लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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अखिलेश के दावों के विपरीत है उत्तर प्रदेश का राजनैतिक इतिहास
संजय सक्सेन

उत्तर प्रदेश की 16 वीं विधान सभा का कार्यकाल खत्म होने के करीब है।चुनाव में साल-सवा साल का समय बचा है,यह समय राजनीति के हिसाब से कम माना जाता है।बिहार चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में गहमागहमी बढ़ना ही थी। सभी दलों के नेता ताल ठोंक रहे हैं। सीएम अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं कि उनकी सरकार ने विकास पर विशेष ध्यान दिया है। इस लिये 2017 में भी जीत का सेहरा उनकी ही पार्टी के सिर बंधेगा।अखिलेश के लिये ऐसा सोचना गलत भी नहीं है।आखिर वह समाजवादी पार्टी और सरकार के ‘सेनापति’ हैं।सेनापति कभी हथियार नहीं डालता है।यह हकीकत है,लेकिन सच्चाई यह भी है कि उत्तर प्रदेश की जनता बदलाव पसंद है।वह एक बार जिस नेता और दल को कुर्सी पर बैठाती है, दूसरी बार उससे कुर्सी छीन भी लेती है।यूपी देश का अकेला ऐसा राज्य होगा,जहां कोई भी नेता लगातार दो बार सीएम नहीं बन पाया। 1952 पहली विधान सभा से आज तक यह सिलसिला जारी है।(एक बार अपवाद को छोड़कर जब मायावती 12 वीं और 13वीं विधान सभा में क्रमशः 137 और 184 दिनों के लिये दो बार सीएम बनी थीं।तब भी माया के दो बार सीएम बनने के बीच करीब डेढ़ वर्षो तक राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा था।)इतिहास इस बात का गवाह है।अगर इतिहास के आधार पर कहा जाये तो अखिलेश की वापसी मुश्किल दिखती है,लेकिन सच्चाई यह भी है कि राजनीति में जो आज तक नहीं हुआ वह आगे भी नहीं होगा।इसकी कोई गारंटी नहीं है।भारतीय राजनीति उसमें भी यूपी की सियासत किसी निर्धारित पैरामीटर पर नहीं चलती है।अखिलेश युवा हैं।काम भी कर रहे हैं।अब सुपर सीएम जैसी बात भी खत्म हो गई है।चाहें सही हो या फिर गलत अखिलेश बिना दबाव के फैसले ले रहे हैं। 2017 में समाजवादी पार्टी किस रणनीति के साथ मैदान में उतरेगी,इसकी रूपरेखा दिखाई पड़ने लगी है।सपा नेताओं की तरफ से चुनावी मोर्चेपर विकास की बात होगी तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जातिवाद का भी खाका तैयार किया जायेगा।
यह सच है कि बिहार में भाजपा को मिली करारी हार के बाद यूपी में भी सियासी माहौल बदला है।लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में ‘लीड’ लेती दिख रही भारतीय जनता पार्टी बिहार के नतीजों के बाद बैकफुट पर है। बिहार में किरकिरी के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यूपी को लेकर रणनीति बदल दी है। बिहार में नीतीश कुमार का विकास और बाहरी बनाम बिहारी का नारा सफल रहा। यूपी में ऐसे नारे और बातें खोखली साबित हों इसके लिये बीजेपी आलाकमान स्थानीय लीडरशीप को भी तवज्जो दे रहे हैं।इसके अलावा भाजपाई अभी से अखिलेश सरकार को विकास और कानून व्यवस्था के मुद्दे पर घेरने में जुट गये है। धरना-प्रदर्शन करके अखिलेश सरकार की नाकामी का ढिंढोरा पीटा जा रहा है।कानून व्यवस्था के मसले सपा सरकार की फजीहत की जा रही है तो आजम के बहाने बीजेपी वाले वोटों के धुू्रवीकरण का भी प्रयास हो रहा है।बीजेपी नेताओं की तरफ से बाबा साहब अम्बेडकर को अपना बनाकर लोगों लोगों के दिमाग में यह बात बैठाने की कोशिश की जा रही है कि भाजपा को सिर्फ ब्राह्मणों-सवर्णों की पार्टी न माना जाये।इसके अलावा बीजेपी आलाकमान द्वारा समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव को कभी अपने करीब औिर कभी दूर दिखाकर सपा के प्रति मुस्लिम वोटों में संशय पैदा किया जाना भी इसी कड़ी का हिस्सा है। भाजपा रणनीति के तहत यह सब कर रही है तो सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने बिहार में जिस तरह से महागठबंधन से दूरी बनाई उससे भी समाजवादी पार्टी का वोटर आश्ंाकित नजर आ रहा है।
बीजेपी ही नहीं बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी मुस्लिम वोटरों के बीच सपा को लेकर आश्ंाका के बीज बो रही हैं।सपा और भाजपा वाले मिले हुए हैं,यह बात साबित करने का माया कोई भी मौका नहीं छोड़ती हैं।बसपा सुप्रीमों के चलते ही केन्द्र और राज्य के संबंधों में भी मजबूती नहीं आ रही है।इसका ताजा उदाहरण है जीएसटी बिल पर समाजवादी पार्टी के विरोधी तेवर।मायावती ने जैसे ही जीएसटी के समर्थन की बात कही सीएम अखिलश्ेा यादव ने जीएसटी का विरोध शुरू कर दिया। बात बिहार से इत्तर उत्तर प्रदेश से की कि जाये तो बिहार का पड़ोसी राज्य होने के बाद भी यूपी और बिहार की राजनीति में जमीन-आसमान का फर्क है।बिहार में जहां कांगे्रस, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल युनाइटेड भारतीय जनता पार्टी को अपना दुश्मन नंबर वन मान कर चल रहे थे,वहीं यूपी में सपा को भाजपा के मुकाबले कांगे्रस से अधिक एलर्जी है।मुलायम कई बार इस बात का अहसास भी करा चुके हैं। इसी वजह से अपने ही दल के नेताओं की ओर से महागठबंधन की हवा बनाने के बाद सपा नेतृत्व की ओर से यह स्पष्ट करने में देरी नहीं की गई कि सपा अपने पांच साल के कामकाज के बूते पर चुनाव जीतेगी।उसे किसी का भी सहारा नहीं चाहिए है। लेकिन सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या समाजवादी पार्टी सचमुच ऐसी मजबूत स्थिति में है कि वह अकेले अपने दम पर दोबारा सत्ता में वापसी का ख्वाब देख सकती है?
कई बार ऐसा लगता है कि अपने प्रचार तंत्र की कामयाबी और चुनावी प्रबंधन को लेकर सपा उसी तरह की गलतफहमी की शिकार हो रही है जैसी गलतफहमी बिहार चुनाव के दौरान भाजपा नेतृत्व को हो गई थी। बिहार चुनाव में ऊपरी तौर पर न उसका प्रचार तंत्र कमजोर नजर आ रहा था न ही चुनावी प्रबंधन ढीला दिखा, लेकिन नतीजा कुछ और आया। बिहार चुनाव में बीजेपी के सारे दांव उलटे पड़े। महागठबंधन ने बेहद चालाकी और सियासी सूझबूझ से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर दिये बयान,असहिष्णुता,अखलाक हत्याकांडद्व बाहरी बनाम बिहारी जैसे मुद्दों को हवा देकर वोटरों को अपने पक्ष में कर लिया।चुनावी रण में किसी की भी नेता और दल की जीत-हार केवल उसकी अपनी ताकत नहीं बल्कि विरोधियों की क्षमता, रणनीति पर भी निर्भर होती है।
सपा की सबसे बड़ी चुनौती है अपने सियासी दुश्मन की पहचान करना। उसके रणनीतिकारों के सामने साफ होना चाहिए उसका दुश्मन नंबर वन कौन है? 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी सत्तारूढ़ बसपा के खिलाफ हुंकार भर रही थी।मायावती सरकार का शासनकाल ज्यादा खराब नहीं रहा था।मायावती सरकार के कुछ मंत्रियों पर जरूर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे,लेकिन माया का दामन साफ था।वह उन मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहीं थीं जो भ्रष्टाचार से घिरे हुए थे।माया राज में फैसले जात-पात से ऊपर उठकर लिये जा रहे थे,लेकिन यह बात बसपा सुप्रीमों मायावती और उनके नेता जनता को समझा नहीं पाये। उधर,तत्कालीन बसपा सरकार पर सटीक हमले के लिये समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह सारे हथकंडे अपना रहे थे,इसके बाद भी चुनाव में अपने आप को पिछड़ता देख ने मुलायम ने अपना तरूप का इक्का ‘अखिलेश यादव’ चल दिया।अखिलेश को आगे करने की वजह थी,मायावती तमाम चुनावी सभाओं में एक ही बात दोहरा रही थीं कि प्रदेश में अगर समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी तो फिर से गुंडा राज आ जायेगा।इसी भ्रम को तोड़ने के लिये सपा प्रमुख को अखिलेश को आगे करना पड़ा था।अखिलेश ने चिल्ला-चिल्ला कर कहा की समाजवादी सरकार बनी तो गंुडों की जगह जेल में होगी। हुआ क्या यह अलग बात है,लेकिन उस समय तो जनता ने युवा अखिलेश की बातों पर विश्वास किया ही था।अखिलेश की बातों से लोगों को लगा कि सपा ही बसपा के भ्रष्टाचार से प्रदेश को मुक्ति दिला सकती है। 2007 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2012 में सपा के मात्र पांच फीसदी अधिक वोट मिले थे, फिर भी उसने(सपा) यूपी के अपने इतिहास की सबसे बड़ी जीत हासिल कर ली। 2017 के चुनाव में जाने से पहले सपा को अपने दुश्मन नंबर वन की न केवल शिनाख्त कर लेनी होनी, बल्कि उसके खिलाफ हल्ला बोल का एलान भी कर देना होगा। सत्ता में आने के बाद से सपा विधानसभा में प्रमुख विपक्षी दल बसपा के बजाय भाजपा को ही दुश्मन नंबर वन की अहमियत देती दिखी। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि 2014 के चुनाव में उसका मुकाबला भाजपा से होना था। लेकिन बिहार चुनाव से ऐन पहले पार्टी भाजपा को लेकर नरम दिखने लगी है।उसे लगने लगा है कि कहीं बसपा फिर से छुपा रूस्तम न साबित हो जाये।वैसे भी पिछले दो दशकों से लड़ाई बसपा-सपा के बीच ही होती रही है।बीते दिनों राज्यसभा में गरीब सवर्णाें को आरक्षण देने की मांग करके बसपा सुप्रीमों ने अपने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को धार देना शुरू कर दिया है।मायावती के बयानों से ऐसा लगता है कि अबकी बसपा एक बार फिर ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ के नारे के साथ ही मैदान में कूदेगी।माया की तरह ओवैसी भी सपा के लिये चुनौती बन सकते हैं जो 2017 के विधान सभा चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं।
अगर नजर इस बात पर दौड़ाई जाये कि उत्तर प्रदेशम में 2017 में क्या होगा? क्या यूपी में महागठबंधन बन सकता है ?तो पता चलता है कि बसपा ऐसा दल है जिसने सबका साथ लिया-दिया,जबकि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त कांगे्रस-भाजपा ने कभी भी एक-दूसरे से हाथ नहीं मिलाया।वहीं चैधरी चरण सिंह के पुत्र और राष्ट्रीय लोकदल के नेता चैधरी अजित सिंह ने हमेशा सत्ता की राजनीति की।2012 में पीस पार्टी,उलेमा काउंसिल,जनतांत्रिक मोर्चा,कौमी एकता दल,शिवसेना,हिन्दू सेना जैसे छोटे-छोटे दल भी ताल ठोंकते मिले थे,लेकिन 2017 इनके लिये सुखद नही लग रहा है।वोटर समझ गये हैं कि इन दलों की स्थिति वोट नुचवा से अधिक नहीं है।अपना दल जरूर भाजपा के साथ लोकसभा की तरह विधान सभा चुनाव में भी खड़ा नजर आ सकता है।
बहरहाल,समाजवादी पार्टी जीत के सपने देख रही है। यह अच्छी बात है। वह ऐसा इस लिये सोच भी सकती है क्योंकि उसने जनता से किये कई वायदे पूरे किये है, लेकिन उसके समाने जो चुनौती हैं उसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है।राजभवन से लगातार टकराव,प्रोन्नति में आरक्षण विवाद,आजम खान के विवादित बोल,प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था,समाजवादी नेताओं की गुंडागर्दी,केन्द्र-राज्य के बीच संबंध में खटास, किसानों की दुर्दशा,गन्ना किसानों की समस्या,बुंदेलखंड की तरफ से सरकार की अनदेखी,ईमानदार सरकारी अधिकारियों को सत्ता पक्ष द्वारा प्रताडि़त करना,नोयडा अथार्रिटी की मुख्य अभियंता यादव सिंह का प्रकरण,मंत्री प्रजापति का भ्रष्टाचार,प्रदेश में बढ़ता साम्प्रदायिक तनाव,पंचायत चुनाव की हिंसा आदि कई ऐसे मसले हैं जिसको लेकर वोटरों में अखिलेश सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती ही जा रही है। इस ओर भी सपा नेताओं को ध्यान देना होगा।समाजवादी पार्टी को इस लिये भी चैकन्ना रहना होगा क्योंकि पंचायत चुनावों में राज्य के कुछ हिस्सों में उसे भारी झटका लगा था। पार्टी के मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं के कई रिश्तेदार चुनाव हार गये थे। मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने इन चुनावों में प्रभावशाली प्रदर्शन कर सबको चैंका दिया। जिला पंचायत चुनावों में पार्टी समर्थित अधिकांश उम्मीदवार जीत गये। पंचायत चुनाव किसी पार्टी के चुनाव निशान पर नहीं लड़े जाते लेकिन पार्टियां उम्मीदवारों को अपना समर्थन देती रहती हैं।
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उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है।करीब 21 करोड़ की आबादी वाले यूपी में वर्ष 1967 तक एक आंग्ल भारतीय सदस्य को सम्मिलित करते हुए विधान सभा की कुल सदस्य संख्या 431 थी। वर्ष 1967 के पश्चात् विधान सभा की कुल सदस्य संख्या 426 हो गई। 9 नवम्बर 2000 को उ०प्र० राज्य के पुनर्गठन एवं उत्तराखण्ड के गठन के पश्चात् विधान सभा की सदस्य संख्या 403 निर्वाचित एवं एक आंग्ल भारतीय समुदाय के मनोनीत सदस्य को सम्मिलित करते हुए कुल 404 हो गई है। विधान सभा का कार्यकाल कुल 5 वर्ष का होता है यदि वह इसके पूर्व विघटित न हो गई हो। प्रथम विधान सभा का गठन 8 मार्च 1952 को हुआ था। तब से इसका गठन सोलह बार हो चुका है। वर्तमान सोलहवीं विधान सभा का गठन 8 मार्च 2012 को हुआ। यहां विधान सभा के सदस्यों की संख्या 100 है।
करीब 02 लाख 41 हजार वर्ग किलोमीटर मंे फैले यूपी से 80 लोकसभा के और 31 राज्यसभा के सदस्य चुने जाते हैं। देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में 1989 तक कांगे्रस का एक छत्र राज रहा। सिवाये 1967 और 1977 के। 1967 में चैथी विधान सभा में कांगे्रस नेता सीबी गुप्ता मुख्यमंत्री थे और चैधरी चरण सिंह उनके साथ।चैधरी चरण सिंह और सीबी गुप्ता के बीच किसी इतना मनमुटाव बढ़ गया कि जब सीबी गुप्ता अपनी सरकार का बहुमत साबित कर रहे थे, तभी विधान सभा में ही चैधरी चरण सिंह ने बगावत करके अपने समर्थकों साथ पाल बदल लिया और भारतीय कांति दल का गठन किया।सीबी गुप्ता सरकार गिर गई।बाद में संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी और चैधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री।इस सरकार में जनसंघ,सोशलिस्ट पार्टी,निर्दलीय सभी विधायक शामिल थे।यानी भेड़ और शेर एक ही घाट पर पानी पीते दिखे।यह सरकार ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाई। इसी प्रकार 1977 में इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी की लहर में उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव को पहली बार पूरी तरह से गैर कांगे्रसी मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य मिला। कांगे्रस ने लम्बे समय तक दलित-ब्राहमण और मुंस्लिम वोट बैंक के सहारे पूरे देश के साथ-साथ यूपी में भी राज किया था,लेकिन 1989 के बाद उत्तर प्रदेश में कांगे्रस का सूरज अस्तांचल की ओर चल दिया। 1989 में नारायण दत्त तिवारी हटे तो फिर कांगे्रस की कभी वापसी नहीं हो पाई। प्रदेश मंडल-कमंडल की राजनीति में घिर गया। भाजपा और सपा-बसपा जैसे दलों का यूपी में प्रभाव बढ़ने लगा,लेकिन पिछले दो दशकों से बसपा और सपा के बीच ही मुकाबला दिखाई दे रहा था,भाजपा भी पिछड़ गई थी।यूपी में कांगे्रस के कमजोर पड़ते ही दिल्ली में भी कांगे्रस के पैर कभी मजबूती से नही ंजम पाये।वह लगातार बैसाखियों के सहारे चलने को मजबूर रही।
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किसने क्या कहा-
उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं कि समाजवादी सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है।जनता अब बदलाव चाहती है। हमें जनता के साथ-साथ संगठन और कार्यकर्ताओं की ताकत पर भरोसा है। बाजपेयी ने कहा कि कानून व्यवस्था समेत कई मोर्चों पर विफल साबित हुई सूबे की समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार अब जन आंदोलन को दबाने के लिए पुलिसिया कार्रवाई कर रही है। यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है, जिसे प्रदेश की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी तथा आगामी विधानसभा चुनाव सबक सिखाएगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की नामाकियों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले भाजपा के जन प्रतिनिधियों को बेवजह हिरासत में लेकर परेशान किया जा रहा है। सरकार का यह व्यवहार लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या का कहना था उनकी पार्टी यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस,भाजपा और ओवैसी ब्रदर्स की पार्टी आईएमआई के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं करेगी। मौर्य का कहना था कि उनकी पार्टी यूपी विधानसभा चुनाव में सपा सरकार के गुंडाराज और बीजेपी के दंगा राज को मुद्दा बनाएगी और खुद को अकेले ही सबसे मजबूत विकल्प के तौर पर पेश करेगी।बसपा नेता ने कहा कि दंगा राज और गुंडाराज के जवाब में उनकी पार्टी कानून के राज के नारे के साथ मैदान में उतरने को तैयार है। उन्होंने कांग्रेस और एमईएएम का मजाक उड़ाते हुए कहा कि कांग्रेस का यूपी में जनाजा निकल चुका है और उसे ढूंढें से भी कार्यकत्र्ता नहीं मिलते तो वहीं ओवैसी की पार्टी की यूपी में कोई पहचान नहीं है।
यूपी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डॉ निर्मल खत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता ने दिल्ली के बाद बिहार में भी उन्हें रिजेक्ट कर दिया। मोदी पर आरोप लगाते हुए निर्मल खत्री ने कहा कि जनता मिलजुल कर रहना चाहती है लेकिन ये नियत मोदी में दिखाई नहीं देती।बिहार के बाद यूपी में भी भाजपा को करारी हार के लिये तैयार रहना चाहिए।खत्री ने सपा-बसपा को भी चेताते हुए कहा कि जिस तरह से इन दोनों पार्टियों ने बिहार में भाजपा को जिताने के लिए षड्तंत्र रचा उन्हें अब सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि यूपी में इनका भी वही हश्र होगा जो भाजपा का बिहार में हुआ है।दिल्ली कांगे्रस की तरफ से तो महागठबंधन पर कोई साफ संकेत नहीं आये हैं लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री निजी तौर पर किसी भी ऐसे गठजोड़ में कांग्रेस के शामिल होने के खिलाफ हैं, जिसमें सपा या बसपा होंगे।उनका आरोप है कि दोनों पार्टियां भाजपा की साथी हैं। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के फिलहाल 28 विधायक हैं। खत्री अपनी पार्टी के विधायक अजय राय पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगाने से भी नाराज दिखे। अजय राय के खिलाफ कार्रवाई से खफा कांग्रेस विधायकों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलने का वक्त मांगा था। लेकिन सीएम ने वक्त नहीं दिया।

 

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1 Comment on "यूपी किसी को लगातार दो बार सीएम नहीं बनाता !"

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डॉ. धनाकर ठाकुर
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भाजपा को स्वच्छ छवि के सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार देने छाहिये – बिना गठबंधन किसी से किये , तभी जनता उसे सर्कार बनाने का अवसर देगी – जाती से जाती काटने की बात भूल छोटी लकीर के सामने बड़ी लकीर खींचे तभी अखिलेश दुबारा नही बनेगे ना मया आ पायेगी

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