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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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cry-0021छोटी-छोटी बातों से जिंदगी बनती है और छोटे-छोटे सिरों से कहानी. यह छोटी-सी कहानी भी एक छोटे-से सिरे से शुरू होती है. लेकिन सबको एक बड़े जज्बात से जोड़ती है. शहीदों की शहादत और देशभक्ति गानों को 26 जनवरी या 15 अगस्त के अलावा भी याद किया जा सकता है. इसीलिए इस कहानी को आज यहां बयान किया जा रहा है.

नागपुर की गंगानगर बस्ती में कभी तिरंगा नहीं फहराया था. 26 जनवरी 2008 को लोगों ने तिरंगा फहराने का सोचा. लेकिन एक मामूली लगने वाले काम की अड़चनों को देखते हुए टाल दिया. अगली बार फहराने का कहते हुए भूल गए. लेकिन बच्चों को याद रह गया. जो बच्चे आशाओं की नन्ही-नन्ही नसैनियां लगाकर आकाश पर चढ़ते हैं. उन्हीं में से 12 बच्चों ने साल 2009 की उसी तारीख को आखिरी सिरा जोड़ दिया. 11 से 14 साल के इन बच्चों ने कौन-सा सिरा, कहां से जोड़ा, यह जानना भी दिलचस्प होगा.

आपने दो सच को एक साथ और अलग-अलग देखा हैं \ यहां एक सच था- काम बेहद आसान है. दूसरा था- काम बेहद मुश्किल है. एक सच ‘कहने’ और दूसरा ‘करने’ से जुड़ा था. इसलिए एक सच ने दूसरे को बहुत दिनों तक दबाए रखा. लेकिन तीसरा सच भी था कि बच्चों का जज्बा किसी जज्बे से कम नहीं था. इस तीसरे सच ने दूसरे सच को अपने पाले में खीच लिया.

पहला सिरा
जनवरी 2008 की 26 तारीख पहला सिरा बना. इस रोज गंगानगर के लोग झण्डा ऊंचा करने के लिए एक हुए. लेकिन जिस खम्बे से तिरंगा फहराना था, वह टूट गया. लोग बिखर गए और बच्चों के दिल भी टूट गए.

14 साल की हेमलता नेताम ने याद किया- ”हमारी ‘बाल अधिकार समिति’ के सभी साथी ‘बाल अधिकार भवन’ में मिले. हमने अपनी बस्ती में तिरंगा फहराने की ठानी.” इस लिहाज से अगली और अहम तारीख थी 15 अगस्त. बच्चों की बैठक से दो बातें निकली. एक- बस्ती के बड़ों से चर्चा की जाए. दूसरा- अपने पार्षद को एक एप्लीकेशन दी जाए.

आखिरी सिरे के पहले
11 साल की पूजा भराडे ने याद किया- ”हमने काम को दूसरों पर छोड़ा और हार गए. हमें बड़ों के साथ एप्लीकेशन लिखनी और उन्हें लेकर आगे बढ़ना था. लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था. जब 15 अगस्त नजदीक आया तो लगा कि झण्डा सिर्फ दिलों में ही फहराकर रह जाएगा. सबकी आंखें 15 से हट गईं. हमारे दिल फिर टूट गए.” लेकिन 15 की तारीख हार और हिम्मत की तारीख बनी. अगर यह नहीं आती तो 26 जनवरी 2009 जीत की तारीख कैसे बनती!

15 अगस्त को वार्ड-12 की पार्षद मीनाताई बरडे ने तिरंगा फहराया. उनके भाषणों से बच्चों के दिलों में देशप्रेम की भावनाएं उमड़ती थीं. बच्चों ने आजादी के नारे लगाए. फिर सबके सामने मीनाताई से 26 जनवरी के पहले खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की मांग रखी.

देखते-देखते नए साल का सूरज उग गया. 12 साल की रोशनी ठाकरे ने याद किया- ”हमें भी अपनी जिद पकड़ी. 5 जनवरी को सारे फिर बैठे. यहां दो फैसले हुए. यह पिछले फैसलों से अलग थे. एक तो अपने हाथों से एप्लीकेशन बनाई. दूसरा खुद जाकर पार्षद से मिलने की सोची. यह काम हमें ही करने थे इसलिए पूरे हुए.”

13 साल के अक्षय नागेश्वर ने याद किया- ”हमने जिम्मेदारियां बांटी. 8 जनवरी को 12 बच्चे पार्षद के आफिस पहुंचे. लेकिन मीनाताई नहीं मिलीं. हम उदास हुए, निराश नहीं.” पार्षद से मिलने की दूसरी तारीख 11 जनवरी रखी गई. इस तारीख की सुबह 9 बजे बच्चे ऑफिस पहुंचे. मीनाताई फिर नहीं थीं. लेकिन मैनेजर ईश्वर बरडे मिल गए. बच्चों ने एप्लीकेशन उन्हें ही दे दी और उनसे मीनाताई का मोबाइल नंबर ले लिया.

बच्चों के अगले 10 दिन भी इंतजार में गुजरे. अब पानी सिर के ऊपर था. 21 जनवरी को ‘बाल अधिकार भवन’ में तीसरी बैठक रखनी पड़ी. यहां से बच्चे फिर मीनाताई के ऑफिस पहुंचे. इस बार संबंधित अधिकारी अशोक सिंह का नम्बर मिला. बच्चों ने अशोक सिंह से खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की अपनी पुरानी जिद दोहरायी. कुल मिलाकर बात आई और गई हो गई.

14 साल के मनीष सोनावने ने याद किया- ”26 जनवरी नजदीक आया. यह परीक्षा की घड़ी थी. हम फिर मीनाताई के ऑफिस में गए. वह फिर नहीं मिली. इसलिए उनके घर जाना पड़ा. मीनाताई ने जब हमारी परेशानियां सुनी तो सॉरी कहा. उन्होंने 26 जनवरी के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बनाने का वादा किया.”

सुबह की तस्वीर
मीनाताई के बातों से उत्साहित बच्चे घर लौटे. 26 जनवरी के एक रोज पहले बच्चे आगे आए. उन्होंने रात के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बना डाला. जो बच्चे आकाश से पंतगें तोड़कर अपनी छतों पर लहराना चाहते हैं उन्हीं में से 12 ने अपनी बस्ती में पहली बार तिंरगा फहराने की खुशी महसूस की थी. ‘बाल अधिकार समिति’ की नंदनी गायकबाड़ और उनके साथी नींव के खास पत्थर साबित हुए. नंदनी बोली- ”अगली सुबह तिरंगा आंखों के सामने लहरा उठा. अब यह खम्बा बच्चों के दृढ़ संकल्प और समपर्ण का प्रतीक है.”

जब कोई बच्चा पहली बार जूते के बंध बांधता है तो उसके चेहरे की खुशी देखती ही बनती है.एक रोज कुछ नन्हें हाथ मिले तो किसी ने न देखा. लेकिन जब छोटी-सी आशा हकीकत में बदली तो पूरे गंगानगर देखता रह गया.

‘बाल अधिकार भवन’ में बड़ा फासला मिटाने वाले छोटे-छोटे कदम एक साथ खड़े है. हेमलता नेताम, पूजा भराडे, अक्षय नागेश्वर, रोशनी ठाकरे और मनीष सोनावने को एक तस्वीर में कैद किया गया है. तकदीर से बनी यह तस्वीर अब इस कहानी का आखिरी सिरा है. हो सकता है यह अगली कहानी का पहला सिरा बन जाए!!

‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’
संचार विभाग, मुंबई
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