लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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शंकर शरण

यूजफुल ईडीयट्स एक विश्व-विख्यात मुहावरा है। इसी नाम से बीबीसी ने गत वर्ष एक ज्ञानवर्द्धक डॉक्यूमेंटरी भी बनाई है। इस कवित्वमय मुहावरे के जन्मदाता रूसी कम्युनिज्म के संस्थापक लेनिन थे। अर्थ थाः वे बुद्धिजीवी जो अपनी किसी हल्की या भावुक समझ से कम्युनिस्टों की मदद करते थे। ऐसे बुद्धिजीवियों को उपयोगी मूर्ख कहने में लेनिन की कोई चालबाजी नहीं थी। जड़-सिद्धांतवादी लेनिन, जिनके सिद्धांत भी अपने ही थे, को अपने विचारों के मामूली नुक्ते पर भी मतभेद नामंजूर था। इस पर वह अपने निकटतम सहयोगियों को भी नहीं बख्शते थे। तब स्वभाविक था कि बाहरी बुद्धिजीवियों को लेनिन सचमुच बकवादी/मूर्ख समझते। पर उन बाहरी बुद्धिजीवियों में जो कम्युनिस्टों की मदद करता, उस की तात्कालिक उपयोगिता मानकर उपयोगी मूर्ख कहा गया। इतिहास गवाह है कि शोषित-पीड़ित पक्षधरता के नाम पर दुनिया में असंख्य लेखकों, कवियों, प्रोफेसरों ने कम्युनिस्टों को सहयोग दिया; और बाद में उन्हीं के हाथों लांछित-प्रताड़ित हुए या मारे गए। जिन्हें प्रमाणिक विवरणों की जरूरत हो, वे प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक हावर्ड फास्ट की पुस्तक द नेकेड गॉडः द राइटर एंड द कम्युनिस्ट पार्टी (1957) पढ़ सकते हैं। अस्तु।

 समय के साथ यूजफुल ईडीयट्स नामक मुहावरे का अर्थ हो गया हैः किसी भी कट्टर, उग्रवादी राजनीति या तानाशाही शासक को मदद पहुँचाने वाले नासमझ बुद्धिजीवी। ऐसे बुद्धिजीवी दूसरे देश के भी हो सकते हैं जो किसी उग्रपंथी संगठन या नेता को प्रगतिशील, साम्राज्यविरोधी आदि मानकर उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। सोवियत संघ और लाल चीन के प्रति पश्चिमी लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों को इसी श्रेणी में रखा जाता था। क्योंकि सोवियत कम्युनिस्ट उन के प्रति  सच्ची मैत्री नहीं, बल्कि उपयोगिता वाले दृष्टिकोण से ही उन्हें सीमित, रंगीन या झूठी जानकारियाँ दिया करते थे। ( भारतीय प्रगतिशील लेखक, प्रोफेसर इसी श्रेणी में थे, चाहे और निचले दर्जे पर।) ताकि वे अपने भोले विश्वास में टिके रहें और कम्युनिस्ट शासन के प्रचारक बने रहें। इस प्रकार, वे बुद्धिजीवी सचेत और व्यवस्थित रूप से भी मूर्ख बनाए जाते थे।   

आज भारत में नक्सलियों और इस्लामी आतंकवादियों के लिए सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों के लिए यह मुहावरा बिलकुल सटीक है। कुछ पहले एक हिन्दी कवि ने संसद पर हमला करने वाले आतंकी मुहम्मद अफजल की तुलना भगत सिंह से की। फिर दिल्ली में कुछ बड़े बुद्धिजीवियों ने माओवादी विनायक सेन की तुलना नेल्सन मांडेला से की। उनमें से किसी ने संविधान संशोधन कर उस कानून को ही खत्म कर देने की माँग की जिससे सेन को दोषी पाया गया। उसने तर्क यह दिया कि देश-द्रोह वाला कानून अंग्रेजों का बनाया हुआ था, इसलिए उसे हटा देना चाहिए। जिन बुद्धिजीवियों ने इस कानून को खत्म करने की माँग की, उन्हें इसका भान भी नहीं कि वे कह क्या कह रहे हैं? 

वे देश के विसर्जन की बात कर रहे हैं! अर्थात, ठीक वही चीज जो कई आतंकवादी गिरोहों, माओवादियों, षडयंत्रकारी मिशनरियों और पाकिस्तानी आई.एस.आई. की भी खुली चाह है। कि यह भारत नामक देश यदि पूरी तरह उनके कब्जे में न आ सके, तो कम से कम टूटकर कमजोर तो हो। ताकि टुकड़े-टुकड़े उनके कब्जे आने की संभावना बने। कोई हिस्सा जिन्ना के अधूरे काम को पूरा करने के काम आए, तो कोई मुगलिस्तान, कोई माओवादी मुक्त इलाका, कोई ईसाई राज्य या दलितलैंड बन जाए। कृपया स्मरण रखें, इनमें से एक भी काल्पनिक नाम नहीं है। विविध बयानों, राजनीतिक प्रचार, दस्तावेज, यहाँ तक कि सरकारी आयोग की रिपोर्ट में इन्हें देखा जा सकता है। 

इन बातों से निपट अनजान हमारा बुद्धिजीवी देश-द्रोह के विरुद्ध कानून खत्म करने की माँग कर बैठता है! ऐसे बुद्धिजीवियों को आतंकियों, नक्सलियों के लिए उपयोगी मूर्ख के सिवा और कहा ही क्या जा सकता है? रोचक बात है कि डॉ. राममनोहर लोहिया ने भी ऐसे प्रख्यात लोगों, प्रोफेसरों को मूढ़ विद्वान की ही संज्ञा दी थी, जो यूजफुल ईडीयट्स से मिलता-जुलता है। यह ऐसे बुद्धिजीवी हैं जो यह भी नहीं जानते कि जिहादियों की मंजिल निजामे-मुस्तफा या माओवादियों के पीपुल्स रिपब्लिक कायम होते ही उन्हें या तो जान बचा भागना पड़ेगा, नहीं तो ऐसी गुलामी की जिंदगी मिलेगी, जिसकी विभीषिका का उन्हें अनुमान तक नहीं। सारी दुनिया के जिहादी, तालिबानी अपने इलाकों में या यहीं जंगलों में माओवादी अपने नियंत्रण क्षेत्र में जो लोमहर्षक न्यायकरते हैं, उससे सभी परिचित है। इसके बावजूद कुछ बुद्धिजीवी जिस रति-उत्साह से उन्हें मदद पहुँचाने में लगे हुए हैं, वह आश्चर्यजनक है। 

ऐसे बुद्धिजीवियों का इस्लामी या माओवादी राज्य में क्या होगा, इसमें अनुमान की कोई बात नहीं। वह एक घोषित सत्य है। 1999 ई. में पोप के वेटिकन में एक अंतर्राष्ट्रीय ईसाई-इस्लामी संवाद आयोजित हुआ था। उसमें एक बड़े इस्लामी आलिम ने साफ कहा, तुम्हारे लोकतंत्र के सहारे हम तुम पर हमला करेंगे, और अपने मजहब के सहारे तुम पर अधिकार करेंगे। यह घटना संवाद में भागीदार एक ईसाई महामहिम गिसेप बर्नार्डीनी ने बताई थी। ऐसी बेधड़क घोषणाओं के पीछे लेनिन वाला जड़ विश्वास ही है जो दूसरों का इस्तेमाल करते हुए भी उन्हें हीन, तुच्छ समझने में संकोच नहीं करता। किंतु दूसरों को तो सोचना चाहिए, कि ऐसे क्रांतिवादी, जिहादी अगर सफल हुए तो क्या होगा? 

मुहम्मद अफजल या बिनायक सेन को भगत सिंह और नेल्सन मांडेला बताने वाले बुद्धिजीवी किसी के हितैषी नहीं। वे निरे नादान या भारी धूर्त्त हैं, जो लोकतंत्र की स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर लोकतंत्र को ही खत्म करने की तैयारी में लगे गिरोहों की मदद कर रहे हैं। यह छिपी बात भी नहीं। जिहादी और माओवादी बयानों, दस्तावेजों में जगह-जगह डंके की चोट पर लिखा है कि उन्हें वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का अंत कर अपनी मजहबी या माओवादी तानाशाही स्थापित करनी है। जिसके बाद यह स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायालय, स्वतंत्र चुनाव आदि का पूर्ण खात्मा हो जाएगा। जंतर-मंतर या मंडी हाउस की खुशनुमा धूप में प्रसिद्धि का सुख लेते हुए वक्तव्य देने की आजादी खत्म हो जाएगी। सरकारी संस्थानों के निदेशक, चेयरमैन रहते हुए सरकारी, न्यायिक निर्णयों का खुला विरोध करने की दुर्लभ छूट तो अकल्पनीय ही होगी! ऐसी अतिशय उदार छूट का लाभ उठाने वाले बुद्धिजीवी भारत को नकली लोकतंत्र कहते हैं और माओवादियों को गाँधावादी बताते हैं! लेनिन ने इन्हें गलत नाम नहीं दिया था। 

ऐसे बुद्धिजीवी यह सब अनजाने कर रहे हों या जान-बूझ कर, हर हाल में वे समाज के लिए घातक कार्य कर रहे हैं। यदि वे माओवादियों का सिद्धांत-व्यवहार जानते हुए उनका बचाव करते हैं, जैसा अरुंधती राय करती हैं, तो उनकी स्वतंत्रता की समझ दूषित है। स्वतंत्रता की धारणा सबकी समानता और न्याय भावना के साथ ही कोई अर्थ रखती है। जो स्वतंत्रता किसी माओवादी को मिलनी चाहिए, वही उस आदिवासी, या शिक्षक, या सरकारी कर्मचारी को भी है जो माओवादियों की दादागिरी पसंद नहीं करता। उन की स्वतंत्रता का क्या हो रहा हैबिनायक सेन के समर्थक उन सैकड़ों नागरिकों की कभी चिंता नहीं करते जिनकी मुखबिर कहकर माओवादी नृशंस हत्या करते हैं। जो माओवादी स्वयं कानून नहीं मानते, उन्हें न्यायालय से कानूनी छूट दिलाने के आंदोलन का क्या अर्थ है?  

दूसरी ओर, जो बुद्धिजीवी माओवादियों, जिहादियों का सिद्धांत-व्यवहार जाने बिना उन्हें मांडेला या भगत सिंह कहते फिरते हैं, वे और भी घातक हैं। ऐसे बुद्धिजीवी बुद्धि शब्द को लज्जित कर रहे हैं। बिना जाने वे मंच पर वही कुछ बोलने लगते हैं जो उन्हें किसी ने बताया है। जैसे, उस शर्मिंदा अभिनेत्री ने कहा,  “कोर्ट ने बिनायक सेन पर एक-तरफा फैसला दिया गया है। उन्हें इतना भी पता नहीं कि पिछले तीन-चार वर्ष से हर अदालत में सेन के लिए अच्छे-से-अच्छे वकीलों ने पैरवी की है। सुप्रीम कोर्ट समेत सभी अदालतों ने उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया। वहाँ सेन और सरकार, दोनों पक्ष की खुली सुनवाई हुई, जहाँ मीडिया ही नहीं, दूसरे नागरिक भी सब कुछ देख सुन सकते थे। अभी तक किसी ने, सेन के वकीलों ने भी, कहीं यह आरोप नहीं लगाया कि किसी कोर्ट ने एकतरफा काम किया। तब यह अभिनेत्री ऐसा निपट मूढ़ बयान दे रही है! मानो पृष्ठभूमि में खड़े किसी निर्देशक ने उन्हें बना-बनाया संवाद बोलने के लिए कहा हो, जिसे पूरी अदा से उन्होंने दुहरा दिया! उनकी प्रसिद्धि के नाम पर यह झूठी बात दुनिया भर में प्रसारित हो गई, और हमारी स्वतंत्र, निष्पक्ष न्यायपालिका, तथा देश की छवि पर कालिख पोती गई। 

ऐसे लेखक, अभिनेता, पत्रकार, समाज-सेवी आदि को ओरियाना फलासी ने अभिजात फाहशाओं की संज्ञा ठीक ही दी थी। जो किसी भाड़े, पुरस्कार या प्रसिद्धि की चाह में उन के लिए भी खड़े होने के तैयार बैठे रहते हैं, जिन्हें वे जानते-पहचानते तक नहीं। भारत के निष्पक्ष, खुले न्यायालय जहाँ अभियुक्त का अच्छे वकीलों द्वारा बचाव किया गया, उस पर लांछन लगाना; कानून की रक्षा करने वाले सुरक्षा-बलों को निंदित करना, और घोषित रूप से विध्वंस को अपना सिद्धांत बताने वाले नक्सली या आतंकवादी का बचाव करने की नियमित प्रवृत्ति को और क्या कहा जाए! 

ऐसे बुद्धिजीवियों से समाज को बचना जरूरी है। वे उस अंधे जैसे हैं जिसके हाथ में आग है। वे अपने उच्च-पदों और प्रसिद्धि का वजन देश का नाश करने में तुले जिहादियों, नक्सलियों के पक्ष में लगा रहे हैं। यह कड़वा सत्य समझने की आवश्यकता है कि ऐसे पैरोकार बुद्धिजीवियों से जिहादियों, माओवादियों को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता है। वस्तुतः, इसीलिए बिनायक सेन जैसे लोगों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए, ताकि देश-द्रोह के लिए लोकतंत्र की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने सभी लोगों को कठोर संदेश मिले। अभी सेन पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, इसलिए देशभक्त लोगों को भी अपनी आवाज उठानी चाहिए। नहीं तो यूजफुल ईडीयट्स अपने साथ-साथ हम सबको ले डूबेंगे।

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1 Comment on "यूजफुल ईडीयट्स की भूमिका"

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डॉ. राजेश कपूर
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यद्यपि पुनरुक्ति दोष के कारण लेख अनावश्यक रूप से लंबा हो गया है पर है बहुत सार्थक लेख. सचमुच ये तथाकथित बुद्धिजीवी ऐसे मूर्ख हैं जिन्हें लेनिन के कहे अनुसार ”युसफुल ईडियट्स” से सही उपमा नहीं दी जा सकती. कितना सही कह रहे हैं शंकर शरण कि जिन लोगों के हित में ये उपयोगी मूर्ख चिल्ला रहे हैं उनकी सत्ता दुर्भाग्य से आई तो ये मूर्ख बोलने की स्वतन्त्रता के लिए तरस जायेंगे और अगर कभी बोले तो सीधे जेल में होंगे या मृत्यु दंड पायेंगे. रूस, चीन और मुस्लिम देश इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं.

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