लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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– डॉ. दीपक आचार्य

हमारा बैठना-उठना भी हमारे व्यक्तित्व और भविष्य का संकेत देता है। आम तौर पर मनुष्य को निरन्तर कर्मशील रहना चाहिए और जो ऐसा नहीं कर पाते हैं और समय गुजारने के लिए अवसर और स्थान तलाशते रहते हैं वे अपने जीवन के अमूल्य क्षणों को खो देते हैं और टाईमपास जिन्दगी के आदी होकर रहे जाते हैं। ऐसे लोग न घर-परिवार में कोई जगह बना पाते हैं और न समाज या राष्ट्र में।

प्रत्येक क्षण का उपयोग किसी न किसी सृजनात्मक गतिविधि में करना चाहिए जिसके सकारात्मक परिणाम और बेहतर प्रभाव सामने आएं। पर ऐसा होता नहीं। किसी भी क्षेत्र में देखें तो समाज में दस फीसदी संख्या ऐसे लोगों की जरूर होती है जो दिन या रात में कहीं न कहीं बेवजह बैठे रहकर वाक् विलासी मनोरंजन और दुनिया जहान का विश्लेषण करते रहते हैं।

इनमें भी ज्यादा प्रतिशत उन लोगों का है जो रात में बंद दुकानों की पेढ़ियों पर या दुकानों के बाहर की सीढ़ियों और किनारों पर बैठकर घण्टों बतियाते रहते हैं। इन लोगों की चर्चाओं का न कोई विषय होता है और न कोई लक्ष्य।

सिर्फ बोलने और सुनने के फोबिया मात्र से उन्हें अमृत तत्व की प्राप्ति का अहसास होता है। इनके लिए जीवन का यह सबसे सस्ता और सुन्दर मनोरंजन है जिसमें न पैसा लगे न कोई टका, और पूरी दुनिया ही सिमट आती है अपनी चर्चा में।

दिन भर जिन दुकानों पर ग्राहक और दूसरे-तीसरे लोग खड़े रहते हैं, जिनके जूतों का मैल और धूल दिन भर वहाँ खिरती रहती है और ऐसे में सभी लोगों के जूतों की गंदगी से इन पेढ़ियों का स्थान दूषित रहता है।

ये वही स्थान होते हैं जहाँ दिन भर का दुर्भाग्य पेढ़ियों पर जमा हो जाता है और बतरस के आदी लोग इस पर बड़े ठाठ से घण्टों बैठकर गपशप करने में मशगूल रहते हैं। बातों में रस पाने वाले इन लोगों को पता तक नहीं रहता कि इन स्थलों की सूक्ष्म दुर्भाग्यकारी धूल इनके कपड़ों में चिपक कर किस तरह उनके घर पहुंच जाती है और ऐसे में रोजाना ये दुर्भाग्यशाली धूूल कणों को साथ ले जाकर अपने घर की शांति भंग करने के द्वार खोल देते हैं जहाँ से समस्याओं की शुरूआत भी होती है।

पेढ़ियों पर जमा गंदी धूल की वजह से वहाँ पसरा हुआ दुर्भाग्य और नकारात्मक अणु वहाँ से साफ होते रहते हैं और उसका फासदा दुकानदार को होता ही है। जिस दुकान की पेढ़ियों पर दुकान बंद होने के बाद बैठने वालों का मजमा लगा होता है वो दुकान अच्छी चलने लगती है क्योंकि दुकान के लिए नकारात्मक ऊर्जाओं से भरे अणुओं को वे लोग साफ कर देते हैं जो वहाँ बैठते हैं, भले ही बैठने वालों के लिए यह स्थिति समस्याजनक हो, लेकिन ऐसी बतरसिया पेढ़ियाँ दुकानदारों को फायदा ही देती हैं। यों भी पुराने जमाने से मान्यता चली आ रही है कि पेढ़ियों और डेरियों पर बैठने से कर्ज और मर्ज बढ़ता ही है।

पेढ़ियों पर बैठ कर आनंद लेने वालों के परिवार में कोई न कोई समस्या हमेशा बनी रहती है जिसकी वजह से उन्हें कर्ज लेने को विवश होना पड़ता है। इसके अलावा जो लोग देर रात तक पेढ़ियांे पर बैठ कर बतरस के शौकीन होते हैं उनका दाम्पत्य जीवन कभी सुखमय नहीं रह सकता। ऐसे लोगों की जोड़ी लम्बे समय तक साथ नहीं रह पाती। यदि कोई कुँवारा व्यक्ति भी पेढ़ियों पर बैठने का आदी होगा उसका विवाह विलम्ब से होगा।

पेढ़ियों पर बैठने के आदी लोग खुद भी अनिद्रा, व्यसनों, गृह कलह, विभिन्न प्रकार की बीमारियों के आदी होते हैं और ऐसे लोगों के साथ दुर्भाग्य इस कदर लगा रहता है कि ये भगवान की पूजा-उपासना या कोई साधना भी ढंग से नहीं कर पाते। सैकड़ों लोगों के जूते-चप्पलों से जमा होता रहने वाला दुर्भाग्य का साया इन्हें ईश्वर के करीब आने ही नहीं देता।

बात सिर्फ दुकानों की पेढ़ियों की ही नहीं, बेवजह किसी भी मकान या प्रतिष्ठान के बाहर बैठना भी इसी श्रेणी में आता है। यदा-कदा काम पड़ ही जाए तब भी पेढ़ियों पर कुछ बिछाकर ही बैठें और उठने के बाद बिछाए गए रूमाल या अन्य सामग्री को झाड़ दें अथवा फेंक दें। इसे घर न ले जाएं।

पेढ़ियों पर बैठने वाले लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि वे एक समय ऐसा आता है जब न अन्दर के रहते हैं, न बाहर के। अर्थात् साफ शब्दों में कहें तो न घर के न घाट के।

इसलिए पेढ़ियों पर बैठने का स्वभाव त्यागें और जीवन में दुर्भाग्य को खुद की गलती से स्वीकारने से बचें। इस एकमात्र खोटी आदत को छोड़ देने मात्र से अपने जीवन और घर-परिवार की कई समस्याओं का निवारण संभव है।

 

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