लेखक परिचय

प्रणय विक्रम सिंह

प्रणय विक्रम सिंह

लेखक श्रमजीवी पत्रकार है. सामाजिक राजनैतिक, और जनसरोकार के विषयों पर लेखन कार्य पिछले कई वर्षो से चल रहा है.

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प्रणय विक्रम सिंह

भारत की सियासत रोज नर्इ करवटें बदल रही है। कभी पक्ष और विपक्ष के मध्य सिमटी रहने वाली राजनीति को नये आयामों में विस्तार मिल रहा है। लोकतंत्र के मंदिर संसद को सडक से चुनौती मिल रही है। व्यवस्था की बुनियाद हिल रही है। कभी बदलाव के इशारे तो कभी असिथरता के संकेतो का सम्प्रेषण जन मानस के मन को विचलित कर रहा है। किन्तु परिवर्तन तो शाश्वत सत्य है। शायद राजनीति के बने बनाए ढांचे में परिवर्तन की सुगबुगाहट उसी शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति है । कह सकते हैं कि गुजरे छ: दशकों में शायद पहली बार हिंदुस्तानी सियासत को जन सरोकारो की कसौटी पर इतनी सख्ती से कसा जा रहा है। संसद का स्वरूप कैसा हो? क्या निर्वाचित जन प्रतिनिधि को पांच वर्षो के लिए हुक्मरान की तरह स्वीकारने की बाध्यता ही जम्हूरियत का कुल जमा हासिल है। कैसे रोका जा सकता है निर्वाचन की तनाशाही को? कुछ ऐसे ही सवालो की अकुलाहट समूचे भारत को व्याकुल कर रही है। हमें सिखाया भी गया है कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती है। यहीं सवाल उठता है कि पांच साल के इंतजार के बरक्स जिंदा कौमों के संघर्ष की दशा और दिशा क्या होनी चाहिए? आज जो लोग अथवा संस्थान आम जनमानस की आवाज या अधिकार प्राप्ति के वैकलिपक माध्यमों के अगुवाकार बन रहे हैं उनकी वैधानिकता क्या है? समाज सेवी अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, इरोम शर्मिला, राजगोपाल, स्वामी रामदेव और मेघा पाटकर जैसे अनेक नामों की अगुवार्इ में जनमानस के जल, जंगल और जमीन से लेकर रोटी, कपड़ा और मकान के सवालों को राष्ट्रव्यापी आवाज मिली। कर्इ बार तो इन लोगों के प्रयासों ने रäहीन क्रांति का भावपूर्ण आभास कराया। यह जन सेवको के समर्पण और जनता के अनुत्तरति सवालों की कसक ही तो थी जिसने महानगरो की चकाचौंध से लेकर सुदूर गांवों तक के अंधियारों तक बदलाव की मशाल आम आदमी के हाथ में थमा दी।

गजब का समय था वह। एक फकीर की फाकामस्ती में सारा हिन्दुस्तान मस्त था। मुख्यधारा की राजनीति के बरक्स सामाजिक संगठनों का आंदोलन विपक्ष की भूमिका अदा कर रहा था और आज भी उस स्थान पर कायम है। उसका कारण है सरकार की अधिनायकवादी शैली में जनता की मांगें स्थान नहीं पा रही है। लिहाजा आम अवाम के अंत:मन में दशको से पकते हक-हकूक के सवाल सामूहिक रूप से किसी समूह के परचम तले आवाज बुलंद करते है और संसद की दीवार पत्तो की तरह हिलने लगती है। संसद की दीवार का पत्तों की तरह हिलना ही सम्भावित खतरो से आगाह करता है। आखिर कौन है यह संगठन जो बदलाव के वाहक बन सत्ता से सवाल पूछ रहे है। इन्हे अपने कार्यक्र्रमों को संचालित करने के लिए कहा से धन प्राप्त हो रहा है? क्या इन आन्दोलनों के संचालन के लिए विदेशो से धन प्राप्त हो रहा है। विदेशो से अनुदान स्वरूप करोड़ों रूपये देने वाले यह पूंजीवादी राष्ट्र भारत में किस प्रकार हक और हकूक के सवालो के पैरोकार हो सकते है जबकि वैशिवक धरातल पर इन्हीं सिदघांतों का वह गला घोट रहे है।

कूटनीति किसी भी बड़े संघर्ष के लिए दुष्ट शक्ति के सहयोग की अनुमति देती है किंतु यदि प्रश्न सकारात्मक परिवर्तन और जवाबदेह व्यवस्था के गठन का हो तो फिर अधिनायकवादी शक्ति से सहयोग की प्राप्ति मुहिम की भावना और भविष्य को सवालों के घेरे में ले लेती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इन्हीं संशयात्मक स्थितियों से बचने के लिए हम लोगों का मार्गदर्शन करते हुए कहा था कि साध्य की पवित्रता व्यक्ति साधक तो बनाती है किंतु शर्त यह है कि साध्य और साधन दोनो पवित्र होने चाहिए। आज पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव और राजनीति के मुनाफाखोर आचरण के कारण साधन की पवित्रता तो कहीं विलोपित हो गर्इ है। सवाल उठाने वालों से लेकर सवालों में घिरे सभी लोग एक ही कश्ती पर सवार दिख रहे हैं। घोटालों की अतंहीन श्रृंखला में रोज नर्इ कडियां जुड़ रही है। मजे की बात यह है कि सभी जांच कराने की चुनौती भी दे रहे हैं। कुछ तो जांच कराकर बरी भी हो गये है। मुख्यधारा की सभी सियासी जमाते कम अथवा ज्यादा पैमाने पर इस रोग की शिकार है।

अत: कह सकते हैं कि सम्पूर्ण सियासी व्यवस्था आज विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है। उसके विपरीत नगर समाज संगठन सियासी जमातों के विकल्प के रूप में जनता के मध्य पैठ बनाने में सफल हो रहे हैं। सुदूर आदिवासी इलाकों से लेकर मेट्रो शहरों की मलिन बसितयों तक में बराबर पैठ रखने वाले यह समाजसेवी संगठन समान रुप से सक्रिय हैं। चुनी हुर्इ सरकारें भी उन्हें सलाम कर रही है। अन्ना हजारे के आन्दोलन के समय समूची संसद की वादा खिलाफी और असहाय स्थिति को भारत की जनता ने स्पष्ट देखा था। अभी हाल ही में समाजसेवी राजगोपाल के नेतृत्व में लगभग एक लाख भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के ग्वालियर से दिल्ली तक मार्च की घोषणा ने सरकार को सजदा करने को मजबूर किया और आगरा तक पहुंचते-पहुंचते सरकार ने बाकायदा मंच पर से किसानों की दसों मांगों को स्वीकारने की घोषणा कर दी। यह था जम्हूरियत की ताकत का सत्ता को अहसास। इसी तरह अभी मध्य प्रदेश में जल सत्याग्रह ने जन-संघर्ष की गहरार्इ उसकी अनिवार्यता से जन सामान्य को अवगत कराया और सरकार को उसकी ताकत से।

नगर समाज संगठनों की यह जनहितकारी भूमिका नि:संदेह प्रशंसनीय है। लोकतंत्र की मजबूत करने की दिशा में सहयोग कर रही है। दीगर है कि हक और हकूक को लेकर चल रहे अधिकार आधारित आन्दोलन लोकतंत्र को प्राण-वायु प्रदान करते है। इन आन्दोलनों में चलते ही सत्ता की निरंकुश प्रवृत्ति पर लगाम लग पाती है। लेकिन वैधानिकता का सवाल अभी भी जस की तस है। यह सिविल सोसाइटी के नाम से पहचानी जाने वाली व्यवस्था विशुद्व भारतीय हितों के लिए आग्रही बनी रहेगी, इसकी पैमाइश कैसे होगी? आखिर कुछ लक्ष्मण-रेखा तो इनकी भी होगी। महज सोसाइटी एक्ट के अन्तर्गत पंजीकृत होने से ही सारी वैधानिकता प्राप्त नहीं है। यह तो स्थापित सत्य है कि किसी भी कार्यक्रम को क्रियानिवत होने के लिए धन की आवश्यकता होती है। धन के अभाव में विचारों को मूर्त रुप नहीं मिल पाता है। फौज को लडने के लिए धन चाहिए, लोकमंगलकारी योजनाओं के संचालन के लिए धन आवश्यक है। आन्दोलन और पूंजी को अलग-अलग नहीं समझा जा सकता है। अत: धन की उपयोगिता एंव उपादेयता से इंकार नहीं किया जा सकता है।

कभी भारतीय वीरता और संघर्ष के अप्रतिम प्रतीक महाराणा प्रताप की आर्थिक विपन्नता की स्थिति में संघर्ष जारी रखने के लिए भामाशाह ने अपना खजाना खोल दिया था। वह संघर्ष भारतीय असिमता के लिए था और पूर्णत: स्वदेशी था। किंतु गैर सरकारी संगठनों के संन्दर्भ में यह स्थिति थोड़ी बदली हुर्इ है। यहां पूंजी विदेशी है। संघर्षरत लोग भारतीय है जैसे भारत के चल रहे कथित सशस्त्र विद्रोह, जिसे नक्सलवाद के नाम से जाना जाता है, उनको भी विदेशों से धन प्राप्त हो रहा है। मतलब मरने और मारने वाले दोनों तबके भारतीय हैं किन्तु असल हे विदेशी हैं। पता नहीं कब विदेशी पूंजी का प्रवाह अपने विदेशी हितों को भारत भूमि पर देखने लगे।

अन्ना आन्दोलन समेत अनेक आन्दोलनों में सरकार की डगमग स्थिति का डेमो विदेशी शक्ति ने भी देख लिया है। कोर्इ बड़ी बात नही है कि अपने हितों की पूर्ति के लिए विदेशी शक्ति अपने पूंजी प्रवाह की दम पर सामाजिक संगठनों की सामथ्र्य का लाभ अपने हितों के लिए कर सकती है।

वैसे भी अगर थोड़ा समीक्षात्मक दृषिटकोण से देखें तो तस्वीर खुद-ब-खुद साफ हो जाती है। मतलब आम जनमानस जो इन संगठनो का अनुसरण करती है, को छोड़ दिया जाये तो बाकी लोग सहमना वेतन भोगी कार्यकर्ता होते हैं। वेतन ही उनके जीविकोपार्जन का जरिया होता है। आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए निष्ठा में परिवर्तन होना कोर्इ बात नहीं है। वैसे भी इस पूंजीवादी राष्ट्रों की ‘यूज एण्ड थ्रो की प्रवृति से सभी वाकिफ है। वही लादेन को जन्म देते हैं और उदेश्य पूरा हो जाने पर उसको नष्ट भी कर देते है। कितना विरोधाभास है कि एक तरफ सम्पन्न राष्ट्रों का समूह निर्धन राष्ट्रों पर बमबारी करता है और उन्हीं के द्वारा अनुदानित सामाजिक संगठन जर्जर और तबाह होते देश में समाज सेवा के कार्यक्रम चलाते हैं। र्इरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे न जाने कितने देश हैं जो विदेशी पूंजी के प्रवाह में बह कर तबाह हो गये।

भारत वर्ष के आधे से अधिक जनपदों में धधकती नक्सली विस्फोटों की ज्वाला विदेशी धन और हितों का ही प्रतिबिंम्बन है। अतरू विदेशी धन के प्रवाह में राष्ट्रीय हितों में प्रवाहित होने की संभावित आशंका के मार्जन के लिए संघर्ष के इन वैकलिपक माध्यमों द्वारा संचालित व्यवस्था परिवर्तन के कार्यक्रमों की दशा और दिशा को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था का वजूद में आना आवश्यक है ताकि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, र्इरान जैसे अनेक राष्ट्रों की बदहाल दास्तान की पुनरावृति महादेश भारत में न हो। और समाज सेवा के लिए जन्मे संगठनो को विषय में यह न कहना पड़े कि-

मै झूम के गाता हूं कमजर्फ जमाने में

एक आग लगा ली है इक आग बुझाने में

 

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2 Comments on "व्याकुल भारत की अकुलाहट"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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अति सुंदर.

आर. सिंह
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प्रणय विक्रम सिंह जी आपके मानस में जो द्वंद्व चल रहा है,वह भारत के अधिकतर बुद्धिजीवियों का द्वंद्व है,पर लगता है कि इसका हल खोजने में आप असमर्थ हैं.भामा शाह अगर विदेशी भी होते तो उस समय राणा प्रताप को वह धन लेने में शायद संकोच नहीं होता,क्योंकि उनकी दृष्टि में अकबर विदेशी था और उसको हटाने के लिए उनको धन की आवश्यकता थी.हो सकता है कि आज का वाम पंथी एक स्वदेशी व्यापारी से मदद न लेकर एक साम्यवादी विदेशी से मदद लेना अधिक उचित समझता.खैर यह तो व्यापक तर्क का विषय है और हमलोग अभी इसको यहीं छोड़… Read more »
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