लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

पिछले दो साल में तमाम भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलानों के बावजूद आम आदमी को भ्रष्‍टाचार से कोई राहत नहीं मिली है। अन्ना आंदोलन ने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जनभावना को जबरदस्‍त ढंग से उभारा था। इससे यह अहसास हुआ था कि कैंसर की तरह नौकरशाही में फैली इस बुराई पर शायद काबू पा लिया जाएगा। लेकिन अन्ना आंदोलन में ठहराव और बिखराव के बाद राजनीतिक दल अपने उस वादे से मुकर गए जो उन्होंने देश की जनता से संसद के मंदिर में सरूत लोकपाल लाने के लिए किया था। अब तो लगता ही नहीं कि लोकपाल जल्द लागू होगा। नतीजतन दुनिया के भ्रष्‍टतम् देशों की संख्या में भारत अव्वल स्थान की ओर लगातार बढ़ रहा है। गैर सरकारी संस्था ट्र्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट ने इस हकीकत की पुष्टि की है। यही नही सेंटर फॉर मीडिया स्टेडीज द्वारा देश के नौ महानगरों में किए अध्‍ययन के मुताबिक चार साल में भ्रष्‍टाचार के मामले दोगुने हो गए हैं। यह संस्था साल 2000 से भष्‍टाचार से जुड़े आंकडों का अध्‍ययन कर रही है।

टीआई द्वारा तैयार भ्रष्‍टाचार धारणा सूचकांक के मुताबिक 176 देषों की सूची में भारत 94 वें क्रम पर है। पिछले साल 95 वें स्थान पर था। सूचकांक में यह भ्रष्‍टाचार में कोई सुधारों का परिणाम नहीं है। यह स्थिति सूचकांक धारणा को मापने के नए फॉर्मूला की वजह से बनी है। यदि परंपरागत तरीके से सूचकांक बनता तो भारत 96 वें नंबर पर आता। टीआई ने इस बार दस अलग – अलग रिपोर्टों का औसत निकालकर सूचकांक तैयार किया है। इसमें विश्‍व बैंक का मूल्यकांन भी षामिल है। अब भारत भ्रष्‍टाचार में चीन से भी नीचे है। जबकि चीन में ऐसा माना जाता है कि वहां सर्वत्र भ्रष्‍टाचार व्याप्त है। हालांकि भारत में भ्रष्‍टाचार का उत्तरोत्तर बढ़ना कोई नई बात नहीं है। 2007 में यह 72 वें क्रमांक पर था, तो 2010 में 87 वें पर और 2011 में 95 वें पर हैं। बीते दो-तीन सालों में भ्रष्‍टाचार के जिस तरह से बड़े घोटाले सामने आए हैं, उससे लगता है, जैसे राजनीतिक और प्रषासनिक व्यवस्था भ्रष्‍टाचार के लिए और भ्रष्‍टाचार के कारण ही फल – फूल रही है।

दूसरी तरफ सीएमएस ने ‘‘इंइिया करप्‍शन अध्ययन 2012’’ के नाम जो रिपोर्ट जारी की है,उसके अनुसार मुबंई भ्रष्‍टाचार के मामले में शीर्ष पर है। यहां चार साल में पांच गुना भ्रष्‍टाचार बढ़ा है। इसके साथ ही बेंगलुरू,चेन्नई,भुवनेश्‍वर,दिल्ली,हैदराबाद,गोवा और दिल्ली में भी भ्रष्‍टाचार बढ़ा है। इस रिपोर्ट से इस बाबत एक सुखद पहलू यह सामने आया है कि अपवादस्वरूप राजधानी अहमदाबाद में बीते चार साल में 18 फीसदी भ्रश्टाचार घ्टा है। यह सर्वे राशन,राशन कार्ड,नए बिजली कनेक्‍शन,पानी की आपूर्ति,कचरा हटाने,सरकारी अस्पताल में ओपीडी कार्ड बनवाने,एफआईआर दर्ज कराने अथवा पुलिस रिकोर्ड से नाम हटवाने जैसी सेवाओं के संदर्भ में किया गया था। यदि राजस्व मामलों को भी इसमें शामिल किया जाता तो भ्रष्‍टाचार का आंकड़ा और बढ़ा दिखाई देता।

टीआई ने जो अध्ययन किया है,उसमें सार्वजानिक चितरण प्रणाली,मनरेगा,मध्यान्ह भोजन, पोलियो उन्मूलन के साथ, स्वास्थ्य लाभ व भोजन का आघिकार संबंधी योजनाएं शामिल हैं। जाहिर है, ये सभी योजनाएं मूलभूत अनिवार्य व जनकल्याणकारी सेवाओं से जुड़ी हैं। भ्रष्‍टाचार के ताजा खुलासों ने साफ किया है कि जमीनी स्तर पर ये योजनाएं किस हद तक लूट और मानवाधिकारों के हनन का सबब बनी हुई हैं। जबकि हम सांस्कृतिक रूप से सभ्य,मानसिक रूप से धर्मिक और भावनात्मक रूप से कमोवेश संवेदनशील कहलाते है। हालांकि हमारे देश में प्रशासनिक पारदर्शिता के उपाय लगातार बढ़ाए जा रहे है,इसके बावजूद भ्रष्‍टाचार सुरसामुख की तरह बढ़ता ही जा रहा है। ई-प्रशासन के बहाने कंप्युटर का अंतर्जाल सरकारी महकमों में इस दृष्टि से फैलाया गया था कि यह प्रणाली भ्रष्‍टाचार को बाधित तो करेगी ही ऑनलाइन सुविधाओं के जरिए समस्या का समाधान भी तुरंत होगा। लेकिन नतीजा निकला वही ढांक के तीन पांत। कंप्युटर प्रणाली के दुरूपयोग ने भ्रष्‍टाचार को आसान तो किया ही,सुरक्षित भी बना दिया।

सूचना के अधिकार कानून को भी भ्रष्‍टाचार से मुक्ति का पर्याय माना गया था। क्योंकि इसके मार्फत आम नागरिक प्रत्येक सरकारी विभाग के कामगज व नोटशीट पर अधिकारी की दर्ज टिप्पणी का लेखा-जोखा तलब कर सकता था, लेकिन यह नुस्खा भी सरकारी मषीनरी पर सटीक नहीं बैठा। क्योंकि इन ताजा रिपोर्टों से साफ हुआ है के सरकारी अमले की अनिमित्ताएं घटने की बजाय बढ़ी है। अब इसी परिपेक्ष्य में नए उपाय के रूप में आधार कार्ड को लाया जा रहा है। प्रचारित किया जा रहा है कि आधार भ्रश्टाचार खत्म करने की दृष्टि से रामबाण उपाय साबित होगा। इसलिय सरकार एक जनवरी 2013 से इसे देश के 52 जिलों में लागू करने जा रही है। खाद्यान्न व ईधन पर दी जाने वाली नकद सबसिडी अब इसी आधार के जरीए मिलेगी। छात्रवृति,वृद्धावस्था पेंशन व अन्य सरकारी आर्थिक सुविधाएं मिलने का आधार इसी आधार कार्ड को ही बनाया जा रहा है। लेकिन जिन राज्यों में आधार के जरीए जनकल्याणकारी सुविधाएं हासिल कराने का सिलसिला शुरू हो चुका है,वहां से नतीजे संतोषजनक नहीं आ रहे है। कर्नाटक में आधार को यूनिट में जोड़ने के लिए जो 65 करोड़ की मशीनें खरीदी गई,उसमें बड़ी मात्रा में भ्रष्‍टाचार बरतते हुए घटिया मषीनें खरीद ली गईं। नतीजतन आधार की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई और इसके आपेक्षित परिणाम देखने में नहीं आए अब इस पूरे मामले की जांच कर्नाटक लोकायुक्त कर रहा है। जाहिर है,इस तकनीक का भी कसौटी खरा उतरना मुश्किल ही है।

दरअसल इन उपायों का एक – एक कर प्रशासन की देहरी पर दम तोड़ देने की पृष्‍ठभूमि में वह श्रम कानून है, जो प्रशासनिक तंत्र को कानूनी रक्षा कवच मुहैया कराते हैं। इसी कारण यह पारदर्यिाता व जबावदेही के सभी उपायों को बेफ्रिकी से ठेंगा दिखाते रहते हैं। दरअसल हमने औपनिवेशिक जमाने की नौकरशाही को स्वतंत्र भारत में जस की तस मंजूर कर लेने की एक बड़ी भूल की थी नतीजतन आज भी हमारे लोकसेवक उन्हीं दमनकारी पंरपाराओं से आचरण ग्रहण करने में लगे है, जो अंगे्रजी राज्य में विद्र्रोहियो के दमन की दृष्टि से जरूरी हुआ करती थी। इस सिलसिले में नौकरशाहों के लिए ढाल बने संविधान के अनुच्देद 310 एवं 311 में बदलाव की मांग अर्से से नागरिक समाज कर रहा है। लेकिन इन्हें बदला जाना नामुमकिन बना हुआ है। यही वे अनुच्छेद है जिनके जरिए ताकतवर नेता और प्रषासक जांच ऐजेसियों को प्रभावित करके तथ्यों व साक्ष्यो को कमजोर करने हुए न केवल पदों पर बने रहते हैं, बल्कि आकंठ भ्रष्‍टाचार में डूबे होने के बावजूद बिना किसी अदालती कार्रवाई का सामना किए ही निर्दोश बने रहते है।

हालांकि कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने हाल ही में राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा है कि भ्रष्‍ट न्यायाधीशों के खिलाफ जांच के लिए केंद्र्र सरकार कानून बनाएगी। इस कानून के तहत भ्रष्‍टाचार में लिप्त उन न्यायाधीशों के खिलाफ भी जांच हो सकेगी जो इस्तीफा देकर अथवा सेवानिवृत्त होने के बाद इन जांचो के दायरे में आने से बच जाते हैं और पेंशन व अन्य सरकारी सुविधाओं को प्राप्त करते रहते है। उन्होंने कहा है कि यह कानून न्यायपालिका जबावदेही विधेयक के जरीय बने या अलग से कोई विधेयक लाया जाए अथवा संविधान में संशोधन किया जाए, इस पर विचार किया जा रहा है।,दरअसल राज्यसभा में विभिंन राजनीतिक दलों के सदस्यों ने दलगत राजनीति से उपर उठकर भ्रष्‍टाचार के आरोपी न्यायधीशों के विरूद्ध जांच उनके इस्तीफा देने के बाद भी जारी रखने के लिए संविधान में संशोधन करने की मांग की थी। मनोनीत सदस्य एचके दुआ ने सदन में निजी संशोधन विधेयक प्रस्तुत कर सरकार से अनुरोध किया था कि राष्‍ट्रपति किसी भी न्यायाधीश का इस्तीफा तभी स्वीकार करें जब उनके विरूद्ध जारी जांच पूरी हो जाएं। दरअसल इस मांग की पृष्‍ठभूमि में पूर्व न्यायाधीश सौमित्र सैन और दिनाकरन के मामले थे। जब इन पर महावियोग का मामला चला तो इन्होंने पद से इस्तीफा देकर जांच से सामना करने से तौबा कर ली। परिणामरूवरूप इन्हें पेंशन व अन्य सुविधाएं मिल रही है और पूर्व न्यायधीश का तमगा लगाकर समाज में प्रतिश्ठा भी हासिल किए हुए है।

लेकिन इस परिपे्रक्ष्य में विडंबना यह है कि फिलहाल तो हमारे न्यायालय और न्यायाधीश सूचना अधिकार कानून के दायरे में भी नहीं आते। मानवाधिकार संगठन पी यू सीएल ने एक जनहित याचिका दायर करके अपील की थी कि सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पारिपारिक संपत्ति का ब्यौरा लेने की इजाज्त मिले। लेकिन तात्कालीन न्यायमूर्ति बालकृष्‍णन ने इस मांग को इस दलील के साथ ठुकरा दिया था कि उनका दफ्तर सूचना के दायरे से इसलिए बाहर है क्योकि वे संवैधानिक पदों पर आसीन हैं। जबकि विधि और कार्मिक मंत्रालय की स्थाई संसदीय समीति ने भी अपनी रिपोर्ट में न्यायपालिका को सूचना कानून के दायरे में लाने की मांग की है। इस समिति का तो यह भी दावा है कि संवैधानिक पदों पर बेठै लोग भी लोकसेवक है, इसलिए सूचना का अधिकार उन पर भी लागू होना चाहिए। किंतु यहां विडंबना यह है कि संसद न्यायपालिका को कोई दिशा निर्देश नहीं दे सकती और न्यायपालिका का विवेक मानता है कि वह सूचना के अधिकार से परे है। अब यहां सोचनीय पहलू यह है कि जब यह अधिकार संसद पर लागू हो सकता है तो न्यायपालिका पर क्यों नही ? बहरहाल भ्रष्‍टाचार का खुलासा करने वाली इन ताजा रिपोर्टों ने राजनीतिक प्रशासनिक व न्यायायिक व्यवस्थाओं को निरावाद व भ्रष्‍टाचारमुक्त बनाए रखने की दिशा में सांकेंतिक पहल की है। लिहाजा इनमें पर्याप्त सुधार किया जाना इसलिए जरूरी है,जिससे हमारी वर्तमान और भावी पीढि़यों को निष्‍पक्ष सरकारी सेवाएं मिलती रहें।

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