लेखक परिचय

महेश दत्त शर्मा

महेश दत्त शर्मा

जन्म- 21 अप्रैल 1964 शिक्षा- परास्नातक (हिंदी) अनेक प्रमुख हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में महेश दत्त शर्मा की तीन हज़ार से अधिक विविध विषयी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपका लेखन कार्य सन १९८३ से आरंभ हुआ जब आप हाईस्कूल में अध्ययनरत थे। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से आपने 1989 में हिंदी में एम.ए. किया। उसके बाद कुछ वर्षों तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए संवाददाता, संपादक और प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया। आपने विभिन्न विषयों पर अधिकारपूर्वक कलम चलाई और इस समय आपकी लिखी व संपादित की चार सौ से अधिक पुस्तकें बाज़ार में हैं। हिंदी लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आपने अनेक पुरस्कार भी अर्जित किए, जिनमें प्रमुख हैं- नटराज कला संस्थान, झाँसी द्वारा लेखन के क्षेत्र में 'यूथ अवार्ड', अंतर्धारा समाचार व फीचर सेवा, दिल्ली द्वारा 'लेखक रत्न' पुरस्कार आदि। संप्रति- स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, संपादक और अनुवादक।

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महेश दत्त शर्मा

10 अगस्त, 1628। स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम का एक बंदरगाह लोगों से खचाखच भरा था। ये लोग “वासा” नामक एक नए लड़ाकू समुद्री जहाज़ को देखने आए थे जो पहली बार समुद्र में उतर रहा था। वह कोई मामूली जहाज़ नहीं था। उसे बनने में पूरे तीन साल लग गए थे।

स्वीडन का राजा गस्तवस द्वितीय एडौल्गफ वासा की इच्छा थी कि वह जहाज़ दुनिया का सबसे शक्तिशाली जहाज़ हो। कुछ लोगों का कहना है कि जब उसे पता चला कि डेनमार्क का राजा अपने नए लड़ाकू जहाज़ में दो डेक बनवाकर उनमें ‘तोपें’ लगवा रहा है तो उसने भी अपने उस जहाज़ में दो तोप वाले डेक बनवाए। वह नहीं चाहता था कि उसके राजवंश के नाम का झंडा फहराने वाला जहाज़ दुनिया के किसी भी जहाज़ से कम हो।

उस जहाज़ को बनवाने के लिए उसने पानी की तरह पैसा बहाया था। उसमें 64 तोपें लगाई गई थीं। इतना ही नहीं, उस जहाज़ की शान ब़ाने के लिए उसमें 700 खूबसूरत मूर्तियाँ जड़ी गई थीं। वह खूबसूरत और शक्तिशाली जहाज़ उस समय का सबसे शानदार जहाज़ था। इसलिए राजा वासा ने अपनी शान और प्रभाव दिखाने के लिए उस जहाज़ का उद्घाटन बड़ी धूमधाम से किया। जिस दिन वासा जहाज़ पहली बार समुद्र में उतरा तो लोग प्रसन्नता से भर उठे और उन्होंने बड़े गर्व के साथ तालियाँ बजाकर उसका स्वागत किया।

लेकिन वासा अभी लगभग एक किलोमीटर दूर ही गया था कि हवा के एक झोंके से लड़खड़ाकर उलट गया। जहाज़ में चारों ओर से पानी भरने लगा और देखतेही-देखते जहाज़ डूब गया। इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई जहाज़ समुद्र में उतरते ही डूब गया हो।

बंदरगाह पर खड़ी भीड़ की आँखें फटीकी-फटी रह गइरं। वासादेश की रक्षा करते हुए शहीद नहीं हुआ, न ही किसी खतरनाक समुद्री तूफान का शिकार हुआ। लोग विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि स्वीडन की शान एक मामूली हवा के झोंके से मिट्टी में मिल गई। जहाज़ तो डूबा ही, साथ में 50 लोगों को मौत के आगोश में सुला गया जो उस समय जहाज़ पर सवार थे। इस घटना ने लोगों को झकझोर कर रख दिया। तब से वासा का नाम लेते ही स्वीडन के लोगों का सिर शर्म से झुक जाता है।

उस शर्मनाक हादसे के तुरंत बाद इस मामले की जाँच की गई। सब जानना चाहते थे कि उस घटना के लिए कौन जिम्मेदार है। परंतु जब पता चला कि स्वयं राजा और उसकी नौसेना का दूसरा सबसे बड़ा सेनापति क्लास फ्लेमिंग उस घटना के लिए जिम्मेदार हैं तो मामले को रफादफा कर दिया गया।

राजा वासा क्यों दोषी था? क्योंकि वह अपनी पसंद का जहाज़ बनवाना चाहता था। जहाज़ बनाने वालों ने भी मजबूरी में उसके डिजाइन के अनुसार जहाज़ बना दिया, हालाँकि उन्हें उस डिजाइन के बारे में कुछ पता नहीं था। जब जहाज़ बनकर तैयार हुआ तो सेनापति फ्लेमिंग ने उसके संतुलन की जाँच के लिए 30 सैनिकों को जहाज़ के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ने के लिए कहा। उसने देखा कि जहाँजहाँ सैनिक जाते हैं, वहाँवहाँ जहाज़ झुक जाता है। तीसरी बार तो वह लगभग उलटने ही वाला था कि सेनापति फ्लेमिंग ने सैनिकों को रोक दिया। यह सब जानते हुए भी उसने जहाज़ को समुद्र में जाने से नहीं रोका। राजा और सेनापति जैसे बड़े लोगों पर आरोप लगाने का दुस्साहस भला कौन कर सकता था।

जहाज़ डूबने के कुछ सालों बाद सन 166465 में स्वीडन की सेना का एक भूतपूर्व अफसर एक उपकरण के माध्यम से वासा जहाज़ में लगी तोपें निकालने में सफल रहा। धीरेधीरे वासा समुद्र की गहराई में पाए जाने वाले कीचड़ में धँसता चला गया। इसके साथ ही उसकी यादें भी उसके साथ दफन हो गइरं।

कई सालों से एंडर्स ांसेस नामक एक पुरातत्त्वविज्ञानी पुराने दस्तावेज़ों की सहायता से समुद्र की गहराइयों में दबे वासा की खोज कर रहा था। सन 1956 में उसकी खोज सफल हुई, जब उसने एक उपकरण द्वारा वासा जहाज़ का एक टुकड़ा समुद्र से निकाला। बाद में वासा को सावधानीपूर्वक समुद्र से खींचकर एक बंदरगाह तक लाया गया।

24 अप्रैल 1961 अर्थात लगभग 333 सालों बाद वासा जहाज़ पुनः स्टॉकहोम के बंदरगाह पर खड़ा था और एक बार फिर लोगों की भीड़ ज़ोरों से तालियाँ बजाकर चिल्ला रही थी। परंतु अब यह जहाज़ केवल पर्यटकों को दिखाने के लिए रखा गया है। साथ ही समुद्री पुरातत्त्वविज्ञानियों के लिए यह एक खज़ाना है, क्योंकि इस जहाज़ से उन्हें बहुत उपयोगी जानकारियाँ मिल रही हैं। जैसे, इस 17वीं सदी के जहाज़ में 25,000 से भी अधिक कलाकृतियाँ हैं जो उस जहाज़ की प्रत्येक छोटीबड़ी मज़ेदार बातों की जानकारी देती है। इसके अतिरिक्त इससे उस समय के जहाज़ बनाने के तरीकों और मूर्तिकला को अच्छी तरह से समझने में भी मदद मिल रही है।

वासा जहाज़ की एकएक वस्तु आज तक सहीसलामत क्यों रही? एक बात तो यह है कि वह जहाज़ एकदम नया था। साथ ही समुद्री कीचड़ में धँसे होने के कारण उसकी लकड़ियों में कीड़े नहीं लगे जो अकसर खारे पानी में पड़ी लकड़ी को खा जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि वासा जहाज़ को स्थिर रखने के लिए 240 टन से भी अधिक वज़न की जरूरत थी, लेकिन वासा में केवल 120 टन वज़न डाला गया था। क्योंकि अधिक वज़न से जहाज़ भारी हो जाता, जिससे कि निचले तोपडेक के छिद्रों से पानी घुस जाता और जहाज़ डूब सकता था। साथ ही इतने अधिक वज़न के लिए जहाज़ में पर्याप्त स्थान भी नहीं था। वासा दिखने में बहुत खूबसूरत था, केवल उसमें संतुलन की कमी थी। और यही कमी उसे ले डूबी।

अब इस जहाज़ को संग्रहालय में रखा गया है। वह दुनिया का ऐसा सबसे पुराना जहाज़ है जिसकी एकएक वस्तु सन 1628 की दुर्घटना के बाद भी सहीसलामत है। संग्रहालय में प्रत्येक साल लगभग नौ लाख लोग 17वीं सदी के उस आलीशान और वैभवपूर्ण जहाज़ को देखने आते हैं। वह जहाज़ हमें याद दिलाता है कि जिनके पास ताकत होती है, वे कैसे अपने अहंकार और हठ की वजह से सही तरीकों को नज़रअंदाज कर देते हैं।

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