लेखक परिचय

डॉ. सौरभ मालवीय

डॉ. सौरभ मालवीय

उत्तरप्रदेश के देवरिया जनपद के पटनेजी गाँव में जन्मे डाॅ.सौरभ मालवीय बचपन से ही सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण की तीव्र आकांक्षा के चलते सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए है। जगतगुरु शंकराचार्य एवं डाॅ. हेडगेवार की सांस्कृतिक चेतना और आचार्य चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि से प्रभावित डाॅ. मालवीय का सुस्पष्ट वैचारिक धरातल है। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया’ विषय पर आपने शोध किया है। आप का देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक मुद्दों पर निरंतर लेखन जारी है। उत्कृष्ट कार्याें के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है, जिनमें मोतीबीए नया मीडिया सम्मान, विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान और प्रवक्ता डाॅट काॅम सम्मान आदि सम्मिलित हैं। संप्रति- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। मोबाइल-09907890614 ई-मेल- malviya.sourabh@gmail.com वेबसाइट-www.sourabhmalviya.com

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मध्यप्रदेश के उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ कुंभ के दौरान 12 से 14 मई तक निनौरा में तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ का आयोजन किया गया. इस दौरान धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा की गई. वक्ताओं ने कृषि, पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति, भाषा, चिकित्सा, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण आदि विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए देश और समाज के उत्थान पर बल दिया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विचार कुंभ को संबोधित करते हुए संत-महात्माओं से आग्रह किया कि वे धरती की समस्याओं पर प्रतिवर्ष सात दिन का विचार कुंभ आयोजित करें. उन्होंने कहा कि आदिकाल से चले आ रहे कुंभ के समय और कालखंड को लेकर अलग-अलग मत है, लेकिन इतना निश्चित है कि यह मानव की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्था में से एक है. इस विशाल भारत को अपने में समेटने का प्रयास कुंभ मेले के माध्यम से ही होता है. उन्होंने कहा कि समाज की चिंता करने वाले ऋषि-मुनि 12 वर्ष में एक बार प्रयाग में कुंभ में एकत्रित होते थे, जिसमें वे विचार विमर्श करते हुए विगत वर्ष की सामाजिक स्थिति का अध्ययन करते थे, उसका विश्लेषण करते थे. इसके साथ ही समाज के लिए आगामी 12 वर्षों की दिशा तय करके योजना बनाते थे. उन्होंने कहा कि प्रयाग से अपने-अपने स्थान पर जाकर संत महात्मा योजना पर कार्य करने लगते थे. इतना ही नहीं तीन वर्ष में उज्जैन, नासिक, इलाहाबाद में होने वाले कुंभ में जब वे एकत्रित होते थे, तब विमर्श करते थे कि प्रयाग में जो योजना बनाई गई थी, उस पर क्या कार्य हुआ और क्या नहीं हुआ. तत्पश्चात आगामी तीन वर्ष की योजना बनाई जाती थी. यह एक अद्भुत सामाजिक संरचना थी, परंतु समय के साथ इसके रूप में परिवर्तन आया. अब कुंभ केवल डुबकी लगाने, पाप धोने और पुण्य कमाने तक ही सीमित होकर रह गया है. उन्होंने कहा कि विचार कुंभ के माध्यम से उज्जैन में एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है. यह प्रयास शताब्दियों पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है. इस आयोजन में वैश्विक चुनौतियों और मानव कल्याण के क्या प्रयास हो सकते हैं, इस पर विचार हुआ है. इस मंथन से जो 51 अमृत बिंदु निकले है, अब उन पर कार्य होना चाहिए. उन्होंने उपस्थित साधु-संतों और अखाड़ों के प्रमुख से आह्वान किया कि वे इन 51 अमृत बिंदुओं पर प्रतिवर्ष एक सप्ताह का विचार कुंभ अपने भक्तों के बीच करने पर विचार अवश्य करें, ताकि विचारों को मूर्त रूप दिया जा सके.
विचार कुंभ को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विकास करते समय प्रत्येक देश की प्रकृति का विचार करना चाहिए. ऐसा ही परिवर्तन दुनिया की वैचारिकता में दिखाई दे रहा है. विविधता को स्वीकार किया जा रहा है और दुनिया कहने लगी है कि विविधता को अलंकार के रूप में देखना चाहिए, दोष के रूप में नहीं. अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि विविधता को स्वीकार कर सम्मानित करना चाहिए, केवल सहिष्णुता नहीं, उससे भी आगे जाना है. उन्होंने कहा कि अस्तित्व के लिए संघर्ष करने के बजाय अब समन्वय की ओर जाना पड़ेगा, धीरे-धीरे सभी लोग यह मानने लगे हैं. व्यवस्था समतायुक्त और शोषणमुक्त होनी चाहिए. जब तक सभी को सुख प्राप्त नहीं होता, तब तक शाश्वत सुख दिवास्वप्न है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत में जन्म लेने वाले लोगों की दो माताएं हैं, एक जन्म देने वाली और दूसरी भारत माता. जन्म देने वाली माता के कारण शरीर मिला, मातृभूमि के कारण संस्कार मिला, पोषण मिला. उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा के अनुसार सारे जीव सृष्टि की संतानें हैं. मनुष्यता का संस्कार देने वाली सृष्टि है. मध्य प्रदेश में कुंभ की वैचारिक परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है. आज विश्वभर के चिंतक, विचारक एक हो गए हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से कहा गया है कि सनातन परंपरा में इन सत्यों की बहुत पूर्व से जानकारी है. आज के परिपेक्ष्य में हमें सनातन मूल्यों के प्रकाश में विज्ञान के साथ जाना होगा. यह करके विश्व की नई रचना कैसी हो, इसका मॉडल अपने देश के जीवन में देना होगा.
जूना पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि अगली सदी भारत की सदी है, क्योंकि जब पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति थक जाएगी, तब भारत के आध्यात्मिक नेतृत्व की आवश्यकता होगी. भारत की भूमि से ही आध्यात्मिक मार्ग निकलेगा, जो विश्व का मार्गदर्शन करेगा. उन्होंने कहा कि मनुष्य की दो विशेषता प्रधान हैं कर्म की स्वायत्तता और चिंतन की स्वतंत्रता. मनुष्य का संकल्प जैसा होगा उसकी सिद्धि भी वैसी ही होगी. संकल्प की पवित्रता से सकारात्मकता आती है. उन्होंने कहा कि विश्व में गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए अच्छा वातावरण उत्पन्न करने की आवश्यकता है. अधिकारों के प्रति जाग्रति तो बढ़ी है, परंतु कर्त्तव्यों के प्रति विस्मृति भी बढ़ी है. वर्तमान समय में परोपकार की प्रवृत्ति पैदा करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि यह विचार-कुंभ विश्व को अधिक से से अधिक वृक्ष लगाने और पृथ्वी को हरा-भरा बनाने का संदेश देगा. उन्होंने क्षिप्रा नदी के किनारे वृहद वृक्षारोपण का आह्वान किया, ताकि हरित क्षेत्र बढ़ सके. श्री चिदानंद स्वामी ने कहा कि नदियों के किनारे इतना पेड़ लगाएं कि हरित क्षेत्र बन जाए. जन्मदिन पर पेड़ लगाएं और पेड़ लगाने का बहाना तलाशें.
योगगुरु और पतंजलि आयुर्वेद के प्रमुख बाबा रामदेव ने कृषि एवं कुटीर उद्योग पर चर्चा करते हुए कहा कि देश की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए कुटीर उद्योग की वस्तुओं को अपनाना होगा. कुटीर उद्योग का बहुत बड़ा क्षेत्र है और यह आवश्यक है कि इसे आम जनता प्रोत्साहित करे. उन्होंने कहा कि अगर हम हाथ से बने सामान का ही उपयोग करने लगें, तो इसका लाभ कर्मकारों के साथ देश को भी होगा, क्योंकि तब देश की मुद्रा बाहर नहीं जाएगी. हमें सूती कपड़े पहनने चाहिए, जिससे भारतीय बुनकरों, कामगारों को काम मिल सके. उन्होंने कहा कि स्वदेशी को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां बनाई जानी चाहिए. उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे भी कुटीर उद्योग की ओर बढ़ें और जो लोग प्रशिक्षण हासिल करके शैम्पू, साबुन आदि बनाना चाहते हैं, उन्हें वह प्रशिक्षण देंगे.
इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने कहा कि जीवन को सुलभ और सरल बनाने के लिए भारतीय पुरातन शास्त्रों का परायण करना चाहिए. सर्वे भवन्तु सुखिनः की अवधारणा का पालन का करना चाहिए. अच्छे के साथ अच्छा और बुरे का साथ भी अच्छा करना चाहिए.
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विचार महाकुंभ के उद्देश्य की चर्चा करते हुए कहा कि कुंभ का संबंध ही विचार-मंथन से है. उन्होंने कहा कि संतों की विचार प्रक्रिया से कल्याणकारी राज्य का कल्याण हो, यही उददेश्य है. भारत में सभी तरह के विचारों, विचार-पक्रियाओं और दर्शन का आदर किया गया है. सभी को पर्याप्त आदर और सम्मान है. आज के समय में सबसे बडी चिंता यह है कि मानव जीवन गुणवत्तापूर्ण कैसे हो. कौन से तरीके और व्यवहार हैं, जिनसे मानव जीवन सुखी और अर्थपूर्ण बन सकता है. विज्ञान और आध्यात्मिकता या दोनों के परस्पर मेल से यह संभव है. इसलिए इस पर विचार करना आवश्यक है. विज्ञान और अध्यात्म दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग, परंपरागत खेती, मूल्य आधारित जीवन, धर्म और आध्यात्म जैसे विषयों का वैश्विक महत्व है.

उन्होंने महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने पर बल दिया. इसके साथ ही उन्होंने राज्य सरकार की योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्ता के सूत्र शक्ति रूपा महिलाओं हाथ में सौंपेंगे. पुलिस सहित अन्य विभागों की भर्ती में 33 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण मिलेगा. अगले शैक्षणिक सत्र से शिक्षा के पाठ्यक्रम में महिला सशक्तिकरण, आत्म निर्भरता, स्वाभिमान, संवेदनशीलता के पाठ शामिल किए जाएंगें. किसी भी विज्ञापन में नारी देह के प्रदर्शन को प्रतिबंधित किया जाएगा और इसके लिए हम कानून भी बनाएंगे. महिला मजदूरों को समान कार्य का समान वेतन दिया जाएगा. मध्यप्रदेश में शराब की कोई भी नई दुकान नहीं खोली जाएगी और नशामुक्ति अभियान चलाया जाएगा. राज्य को शक्ति प्रदेश बनाएंगे, जिसमें महिलाओं को संपूर्ण अधिकार दिए जाएंगे. बेटा-बेटी बराबर हैं, यह जनअभियान चलाया जाएगा.
साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि नारी निकेतन किसी समस्या का हल नहीं है. नारी को आंतरिक और बाहरी रूप से सशक्त बनाने के लिए नीति बनाने की आवश्यकता है. महिलाओं को रोटी कमाने लायक बनाए.
श्रीमती मृदुला सिंन्हा ने कहा कि महिलाओं के लिए विशेष योजनाओं की महती आवश्यकता है. शिक्षा पाठ्यक्रमों में नारी उत्थान के पाठ शामिल किए जाने चाहिए. बच्चों को चाहिए कि वे माता-पिता को वृद्धाश्रम नहीं भेजें. उन्होंने कहा कि विवाह करना अनिवार्य नहीं, बल्कि आवश्यक है. इस संबंध को निभाना चाहिए.

सुश्री साध्वी भगवती ने कहा कि बड़ा होना जरूरी नहीं, बल्कि बढ़िया होना जरूरी है, यह भाव भारतीय जनमानस में पैदा करने हेतु अभियान चलाया जाना चाहिए. नारी के अंदर विद्यमान अच्छे संस्कारों को प्रोत्साहित करने हेतु शुभ शक्ति नामक योजना संचालित की जानी चाहिए.

शिव भरत गुप्त ने कहा कि स्त्री के चरित्र को लांक्षित करने वाले लोगों और कथनों को रोकने के लिए एक विशेष कानून होना चाहिए. स्त्री की प्रकृति के अनुरूप रॊल मॊडल तैयार करना चाहिए, जो उनके अनुकूल हो. स्त्रियों के सशक्तिकरण के लिए केवल आरक्षण एक मात्र समाधान नहीं है, उसके लिए एक सोशल रॊल मॊडल तैयार करना होगा, ऐसी सामाजिक और नई संस्थाएं बनानी होंगी, जिससे परिवार और बच्चों के साथ-साथ महिलाओं के अकेलेपन को दूर किया जा सके, इसके लिए भी महिलाओं को ही जिम्मेदारी सौंपनी होंगी.

यूएन वीमेन की सदस्य अंजू पांडे ने कहा कि कार्यशील महिलाओं के कार्य या गृह कार्य का भी मूल्यांकन होना चाहिए. महिलाओं के अनपेड वर्क पर ध्यान केन्द्रित कर उस पर भी विमर्श होना चाहिए. पुरुषों की मानसिक स्थिति बदलने के लिए भी सरकारी प्रयास किए जाने चाहिए.

सुश्री निवेदिता बिड़े ने कहा कि समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने एवं उनका आदर करने के लिए जनजाग्रति हेतु योजनाएं बनाई जाएं. स्त्री-पुरूष में समानता एवं भ्रूण हत्या रोकने से समाज में एकात्मता एवं आत्मीयता का भाव उत्पन्न होगा.

सुश्री गीता बलवंत गुण्डे ने कहा कि समाज में लिंग भेद के प्रति सामाजिक संवेदना पैदा करने की आवश्यकता है. भारतीय विकास की अवधारणा के आधार पर बाल विकास को मॊडल बनाया जाना चाहिए. शिक्षा के द्वारा महिलाओं में आत्मविश्वास को बढ़ाए जाने की नीति बनाने की आवश्यकता है.

स्वामिनी विमला नंदनी ने कहा कि बच्चों में बाल्यकाल की आयु में संपूर्ण विकास की कार्ययोजना बने. मां के गर्व से ही कन्या के प्रोत्साहन को बढ़ावा दिया जाए.
विचार कुंभ में 45 देशों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया. विभिन्न मुद्दों पर विदेशी वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे. श्रीलंका के वरिष्ठ सलाहकार सतत विकास एवं वन मंत्रालय मिस्टर उच्चिता डि जोयसा ने पर्यावरण परिवर्तन और सतत विकास पर चर्चा करते हुए कहा कि हमें विकास के साथ संरक्षण पर बल देना चाहिए. सतत स्थाई विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए. भविष्य की पीढ़ी और पर्यावरण को ध्यान में रखकर ही विकास करना चाहिए. विश्व के 193 देशों के द्वारा न्यूयार्क में किए गए पर्यावरणीय विमर्श और उसके निष्कर्षों को संपूर्ण विश्व में लागू किए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए. पृथ्वी के भविष्य पर चिंतन करना अनिवार्य है. पर्यावरणीय स्तर पर नवीन विश्व नीति को तैयार करना चाहिए. गरीबी के लिए भोजन, स्वास्थ्य, स्वच्छ जल, प्रदान करने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए.

अमेरिका के न्यूयार्क स्थित सिटी यूनिवर्सिटी की प्रो. रेबेक्का ब्रेट्सपीस ने कहा कि भोजन के मानकीकरण और फूड सिक्योरिटी को बढ़ावा देने के साथ ही भोजन की बर्बादी को राकने हेतु विशेष प्रयास किए जाने चाहिए.

अमेरिका की ओक्लाहामा यूनिवर्सिटी के डॊ. सुभाष ने कहा कि प्राचीन धंधों या प्राचीन व्यवसाय पद्धतियों को लुप्त होने से बचाने का प्रयास करना चाहिए. भारतीय संस्कृति के पर्यावरणीय पक्षों को उजागर करने पर बल देना चाहिए. आत्म विद्या और प्राचीन भारतीय विज्ञान को प्रसारित करना चाहिए. जड़-चेतनमय विज्ञान के विकास पर बल देना चाहिए.

संयुक्त राज्य अमेरिका से आए वैदिक शिक्षाविद डेविड फ्राले (पंडित वामदेव शास्त्री) ने कहा कि आयुर्वेद और योग वेदांत का आधुनिकीकरण करना चाहिए, ताकि वह अत्यधिक प्रभावी बन सके. एलोपैथिक की अपेक्षा आयुर्वेद पर विशेष बल दिया जाना चाहिए. आयुर्वेद और योग की शिक्षा प्रत्येक बच्चे को बाल्यावस्था से दिया जाना अनिवार्य होना चाहिए. संयुक्त राज्य अमेरिका के ही वैदिकवेत्ता माइकल ए. क्रीमो (धु्रपद कर्मा) ने कहा कि वैदिक ज्ञान और संस्कृति के अध्ययन को बढ़ावा देना चाहिए. शांति और सद्भाव के गुरुकुल शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

अमेरिका से आई योगिनी साम्भवी ने कहा कि समझ हमारी मूल प्रकृति है, सबसे पहले हमें अपने आप को ही समझने की आवश्यकता है.

दक्षिण कोरिया के प्रो. गी लोंग ली ने कहा कि दर्द से हमें भागना नहीं चाहिए, हम इसी के माध्यम से विवेक, मुक्ति और निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं.

जापान से आए यसुआ कामाता ने कहा कि हर किसी को पूर्णतावादी सोच की ओर बढ़ना चाहिए. संकीर्ण मानसिक स्थिति से बचना चाहिए.

थाइलैंड से आए पर्यावरणविद् बिक्कुनी धर्मनंदा ने कहा कि महिलाओं पहले से ही सशक्त हैं, बस उनकी शक्ति को छीना न जाए, उन्हें आगे बढ़ने का भरपूर मौका दिया जाना चाहिए. उन्हें आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर प्रदान करने चाहिए.

कम्बोडिया के गेसी सम्पटेन ने कहा कि योग मनुष्य का अंतिम सत्य है, और किसी किताब से आप इसे नहीं सीख सकते, इसे केवल अभ्यास से ही सीखा जा सकता है. अतः योग और ध्यान के व्यावहारिक पहलू पर ध्यान देना चाहिए.

कम्बोडिया के ही सॊन सुबर्ट ने कहा कि किसान जो हमारा पेट भरते हैं, उनके आत्म सम्मान और गरिमा का सरकार विशेष ध्यान रखना चाहिए.

बांग्लादेश के मुख्य सूचना आयुक्त मोहम्मद ग़ुलाम रहमान ने कहा कि मीडिया को महिलाओं के सकारात्मक स्वरूप और उनके लिए अनुकूल वातावारण को तैयार करने हेतु भरसक प्रयास करने चाहिए.

डॊ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता के साथ उसकी विश्वसनीयता बनी रहे, इसके लिए भारतीय प्रेस परिषद की तरह एथिकल रेगुलेटरी अथॊरिटी बनाने की आवश्यकता है. बार काउंसिल ऒ इंडिया की तरह ही पत्रकारों का भी पंजीकरण जरूरी होना चाहिए. पत्रकार बनने के लिए न्यूनतम मानदंड स्थापित करने की आवश्यकता है.

श्री सक्रांत सानु ने कहा कि पारम्परिक शिक्षा पद्धति को पुनर्जीवित करना होगा. मीडिया की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पत्रकारों को प्राप्त सुविधाओं का पत्रकारों द्वारा खुलासा किया जाना चाहिए. कोई भी देश अपनी भाषा के बिना विकसित नहीं हो सकता, लिहाजा मातृभाषा में शिक्षण तंत्र को विकसित करने की आवश्कता है.

प्रो. टीएन सिंह ने कहा कि शिक्षात्मक उपलब्धियों को जनमाध्यमों द्वारा सही माध्यम से सही लोगों तक पहुंचाना चाहिए. मीडिया को खबरें उन्हीं संदर्भों में दिखानी चाहिए, जो समाज के लिए उपयोगी हैं. शिक्षा के क्षेत्र में जो अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें मीडिया द्वारा महत्व दिया जाना चाहिए.

डॊ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने स्वच्छता पर चर्चा करते हुए कहा कि जिस ग्रामीण परिवार के पास अपना शौचालय नहीं होगा, उसे चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर पानी को खुला न छोड़ा जाए.

पांडिचेरी स्थित अरविन्दो आश्रम के श्रद्धालु रनाडे ने कहा कि हर किसी को चाहिए कि वह अपने में सातत्य भाव, एकत्व भाव, अनन्तता बोध और भारतीय बोध का विस्तार करता करे.
विचार कुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष अनिल माधव दवे ने जैविक खेती को प्रोत्साहित करने पर बल देते हुए कहा कि किसानों को शून्य बजट खेती के लिए (सुभाष पालेकर मॊडल) प्रेरित किया जाए. देशी गायों को प्रत्येक परिवार में पाल कर कृषि को संबल दिया जा सकता है.
अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ के आयोजन के माध्यम से भारत की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखने का प्रयास किया गया. जिस प्रकार वक्ताओं ने देश और समाज से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया और जनहित में कार्य करने का आह्वान किया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि विचार महाकुंभ अपने उद्देश्य में सफ़ल रहा है.

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