लेखक परिचय

राजेश कश्यप

राजेश कश्यप

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

Posted On by &filed under हिंद स्‍वराज.


स्वतंत्रता दिवस विशेष  -राजेश कश्यप

हम गौरवमयी स्वतंत्रता के साढ़े छह दशक पार कर चुके हैं। आज हम जिस आजादी का सुख भोग रहे हैं, वह शहीदे-आजम सरदार भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, लाला लाजपतराय, खुदीराम बोस, उधम सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, राजगुरू, सुखदेव जैसे असंख्य जाने-अनजाने देशभक्त शूरवीरों, अमर शहीदों और रणबांकुरों के असीम त्याग, बलिदान और कुर्बानियों का प्रतिफल है। इसके लिए हम अपने शहीदों और देशभक्त क्रांतिकारियों की कुर्बानियों और शहादतों के लिए आजीवन ऋणी रहेंगे। हम उनके असीम बलिदानों से कभी उऋण नहीं हो सकते। उन्होंने निःस्वार्थ भाव से अपने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अपना सुख, चैन, ऐशोआराम आदि सबकुछ भुलाकर क्रूर अंग्रेजों की असहनीय यातनायें झेंलीं और हंसते-हंसते ‘भारत माता की जय’, ‘वन्दे मातरम्’ और ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ के गगनभेदी अनहद नारों की गूँज करते हुए फाँसी के फंदे को गले लगा लिया। क्या उनकीं कुर्बानियों, शहादतों और बलिदानों को कभी कोई हिन्दुस्तानी भुला सकता है? कदापि नहीं।

हर हिन्दुस्तानी का सबसे बड़ा फर्ज यह बनता है कि वह हमेशा अपने शहीदों और बलिदानियों की कुर्बानियों का स्मरण रखे और उनके स्वप्नों को साकार करने के लिए समर्पित भाव से अपनी भूमिका निभाना सुनिश्चित करे। चाहे कोई राजनेता हो या समाजसेवक, डॉक्टर हो अथवा इंजीनियर, शिक्षक हो या फिर कलमकार, नौकरीपेशा हो या मजदूर, दुकानदार हो या फिर आम आदमी। यदि सभी अपने-अपने क्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी, वफादारी और समर्पित भाव से अपनी जिम्मेदारी का वहन करें तो निश्चित तौरपर हम अपने शहीदों के सपनों का भारत बना सकते हैं। हमारे शहीदों ने एक ऐसे सुनहरे भारत का सपना संजोया था, जिसमें राम-राज्य की स्थापना हो, कोई भूख से न मरे, किसी के साथ कोई अन्याय न हो, उन्नति व प्रगति के सभी को समान अवसर मिलें, किसी के साथ किसी भी स्तर पर कोई भेदभाव न हो, सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, गरीबी, बेरोजगारी, बेकारी, अपराध आदि का नामोनिशान न हो और देश में अमन व चैन की अविरल बयार बहे। हमारे देशभक्तों को यह अटूट विश्वास था कि उनकीं कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी और आने वाली पीढ़ियां उनके सपनों को जरूर साकार करेंगी और पूरे विश्व में उनके देश की गौरव पताका लहरायेगी।

ईमानदारी से आत्मिक तौरपर आत्म-मंथन कीजिए कि क्या हम अपने शहीदों की उम्मीदों और अपेक्षाओं पर खरा उतर उतर पाए हैं? क्या हम स्वतंत्रता के साढ़े छह दशक बाद यह सीना ठोंककर कह सकते हैं कि हमने अपने बलिदानियों के विश्वास को नहीं तोड़ा है? क्या हम अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी, वफादारी और समर्पित भावना से निभा पा रहे हैं? क्या हमारा देश उसी दशा और दिशा में आगे बढ़ रहा है, जैसी हमारे देशभक्तों ने कभी कल्पना की थी? इन सब सुलगते और धधकते सवालें का जवाब केवल और केवल ‘नहीं’ है। ऐसा क्यों? क्योंकि हम कृतघ्न हो चुके हैं। हमें अपनी आजादी की कीमत का जरा भी आभास नहीं है। हम स्वार्थी, लालची और कपटी बन गए हैं। हम भूल गए हैं कि हमारा देश के प्रति क्या उत्तरदायित्व है और अपने शहीदों के प्रति क्या फर्ज है? भौतिकतावाद की इस दुनिया में सिर्फ पैसा रह गया है। इंसानियत मर गई है, संस्कार स्वाहा हो गये हैं, नैतिकता दम तोड़ गई है और ईमानदारी व वफादारी समाप्त हो गई है। भूमण्डलीकरण के इस दौर में संकीर्ण प्रतिस्पर्द्धा का नंगा नाच हो रहा है। बुद्धिजीवी और सामाजिक सरोकर रखने वाले लोगों का दायरा सिमट गया है और वे एकदम हाशिये पर पहुंच चुके हैं। कुटिल, कृतघ्न और क्रूर लोगों की तूती बोल रही है। यह कड़वी सच्चाई है।

यदि यह कहा जाये कि हम अपने शहीदों की उम्मीदों पर जरा भी खरे नहीं उतरे हैं तो कदापि गलत नहीं होगा। आज देश में गरीबी, भूखमरी, बेकारी, बेरोजगारी, अपराध, अत्याचार, लूटपाट, भ्रष्टाचार आदि सब चरम पर पहुंच चुके हैं। आम आदमी का जीना टेढ़ी खीर बन गया है। देश का नब्बे फीसदी धन मात्र दस फीसदी लोगों में सिमटकर रह गया है। राजनीतिक लोगों, उद्योगपतियों और दलालों ने देश की धन-दौलत और हर संपदा को जमकर लूट लिया है। देश की अस्सी फीसदी आबादी 20 रूपये प्रतिमाह से कम में गुजारा करने को विवश है। सत्ताधीश लोग 22 से 32 रूपये खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर का दर्जा दे रही है। एक तरफ देश की प्रति व्यक्ति आय 60 हजार से अधिक बतला रहे हैं और दूसरी तरफ 70 फीसदी आबादी को सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध करवाकर ‘खाद्य सुरक्षा’ देने की वाहवाही लुटने की कोशिश जारी है। एक तरफ किसानों की खून-पसीने की कमाई अर्थात् कृषि पैदावार सड़कों पर मिट्टी में मिल रही है और सरकारी गोदामों में सड़ रही है तो दूसरी तरफ अन्नदाता किसान भूखों मर रहा है और कर्ज के बोझ से तंग आकर मौत को गले लगाने के लिए विवश है।

देश का युवा बेकारी और बेरोजगारी के चलते अपराधिक मार्ग पर अग्रसित हो चला है। नौकरियों में भी भाई-भतीजावाद और पैसे का बोलबाला स्थापित हो चुका है। प्रतिभा और शैक्षणिक योग्यता का कोई स्तर नहीं रह गया है। शिक्षा के नाम पर देश के कोने-कोने में भारी गोरखधंधा चल रहा है। पैसे के बल पर बड़ी से बड़ी डिग्री बिना मेहनत किए घर बैठे ही मिल रही हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर बिल्कुल ही गिर गया है। आम आदमी भी अपने बच्चों को प्राईवेट स्कूलों में महंगी दर पर शिक्षा दिलवाने के लिए मजबूर हो गया है। लैंगिक असमानता आज भी देश का मुंह बुरी तरह चिढ़ा रही है। कन्या-भ्रूण हत्या और नारी शोषण व प्रताड़ना रूकने का नाम ही नहीं ले रही हैं। दहेजप्रथा जैसी कुप्रथा का दंश पूरा देश बराबर झेल रहा है। अपहरण और बलात्कार की घटनाओं में प्रतिवर्ष तेजी से इजाफा होता चला जा रहा है। राजनीतिक और धनाड्य लोग मासूम अबलाओं की इज्जत से जी भरकर खेल रहे हैं और अपनी हवश का सहज शिकार बना रहे हैं। ऐसे वहशी और दरिन्दे लोगों का कानून भी कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा है। देश में अब यह आम धारण बन चुकी है कि देश का कानून सिर्फ गरीबों, मजबूरों और असहाय लोगों के लिए ही है। यह कानून भ्रष्टाचारियों, अपराधियों, बलात्कारियों और गुण्डों के आगे लाचार और बेबस है।

आज सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि देश में राजनीति का अपराधिकरण और अपराधिकरण का राजनीतिकरण हो गया है। जिसके पास धनबल और बाहुबल है, वही लोकतंत्र का ध्वजवाहक बन रहा है। देश की सर्वोच्च संस्था संसद में ऐसे लोगों की भरमार है जिन पर हत्या, डकैती, अपहरण, बलात्कार और भ्रष्टाचार जैसे अनेक संगीन मामले दर्ज हैं और वे जनप्रतिनिधि के तौरपर लाल बत्तियों और ऐयरकंडीशन महलों में ऐशोआराम फरमा रहे हैं। इससे बड़ा देश का दुर्भाग्य भला और क्या होगा? आज कोई भी ऐसी राजनीतिक पार्टी नहीं बची है, जिसमें गुण्डा तत्व, बदमाश, बेईमान, असामाजिक और अपराधिक तत्व न घुसे हुए हों। देश के बहुत से ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जो न तो संसद अथवा विधानसभा में कोई जनहित का मुद्दा उठाते हैं और न ही पाँच साल तक जनता को मँुह दिखाते हैं। चुनावी समय में ही नेता लोग गरीबों की झोंपड़ियों में नाक रगड़ने आते हैं और शराब, पैसे व बदमाशी के दमपर वोट हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं। क्या यह सच्चे लोकतंत्र की निशानी है? यदि लाचार और मजबूर लोगों की आवाज किसी आन्दोलन के माध्यम से उठती है तो उसे सख्ती से दबा दिया जाता है और आन्दोलन को बुरी तरह कुचल दिया जाता है। क्या यही सराहनीय लोकतांत्रिक प्रणाली है?

आज देश की अस्सी फीसदी आबादी भय, भूख और भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त है। उमंग, चाह, उम्मीद, सुख, चैन आदि से वह निरन्तर अछूती होती जा रही है। उसके लिए हर पर्व और राष्ट्रीय दिवस की भी कोई खास अहमियत नहीं रह गई है। देश के अधिकतर भावी कर्णधारों के लिए त्यौहार और राष्ट्रीय पर्व महज एक अवकाश का प्रतीक बन गए हैं। राष्ट्रीय पर्वों स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि मनाने की औपचारिकता संगीनों के साये में की जाती है। आतंकवादी घटनाओं के भय के चलते आम आदमी अपने राष्ट्रीय समारोहों से एकदम कट चुका है। क्या यह सब देशवासियों के लिए सबसे बड़ी बदकिस्मती का विषय नहीं है? वैसे भी देश में सत्ताधारियों की गलत नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उदासीनता के चलते आतंकवाद चरम पर पहुंच चुका है। देश के किस कोने में कब कोई आतंकवादी वारदात हो जाये, कोई भी नहीं कह सकता है। देश में साम्प्रदायिकता की आग की तपिश भी निरन्तर बढ़ती जा रही है। माओवाद, नक्सलवाद, असम हिंसा, कश्मीर समस्या आदि सबके चलते निर्दोष लोगों को तरह-तरह की कुर्बानियां देनी पड़ रही हैं।

इन सब समस्याओं और परिस्थितियों के लिए अधिकतर सत्ताधारी राजनीतिकों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसा स्वभाविक भी है। सभी समस्याओं के मूल में कहीं न कहीं राजनीतिक तत्व मौजूद मिलेंगे। लेकिन, इसके साथ ही अन्य क्षेत्रों डॉक्टर, शिक्षक, अधिकारी, कलमकार, दुकानदार, इंजीनियर, मजदूर, किसान, विद्यार्थी आदि भी इन समस्याओं के लिए उतना ही जिम्मेदार नजर आता है, जितने कि राजनीतिक लोग। क्योंकि हम सब भी अपने उत्तरदायित्व को पूरी ईमानदारी, वफादारी और जिम्मेदारी के साथ नहीं निभा रहे हैं। हर पेशे से जुड़ा व्यक्ति मेहनत और ईमानदारी से कमाने की बजाये हरामखोरी, चोरी और बेईमानी से अधिक से अधिक धन कमाने की जुगत में रहता है। उसके लिए नैतिकता, फर्ज और राष्ट्रीयता के सभी मायने एकदम गौण हो जाते हैं। निजी स्वार्थपूर्ति के चलते ही समाज से आपसी भाईचारा, मेलमिलाप और सौहार्द भावना भी निरन्तर दम तोड़ती जा रही है। कहना न होगा कि स्वतंत्रता की इस पावन वेला में हम सबको बड़ी शांति, धैर्य और ईमानदारी से स्वतः आत्म-मंथन करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या वह स्वयं अपने शहीदों की कुर्बानियों और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्वों पर खरा उतर सकता है? यदि नहीं तो क्यों नहीं? यदि हम हकीकत की कड़वी सच्चाईयों से स्वयं आत्मसात करने का साहस जुटा लें तो हर समस्या और दुष्प्रवृति का सहज नाश हो सकता है और उसके बाद हम अपने शहीदों के सपनों को साकार करने वाली राह पर सहज अग्रसित हो सकते हैं। यही स्वतंत्रता के सच्चे सबक हैं। समस्त देशवासियों को गौरवमयी स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेरों-ढ़ेरों हार्दिक बधाईयां और शुभकामनाएं।

Leave a Reply

1 Comment on "स्वतंत्रता के सच्चे सबक!"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
binu bhatnagar
Guest

बहुत ख़ूब लिख़ा है आपने पर कितने लोग इसे समझेंगे मानेगें बस उम्मीद कर सकते हैं कि कुछ लोगों पर तो इसका प्रभाव पड़ेगा।

wpDiscuz