लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’

भाजपा, सपा, कांग्रेस सहित देश के तमाम राजनीतिक दलो द्वारा अपने अपने चुनावी घोषणा पत्र जारी कर दिये गये है। देश के सभी राजनीतिक दलो द्वारा सिर्फ और सिर्फ युवाओ पर ध्यान और युवाओ को लैपटॉप, टैबलेट, साईकिले आदि देने की कई योजनाओ से रिझाया भी गया है। देश में इस बार चुनावो में युवाओ की बात होना स्वाभाविक है क्यो कि राहुल, अखिलेश, और छोटे चौधरी जयंत जो इस बार अपने अपने दलो की कमान थामे है। युवाओ की बात होनी चाहिये ये बहुत अच्छी बात है, क्योकि आने वाले वक्त में इन्हे ही पड़ोसी देशो और देश में होने वाली तमाम समस्याओ से इन्ही को तो मुकाबला करना है। लेकिन इन सब के बीच आज के समाज, सामाजिक बुराईयो, आम आदमी की बुनियादी जरूरतो को, प्राकृतिक आपदाओ को नजर अंदाज करने के साथ ही विशेष रूप से देश के बुजुर्ग को भूलने की भूल करना शायद देश और राजनीतिक दलो को आने वाले समय में भारी पड सकता है। यू तो वृद्धजनो के हितो के लिये 1999 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय नीति की घोषणा की थी। लेकिन आज तक किसी राज्य ने इस ओर उल्लेखनीय कार्य नही किया। केन्द्र द्वारा 2007 में जारी किया गया भरण पोषण अधिनियम भी देश के तीन राज्यो में ही लागू है। इंद्रिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्ध आयु पेंशन योजना भी आज हर राज्य में लागू नही है। उत्तर प्रदेश में चल रही वृद्धाव्यवस्था पेशन योजना भी भ्रष्टाचार में इस कदर डूब चुकी है कि सरकारी बाबू वृद्धजनो से ज्यादा इस योजना का लाभ खूब उठा रहे है।

आज देश के हालात ऐसे है कि शहरो में हजारो बुजुर्ग आज भी भूखे खुले आसमान के नीचे सोते है। कितने बीमार है ये बताने की जरूरत नही इस उम्र में बेसहारो को छोडिये जो अपने बच्चो के साथ रहते है उन में से भी लगभग 80 प्रतिशत लोगो को दवाईयो, और उन की उम्र के हिसाब से क्लौरी युक्त ठीक से भोजन नसीब नही होता। रोगी काया, सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा का अभाव, असुरक्षित और एकांकी जीवन आज ये ही हमारे देश के बुजुर्ग का नसीब बन गया है। ऐसे में राजतीतिक अपेक्षा किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्रो में इन बुजुर्ग का जिक्र या किसी प्रकार की कोई योजना न होना वास्तव में काफी गम्भीर मुद्दा नजर आता है। अब तक क्योकी सभी राजनीतिक पार्टियो के घोषणा पत्रो के रूप में तीर उन के तरकश से निकल चुके है, देश की एक मात्र बहुजन समाज पार्टी में घोषणा पत्र जारी करने की परम्परा नही है तो हम नही कह सकते की वो ही देश के बुजुर्ग के बारे में सोचे, पर ये नही हो सकता। क्यो कि बसपा सुप्रीमो की सोच दलित से आगे अभी तक नही निकल पाई है। देश के सारे के सारे राजनीतिक दलो की निगाहे इस वक्त उत्तर प्रदेश पर जमी है पर तकरीबन 20 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश की समस्याओ और इस प्रदेश के आम आदमी की समस्याओ के प्रति अभी तक कोई भी राजनीतिक दल और राजनेता चिंतित नही दिखाई दे रहा है। एक बार फिर से प्रदेश को सवर्ण, मुस्लिम, दलित, पिछडा, और अति पिछडा वर्ग में बांट दिया गया है, वही भाजपा ने फिर से दफन हो चुके राम मंदिर के मुद्दे को पिटारे से बाहर निकाल कर प्रदेश के हिंदुओ में मुसलमानो के प्रति जहर भरना शुरू कर दिया है। काग्रेस मुसलमानो को लुभाने क लिये अति पिछडे मुसलमानो को ओबीसी कोटे में आरक्षण देने का वादा कर रही है, तो समाजवादी पार्टी युवाओ पर डोरे डालने के इरादे से इन्टर पास छात्रो को टैबलेट और लैपटॉप, स्कूली छात्राओ को साईकिल, रिक्षा चालको को मुफ्त में सोलर रिक्शे देने के वादे कर रही है।

आज देश की राजनीतिक पार्टियो की सोच और उन के इन चुनावी घोषणा पत्रो को देखकर मुझे हैरत हो रही कि जिस प्रदेश में किसान दाने दाने को मोहताज होकर आत्माहत्या तक करने पर मजबूर हो गया हो, जिस प्रदेश में बिजली की समस्याओ के कारण लधु उघोग बन्द होने के कंगार पर हो, जिस प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओ के आभाव के कारण हर वर्ष देश के मासूम बच्चे तरह तरह की बीमारियो के कारण ईलाज न मिल पाने के कारण दम तोड़ देते हो, जिस प्रदेश में बच्चो कि बुनियादी शिक्षा काफी कमजोर हो हाल यें है की स्कूल भवन जर्जर और टूटे फूटे, बच्चे के बैठने के लिये टाट पट्टिया नदारद, स्कूल परिसरो में गंदगी के अम्बार, बरसात में टपकती छते, आज अधिकतर सरकारी स्कूलो में बुनियादी सुविधाये आधी अधूरी या कही कही लगभग खत्म है। अध्यापक ना की बराबर आज भी उत्तर प्रदेश में 17000 गॉव ऐसे है जहॉ एक किलोमीटर के दायरे में कोई स्कूल नही है एक शिक्षक पर औसतन 51 बच्चे हो, वही देश की सडको की दशा और दिशा बदली है, जिस प्रदेश पर दो करोड़ रूपये का कर्ज चढा हो, वहा छात्रो को मुफ्त लैपटॉप, टैबलेट, किसानो को बिजली, गरीबो को गाय, स्कूली छात्राओ को साईकिले, रिक्शा चालको को सोलर रिक्शे मुफ्त दिये जाने के बादे आखिर किस प्रकार क्यो और किस बजट से किये जा रहे है। क्या ऐसे वादे कभी पूरे हो पायेगे, अगर पूरे होगे तो क्या प्रदेश विकास की पटरी पर दौड पायेगा, वादे करना कोई बुरी बात नही पर क्या बसपा के शासनकाल में भ्रष्टाचार से बीमार हुए प्रदेश को स्वस्थ प्रदेश बनाये जाने का किसी पार्टी के पास कोई फार्मुला है।

आपदा अगर कुदरत का कहर है तो इंसानी व्यवस्था और मौजूदा प्रदेश की सरकार का प्राकृतिक आपदा इम्तेहान होती है। जो बाढ, सूखे, और भूकंप के रूप मे हर साल सैकडो लोगो की जान ले लेती है इस ओर किसी पार्टी का ध्यान नही जाता और ये मुद्दा कभी भी किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्र में नही होता। आखिर क्यो देश की राजनीति और राजनेता सिर्फ और सिर्फ हिंदू मुस्लिमो की राजनीति में उलझ जाते है। जब की देश में कई ऐसे मुद्दे है जिन पर चुनाव लडा जा सकता है, पर हमारे देश के राजनेता न जाने क्यो हिंदू मुस्लिम की राजनीति से बाहर निकलना ही नही चाहते। युवाओ से ज्यादा आज बुजुर्ग को राजनीतिक दलो को अपने अपने घोषणा पत्रो में जगह देनी चाहिये। तभी प्रदेश की सभी समस्याए कम होगी प्रदेश में प्रदेश के वरिष्ठ नागरिको के लिये एक ऐसे मंत्रालय का गठन होना चाहिये जिस मे बिना आयु और रोग की तस्दीक किये बगैर स्वास्थ्य बीमा किया जाये। गृहकर, बिजली बिल, टेलिफोन बिल, स्टाम्प ड्यूटी, में इन वृद्वो को 50 प्रतिशत छूट दी जाये ताकि इस आधारिक युग में बच्चे अपने मां बाप को बोझ न समझकर इन्हे खुशी खुशी अपने घरो में रखे।

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2 Comments on "यूपी, चुनावी एजेंडो में बुजुर्ग और आम समस्याए गायब"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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शादाब भाई जब ऐसे ही वोट और सत्ता मिल जाती है तो दलों को कोई पागल कुत्ते ने कटा है जो वे आम आदमी और बुजुर्गों की चिंता करें?

MAHENDRA GUPTA
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इन बुजुर्गो को बोझ समझने वाले राजनेतिक दल भला उनके लिए क्या गोष्णा करेंगे. आज के हालत मई उन्हें तो दर युवाओं से ही लग रहा है.बेरोजगारी,भ्रस्ताचार ,अवाव्यस्था से तंग आये यह नौजवान कही बागी बन हिंसा पर न आजाये इसलिए डरे हुए यह दल ५ कुछ सोच भी नहीं सकते. या फिर जाति, धरम,पर लोगों को लालच दे कर भरमाने की कोशिश करते है.जैसे आरक्षण का झुनझुना कांग्रेसी लाए है तो बाकि भी उसे आधार बना कर राजी करने में लगे है. इसका दूरगामी अंजाम क्या होगा,उस की परवाह उन्हें नहीं है.लानत है इन PAR

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