लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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मृत्युंजय दीक्षित

हर वर्ष 14 फरवरी का दिन वैलेण्टाइन डे यानी प्रणय दिवस को पूरे धूमधाम व उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस तिथि को मनाने के लिए पूरी दुनिया भर में विशेष तैयारियां की जाती है। हर टूर कंपनी युवा जोड़ों को आकर्षित करने के लिए तरह तरह के टूर पैकेजों की घोषणा करते हैं। सभी होटल व पर्यटक केन्द्रों में अपार भीड़ उमड़ती है। भारत में भी अब यह प्रणय दिवस मनाने का प्रचलन काफी तेजी से बढ़ गया है। यह प्रणय दिवस कब, क्यों और केसे प्रारम्भ हुआ इसका कोई विधिवत प्रामाणिक इतिहास नहीं प्राप्त होता है। कहा जाता है कि वैलेण्टाइन डे रोम के एक पुजारी के नाम पर मनाया जाता है जो शहीद हो गया था तथा जिसे 14 फरवरी 269 को फलेमिनिया में दफनाया गया था। उसके अवशेष रोम के चर्च में रखे हुए हैं। एक ओर वैलेण्टाइन संत के बारे में कुछ प्रमाण मिलते हैं लेकिन वे सब कपोल कल्पनायें अधिक लगती हैं।

भारत में वैलेण्टाइन का प्रचार- प्रसार 1992 के बाद से अधिक हुआ जब भारत में रंगीन टी वी चैनलों की बाढ़ आने लगी। भारत में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. नरसिंहा राव के शासनकाल में जब आर्थिक उदारीकरण का एक नया दौर प्रारम्भ हुआ और देश में नई- नई कंपनियों की बहार आने लगी तथा विदेशी लोग भारत को आसान बाजार और लोगों को आसान खरीददार समझने लगे तो फिर चर्च प्रेरित व संचालित कम्पनियों के माध्यम से विदेशी कंपनियां युवाओं को बहकाने के लिए एक नया तरीका खोज कर ले आयी हैं और वह है वैलेण्टाइन डे। अमूमन माना जाता है कि भारतीय जनमानस किसी विषयवस्तु की गहराई में न जाकर बस मायाजाल के चक्कर में फंस जाता है। यही कारण है कि आज भारत में विदेशी कचरा वैलेण्टाइन बेतहाशा फल- फूल रहा है। इसकी आड़ में विदेशी कंपनियां जहां युवाओं को मानसिक रूप से खोखलाकर रही हैं व वहीं भारतीय संस्कृति से भी कोसों दूर कर रही हैं। आज वैलेण्टाइन की आड़ में युवाओं में नशे की लत भी बढ़ रही है तथा अश्लीलता व नकली प्रेम के चक्कर में वहशी अपराधी भी बन रहे हैं। वैलेण्टाइन के कारण ही आज युवतियां कहीं सुरक्षित नहीं रह गयी हैं। वैलेण्टाइन प्रेम का प्रतीक माना गया है लेकिन यह पर्व वास्तव में टी वी चैनलों के धारावाहिकों का टी आर पी बढ़ा रहा है। फिल्मी पर्दे पर अश्लीलता की बाढ़ आई हुई है। अभी आज के युवाआ से यदि वैलेण्टाइन का वास्तविक इतिहास पूछा जाये या उददेष्य पूछा जाये तो कोई बता नहीं पायेगा वह बस गूगल गुरू को ही खंगालने लग जायेगा। वैलेण्टाइन डे मनाने भर से ही युवाओं में एक- दूसरे के प्रति प्रेम नहीं आ जाता। भारतीय संस्कृति में जीवन के सात युगों तक वैलेण्टाइन मनाने की परम्परा और मान्यता है। अगर वैलेण्टाइन से आजीवन प्रेम सम्बंध प्रगाढ़ होते तो फिर आज तलाक के इतने मामले क्यों बढ़ रहे हैं।

वैलेण्टाइन डे विदेशी कंपनियों का केवल और केवल अपने उत्पादों को बेचने के लिए प्रोपोगण्डा मात्र है। भारत में वैलेण्टइन की प्राचीन परम्परा बहुत ही निराली रही है। यहां पर कामोत्सव मनाया जाता था जिसे मदनोत्सव कहा गया है। भारत में बसंत पंचमी से लेकर होली के पर्व तक पूरे एक माह जमकर युगलों के लिए प्रणय मनाने का समय निर्धारित है। संस्कृत में तो कामसूत्र पर पूरा एक ग्रंथ ही उपलब्ध है। खजुराहों की मैथुन करती मूर्तिंयां कला का एक अनुम उदाहरण हैं। खजुराहो का भ्रमण करने से साफ पता चलता है कि भारत की तत्कालीन संस्कृति में कितना अधिक खुलापन था। नारियों को पूर्ण स्वतंत्रता थीं व उन्हें अपना वर खोजने के भी पूरे अधिकार थे। रामचरित मानस में भी रति के पति कामदेव को शिव द्वारा भस्म किये जाने का प्रसंग भी मिलता है।

भारत में आज वैलेण्टाइन को सबसे अधिक मीडिया, विज्ञापन कंपनियां अधिक प्रोत्साहित कर रहे है। जिसके कारण भारत का परम्परागत पारिवारिक संस्कृति व सभ्यता भी बेहद प्रभावित हो रहे हैं। पारिवारिक संस्थायें टूट रही है। विलगाव बढ़ रहा है। भारतीय परम्परा का प्रेम शाश्वत होता है सदा के लिए होता है जबकि यह दिवस तो बाद में अकेलापन और तनाव को ही बढावा देने वाला होता है।

आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि समाचार पत्र- पत्रिकाआंे में तथा मीडिया व सिनेमा यहां तक कि खेलों की दुनिया में भी वैलेण्टाइन स्पेशल की बाढ़ आई हुर्ह है। फिल्मों व धारावाहिकों में प्रेम के नाम पर अश्लीलता को जमकर परोसा जा रहा है। आज गुलाब का फूल 50 रूपये से लेकर 100 रूपये तक का बिक रहा है। पता नहीं यह भेड़चाल लोगों को किधर लेकर जायेगी। आज का युवा मीडिया से प्रभावित हो रहा है। सोशल मीडिया से प्रभावित हो रहा है जिसे आधुनिकता का नया रंग दिया जा रहा है।अगर आज हमने अपने युवाओं को अभी से अपनी परम्परागत मूल्यों के विषय में नहीं बताया तो भविष्य आज को ही दोष देगा। आज समय की आवश्यकता है कि युवाओं को खुली हवा में जीने दिया जाये लेकिन उन्हें अपनी धर्म, संस्कृति और सभ्यता के साथ जोड़कर भी रखा जाये। देश के सभी हिंदूवादी उग्र संगठनों शिवसेना, बजरंग दल व संघपरिवार के तमाम आनुषांगिक संगठनें ने इस प्रणय दिवस पर हंगामा काटने का फैसला किया है लेकिन इसका कोई लाभ नहीं है। आज जरूरत इस बात कि है कि आधुनिकता के साथ इन बुराइयों के साथ संघर्ष किया जाये।

मृत्युंजय दीक्षित

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