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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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 आलोका

केंद्र की यूपीए सरकार ने वर्ष 2010-11 के बजट में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के हितों के लिए विशेष ‘‘राष्‍ट्रीय सामाजिक कोश‘‘ बनाने के अपने वायदे को आखिरकार पूरा कर दिया। इसके तहत सरकार ने बुनकरों, रिक्‍शा चालकों और बीड़ी मजदूरों सहित असंगठित क्षेत्र के 43 करोड़ से अधिक श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए एक अरब रूपए के इस कोश के गठन और संचालन को मंजूरी दी। खास बात यह है कि इस कोश का संचालन श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय के तहत होगा। देखा जाए तो अभी तक असंगठित क्षेत्र के अधिकतर श्रमिकों के पास बुढ़ापे का सहारा बनने वाली बीमा, स्वास्थ्य देखभाल और पेंशन योजना जैसी कोई सुविधा नहीं थी।

देश में मजदूरों के कल्याण के लिए जो भी कानून मौजूद है, वह पर्याप्त नहीं है क्योंकि उसके दायरे में केवल संगठित मजदूर ही आते रहे हैं। परिणामस्वरूप असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को इससे कोई फायदा नहीं मिल पाता है। वास्तव में देश में श्रमिकों के दो वर्ग हैं एक संगठित वर्ग जिसके बारे में सरकार को पूरी जानकारी उपलब्ध है तथा उसके उत्थान के लिए कई स्तरों पर सरकारी योजनाएं मौजूद हैं, जिसका वह भरपूर लाभ उठा सकते हैं। संगठित होने की वजह से इस वर्ग के पास सरकार तक अपनी बात पहुंचाने की ताकत भी होती है। वहीं दूसरा वर्ग असंगठित मजदूरों का है जिसके पास न तो कोई सरकारी लाभ पहुंच पाता है और न ही वह दिल्ली तक अपनी आवाज पहुंचा सकता है।

देश के तकरीबन सभी राज्यों में असंगठित मजदूरों की एक बड़ी संख्या मौजूद है। सरकारी आकड़ों के अनुसार यह संख्या 43 करोड़ 30 लाख है। लेकिन सत्य यह है कि आकड़े और वास्तविकता में काफी अंतर है। अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड में असंगठित मजदूरों की संख्या लाखों में है। इसमें बीड़ी मजदूरों का एक बड़ा तबका शामिल है। इन मजदूरों का दुर्भाग्य यह है कि उनकी वास्तविक संख्या राज्य सरकार के पास नहीं है। उदाहरणस्वरूप राज्य के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग के अनुसार पाकुड़ जिले में मात्र 2589 बीड़ी मजदूर हैं जबकि इसी जिले में केंद्र सरकार द्वारा संचालित श्रमिक औशधालय में इसकी संख्या 4457 दर्ज है। कमोबेश यही स्थिति चतरा जिले की है। जहां केंद्र सरकार द्वारा संचालित स्थैतिक केंद्र में निबंधित बीड़ी मजदूरों की संख्या 6000 है जबकि राज्य सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग के पास यह आकड़ा मात्र 200 का है। राज्य के सभी जिलों में ऐसी ही स्थिती है। इनमें कोई भी आंकड़ा न तो राज्य, न केंद्र और न ही वास्तविकता से मेल खाता है। यही कारण है कि आजादी के 64 वर्षों के बाद भी इन बीड़ी मजदूरों की बदहाली में कोई कमी नहीं आई है। सरकार की इस उपेक्षा का फायदा बीड़ी उधोग में लगी कंपनियों ने भी खूब उठाया। न्यूनतम मजदूरी से भी कम पारिश्रमिक तथा शोषण-उत्पीड़न तो जैसे इन बीड़ी मजदूरों की जिंदगी बन चुकी है। झारखंड में बीड़ी उद्योग चलाने वाली लगभग सभी कंपनियां राज्य से बाहर की हैं। जो बिचौलियों और दलालों के माध्यम से अपना कारोबार चलाती हैं। कंपनियों का मजदूरों से सीधे तौर पर कोई सरोकार नहीं होने की वजह से इन्हें मिलने वाले लाभ को यही बिचौलिये और दलाल गटक जाते हैं। ऐसे में प्रष्न उठता है कि आजादी के पहले से जारी इस कारोबार के मजदूर अब तक संगठित क्यूं नहीं हो पाए हैं? इस सवाल के जवाब में ट्रेड यूनियन से जुड़े माणिक मिश्रा के अनुसार बीड़ी बनाने के काम में अधिकतर महिलाएं हैं। जो घर की आय को बढ़ाने के मकसद से इस व्यवसाय से जुड़ी हुईं हैं। इनमें अस्सी फीसद महिलाएं मुस्लिम परिवेश से हैं। जो पर्दानशीं होने के कारण घरों से बाहर नहीं निकल पाती हैं। ऐसे में संगठित करना काफी मुशकिल होता है। वहीं दूसरी तरफ अशिक्षा की वजह से यह महिलाएं तंबाकू से होने वाली खतरनाक प्रभाव से भी अनजान हैं और कई गंभीर बिमारियों से ग्रसित होती जा रही हैं।

श्रम मंत्रालय की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार श्रम शक्ति का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है। जो देश में कुल मजदूरों की संख्या का 93 प्रतिशत है। ये सकल घरेलू उत्पाद में 65 प्रतिशत जबकि राश्ट्रीय बचत में इनका योगदान 45 प्रतिशत है। यही कारण है कि श्रम मंत्रालय समय समय पर सभी तरह के मजदूरों की सुरक्षा के लिए एक समग्र कानून बनाने की बात करता रहा है। इसके अनुसार असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों के लिए भी पहचान पत्र, स्वास्थ्य सेवा, मातृत्व सुरक्षा और छोटे बच्चों की देख-रेख, प्रोविडेंट फंड का लाभ, आवास, पेयजल व सफाई संबंधी लाभ, रोजगार के दौरान लगी चोट के मुआवजे, अवकाश प्रप्ति व इसके बाद के लाभ, आय अर्जन की क्षमता न रहने की स्थिती में कुछ सुरक्षा, बंधक मजदूरी हटाने की स्कीम तथा अन्यायपूर्ण श्रम संबंध हटाने के प्रयास जैसे मुªद्दों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

बहरहाल देर से ही सही सरकार द्वारा बीड़ी मजदूरों के सामाजिक सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम सराहनीय है। लेकिन यह पहल तभी कामयाब मानी जाएगी जब इसका लाभ वास्तविक हकदारों को मिलेगा, अन्यथा इन बीड़ी मजदूरों की दशा ऐसे ही धुँए में उड़ती जाएगी। (चरखा फीचर्स) 

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