपान का काम और टेंट कम्युनिटी सेंटर से ली गयी इस ज़मीन पे भी होता है. निगम कम्युनिटी सेंटर की ज़मीन उसको इसलिए लौटाना चाहता है. क्लब का स्विमिंग पूल, टेनिस कोर्ट, बैडमिन्टन कोर्ट और पूरी की पूरी पार्किंग उसी ज़मीन पर है. यहाँ तक कि क्लब का मेन गेट भी उसी ज़मीन पर है.ये ज़मीन जब क्लब ने ली तो रेज़ीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने इसका विरोध किया था. ये करीब एक एकड़ ज़मीन छिन जाने के बाद कम्युनिटी सेंटर समारोहों के आयोजन के लिए बहुत छोटा पड़ गया. इस से आम लोगों में असंतोष है. निगम की सोच है कि क्लब के नीचे आई ज़मीन कम्युनिटी सेंटर को वापिस दे देना सुप्रीम कोर्ट की राय के अनुरूप होगा.

हालांकि ये संभव है कि निगम और प्रशासन ये ज़मीन क्लब से वापिस लेने से पहले माननीय हाई कोर्ट में चल रहे मामले के निबटने का इंतज़ार करें जिसमे दरअसल क्लब की सारी की सारी ही ज़मीन क्लब से वापिस ले लेने की मांग की गयी है. इस आधार पे कि न तो क्लब के पास कोई लीज़ है और वो इस ज़मीन पे व्यापारिक गतिविधियाँ भी करता आ रहा है.

इस बीच, जानकारी ये भी है कि क्लब के मौजूदा पदाधिकारी हमेशा की तरह मार्च में नए चुनावों के ज़रिये ये सारे झंझट किन्हीं औरों के लिए छोड़ कर खुद पतली गली से निकल लेना चाहते हैं. सदस्यों में एक आम धारणा है कि मुकदमों, जुर्मानों और उनसे उपजी परिस्थितियों से उन्हें अनजान इसलिए रखा जा रहा है.

जिन्हें मालूम न हो बता दें कि कभी देश के सब से अमीर और आज भी सब से खूबसूरत इस प्रेस क्लब के पतन की शुरुआत उन कुछ निर्माण कार्यों से हुई जो कथित रूप से ‘रिश्तेदारों’ को ठेके दे कर कराये गए. इन पे ज़रूरत से बहुत ज्यादा धनराशि खर्च हुई बताई गयी. कुछ सदस्यों ने इस पे सवाल खड़े किये तो उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. उन ने जगह जगह आरटीआई डाल दी. पंजाब, हरियाणा की सरकारों से पूछा क्लब को पैसे कितने दिए? यूटीलाइज़ेशन सर्टिफिकेट कितने का मिला? चंडीगढ़ प्रशासन से पूछा क्या कोई लीज़ है इस करीब सौ करोड़ रूपये मूल्य की ज़मीन की प्रेस क्लब को? हरियाणा सरकार ने माना करीब एक करोड़ रूपये दिए. खबर है कि मायावती भी अपने तीस लाख रुपयों का यूटीलाइज़ेशन सर्टिफिकेट मांग रही हैं. चंडीगढ़ प्रशासन ने मान लिया कि प्रेस क्लब किसी लीज़ या किरायेदारी के बिना काबिज़ है इस ज़मीन पर. एक और आरटीआई आबकारी विभाग को गयी. इसमें पूछा कि क्या बार का लायसेंस देने के लिए मलकीयत, लीज़ या किरायेदारी का सबूत ज़रूरी होता है और अगर हाँ तो क्या वो क्लब से कभी लिया गया? इसके बाद आबकारी विभाग की सिट्टी पिट्टी गुम है. पहले पिछले पैसों का ही कोई हिसाब किताब न मिलने के बाद सरकारों ने भी पैसे देने कब के बंद कर दिए हैं. ऐसे में क्लब के पदाधिकारी भारी मुश्किल में हैं.

इस बीच क्लब ने एक तीर और चलाया. उसने क्लब में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों को निकाल देने की धमकी दी. इनमे हाईकोर्ट में याचिका डालने वाले संजीव पाण्डेय भी थे. उन ने जब हाई कोर्ट को बताया कि क्लब उनपे याचिका वापिस लेने का दबाव बना रहा है तो माननीय हाईकोर्ट ने वो चिट्ठी भेजने वाले क्लब के महासचिव को अवमानना का नोटिस दे दिया. उसका भी जवाब अभी आना है.

सब से ताज़ी जानकारी ये है कि क्लब से हिसाब किताब उन साढ़े सात लाख रुपयों का भी पूछा जाने वाला है जो उसने स्थानीय सांसद (और केन्द्रीय संसदीय मंत्री) पवन बंसल के निधि कोष से लिए. पहली मंजिल पे लायब्रेरी बनाने के लिए. लायब्रेरी जो कभी कहीं बनी ही नहीं!

 

 

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