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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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राजीव उपाध्याय

असम पर अहोम राजाओं का राज होता था . सारायी घाट के युद्ध में लाचित बर्फुकन के चातुर्य से जीतने के बाद वे मुग़ल राज से बच गये . असम कि समस्याएं सन १८२६ में अंग्रेजों के असम जीतने से शुरू हुयी .

१. सन १८३७ में चाय कि खेती शुरू करने के लिए थोड़े से मध्य भारत से बंधुआ मजदूर लाए गये . परन्तु १९०५ के बंगाल विभाजन के बाद अंग्रेजों ने काफी अंग्रेजी पढ़े बंगाली बुला लिए जो उनकी राज चलने में मदद करते थे . असमी बंगालियों को पसंद नहीं करते थे क्योंकि वे अंग्रेजों के करीब थे . परन्तु फिर भी उनकी संख्या बहुत सीमित थी.

२. १९०६ में मुसलिम लीग बनने से उसके नेता नवाब सलीम उल्लाह खान ने मुसलमानों को असम में बसने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया जिससे ब्रह्मपुत्र घाटी का फायदा मुसलमानों को मिले . नवाबी शासन में यह संभव नहीं था .

३. सी . एस . मुलन ने १९३१ कि जन्गाडना के बाद इसका बहुत कठोर शब्दों में लालचियों द्वारा ज़मीन लूटने कि भर्त्सना की और इसे असम कि संस्कृति का विनाश बताया..

४. १९३७ में नए मुख्यमंत्रि गोपी नाथ बोरदोलई ने आव्रजन पर रोक लगाने कि कोशिश कि .परन्तु शीघ्र ही कांग्रेस ने अपने मुख्या मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने को कहा . नेताजी सुभाष ने स्थिति कि गंभीरता को समझते हुए गोपीनाथ को मुख्यमंत्रि बना रहने देने कि वकालत कि पर कांग्रेस नहीं मानी .

५. उसके बाद मुसलिम मुख्यमंत्रि सददुलाह ने बहुत मुसलमानों को बसाना शुरू कर दिया और एक लाख बीघा ज़मीन मुसलामानों को दे दी . असम के नेताओं जैसे बिष्णु राम मेढ़ी ने इसका तीव्र विरोध किया . पर ज्यादा अन्न उपजाने का बहाना कर के इसको ख़ारिज कर दिया .

६. १९४२ में लोर्ड वावेल को जब सब समझ आया तो उन्होंने इसे अन्न बढाओ नहीं बल्कि मुसलमान बढाओ कार्यक्रम कह कर इसकी भर्त्सना की .

७. १९४६ में दिल्ली में मुसलिम लीग व् बाद में जिन्ना ने असम को पाकिस्तान में देने को कहा . पर कांग्रेस ने इसका विरोध किया . भाग्य से मुसलिम बाहुल्य सिलहट के पाकिस्तान में जाने से कुछ दिनों के लिए असम को कुछ रहत मिल गयी .परन्तु जिन्ना के शायद कहने पर उनके सचिव मैनुल हक चौधरी भारत में इस अजेंडे को पूरा करने के लिए रह गये .

८. १९६४ में असम के तब के मुख्यमंत्रि बी सी चालिहा ने कानून बना कर इसे रोकने कि फिर कोशिश कि. परन्तु तब तक २० एम् एल ऐ मुसलिम थे जिन्होंने सरकार गिराने कि धमकी दे कर आव्रजन को बंद नहीं होने दिया . बाद में चौधरी केंद्र में मंत्रि बन गये और राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के साथ मिल उन्होंने आव्रजन को खूब बढ़ावा दिया .

९. भुट्टो ने अपनी किताब में असम को विभाजन कि शेष आहुति करार दिया था . मुजीबुर रहमान भी असम को बंग्लादेश का जरूरी हिस्सा मानते थे .इस तरह श्रीमती गांधी के कार्यकाल में दस लाख मुसलमान असम में और आ गये .

१०. बी के नेहरु , जो असम के गवर्नर रह चुके थे , उन्होंने इस वोट कि बुरी राजनीती के लिए कांग्रेस कि भर्त्सना कि. असम कि आबादी १९४७ में १९ लाख से बढ़ कर १९७२ व्में ३७ लाख हो गयी.

११. १९८२ में जब मंगलदोई सीट के मतदाता सूचि में बंगलादेशी मुसलमानों के नाम डालने कि कोशिश कि तो असम में व्यापक जन आंदोलन शुरू हो गया .

१२. परन्तु मुसलिम परस्ती में सरकार तब भी १९७१ से पहले के आने वालों को नागरिकता देना चाह रही थी जब कि आंदोलनकारी १९५० से लिस्ट काटना चाह रहे थे . बहुत देर तक चलने के बाद आंदोलन कारियों से समझौते से घुसपैठियों कि धार पकड़ करने कि सहमति बनी . परन्तु कांग्रेस ने १९४७ का IMDT एक्ट इस चालाकी से बनाया कि विदेशियों को विदेशी सिद्ध करने कि जिम्मेवारी पुलिस कि कर दी. संसार के किसी देश में ऐसा प्रावधान नहीं है.

१३. मुसमानों ने मिल कर अगले पन्द्रह सालों में कुल दस हज़ार आदमियों को पहचानने दिया . २२ साल बाद सुपीम कोर्ट ने इस उलटे कानून को रद्द किया . परन्तु इस बीच एक करोड मुसलमान बंगलादेश से और आ गये और सुनियोजित ढंग से सारे देश में फैल गये . असम व् बंगाल पर विशेष कहर गिरा .

१४. सी पी ऍम ने कांग्रेस कि तरह इन बांग्लादेशियों का वोट बैंक कि तरह इस्तेमाल किया और अब ममता बनर्जी कर रही हैं .

१५. बोडो लोगों को एक समझौते के तहत कुछ विशेष अधिकार प्राप्त हैं . बांग्लादेशियों ने जबरदस्ती जंगल कि ज़मीन घेर के मस्जिद बनानी स्शुरु कर दी और ज़मीन हथियाना सुरु कर दिया . बोडों का विरोध सही व् स्वाभाविक था . गोधरा कि तरह लड़ाई कि पहल मुसलमानों ने कि और खामियाजा सब को भुगतना पड़ रहा है . पर बोडों कि यह क्षणिक जीत है. मुसलामानों के पास बहुत हथियार है और वे कहीं और हमला कर गृह युद्ध शुरू कर देंगे . मुंबई में हाल के दंगों में पुलिस ने हमलावर मुसलामानों को ही बचाया चाहे इस के लिए खुद मर गयी.

१६. सरकार को इन बदली परिस्थितियों में पंजाब सी गलती नहीं दोहरानी चाहिए . असम को बचाना हमारा पहला कर्त्तव्य होना चाहिए. बांग्लादेशियों को देश से निकलना ही इस समस्या का ठीक व् न्याय पूर्ण इलाज़ है.

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3 Comments on "असम व् बोडो समस्या एक ऐतिहासिक परिपेक्ष में"

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dilip kumar
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lekh me history ke madhyam se Aasam ki samasya ko shandar tarike uthaya gaya hai….. iske liye Rajiv ji nishchit hi kabiletarif hai….
aaj gandi rajniti ki vajah se hi Desh ka Satyanash ho raha hai……….

Rajiv Upadhyay
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दिलीप जी प्रशंसा के लिए धन्यवाद
आशा है भविष्य मैं भी आपको मेरे लेख पसंद आएंगे.

डॉ. मधुसूदन
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क्या पैरो तले की धरती भी खिसक जाएगी?
बहुत गंभीर समस्या, और शासन अपने चेहरे पर की मख्खी भी उड़ा नहीं सकता?

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