लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

उत्तर-प्रदेश विधान सभा चुनाव में जाति और धर्म के गठजोड़ की कोशिशों में इस बार ब्राह्मण अछूत हैं। जबकि 2007 के चुनाव में मायावती ब्राह्मण और दलित के जातीय प्रबंधन से ही सत्ता पर काबिज हुईं थीं। चुनाव परिणाम में सफलता मिलने के बाद चुनाव विश्लेषकों ने इसे ही ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का नाम देकर खूब डंका पीटा और इस कथित समीकरण का मायावती ने अखिल भारतीय आधार बनाने की चेष्टा की। मायावती को लगा इस जातीय समीकरण का जादू पूरे देश में बसपा का परचम फहरा देगा और वे हाथी पर सवार होकर दिल्ली की राजगद्दी हथिया लेंगी। इस मकसद पूर्ति के लिए उन्होंने इस नारे ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनमें मारो जूते चार’ से किनाराकशीं करके नारा लगाया ये ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है।’ किंतु वक्त की नजाकत के चलते ब्राह्मण न केवल हाशिये पर डाल दिए गए हैं, बल्कि उनके ‘मत’ की महत्ता का नोटिस कोई भी राजनीतिक दल नहीं ले रहा है। मसलन सभी दल उन्हें अछूत मानकर चल रहे हैं। लिहाजा उत्तर-प्रदेश के मतदाताओं में 12 फीसदी की हैसियत रखने वाले ब्राह्मणों की खामोशी किस करवट बैठने की उम्मीद की जाए, इस पर भी गौर करना जरूरी है।

उत्तर-प्रदेश में इस मर्तबा एक नया जातीय समीकरण, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी कथित रूप से सैद्धांतिकता का आधार बनता दिखाई दे रहा है। इसी बिना पर सभी दल सबसे ज्यादा मुसलमानों को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं। इनका मत प्रतिशत करीब 18 फीसदी है। इसीलिए मुलायम सिंह इन्हें संख्याबल के आधार 18 फीसदी सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की पैरवी कर रहे हैं। यदि धर्म या जाति के संख्याबल को आरक्षण का कानूनी आधार बनाया जाता है तो आबादी नियंत्रण के सभी उपाय व्यर्थ हो जाएंगे और सभी धर्मावलंबी व जाति के लोग अपनी ताकत दिखाने के लिए आबादी बढ़ाने में लग जाएंगे और फिर आबादी के अनुपात में सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी मांगेंगे

परंपरागत रूप से ब्राह्मण कभी भी जातिवाद का प्रखर पैरोकार नहीं रहा। लेकिन पिछले दो दशक से जिस तरह से वह राजनीति की बिसात पर उपेक्षा और बहिष्कार का दंश झेल रहा है, उसके चलते उसने भी ब्राह्मण एकता का राग अलापना शुरू कर दिया है। इस बिना पर ब्राह्मणों के राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर संगठन वजूद में आने लग गए हैं। भगवान परशुराम के रूप में जो ब्राह्मण तमाम ऐसे वर्गां और उपवर्गों में बंटे हुए थे, जिनमें परस्पर वैवाहिक बंधन निषेध थे, वे अब तेजी से टूट रहे हैं। लिहाजा परस्पर सभी वर्गों में शादियों का सिलसिला तेजी से चल निकला है। इस सब कि बावजूद ब्राह्मणों को राजनीति के धरातल पर ‘वोट बैंक’ के रूप में संगठित करना तराजू पर मेढ़कों को तौलने जैसा मुश्किल है।

उत्तर-प्रदेश की राजनीति के मौजूदा परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मणों को नजरअंदाज भले ही किया जा रहा हो, लेकिन यहां काबिलेगौर यह भी है कि जिस-जिस दल ने भी ब्राह्मणों से किनाराकशीं की वह उत्तर-प्रदेश की राजनीति के केंद्र में नहीं रहा। ब्राह्मणों को ठुकराए जाने का दंश कांग्रेस तो बीते दो दशक से भोग रही है। मुसलमानों पर अंधा दांव खेल रही कांग्रेस की उत्तर-प्रदेश में पिछले चुनावों की तुलना में बढ़त की उम्मीद तो सभी चुनाव पूर्व सर्वे और विश्लेषक कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस अकेली सरकार बना लेगी यह दावा अब तक किसी ने नहीं किया। जबकि ब्राह्मण कांग्रेस का 40 साल तक प्रतिबद्ध वोट रहा है और उसका 12 से 15 फीसदी वोट बैंक भी है। किंतु कांग्रेस इसे नहीं रिझा रही है।

उत्तर-प्रदेश में जातीय आधार पर मत विभाजन की शुरूआत मण्डल कमीशन को लागू करने से उपजे विवाद की देन है। इस वजह स सवर्ण और पिछड़ों में एक स्पष्ट विभाजक रेखा सामने आई। इसी दौरान उग्र हुए मंदिर-मस्जिद विवाद ने मतों का विभाजन हिन्दू और मुसलमानों के बीच किया। कांग्रेस से रूठे पिछड़े और मुसलमानों को जाति और मजहब के आधार पर दोहन की प्रच्छन्न शुरूआत कथित समाजवादियों ने की। जिसका सबसे ज्यादा लाभ मुलायम सिंह ने उत्तर-प्रदेश में उठाया। लेकिन चुनाव में धर्म और जातीय विभाजन का खुले इस्तेमाल की शुरूआत मंचों से मायावती ने की। उन्होंने जाति और धर्म की बुनियाद पर उम्मीदवार तो खड़े किए ही, अपने भाषणों में यह भी उल्लेख किया कि किस जाति और किस धर्म के लोगों को कितने टिकट दिए हैं। तब से प्रदेश में राजनीति की धुरी जाति हो गई। और राजनीतिक दलों के बौद्धिक तबके ऐसे जातीय समीकरणों के अनुसंधान में लग गऐ जिनके बूते सत्ता हासिल की जा सके। क्योंकि प्रदेश की लगभग 90 फीसदी सीटों पर जातियों का धु्रवीकरण ही विजयश्री का तिलक रचता है। मजहब (मुसलमान) और जाति (यादव) के इसी गठजोड़ की बुनियाद पर पहली बार मुलायम सिंह ने 1989 में सत्ता का सिंहासन हासिल किया। तब से लेकर अब तक सत्ता का तिलिस्म इन्हीं सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है और इन्हें साधने के लिए दल वे सभी हथकंडे अपनाते हैं, जिनके चलते इस समीकरण का रूख उनकी ओर मुड़ जाए।

राजनीति की बिसात पर उलटफेर का माहौल रचने में माहिर ब्राह्मण उत्तर-प्रदेश में कमोबेश खामोश है। मायावती समेत यह चिंता सभी दल-प्रमुखों को सता रही है। 2007 में बहुजन के हाथी पर ब्राह्मणों की भागीदारी से ही सर्वजनों ने सवार होकर सोशल इंजीनियरिंग के नारे को सार्थकता दी थी। लेकिन मायावती के दायां हाथ होने के बावजूद सतीश मिश्रा ब्राह्मणों को तो कुछ कारगर कर ही नहीं पाए, अवसर मिलने के बावजूद वे ब्राह्मणों के सर्वमान्य नेता भी नहीं बन पाए। मायावती ने आर्थिक आधार पर ब्राह्मणों को आरक्षण देने का वादा मंचों से कई मर्तबा दोहराया तो जरूर, किंतु इस दिशा में कोई कानूनी पहल नहीं की ? ब्राह्मणों को अन्य समाज कल्याण की योजनाओं से जोड़ने की भी दरकार थी, लेकिन कोई लाभ नहीं दिया गया। नतीजतन अब प्रदेश का 12 से 15 फीसदी मतदाता मायावती के कथित सोशल इंजीनियरिंग के चक्रव्यूह से स्वतंत्र है। मायावती ने भी ब्राह्मणों की इस मंशा को ताड़ लिया है, इसलिए अब उनका जोर पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों की ओर है। लेकिन बसपा इस मकसद में कितनी कामयाबी हासिल कर पाती है यह तो नतीजे घोषित हो जाने के बाद ही तय होगा।

मुलायम सिंह यादव आज भले ही ब्राह्मणों से परहेज करते हुए मुस्लिमों की चिरौरी करने में अतिवाद की भूमिका में आ गए हों, किंतु 2004 में मुलायम ने ब्राह्मणों की पूछ-परख की तो सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की और मुख्यमंत्री बने। इसके पहले प्रदेश में मंदिर निर्माण के उभार के चलते ब्राह्मणों ने भाजपा को दो मर्तबा सबसे ज्यादा सीटें दिलाईं और कल्याण सिंह व राजनाथ सिंह के नेतृत्व में गठजोड़ सरकारें बनीं। लेकिन ये गठजोड़ सरकारें तालमेल में कमी के चलते अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं। नतीजतन विधानसभाएं भंग हुईं और नए चुनाव के हालात पैदा हुए।

इस चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं ने अपने पारंपरिक घर कांग्रेस की ओर लौटने का रूख किया था। लेकिन कांग्रेस ने प्रदेश में जिस तरह से खुलकर मुस्लिम कार्ड खेलने की शुरूआत की, उससे ब्राह्मण स्तब्ध हैं। नतीजतन वह कश्मकश व असमंजस के ऐसे चौराहे पर खड़ा है कि उसे स्पष्ट कुछ सूझ नहीं रहा। लिहाजा वह भ्रम में है। भ्रम के चलते ब्राह्मण वोटों का विभाजन भी तय है। इस विभाजन का ही नतीजा होगा कि उत्तर-प्रदेश में स्पष्ट बहुमत किसी भी दल को मिलने नहीं जा रहा है। नतीजतन मिली-जुली सरकार वजूद में आएगी, जो कालांतर में मध्यावधि चुनाव का कारण बनेगी।

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