लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला

झारखण्ड सरकार के शिक्षा विभाग ने अपने विद्यालयों में चौथी
कक्षा से विद्यार्थियों को वैदिक गणित पढाने का निर्णय लिया है । राज्य
शिक्षा परियोजना ने इस बावत प्रयोग के तौर पर राजधानी के १०० विद्यालयों
में अगले ही सत्र से इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने की स्वीकृति प्रदान कर
दी है । यह निर्णय तब लिया गया है , जब वैदिक गणित पढाने वाले एक
गुरुकुल के विद्यार्थियों की अद्भूत गणितीय मेधा और इसके प्रति सरकारी
उदासीनता पर मेरे कई लेख प्रकाशित होने के बाद एक सर्वेक्षण-प्रतिवेदन से
यह तथ्य प्रकाश में आया कि सरकारी स्कूलों में आठवीं कक्षा तक के बच्चे
तो गणित के जोड-घटाव-गुणन-विभाजन जैसे मामूली सवालों को हल करना भी नहीं
जानते । विद्यालयों में प्रचलित मैकाले-अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति के
पाठ्यक्रम इतने दुरुह और उबाऊ हैं कि बच्चों में गणित पढने की रुचि तो
दूर इसके प्रति भय भी व्याप्त होता जा रहा है , जिसका नतीजा है कि बच्चे
गणित में फिसड्डी होते जा रहे हैं । वैदिक गणित के पठन-पाठन से बच्चों की
न केवल गणितीय मेधा-प्रतिभा विकसित होगी, बल्कि उनकी रुचि-प्रवृति भी
गणित के प्रति संवर्द्धित होगी, क्योंकि यह सहज-सरल रोचक और मनोवैज्ञानिक
है ।
कम्प्युटर की गति से भी तेज गति से जोड-घटाव-गुणन-विभाजन के
सवालों का हल प्रस्तुत करने वाला ‘वैदिक गणित’ भारतवर्ष के प्राचीन
ज्ञान-विज्ञान का एक अभिन्न अंग रहा है । किन्तु , अपने देश में प्रचलित
शिक्षा की मैकालेवादी जकडन के कारण आधुनिक शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से यह आज
भी दरकिनार ही है । अंग्रेजी पद्धति की प्रचलित गणित में ‘कैलक्युलेटर’
और ‘कम्प्युटर’ एक सीमा तक ही अंकों की गणना कर सकते हैं ; किन्तु वैदिक
गणित में इसकी कोई सीमा नहीं है , जबकि इसमें बडी से बडी संख्याओं की
गणना के लिए भी किसी कल्क्युलेटर की कोई जरूरत नहीं पडती । आपको यह जानकर
आश्चर्य होगा कि इसके विशिष्ट सूत्रों के सहारे कोई भी व्यक्ति बडी से
बडी संख्याओं का जोड-घटाव-गुणन-विभाजन किसी लेखन-सामग्री का उपयोग किए
बिना कल्क्युलेटर से भी कम समय में , मन ही मन कर सकता है । मान लें कि
आपको 889 में 998 का गुणा करना है , तो प्रचलित तरीके से यह मौखिक रूप
में आसान नहीं है । किन्तु वैदिक तरीके से उसे कुछ सेकेण्डों में ही ऐसे
हल कर लेंगे कि दोनो संख्याओं के सबसे नज़दीकी पूर्णांक एक हज़ार में से
उन्हें घटाने पर मिले क्रमशः 2 और 111के सहज गुणनफल- 222 को मन में ही
दाहिने तरफ रख कर 889 में से उस 2 को घटा कर (जिसे 998 को एक हज़ार बनाने
के लिए जोड़ना पड़ा था) मिले- 887 को मन ही में 222 के पहले बाएं तरफ रख
देंगे तो 887222 , अंतिम व सही गुणनफल आ जाएगा । वैदिक गणित की ऐसी विविध
सहज व मनोरंजक विधियों से बड़ी-बडी संख्याओं का जोड़-घटाव और गुणन-विभाजन
ही नहीं, बल्कि बीजगणित के त्रिकोणमितीय-ज्यामितीय वर्ग व वर्गमूल और घन
व घनमूल निकालना भी संभव है ।
मालूम हो कि पूरी दुनिया को गणितीय ज्ञान और पदार्थ विज्ञान
की धुरी के समान ‘शून्य’ और ‘दश्मलव’ का उपहार देने वाले प्राचीन भारतीय
वाङ्ग्मय , अर्थात वेद-पुराण-उपनिषद आदि के ज्ञान-महासागर में अनेक
ऐसी-ऐसी सरितायें प्रवाहित हैं , जो पश्चिमी-अंग्रेजी दुनिया की पहुंच से
अभी भी काफी दूर हैं । ज्ञान के जिस महासागर ने दुनिया को गणितीय ज्ञान
की धुरी- ‘शून्य’ और ‘दश्मलव’ नामक उपहार प्रदान किया , उन ‘वेदों’ में
समस्त सृष्टि का सम्पूर्ण गणित भी समाहित है । हालाकि यह वेद-विदित गणित
ही दुनिया भर में प्रचलित समस्त गणितों का मूल है ।
उल्लेखनीय है कि वेदों के ज्ञान-महासागर से गणितीय ज्ञान के
हीरे-मोती चुन-चुन कर उसे लिपिबद्ध करने का भागीरथ काम आद्य शंकराचार्य
ने किया था , जो उनके किसी मठ में सुरक्षित था । किन्तु पश्चिमी आतताइयों
के आक्रमण-शासन के दौरान मठों-मंदिरों को नष्ट किये जाने के क्रम में वह
ग्रन्थ भी धूल-धुसरित हो गया था , जिसे कालान्तर बाद 20वीं शताब्दी में
झाड़-पोंछ कर सामने लाया- गोवर्द्धन मठ , पुरी के शंकराचार्य स्वामी
भारती कृष्णतीर्थजी ने । वे न केवल संस्कृत व दर्शनशास्त्र के विद्वान थे
, बल्कि गणित और इतिहास के अलावे सात विषयों में मास्टर्स (MA) थे ।
उन्होंने प्राचीन ग्रंथों और बची-खुची सम्बन्धित पांडुलिपियों का मंथन कर
इन वेद-विदित 16 गणितीय सूत्रों की व्याख्या से युक्त 16 पुस्तकों की
पांडुलिपियाँ लिखीं, जो अंकगणित ही नहीं, बीजगणित और भूमिति-ज्यामिति
सहित गणित की हर शाखा से संबंधित थीं । किन्तु दैव-दुर्योग से वे
पाण्डुलिपियां भी नष्ट हो गईं । तब उन्होंने इस वेद-वर्णित ज्ञान को
दुबारा लिपिबद्ध करना शुरू किया । लेकिन वे एक ही सूत्र की व्याख्या लिख
सके थे , उसी दौरान उनका निधन हो गया । बाद में उनकी उसी व्याख्या के
आधार पर उनके शिष्यों ने सन 1965 में ‘वेदिक मैथमेटिक्स’ नाम से एक
पुस्तक अंग्रेजी में प्रकाशित करायी । उस पुस्तक की एक प्रति जब किसी तरह
से लन्दन पहुंच गई , तब वहां के जाने-माने गणितज्ञ भी उसके
सूत्रों-समीकरणों को देख-समझ कर चकित रह गये । तभी से पश्चिमी देशों में
वैदिक गणित को मान-सम्मान मिलना शुरू हो गया । सबसे पहले लंदन के सेंट
जेम्स स्कूल ने अपने वहां इस ‘वैदिक गणित’ की पढ़ाई शुरू की । आज इसकी
पढाई इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के सरकारी और
निजी स्कूलों में हो रही है , किन्तु हमारे अपने देश की सरकार तथाकथित
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ज्ञान-विज्ञान का यह अमृत यहां के नवनिहालों को
सुलभ कराने में आना-कानी ही करती रही है । गोवर्द्धन मठ, पुरी के
वर्तमान शङ्कराचार्य निश्चलानन्द सरस्वती , जिन्होंने भारती कृष्णतीर्थ
के कार्यों को आगे बढाते हुए वैदिक गणित पर आठ-आठ किताबें लिखी हैं , इस
बात को लेकर दुःखी हैं कि आज अपने देश के बुद्धिजीवी भी उसी ज्ञान को
पठनीय मानते हैं जो इंग्लैण्ड-अमेरिका से आया हुआ हो ।
बावजूद इसके , इस ‘वैदिक गणित’ के ज्ञान की सुगंध से अपने
देश के कतिपय वेदानुरागी शिक्षार्थी-विद्यार्थी सुवासित होते रहे हैं ।
गुजरात के अहमदाबाद में एक प्रयोगधर्मी शिक्षाविद उत्तमभाई जवानमल शाह के
हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला नामक ‘गुरूकुल’ का 14 वर्षीय छात्र
तुषार विमलचन्द तलावट मात्र 03 मिनट 30 सेकण्ड में 70 सवालों को हल कर
एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 5300 प्रतिभागियों को पराजित कर प्रथम
स्थान प्राप्त किया हुआ है । विगत 26-27 दिसम्बर’ 2015 को ‘ मेन्टल
कैलकुलेशन इण्डिया कप ’ की चेन्नई में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में
देश भर से शामिल 19 राज्यों के 4300 प्रतिभागियों में सबसे कम उम्र का यह
बालक छह अंकों के जोड-घटाव और तारीख-सम्बन्धी 70 सवालों के जवाब
कम्प्युटर से भी तीव्र गति से मात्र 03 मिनट 10 सेकण्ड में देकर अपने देश
के मैकालेवादियों की आंखों में उंगली डाल चुका है । इतना ही नहीं , 26-27
दिसम्बर’2015 को उसी चेन्नई शहर में ‘हिन्दुस्तान मैथ्स ओलम्पियाड’ की ओर
से आयोजित प्रतियोगिता में सभी 1700 प्रतिभागियों को पछाडते हुए मात्र 03
मिनट 15 सेकण्ड में ही 100 सवालों का हल प्रस्तुत कर प्रथम स्थान प्राप्त
कर लेने के बाद यह बालक ‘अलोहा इण्टरनेशनल’ नामक संस्था द्वारा गत 24
जुलाई’ 2016 को इण्डोनेशिया की राजधानी- जकार्ता में आयोजित
अंतर्राष्ट्रीय गणित प्रतियोगिता में सम्पूर्ण भारत देश का प्रतिनिधित्व
करते हुए विजेता बन कर लौटा, जिससे अहमदाबाद में मेरी मुलाकात हुई तो,
उसके मुख से वैदिक गणित के तत्सम्बधी एक से एक सूत्रों को जान-सुन कर
मुझे विस्मय भी हुआ और दुःख भी ।
दुःख इस कारण क्योंकि इंग्लैंड, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया
जैसे देशों के स्कूलों में बच्चों को वैदिक गणित सिखाया जा रहा है , जबकि
हमारे देश की सरकारों को या तो यह भय सताता है कि इस विलक्षण ज्ञान की
पढाई से वेद-विरोधी सम्प्रदाय के वोटों का उन्हें नुकसान उठाना पड सकता
है , अथवा इन्हें ‘योग’ के ‘योगा’ बन कर पश्चिम से भारत लौटने की तरह इस
गणित के भी पश्चिमी संस्करण की प्रतीक्षा है । किन्तु झारखण्ड सरकार ने
प्रयोग के तौर पर ही सही, वैदिक गणित को अपनाने-पढाने की स्वीकृति प्रदान
कर दी है , तो यह हमारे बच्चों की शैक्षणिक दुर्दशा , खास कर उनकी गणितीय
स्थिति व मनोदशा को सुधारने की बुद्धिमतापूर्ण ‘उत्तम युक्ति’ है । इसका
स्वागत किया जाना चाहिए ।
मनोज ज्वाला ,

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