लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र अपने निर्धारित समय से छह दिन पूर्व खत्म हो गया। सरकार ने सभी मामले इतनी तेजी में निपटाए मानों उसे किसी बात की बहुत जल्दी हो। छह दिन का काम मात्र 15 मिनट में पूरा करा कर विपक्ष को पटकनी देने में बसपा सरका कामयाब रही, इसके लिए बसपा के रणनीतिकारों को बधाई मिलनी चाहिए लेकिन इससे जो विधायी मर्यादाएं तार-तार हुईं इसकी ओर सरकार ने जरा भी ध्यान न देकर यह साबित कर दिया कि उसे विधायी मर्यादाओं से अधिक अपनी सरकार की सेहत की चिंता थी, सरकारी तानाशाही के खिलाफ विपक्ष ने धरना-प्रदर्शन करके विरोध जताया तो रात के अंधेरे में उसके जनप्रतिनिधियों को मार्शल के द्वारा पहले तो विधान सभा से जर्बदस्ती बाहर निकाल दिया गया और उसके बाद विधान भवन के बाहर खड़ी पुलिस ने लाठियां बरसा कर लोकतंत्र का गला घोटने की कोशिश की।इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाना चाहिए कि माया सरकार ने 96 विभागों का एक लाख सत्तासी हजार करोड़ से भी अधिक का बजट मात्र 15 मिनट में पारित करा दिया वह भी तब जबकि विपक्ष धरने पर बैठा था। उत्तर प्रदेश अस्थानीय स्वायत्त विधीय द्वितीय संसोधन विेधेयक 2011 को पारित कराने को लेकर चल रहे हंगामें के बीच विनियोग विधेयक पारित कराना लोकतांत्रिक ही नहीं सरकार की ‘सेहत’ के लिए भी घातक हो सकता है।विधान सभा के साठ साल के इतिहास में इतनी जल्दबाजी पहले कभी नहीं देखने को मिली जितनी जल्दबाजी बसपा सरकार ने दिखाई।बसपा की सरकार बहुमत वाली है तो इसका मतलब यह नहीं हो सकता है कि विपक्ष को बोलने या अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं मिले। समाजवादी पार्टी ने बसपा के इस कृत्य के खिलाफ सदन से लेकर सड़क तक हो हल्ला किया तो कांग्रेस और भाजपा विरोध के नाम पर औपचारिकता ही निभाते रहे। कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रमोद तिवारी से तो कांग्रेस हाईकमान ने यहां तक पूछ लिया कि उन्होंने बसपा की मनमानी के खिलाफ धरना खत्म करने में जल्दबाजी क्यों दिखाई।

माया सरकार द्वारा विधायी कार्य तेजी से निपटाने के बाद विधान सभा की कार्रवाई अपने निर्धारित समय से करीब हफ्ते भर पहले स्थगित करने के पीछे मुख्य वजह बसपा सरकार के तौर-तरीकों पर विपक्ष का विरोध करना था। सपा और अन्य राजनैतिक दलों के उत्तार प्रदेश नागर स्थानीय स्वायत्ता शासन विधि (द्वितीय संशोधन) विधेयक 2011 पर चर्चा कराए जाने को लेकर अड़े हुए थे और हंगामा कर रहे थे। इसीके चलते सत्ता पक्ष ने सदन की कार्यवाही समय से पूर्व अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दी,जबकि विधानसभा सत्र एक मार्च तक चलना था। स्थानीय निकायों की चुनाव प्रक्रिया में बदलाव सम्बन्धी विधेयक पर चर्चा कराने की मांग को लेकर सपा सदस्यों ने जोरदार हंगामा किया और विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर पर कागज के गोले फेंके तथा मार्शलों की टोपियां उतारकर फेंक दीं। इसके अलावा कुछ सदस्य सदन की कार्यवाही लिख रहे अधिकारियों की मेज पर भी चढ़ गए। इसी बीच, संसदीय कार्यमंत्री लालजी वर्मा ने सदन की नियमावली शिथिल करते हुए एक मार्च तक के लिये सदन की पूर्व निर्धारित समूची कार्यवाही को उसी समय(21 फरवरी को ही) लिये जाने का प्रस्ताव पेश किया, जिसे शोरगुल के बीच सदन में ध्वनिमत से स्वीकार कर लिया गया। प्रस्ताव स्वीकार होते ही संसदीय कार्यमंत्री वर्मा ने अध्यक्ष की अनुमति से एक-एक कर सारी मदें पारित करने के लिये प्रस्ताव पेश किये और हंगामे के बीच वित्ताीय वर्ष 2011-12 के सम्पूर्ण बजट प्रस्तावों एवं विनियोग विधेयक को पारित कर दिया गया। शोरशराबे, नारेबाजी और हंगामे के बीच भाजपा ने संशोधन प्रस्ताव पेश किया। लेकिन इसी बीच सारी कार्यवाही पूरी कर ली गई और ससंदीय कार्य मंत्री के प्रस्ताव पर मतदान करवाकर विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दी।

विधानसभा में हंगामे के बीच बजट एवं विनियोग विधेयक पारित किये जाने के ढंग और एक मार्च तक चलने वाले सत्र को 21 फरवरी को ही अनिश्चितकाल के लिये स्थगित किये जाने के विरोध में भाजपा विधानमंडल दल के उपनेता हुकुम सिंह के अलावा सपा और कांग्रेस के सदस्य भी सदन में आमरण अनशन पर बैठ गए। इससे पूर्व सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सपा सदस्यों ने राज्य के नगर निगमों तथा निकायों के अध्यक्षों की चुनाव प्रक्रिया में बदलाव के लिये गत 14 फरवरी को सदन में पेश हुए विधेयक पर चर्चा कराने की मांग करते हुए हंगामा किया। इसके चलते प्रश्नकाल नहीं हो सका। प्रश्नकाल की शुरुआत होते ही सपा के अम्बिका चौधरी ने विधेयक पर नियम 311 (सदन की कार्यवाही रोककर चर्चा कराना) के तहत चर्चा कराने की मांग की। उन्होंने इस विधेयक को स्थानीय निकाय चुनावों में लोकतंत्र का खात्मा करने की कोशिश करार दिया। सपा के वरिष्ठ नेता आजम खां ने भी चौधरी की बात का समर्थन करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर तुरंत चर्चा कराई जानी चाहिये। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने कहा कि वह शून्यकाल में इस मुद्दे को सुनने के लिये तैयार हैं, लेकिन सपा सदस्य मायावती सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सदन के बीचों-बीच आ गए। बार-बार के आग्रह के बावजूद जब सपा सदस्य अपनी सीटों पर जाने को तैयार नहीं हुए तो राजभर ने सदन की कार्यवाही पहले अपराह्न 11 बजकर 40 मिनट तक के लिये और फिर अपराहन 12 बजकर 20 मिनट तक के लिये स्थगित कर दी, नतीजतन प्रश्नकाल नहीं हो सका।

गौरतलब है कि सरकार ने गत 14 फरवरी को विधानसभा में ‘उत्तार प्रदेश नागर स्थानीय स्वायत्ता शासन विधि :द्वितीय संशोधन: विधेयक-2011’ पेश किया था। इस विधेयक में अध्यक्ष का चुनाव जनता के बजाय नगर परिषद या नगर पंचायत के सदस्यों की ओर से और महापौर का चुनाव नगर निगम के सदस्यों की ओर से किये जाने का प्रस्ताव था। विधेयक में यह भी व्यवस्था थी कि अगर अध्यक्ष और महापौर सम्बन्धित निकाय के सदस्य नहीं है तो उन्हें पदेन सदस्य माना जाएगा। विपक्षी दल इस विधेयक का यह कहते हुए विरोध कर रहे थे कि इससे स्थानीय निकायों में निर्वाचित सदस्यों की खरीद-फरोख्त बढ़ेगी। साथ ही धनबलियों और बाहुबलियों को बढ़ावा मिलेगा,लेकिन किसी की एक नहीं सुनी गई और नगर निकाय विधेयक में बदलाव कर दिया गया। विरोध स्वरूप विधान सभा में धरने पर बैठे विपक्षी विधायकों में सबसे पहले सपा के रियाज अहमद और उसके बाद उदयराज को निकाला गया। सदन में पुलिस के प्रवेश पर उन्होंने कड़ा विरोध जताया तो पुलिस वाले बाहर चले गए ।बाहर निकाले गए विधायक भी लौट आए, लेकिन थोड़ी देर में ही पुलिस के जवान और मार्शल फिर अंदर आए और विधायकों को निकालना शुरू किया। कुछ विधायकों को जबरिया निकाला गया। बाकी सरकार विरोधी नारेबाजी करते हुए खुद निकल गए। विधानसभा से विधायकों इस तरीके से निकालने का वाक्या वर्षों बाद हुआ।

इससे पहले मान मनौव्वल के कई दौर चले। इसके बाद सायं साढ़े चार बजे भाजपा ने और फिर रात करीब दस बजे कांग्रेस ने अपना धरना समाप्त कर दिया। मगर सपा और रालोद के सदस्य डटे रहे ।सपा के कई सदस्य विरोध स्वरूप फर्श पर ही लेट भी गए। विधान परिषद में भी यही नजारा थ, जहां सपा के सदस्य विधानसभा में सरकार की मनमानी के खिलाफ धरने पर बैठे थे। उधर विधानभवन के बाहर मुख्य सड़क पर सपा कार्यकर्ता धरने पर बैठ गए। कई कार्यकर्ताओ ंने विधान भवन की गेट पर चढ़कर अंदर जाने की कोशिश भी की लेकिन पुलिस ने उन्हे लाठियों के बदल पर खदेड़ दिया। बाद में पुलिस ने फलैग मार्च भी किया। सपा कार्यकर्ताओं ने ऐलान किया कि वे राजभवन का घेराव करेंगे।भाजपा और कांग्रेस ने अपना धरना समाप्त कर दिया था लेकिन रालोद के विधायक सपा के साथ धरने पर जमे हुए थे। रालोद के जो पाँच विधायक आमरण अनशन पर बैठे थे उनमें से एक पूरन प्रकाश का स्वास्थ्य भी बिगड़ा और उनके इलाज के लिए डाक्टर भी आए। डाक्टरों ने उन्हें बाहर चलने की सलाह दी लेकिन वे नहीं माने।

इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्षी दलों के उस एका के दावों की पोल भी खोल दी जिसका ऐलान सत्र शुरू होने से पहले किया गया था। निकाय चुनावों की व्यवस्था में बदलाव के लिए विधायक पर सरकार को घेरने की कोशिश में सपा ने सदन में बढ़त लेने की कोशिश की तो भाजपा की ओर से आरोप लगा कि सपा की बसपा से मिली-भगत है। नेता विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठे। वहीं कांग्रेस ने भी आरोप लगाया कि विधेयक पर उनकी ओर से संशोधन था, लेकिन सपा ने जिस तरह मामले को हाईजैक किया उसने सरकार को मनमानी का मौका दे दिया।

विधानसभा में विपक्ष के सामजस्य न होने का लाभ माया सरकार ने उठाया। विपक्ष के बिखराव का फायदा उठाते हुए सरकार ने तेजी से समाान्य बजट सहित सारे कामकाज पूरे कर लिए और विपक्षी नेता हाथ मलते रहे गये।विपक्षी आपस में तब लड़ रहे थे जबकि वह इससे पूर्व अपनी एकता के बल पर राज्यपाल के अभिभाषण के मुद्दे पर बसपा सरकार की मुखिया को छुकाने में कामयाब रहे थे। विपक्षी कएता की चलते ही राज्यपाल के अभिभाषण के बाद उनके अभिभाषण पर रखे गये संशोधन प्रस्ताव पर नेता विरोधी दल के बोलते समय मुख्यमंत्री को सदन में मौजूद रहना पड़ा था,लेकिन इस एकजुटता से विपक्ष ने कोई सीख नहीं ली । सोमवार 21 फरवरी को निकाय चुनाव प्रक्रिया में बदलाव के लिए सदन में पेश उत्तर प्रदेश नागर स्थानीय स्वायत्ता शासन विधि संशोधन विशेषकर 2011 के विरोध के लिए विपक्षी दलों की अपनी ढपली अपना राग छेड़ते देखा गया। सपा इस मुद्दे को नियम 311 के तहत उठाने पर अड़ी थी जबकि भाजपा ने इस पर संशाधन दे रखा था। वो चाहती थी सदन नियमानुसार चले और उसकी पूरी बात आ जाए। दोनों दलों के बीच की छिड़ी इस जंग में कांग्रेस ओर रालोद भी अपनी मौजूदगी दर्ज करना चाहते थे। सदन में संख्या बल से मजबूत सपा इस मुद्दे को हाथ से फिसलने नहीं देना चाहती थी, नतीजतन उसने समूचे मामले में लीड लेने के लिए कार्यवाही न चलने देने की रणनीति अपनायी और पूरे समय उसकी कोशिश रही कि मामला ठंडा न पड़ने पाये और इसके लिए उसने न केवल धरना दिया बल्कि पीठ पर पहुंचने को कोशिश में सुरक्षागार्डों से धक्का मुक्की भी की।

उधर, सदन में विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर को सपा के अंबिका चौधरी, मोहम्मद आजम खां और उदयराज यादव आदि ने उक्त संशोधन विधायेक के प्रावधानों को नियम 311 की सूचना जरिये चुनौती दी थी। अध्यक्ष महोदय, उसे कार्य स्थगन में स्वीकार कर चुके थे और उसे शून्य प्रहर में सुनने के लिए तैयार भी थे लेकिन सुर्खिया पाने की होड में जुटी सपा सारे नियमों को निलंबित कर इस विषय को पहले सुनने के लिए हंगामा काट रही थी। सपा की जिद्द में समूचा प्रश्न प्रहर हंगामें की भेट चढ़ गया। जब दोबारा कार्यवाही शुरू हुई तो कांग्रेस के प्रमोद तिवारी और भाजपा के ओमप्राकश सिंह व हुकुम सिंह इस कोशिश में जुट गये कि किसी तरह सदन व्यवस्थित हो सके। इसके लिए नेताओं ने यहां तक प्रस्ताव किया कि भले विधेयक पर संशोशन भाजपा की ओर से आया हो पर इसकी शुरूआत सपा करे और नेता विरोधी दल पहले अपनी बात रखे फिर भाजपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल अपनी बात रखेंगे। यह प्रस्ताव भी सपा को स्वीकार नहीं हुआ। नतीजतन संख्या बल पर सरकार विधेयक को पारित कराने में कामयाब हो गयी और विपक्ष ठगा सा रह गया। सदन स्थगित होने के दूसरे दिन 22 फरवरी को विरोध स्वरूप भाजपा ने काला दिवस मनाया तो सपा ने प्रदेशव्यापी प्रदर्शन किया।वहीं मुख्यमंत्री मायावती ने विपक्ष के विरोध को आधारहीन करार दिया।विभिन्न दलों के नेता इस मुद्दे पर भले ही जुदा-जुदा राय रखते हों लेकिन आम जनता को तो यही लगा कि उत्तर प्रदेश में एक बार लोकतंत्र लाचारतंत्र बन कर रह गया और इसके लिए किसी भी राजनैतिक दल को माफ नहीं किया जा सकता है। जनता जानती है कि आज जहां मायावती खड़ी हैं,बीते कल में वहां कई नेता खड़े दिख चुके हैं। किसी भी सरकार ने अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए शायद ही लोकतंत्र की मर्यादा का ख्याल रखा होगा।

 

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