लेखक परिचय

ब्रह्मदीप अलुने

ब्रह्मदीप अलुने

.राजनीति विज्ञान एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध , शा. माधव कला, वाणिज्य एवं विधि महा. उज्जैन

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gandhi-jiप्रो.ब्रह्मदीप अलूने

नेहरू ने दिसम्बर 1928 मे कलकत्ता अधिवेशन मे कहां था , ‘‘बापू,मेरे और आपके मध्य अंतर यह है कि आप धीमी गति मे विश्वास करते है जबकि मेरा लक्ष्य क्रांति है ।’’ गांधी का व्यंग्यात्मक उत्तर था ,‘‘मेरे तरूण, मैने क्रांति को पैदा किया है ,जबकि अन्यों ने केवल उसका शोर मचाया है । जब तुम्हारे फेफड़ंे थक जायें और तुम सचमुच इसके लिए गंभीर हो तो मेरे पास आना तब मै तुम्हे दिखाउंगा की क्रांति कैसे होती है ।’’

1891 में गांधी जब दक्षिण अफ्रीका मे वकालत कर रहें थे तब रेलयात्रा के दौरान एक अंग्रेज यात्री ने उन्हे बहुत मारा , स्वयं गांधी के शब्दांे में,‘‘ उसने मेरी बाँह पकड़कर मुझे घसीटना शुरू किया। वह गोरा अधिकारी मुझे गालियां दे रहा था , खींच रहा था और मार भी रहा था । मेरी छाती धधक रही थी ,मैने निश्चय किया की चाहें जो हो जायें मैं इस गोरे के पैरों मे नहीं बैठूंगा ।’’ उस गोरे के अत्याचार से संतप्त मोहनदास करमचंद गांधी उठ खड़ा हुआ, वह अराजनीतिक था लेकिन आगे चलकर राजनीति की सारी इबारतें लिखी, खुद पर भरोसा इतना कि अहिंसा और सत्याग्रह को हथियार बनाकर अराजक होने से भी गुरेज़ नही किया ।

महात्मा गांधी मन,वचन और कर्म से विशुद्वतः भारतीय संस्कृति के उपासक थे । उन्हे भारती संस्कृति अपेक्षाकृत पाश्चात्य संस्कृति के श्रेष्ठतर प्रतीत हुई । इसी कारण उन्होने औद्योगीकरण को भारत के लिए उपयुक्त नहीं समझा और कुटीर उद्योगांे पर बल दिया । नेहरू की दृष्टि मे यह सब कुछ अराजनीतिक था ।

गांधीजी मानते थे कि आधुनिक सभ्यता पतन की राह पर ले जा रही है , जिसमें समूची राजनीतिक एवं औद्योगिक व्यवस्था राज्य के इर्द गिर्द दिखाई देती है। इसके साथ ही आधुनिक सभ्यता अहिंसा सें दुर हिंसा के करीब ,सत्य से दुर ,झुठ और फरेब के करीब , नैतिकता से दुर अनैतिकता के करीब तथा धर्म से दुर विलासिता एवं यंत्रीकरण जीवन का पर्याय है । इस प्रकार गांधीजी आधुनिक सभ्यता के घोर विरोधी हो गयें और जब कोई उनके राजनीतिक सहयोगी इससे इतर किसी विचार या काम को अंजाम देते थे तो गांधी उसका घोर विरोध कर अराजक हो जाते थे ।

जब जवाहरलाल नेहरू अपनी ब्रुसेल्स और सोवियत संघ की यात्रा से लौटे और उन्होने सामन्तवाद, पूंजीवाद , साम्राज्यवाद पर करारी चोटें की और कृषक एवं श्रमिकों को संगठित कियें जाने पर बल दिया तो गांधी को उनके ये समाजवादी प्रयास अरूचिकर लगे और उन्होने नेहरू को लिखा, ‘‘तुम बहुत तेज जा रहे हो।’’

नेहरू ने दिसम्बर 1928 मे कलकत्ता अधिवेशन मे कहां था , ‘‘बापू,मेरे और आपके मध्य अंतर यह है कि आप धीमी गति मे विश्वास करते है जबकि मेरा लक्ष्य क्रान्ति है ।’’ गांधी का व्यंग्यात्मक उत्तर था ,‘‘मेरे तरूण, मैने क्रांति को पैदा किया है ,जबकि अन्यों ने केवल उसका शोर मचाया है । जब तुम्हारे फेफड़ंे थक जायें और तुम सचमुच इसके लिए गंभीर हो तो मेरे पास आना तब मै तुम्हे दिखाउंगा की क्रांति कैसे होती है ।’’

फरवरी 1938 का हरिपुरा  कांग्रेस अधिवेशन सुभाषचन्द्र बोस के अध्यक्ष बनने को लेकर बहुत चर्चित रहा । राजनीतिक विचारधारा और लोकमत के सम्मान की दुहाई देने वाले गांधी के द्वारा सुभाषचन्द्र बोस के विरोध मे जो कुछ किया गया वह बेहद आश्चर्यजनक था । इससे गांधी की अराजनीतिक छविं को बड़ा नुकसान हुआ । गांधीजी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते थे , परन्तु उनके द्वारा मना किये जाने पर पण्डित जवाहरलाल नेहरू पर गांधीजी ने जोर डाला और उन्होने भी इनकार कर दिया । आचार्य नरेन्द्र देव का नाम भी कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए लिया गया, परन्तु वे इसके लिए राजी नही हुए । गांधी और उनके समर्थक समस्त दिग्गज शक्तियां सुभाष को परास्त करने मे जुट गई, किन्तु उस समय समस्त भारत आश्चर्यचकित रह गया जब राष्ट्र ने गांधी विरोध को दरकिनार कर सुभाषचन्द्र बोस को अध्यक्ष चुन लिया ,चुनाव मंे सुभाषचन्द्र बोस विजयी घोषित हुए ।  गांधीजी ने इसे सार्वजनिक रूप से अपनी व्यक्तिगत पराजय माना । नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस मे विकट समस्या उत्पन्न हो गई और अंततः 1939 मे सुभाषचन्द्र बोस ने इस्तीफा दे दिया ।इसके बावजूद गांधी ने सुभाषचन्द्र बोस को कभी स्वीकार नहीं किया और अंततः फाॅरवर्ड ब्लाॅक के जरिये सुभाषचन्द्र बोस अलग राह पर चल पड़े ।

गांधी को एक अंिहंसक युगपुरूष के रूप में जाना जाता है लेकिन गांधी की अहिंसा में भी विरोध या अराजकता के गुण मौजुद रहे । सन् 1920 मे हिन्द स्वराज मे उन्होने लिखा ,‘‘ मै पुर्णतः विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि जहाँ मुझे हिंसा और कायरता के बींच एक चीज को चुनना पड़ेगा तो मैं हिंसा को चुनुंगा ।मै एक जाति की नपंुसकता की अपेक्षा हजारों बार हिंसा का खतरा उठाने को तैयार हूँ ।’’

रामराज्य की कल्पना करने वालें गांधी ने राज्य को एक आवश्यक बुराई कहा । माक्र्सवादियों तथा अराजकतावादियों के समान गांधीजी एक राज्यविहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे । वे दार्शनिक , नैतिक, ऐतिहासिक व आर्थिक कारणों के आधार पर राज्य का विरोध करते थे , अतः उन्हे दार्शनिक अराजकतावादी भी कहा जाता है ।

अहिंसा और सत्याग्रह के पथ प्रदर्शक बनकर गांधी ने भारतीयों को एकता के सुत्र में बांधा , अंग्र्रेजी नीतियों का विरोध शांतिपुर्ण तरीकें से किया लेकिन जब भी गांधी के विचारों का अंग्रेजी सरकार ने विरोध किया या उन्हे दबाने की कोशिश की तो कभी असहयोग का ज्वार फुटा ,कभी सविनय क्रांति हुई और अंततः भारत छोड़ो के जरिये अंग्रेजी हुकुमत की चुलें हिला दी । स्पष्ट है कि गांधी एक ऐसे दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व के धनी थे जिन्हें हारना कभी पसंद नहीं था और गांधी की इसी जिद़ ने उन्हंे महान प्रणेता बना दिया ।

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1 Comment on "अराजनीतिक गांधी की अराजकता"

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mahendra gupta
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नेहरु क्रन्तिपसंद जरूर होंगे,पर उनके बाद के कृत्यों में उनकी झलक नहीं मिलती.उंका कहना मैं क्रांतिपसंद हूँ,सहज लगता है,पर क्रांति की भूमि एक ही दिन में कहने मात्र से नहीं बन जाती,बाद के परिवर्तनों को नेहरु व कांग्रेस ने झपट लिया पर वे क्या गांधीवादी स्वरुप दे सके?गाँधी की वैचारिक हत्या जितनी कांग्रेस ने कितनी बार की यह तो शायद वे भी नहीं जानते पर पर उस क्रांति के परिणामों का रस कितने साल तक चखा, व आगे कितने साल और चखेंगे ये जरूर जानते हैं.नेहरु जी का सपना अपने आप में कितना अदूरदर्शिता पूर्ण था यह तो उनकी पार्टी… Read more »
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