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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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पूजा श्रीवास्तवratio of sex deter

समाज को चलाने वाले दो पहिए स्त्री और पुरूष…….कहने को तो बड़ी बड़ी बातें….दोनों को बराबर हक है, समाज के विकास में दोनों का अहम हिस्सा है….दोनों अपने आप में बेहद महत्तवपूर्ण घटक हैं….लेकिन वास्तविकता इससे परे है……ये बात आज मुझे बताने की नहीं कि इस समाज को क्या कहा जाता है…. दोनों महत्तवपूर्ण पहिओं से बना समाज कब पुरूष प्रधान समाज बन गया……पता नहीं…….मैं बताऊं ये शुरू से ही पुरूष प्रधान ही रहा…..सवाल उठता है कि इसे पुरूष प्रधान होने की उपाधि किसने दी…..जाहिर सी बात है किसी स्त्री ने तो दी नहीं होगी…तो ये उपाधि खुद पुरूष वर्ग ने ही दे डाली……

सदियों से ये बाते चली आ रही है…स्त्री अबला है……वो कमजोर है..उसे मदद चाहिए…….उसे सुरक्षा चाहिए……पर सवाल उठता है स्त्री को सुरक्षा किससे चाहिए…….उसे मदद किसके लिए चाहिए……सोचेगें तो जवाब में उन्हीं का नाम होगा जो इस तरह के सुरक्षा मुहैया कराने की बातें करते हैं….जी हां महिलाओं को सुरक्षा इस तथाकथित पुरूष वर्ग से ही चाहिए………वो पुरूष जो अपने आप को सशक्त और स्त्री का सुरक्षा कवच बनने के बदले प्रधान की उपाधि तो पा लेता है…पर वो भूल जाता है कि स्त्री को नोंचने वाला भी वही है……..वरना भला किसी महिला को सुरक्षा की क्या जरूरत…..

आपको शायद मेरी बातों पर यकीन नहीं होगा, लेकिन सच पर आधारित मेरे इन किस्सों को सुनकर शायद आप खुद सोचने पर मजबूर हो जाएंगे

 

ये कहानी है…….लक्ष्मी की……..वो लक्ष्मी जो पूरा परिवार होने के बावजूद एकाकी जीवन जीने में ही शुकून महसूस करती है………ऐसा नहीं है कि वो स्वार्थी है…ऐसा नहीं है कि उसे अपने परिवार के प्रति नैतिक जिम्मेदारी का एहसास नहीं…..पर बात इससे इतर भी कुछ और है……

हॉस्पिटल के कॉरिडोर में स्ट्रेचर में छटपटाती एक औरत…….पेट में 7 माह का गर्भ……जिसकी गंभीर हालत देख डॉक्टरों के भी हाथ पांव फूल रहे थे….जैसे तैसे उस महिला को ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया……किसकी मौत होगी बच्चे की या मां की……दोनों को तो बचाना मुश्किल है….हां हां एक न एक को तो भगवान अपने पास बुला लेंगे……इन कानाफूसियों के बीच जन्म हुआ एक बच्ची का……..जिसका नाम रखा गया लक्ष्मी…….जी हां इस तरह हुआ था हमारी लक्ष्मी का जन्म………उसकी मां को जब होश आया तो डॉक्टरों ने उसकी इस हालत की वजह जाननी चाही तो पता लगा कि इस औरत के साथ बच्चा गिराने की कोशिश की जा रही थी…….यानि कि लक्ष्मी के वजूद सामने आने से पहले ही उसके परिवार वाले उससे मुक्ति पाना चाह रहे थे….सवाल आता है क्यों…..जवाब क्योंकि वो एक लड़की थी…..

ये कोई पहला मामला नहीं है भारत में इस तरह के किस्से हर शहर हर गांव हर गली में होते हैं, बस कोई कहता नहीं……..भारत के कई राज्यों में इस तरह कन्या भ्रूण की हत्या कर देने का सिलसिला जारी है…..यही वजह है कि भारत देश के कई राज्यों में आज लड़कियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है…..आंकड़ों की माने तो खुद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन राज्यों में की जा रही भ्रूण हत्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले एक दशक में भारत में एक करोड़ से भी ज्यादा कन्या भ्रूण हत्या हो चुकी है……और ये संख्या प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में मारे गए लोगों से भी अधिक है……तो वहीं संयुक्त राष्ट्र की माने तो भारत में अवैध रूप से रोजाना करीब 2 हजार अजन्मी कन्याओं को गर्भ में मार दिया जाता है…..

 

लक्ष्मी भी इनमें से एक होने वाली थी…..खैर लोगों ने इसे जाको राखे साईंया वाले जुमले से जोड़ लिया और परिवार वालों ने उस जन्मी लड़की को भारी दुख और अपने कष्टों की शुरूआत मानकर स्वीकार कर लिया…… लक्ष्मी की परवरिश भी उसके जन्म लेने की दास्तां की तरह ही संघर्षमय रही…….घर में मिल रही खुराक के हिस्सों में जब लक्ष्मी अपने हिस्से को अपने भाई के हिस्से के साथ आंकती तो उसका पूरा खाना भाई के एक निवाले के बराबर पाती थी…..क्या पकवान क्या रोटी प्याज हर चीज में उसे मिलने वाली कम खुराक ने उसके मन में सवाल पैदा करने शुरू कर दिए……सवाल था….पिताजी मुझे रोज भइया से कम खाना क्यों मिलता है……..जवाब  क्योंकि तू लड़की है……

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भारत में बच्चों के लिंगानुपात में निरंतर होने वाली कमी के लिए दहेज़ और सामाजिक परम्पराओं को ज़िम्मेदार माना गया है…..दहेज तो कन्या भ्रूण के जीवन के लिए एक अभिशाप है…….लडकी पराया धन होती है, और लड़का घरका चिराग, वंश को आगे बढ़ाने वाला…..इसी बात को गांठ बांधकर पूरे परिवार के लोग पुत्र की परवरिश में ज्यादा और बेटी की परवरिश में कामचलाऊ ध्यान देते हैं…..लक्ष्मी भी इसी का दंश भोग रही थी…..

समझ न आने वाले इस लॉजिक को लक्ष्मी अपनी किस्मत मानने लगी….वक्त के साथ साथ लक्ष्मी का कद भी बढ़ने लगा….संस्कारों से आच्छादित 8 साल की लक्ष्मी घर के पूरे काम करने में निपुण हो गई……अपनी मां के साथ घर के काम में हाथ बंटाना, अपने घर के चूल्हे के लिए जंगल जाकर लकड़ियां लाना, गौशाले की देखरेख करना, यहां तक की अपने बापू को खेत में भी मदद करना लक्ष्मी के दिनचर्या में शामिल हो गया……यूं तो लक्ष्मी के मन में काम के प्रति कोई कोताही नहीं थी, लेकिन अपने भाई को साफ सुथरे कपड़ें पहन कर रोज स्कूल जाता देख लक्ष्मी के मन में भी स्कूल जाने की इच्छाएं जगने लगी……..वो भी स्कूल जाना चाहती थी….और एक दिन उसने ये बात अपनी मां से कह दी……मां तो सारी स्थितियों को अच्छे से जानती थी, लेकिन लक्ष्मी के लिए उसने उसने ये बात लक्ष्मी के पिता के सामने रखी……..लेकिन वहां से इंकार होना पूर्व विदित था……लक्ष्मी समझ नहीं पा रही थी कि क्यों उसे स्कूल नहीं जाने दिया जा रहा…..एक दिन खेल खेल में उसने अपने भाई के सामने भी ये बात कही….भइया मैं भी आप के साथ स्कूल आना चाहती हूं, पर बापू मुझे स्कूल क्यों नहीं भेजते……..तो उस 14 साल के लड़के ने भी जवाब दिया…क्योंकि तू लड़की है……

खैर लक्ष्मी ने इस कटाक्ष के वार को खाली नहीं जाने दिया…..लुकछुप तरीके से थोड़ा थोड़ा करके वो पढ़ने की कोशिशे करती गई…..और मां सरस्वती ने भी उस पर अपना खूब सारा प्यार लुटाया…..स्कूल और पढ़ाई के प्रति उसकी निष्ठा देख गांव की मास्टरनी के घर वो काम करने के बदले पढ़ाई करने लगी…..जैसे तैसे उसने 8 वीं तक की पढ़ाई की…..फिर अचानक उसके घर वालों ने उसकी शादी कर दी……महज 15 साल की उम्र में लक्ष्मी एक शादीशुदा की श्रेणी में आ गई…….कब बचपन बीता और कब वो गृहस्थी की जिम्मेदारियों में कैद हो गई, उसे खुद नहीं पता चला…..ससुराल में 4 दिन अच्छे बीते फिर वहीं लानतों वाली जिंदगी शुरू…..विरोध करने से पहले ही उसके ही मन से आवाज आने लगती मां ने कहा था ससुराल में किसी से बहस मत करना, सबको खुश रखना, घर बनाना तेरी जिम्मेदारी है, वरना पाप लगेगा……क्योंकि तू लड़की है…..

 

वक्त बीतता गया…..लक्ष्मी मां बनने वाली थी……उसे लगा कि इस नन्हे जीव के आने के बाद शायद उसकी जिदंगी में खुशियों का पदार्पण हो जाए……इसी आस के साथ जीते लक्ष्मी को अभी वक्त भी नहीं बीता था कि एक दिन उसे जबर्दस्ती अस्पताल ले जाया गया…..भ्रूण के लिंग परीक्षण के लिए….वहीं वाकया जो उसकी मां के साथ हुआ था अपनी पुनरावृत्ति कर रहा था…..परीक्षण में पता चला कि उसकी कोख में लड़की है…..बस घरवालों ने एक ही पल मे फैसला ले लिया गर्भ गिराने का…….जब लक्ष्मी को इस बात की खबर लगी तो लक्ष्मी ने इस हरकत का पुरजोर विरोध किया…..आखिर मेरे बच्चे को क्यों मार डालना चाहते हो आप लोग, जवाब में उसके पति ने साफ कर दिया कि क्योंकि तेरे गर्भ में लड़की है……

लड़की है तो क्या हुआ…..बचपन से इस बात को सुनती आई लक्ष्मी की अभी भी समझ में नहीं आ रहा था कि कोई कैसे अपने अजन्मे बच्चे को भी मार देना चाह सकता है…….लेकिन धीरे धीरे लक्ष्मी के दिमाग में अपने बचपन से जवानी तक के सारे उलाहने याद आने लगे…….लड़की होने के बदले लक्ष्मी ने पूरी जिंदगी बलिदान दिए, लेकिन अपने बच्चे की किस्मत को इस स्याही से नहीं लिखना चाहती थी, लिहाजा उसने खुलकर विरोध किया……हां उसने अपने परिवार वालों के खिलाफ अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के फैसले पर अपनी इंकार का ठप्पा लगा दिया……..लक्ष्मी के इस बहादुरी से भारत को एक बालिका बच्चे का वरदान तो मिल गया लेकिन लक्ष्मी को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी…..उसके ससुराल वालों ने उसके इस विद्रोह की सजा के तौर पर घर निकाला दिया…….

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1 Comment on "आधी आबादी का सच"

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dr.ashokkumartiwari@gmail.com
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dr.ashokkumartiwari@gmail.com

जिस देश का प्रधानमंत्री अपनी धर्मपत्नी को महत्व नहीं देता है — वहाँ आम जनता की क्या बात की जाए पर प्रधानमन्त्री को कोई कुछ नहीं कहेगा ? ? —- महिलाओं को प्रताड़ित करने का एक और कार्य उन्होंने अभी-अभी किया है महामहिम राज्यपाल कमलाबेन को गलत तरह से हटाकर — कहाँ हैं महिला समितियाँ —— ? ? ? शर्म आनी चाहिए ऐसी महिला समितियों की नेत्रियों को या एक साथ सामूहिक रूप से इस्तीफा दे देना चाहिए —

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