लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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uniform civil codeडा. राधेश्याम द्विवेदी
इस कानून का अर्थ:- भारत के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक (सिविल) कानून (विधि) से है। समान नागरिक संहिता एक सेक्युलर (पंथनिरपेक्ष) कानून होता है जो सभी धर्मों के लोगों के लिये समान रूप से लागू होता है। दूसरे शब्दों में, अलग-अलग धर्मों के लिये अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ का मूल भावना है। समान नागरिक कानून से अभिप्राय कानूनों के वैसे समूह से है जो देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी धर्म या क्षेत्र से संबंधित हों) पर लागू होता है। यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। ऐसे कानून विश्व के अधिकतर आधुनिक देशों में लागू हैं। समान नागरिकता कानून के अंतर्गत व्यक्तिगत स्तर,संपत्ति के अधिग्रहण और संचालन का अधिकार तथा विवाह, तलाक और गोद लेना आते हैं, समान नागरिकता कानून भारत के संबंध में है, जहां भारत का संविधान राज्य के नीति निर्देशक तत्व में सभी नागरिकों को समान नागरिकता कानून सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का मतलब ये है कि देश के हर नागरीक के लिए एक समान कोड होगा. शादी, तलाक और जमीन जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा. फिलहाल हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के तहत करते हैं. हालांकि इस तरह का कानून अभी तक लागू नहीं किया जा सका है।
इस कानून के लागू होने में दिक्कतें:- आखिर यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर क्या दिक्कतें हैं. कई लोगों का ये मानना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाने से देश में हिन्दू कानून लागू हो जाएगा. जबकि सच्चाई ये है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड एक ऐसा कानून होगा जो हर धर्म के लोगों के लिए बराबर होगा और उसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा.ऐसी भी बातें कही जाती हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाने के बाद लोगों की धार्मिक आज़ादी खत्म हो जाएगी. जबकि सच्चाई ये है कि समान नागरिक संहिता के लागू हो जाने के बाद लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता बाधित नहीं होगी बल्कि इसके लागू होने से सभी को एक समान नजरों से देखा जाएगा.
पर्सनल लॉ:- भारत में अधिकतर निजी कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध हिंदू विधि के अंतर्गत आते हैं, जबकि मुस्लिम और ईसाई के लिए अपने कानून हैं। मुस्लिमों का कानून शरीअतपरआधारित है; फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है जबकि हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं. फिलहाल हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी क़ानूनों के तहत करते हैं. मुस्लिम धर्म के लोगों के लिए इस देश में अलग कानून चलता है जो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ज़रिए लागू होता है. अन्य धार्मिक समुदायों के कानून भारतीय संसद के संविधान पर आधारित हैं।
अंग्रेजों के जमाने से इस कानून का इतिहास :- यह विवाद ब्रिटिशकाल से ही चला आ रहा है। अंग्रेज मुस्लिम समुदाय के निजी कानूनों में बदलाव कर उससे दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते थे। निजी कानूनों का ये विवाद अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है. उस दौर में अंग्रेज, मुस्लिम समुदाय के निजी कानूनों में बदलाव करके उनसे दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते थे. हालांकि विभिन्न महिला आंदोलन के कारण मुसलमानों के निजी कानूनों में थोड़ा बदलाव हुआ।प्रक्रिया की शुरुआत 1772 के हैस्टिंग्स योजना से हुई और अंत शरिअत कानून के लागू होने से हुई. हालांकि समान नागरिकता कानून उस वक्त कमजोर पड़ने लगा, जब तथाकथित सेक्यूलरों ने मुस्लिम तलाक और विवाह कानून को लागू कर दिया. 1929 में, जमियत-अल-उलेमा ने बाल विवाह रोकने के खिलाफ मुसलमानों को अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की. इस बड़े अवज्ञा आंदोलन का अंत उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गई। आजादी के बाद साल 1950 के दशक में हिन्दू कानून में तब्दीली की गई लेकिन दूसरे धर्मों के निजी कानूनों में कोई बदलाव नहीं हुआ.यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने में सबसे बड़ी समस्या ये है कि इसके लिए क़ानूनों में ढेर सारी तब्दीलियां करनी पड़ेंगी. दूसरी समस्या ये है कि तमाम राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग वजहों से इस मुद्दे पर बहस नहीं करना चाहती क्योंकि, ये उनके एजेंडे को सूट नहीं करता, जिसका नतीजा ये है कि देश चाहती क्योंकि, ये उनके एजेंडे को सूट नहीं करता, जिसका नतीजा ये है कि देश आज भी अलग-अलग कानूनों में में बंधा हुआ है.1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। इस कानून के कारण धर्मनिरपेक्ष और मुसलमानों के बीच खाई और गहरी हो गई। वहीं, कुछ मुसलमानों ने बदलाव का विरोध किया और दावा किया कि इससे देश में मुस्लिम संस्कृति ध्वस्त हो जाएगी.
योगी आदित्यनाथ के बोल:- जब योगी आदित्यनाथ बोलने लगे तो समान नागरिक संहिता के अलावा मुस्लिम महिलाओं पर भी बोले। उन्होंने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से मुस्लिम महिलाओं की हालत में काफी सुधार होगा। खासकर, तीन बार बोल कर तलाक लेने के मामले में। इसके अलावा भी कई फायदे होंगे इससे। गोरखपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान योगी ने कहा कि बहुत जरूरी है कि नागरिक संहिता लागू हो। मुस्लिम समुदाय की महिलाओं पर बोलते हुए योगी ने कहा कि नागरिक संहिता लागू होने से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधरेगी। वो अपने हक के लिए आवाज उठा सकती हैं। मुस्लिम समाज में जो तीन बार तलाक बोलने की जो परंपरा चली आ रही थी, उसकी समीक्षा की जो बात कही गई है, वो सराहनीय है।योगी ने कहा कि जिस तरह क्रिमिनल की एक संहिता होती है, ठीक उसी तरह समान संहिता यानि नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। जिससे जाति, लिंग, मजहब के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सके।
सरकार ने विधि आयोग से राय मांगी:- यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है. सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने पर कोई ठोस राय बनाने से पहले इसे विधि आयोग के पास भेजा है। कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने लॉ कमीशन को चिट्ठी लिखी है जिसमें यूनिफॉर्म सिविल कोड के बारे में स्टडी करके एक रिपोर्ट देने को कहा गया है. कानून मंत्री ने कहा है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड बीजेपी के एजेंडे में है और संसद के बाहर और अंदर इस बारे में चर्चा होती रहती है. इसलिए इस मुद्दे पर सरकार ने आगे बढ़ने का फैसला लिया है. सरकार समान नागरिक संहिता को लागू करने के पक्ष में है लेकिन इससे पहले वह इस मुद्दे पर सभी पक्षों से व्यापक बातचीत करना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार इस मुद्दे को लेकर सभी राजनीतिक दलों की एक बैठक भी करना चाहती है। विधि आयोग को यह निवेदन भेजे जाने का समय भी बहुत महत्वपूर्ण है, इस महीने के अंत में संसद का मॉनसून सत्र आरंभ हो रहा है और इस मुद्दे को लेकर दोनों सदनों में तीखी बहस हो सकती है। सरकार को इस मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा भी दायर करना है। अंग्रेजी अखबार इकनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, कानून मंत्री गौड़ा सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करने से पहले प्रधानमंत्री, अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों और कानून के बड़े अधिकारियों से इस पर मशवरा करेंगे. कानून मंत्री ने कहा है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड पर आम सहमति बनाने के लिए अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ बोर्डों और दूसरे स्टेक होल्डर्स यानी संबंधित पक्षों से व्यापक बातचीत की जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई:-सुप्रीम कोर्ट ‘तीन तलाक’ की संवैधानिक वैधता की जांच से जुड़ी याचिका की सुनवाई कर रहा है। इस मामले पर कोर्ट में अगली सुनवाई सितंबर में होगी। कानून मंत्रालय के एक सूत्र का कहना है कि सरकार अदालत में मामले को विधि आयोग को सौंपने की दलील देकर कुछ और वक्त मांग सकती है। गौड़ा ने शरद सत्र के दौरान राज्य सभा में कहा था, ‘यह सरकार का दायित्व है कि समान नागरिक संहिता को लागू करे लेकिन कोई भी फैसला सभी पक्षकारों से व्यापक चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।’ संवैधानिक वैधता के बारे में उन्होंने कहा था कि संविधान की धारा 44 के अंतर्गत समान नागरिक संहिता को लागू करना ‘राज्य का दायित्व’ था। गौड़ा ने आगे कहा था, ‘इस महत्वपूर्ण मामले की संवदेनशीलता को देखते हुए कहा जा सकता है कि कोई भी अगला कदम उठाने से पहले इससे जुड़े सभी पक्षों के साथ व्यापक चर्चा करना आवश्यक होगा।’ सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही साफ कर दिया था कि समान नागरिक संहिता को लागू करने की शुरुआत संसद के जरिये की जानी चाहिए न कि न्यायपालिका द्वारा।’

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