लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

संसार के सभी मनुष्यों वा स्त्री-पुरुषों पर ध्यान केन्द्रित करें तो यह सभी एक बहुत ही बुद्धिमान व सर्वव्यापी कलाकार की रचनायें अनुभव होती हैं। संसार भर में सभी मनुष्य की दो आंखे, दो कान, नाक, मुंह, गला, शिर, वक्ष, उदर, कटि व पैर प्रायः एक समान ही हैं। सभी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह अपने बनाने वाले को जाने, उसका धन्यवाद करें, उससे कृतज्ञ एवं अनुग्रहीत हों। यही मनुष्यता वा मानवधर्म का आधार व मुख्य सिद्धान्त है। आज का मनुष्य अनेक प्रकार के ज्ञान से सम्पन्न है। विज्ञान तो अपनी चरम अवस्था पर आ पहुंच है परन्तु यदि धार्मिक व सामाजिक ज्ञान की बात करें तो आज भी संसार में इस क्षेत्र में अधिकांशतः कृपणता ही दृष्टिगोचर होती है। संसार मे प्रमुख मत जिन्हें रूढ़ अर्थों में धर्म कह देते हैं, 5 या 6 हैं। इन सभी मतों वा धर्मों के लोग वा विद्वान ईश्वर के स्वरूप, स्वभाव व कृतित्व आदि पर समान विचार नहीं रखते अर्थात् इनमें परस्पर कुछ समानतायें व कुछ भिन्नतायें है। मनुष्य का आत्मा अल्पज्ञ है अतः विचारों में अन्तर व भिन्नता होना स्वाभाविक है। इसके साथ मनुष्य का यह भी कर्तव्य है जिन विषयों में परस्पर भिन्नता हो, उस पर सदभावपूर्वक परस्पर संवाद करें और युक्ति व तर्क से सत्य का निर्णय कर उसे स्वीकार करें। परन्तु हम देखते हैं कि सभी मतों के विद्वान व आचार्य न तो भिन्न-भिन्न विचार वाले विषयों पर परस्पर संवाद कर चर्चा व निर्णय ही करते हैं और न ही अपने ही मत व पन्थ के भीतर विचार, चिन्तन कर अपनी मान्यताओं व सिद्धान्तों को सत्य की कसौटी पर कसते हैं। अनुपयोगी, अप्रसांगिक व मिथ्या मान्यताओं के सुधार व संशोधन की उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसके विपरीत यही देखा जाता है कि प्रत्येक मत व सम्प्रदाय का अनुयायी अथवा विद्वान अपनी सत्य व असत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों पर आंखें बन्द कर विश्वास करता है व वैसा ही आचरण करता है। इसी को अन्धविश्वास, मिथ्याविश्वास एवं मिथ्याचार कह सकते हैं। मतों के इस व्यवहार से उनके अपने अनुयायी मनुष्यों का उपकार होने के स्थान पर अपकार ही होता है। मनुष्य का जन्म सत्य व असत्य को जानकर सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए ही हुआ है। सत्य के ग्रहण से मानव की सर्वांगीण उन्नति होती है और ऐसा न करने से भौतिक उन्नति कोई कितनी ही कर ले परन्तु, धन, सम्पत्ति व भौतिक साधनों से, आध्यात्मिक व परलोक की उन्नति कदापि सम्भव नहीं है। जिस प्रकार विज्ञान में सभी मान्यतायें तर्क, युक्ति तथा क्रियात्मक प्रयोग के परिणामों के आधार पर अपनायी व स्वीकार की जाती है जिन्हें सभी देशों के वैज्ञानिक व सामान्यजन सार्वभौमिक रूप में स्वीकार करते हैं, इसी प्रकार से मनुष्यों के धर्म के सभी सिद्धान्त भी तर्क, युक्ति व प्रमाणों के आधार पर निर्धारित होने के साथ समस्त संसार में एक व समान होने चाहिये। धार्मिक, सामाजिक, संस्कृति व सभ्यता विषयक सत्य सिद्धान्तों का सार्वभौमिक रूप से निर्धारण होकर मनुष्य कब इनको अपनायेगा, कहा नहीं जा सकता। वह मनुष्यमात्र के सार्वभौमिक सत्य धर्म के निर्णय में जितना विलम्ब करेगा उसके इस कार्य से दोह व्यक्तिगत व सामाजिक हानि होना निश्चित है। अतः मनुष्य को मननशील होकर सत्य का निर्धारण करना व उसी सत्य मार्ग का अनुकरण व अनुसरण करना ही उसका मुख्य कर्तव्य वा धर्म होने के साथ उसके लिए लाभकारी है।

 

संसार के सभी मतों व धर्मग्रन्थों में वेद सर्वाधिक प्राचीन है। वेद किसी विषय व वस्तु आदि को जानने अर्थात् ज्ञान को कहते हैं। यदि वेद धर्मग्रन्थ हैं तो हमारा मुख्य धर्म सत्य व ज्ञान ही कहा जा सकता है। प्रश्न है कि ज्ञान की उत्पत्ति किससे होती है? इसका उत्तर है कि ज्ञान की उत्पत्ति मनुष्यों से नहीं अपितु ईश्वर के द्वारा संसार की रचना को करने से होती है। मनुष्य वा वैज्ञानिक तो सृष्टि में कार्यरत नियमों व ज्ञान की खोज करते हैं। विज्ञान में जितने भी नियम हैं उनका ज्ञान व वह सभी नियम हमारी सृष्टि की आदि से ही संसार में विद्यमान हैं व कार्य कर रहे हैं। इनमें से अनेक नियमों का बीज रूप में ज्ञान वेद में सृष्टि के आरम्भ काल से ही विद्यमान है। हमारे ऋषियों ने वेदों का अध्ययन कर संसार में कार्यरत सभी नियमों को जाना था और इसके साथ ही जीवात्मा और परमात्मा के स्वरुप को भी जाना व समझा था। वह जानते थे कि जीवात्मा को सत्य का आचरण करने के साथ ईश्वरोपासना व पर्यावरण की शुद्धि के लिए यज्ञ आदि कार्यों को करना है जिससे अर्जित कर्माशय से वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर जन्म मरण के दुःख रूपी अभिविनेश क्लेश पर विजय प्राप्त कर सके। एकांगी विज्ञान को विकसित कर, उससे सुख-सुविधा की वस्तुएं और युद्ध की विध्वंशक सामग्री बनाकर यह लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता था। अतः उन्होंने सन्तुलित जीवन के महत्व को जानकर अपने जीवन व कार्यों में न्याय किया था। यदि गति के नियमों की बात करें तो हमारे पूर्वजों को खगोल ज्योतिष का उच्च कोटि का ज्ञान था। इसके आधार पर वह वर्षों पूर्व ही भविष्य में होने वाले सूर्य व चन्द्र ग्रहण की त्रुटिरहित गणना के साथ खगोल के अनेकानेक रहस्यों से परिचित थे। आयुर्वेद रोगों से मानव जीवन की रक्षा का शास्त्र व विद्या है। इसका भी प्राचीन काल में पूर्ण विकास हुआ था। प्राचीन काल में अकाल व अल्पायु में मृत्यु बहुत कम हुआ करती थीं। प्राचीन काल से महाभारत काल के बाद का समय अपेक्षित न होकर उससे पूर्व का समय अभिप्रेत है। इसी प्रकार से अनेकानेक तीव्र गति से चलने वाले रथ वा यान भी हुआ करते थे। हमारे पूर्वज समुद्र की यात्रायंे भी करते थे। अर्जुन की पत्नी उलोपी तो पाताल वा अमेरिका की निवासी थी। वैदिक विद्वान पाराशर अमेरिका में काफी समय तक रहे, इसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। अतः प्राचीन काल से महाभारत काल तक आध्यात्मिक व भौतिक विज्ञान का विकास अपनी चरम अवस्था में रहा है, इसका अनुमान प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययन से मिलता है। इन परा व अपरा विद्याओं का विकास वेदों के आधार पर हमारे ऋषियों ने किया था। अतः वेद मानव धर्म सहित सभी सत्य विद्याओं का भी प्रकाश करते हैं और अपने अध्येता को यह सामथ्र्य व बौद्धिक क्षमता प्रदान करते हैं कि व्यक्तिगत व संगठित रूप से अनेक विद्याओं व विज्ञान को विकसित कर सकें।

 

धर्म का सम्बन्ध मनुष्यों के आचरण से होता है। आचरण यदि सत्य पर आधारित है तो वह धर्म और इसके विपरीत अधर्म कहलाता है। सत्य की परीक्षा के लिए लक्षण व प्रमाणों के आधार पर निर्णय किया जाता है। वेदों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि यह परा व अपरा विद्याओं सहित मानव के सभी प्रकार के कर्तव्यों का शास्त्र भी है जिसकी प्रत्येक बात ईश्वर प्रदत्त होने से सत्य की कसौटी पर भी खरी है। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में संसार के सभी मतों के आचार्यों व विद्वानों को खुली चुनौती दी थी कि वह उनसे मिलकर किसी भी धार्मिक विषय में शंका समाधान सहित शास्त्रार्थ कर सकते है। किसी मत व उसके आचार्य में उनसे शास्त्रार्थ करने का उत्साह व साहस नहीं हुआ। जिन लोगों ने उनसे वार्तालाप व चर्चायें कीं, उनको उन्होंने पूर्ण सन्तुष्ट किया था। यह मानव जीवन की अपनी विशेषता ही है कि अनेक विद्वान भी तर्क व युक्ति से सिद्ध सत्य बातों को न मानकर उसके विपरीत असत्य व तर्कहीन बातों को ही मानते व आचरण में लाते हैं। इस मानव स्वभाव को पूर्णतः बदलना अर्थात् सुधार करना शायद् सम्भव नहीं है। यदि ऐसा होता तो संसार में केवल एक मत होता और लोगों में जिन विषयों पर भ्रान्तियां होती, उसका समाधान परस्पर वार्तालाप व गोष्ठी करके सद्भाव पूर्वक हो जाता। परीक्षा करने पर वेद ईश्वर प्रदत्त एवं सत्य ज्ञान से पूर्ण सिद्ध होते हैं। अन्य मतों की स्थिति यह है कि उनकी बहुत सी बाते सत्य हैं व अनेक सत्य नहीं हैं। नाना मतों में विद्यमान इन असत्य व अज्ञान की बातों पर उन-उन मतों के आचार्यों को विचार व चिन्तन कर उनका सुधार व संशोधन करना चाहिये। इसका संकेत व दिग्दर्शन महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में किया था और उनमें से कुछ का संकलन नमूने के तौर पर सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में किया है। महाभारत काल से पूर्व भी यह परम्परा समस्त विश्व में विद्यमान रही है। इसी कारण महाभारतकाल तक वैदिक मान्यतानुसार 1.96 अरब वर्षों में कोई वेदों से इतर नया मत अस्तित्व में नहीं आया था। भारत का बौद्ध, जैन व पौराणिक मत हो या विदेश के अन्य सभी मत, यह सभी अज्ञान व अन्धकार के उस काल मध्यकाल में आये जब वेदों का ज्ञान अस्त व विलुप्त हो गया था। महर्षि दयानन्द ने अपने अपूर्व पुरुषार्थ से वेदों के सत्य ज्ञान की खोज की और उसे देश-देशान्तर के लोगों के लिए उपलब्ध करा दिया। व्यवहारिक रूप से वर्तमान में वेद ही संसार के सभी मनुष्यों का सार्वभौमिक एक मात्र धर्म है। वेद में अज्ञानमूलक भ्रान्तिपूर्ण कोई बात नहीं है। किसी कुरीति व असमानता का प्रचलन वेद से नहीं हुआ और न ही वेद में ऐसी कोई बात है। देश-विदेश के सभी अन्धविश्वास व कुरीतियां मनुष्यों के वेद ज्ञान से दूर होने व उनके अपने अज्ञान के कारण उत्पन्न हुईं हैं। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य सत्य को जानकर उसका ग्रहण कर व आचरण में लाकर ईश्वरोपासना, यज्ञ, परोपकार, परसेवा, भलाई के काम करके मृत्यु पर विजय प्राप्त करना वा जन्म मरण से छूटकर मोक्ष के आनन्द की प्राप्ति करना है। यह केवल वैदिक धर्म की शरण में आने व उसके अनुरुप आचरण व व्यवहार करने से ही सम्भव हो सकता है। संसार के सभी लोग, मुख्यतः सभी धर्माचार्य, निष्पक्ष भाव से वेदों का अध्ययन कर अपने जीवन को सत्य मार्ग पर चलाने के साथ अपने अनुयायियों को प्रेरणा कर सभी धर्म-अर्थ-काम व मोक्ष की प्राप्ति करें, यही धर्म का प्रयोजन है। यह स्पष्ट है कि वेद सार्वभौमिक मानव धर्म के ग्रन्थ है। आईये, वेदों की शरण में चले और कृतकार्य हों।

 

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मनमोहन आर्य

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संसार के सभी मनुष्यों वा स्त्री-पुरुषों पर ध्यान केन्द्रित करें तो यह सभी एक बहुत ही बुद्धिमान व सर्वव्यापी कलाकार की रचनायें अनुभव होती हैं। संसार भर में सभी मनुष्य की दो आंखे, दो कान, नाक, मुंह, गला, शिर, वक्ष, उदर, कटि व पैर प्रायः एक समान ही हैं। सभी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह अपने बनाने वाले को जाने, उसका धन्यवाद करें, उससे कृतज्ञ एवं अनुग्रहीत हों। यही मनुष्यता वा मानवधर्म का आधार व मुख्य सिद्धान्त है। आज का मनुष्य अनेक प्रकार के ज्ञान से सम्पन्न है। विज्ञान तो अपनी चरम अवस्था पर आ पहुंच है परन्तु यदि धार्मिक व सामाजिक ज्ञान की बात करें तो आज भी संसार में इस क्षेत्र में अधिकांशतः कृपणता ही दृष्टिगोचर होती है। संसार मे प्रमुख मत जिन्हें रूढ़ अर्थों में धर्म कह देते हैं, 5 या 6 हैं। इन सभी मतों वा धर्मों के लोग वा विद्वान ईश्वर के स्वरूप, स्वभाव व कृतित्व आदि पर समान विचार नहीं रखते अर्थात् इनमें परस्पर कुछ समानतायें व कुछ भिन्नतायें है। मनुष्य का आत्मा अल्पज्ञ है अतः विचारों में अन्तर व भिन्नता होना स्वाभाविक है। इसके साथ मनुष्य का यह भी कर्तव्य है जिन विषयों में परस्पर भिन्नता हो, उस पर सदभावपूर्वक परस्पर संवाद करें और युक्ति व तर्क से सत्य का निर्णय कर उसे स्वीकार करें। परन्तु हम देखते हैं कि सभी मतों के विद्वान व आचार्य न तो भिन्न-भिन्न विचार वाले विषयों पर परस्पर संवाद कर चर्चा व निर्णय ही करते हैं और न ही अपने ही मत व पन्थ के भीतर विचार, चिन्तन कर अपनी मान्यताओं व सिद्धान्तों को सत्य की कसौटी पर कसते हैं। अनुपयोगी, अप्रसांगिक व मिथ्या मान्यताओं के सुधार व संशोधन की उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसके विपरीत यही देखा जाता है कि प्रत्येक मत व सम्प्रदाय का अनुयायी अथवा विद्वान अपनी सत्य व असत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों पर आंखें बन्द कर विश्वास करता है व वैसा ही आचरण करता है। इसी को अन्धविश्वास, मिथ्याविश्वास एवं मिथ्याचार कह सकते हैं। मतों के इस व्यवहार से उनके अपने अनुयायी मनुष्यों का उपकार होने के स्थान पर अपकार ही होता है। मनुष्य का जन्म सत्य व असत्य को जानकर सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए ही हुआ है। सत्य के ग्रहण से मानव की सर्वांगीण उन्नति होती है और ऐसा न करने से भौतिक उन्नति कोई कितनी ही कर ले परन्तु, धन, सम्पत्ति व भौतिक साधनों से, आध्यात्मिक व परलोक की उन्नति कदापि सम्भव नहीं है। जिस प्रकार विज्ञान में सभी मान्यतायें तर्क, युक्ति तथा क्रियात्मक प्रयोग के परिणामों के आधार पर अपनायी व स्वीकार की जाती है जिन्हें सभी देशों के वैज्ञानिक व सामान्यजन सार्वभौमिक रूप में स्वीकार करते हैं, इसी प्रकार से मनुष्यों के धर्म के सभी सिद्धान्त भी तर्क, युक्ति व प्रमाणों के आधार पर निर्धारित होने के साथ समस्त संसार में एक व समान होने चाहिये। धार्मिक, सामाजिक, संस्कृति व सभ्यता विषयक सत्य सिद्धान्तों का सार्वभौमिक रूप से निर्धारण होकर मनुष्य कब इनको अपनायेगा, कहा नहीं जा सकता। वह मनुष्यमात्र के सार्वभौमिक सत्य धर्म के निर्णय में जितना विलम्ब करेगा उसके इस कार्य से दोह व्यक्तिगत व सामाजिक हानि होना निश्चित है। अतः मनुष्य को मननशील होकर सत्य का निर्धारण करना व उसी सत्य मार्ग का अनुकरण व अनुसरण करना ही उसका मुख्य कर्तव्य वा धर्म होने के साथ उसके लिए लाभकारी है।

संसार के सभी मतों व धर्मग्रन्थों में वेद सर्वाधिक प्राचीन है। वेद किसी विषय व वस्तु आदि को जानने अर्थात् ज्ञान को कहते हैं। यदि वेद धर्मग्रन्थ हैं तो हमारा मुख्य धर्म सत्य व ज्ञान ही कहा जा सकता है। प्रश्न है कि ज्ञान की उत्पत्ति किससे होती है? इसका उत्तर है कि ज्ञान की उत्पत्ति मनुष्यों से नहीं अपितु ईश्वर के द्वारा संसार की रचना को करने से होती है। मनुष्य वा वैज्ञानिक तो सृष्टि में कार्यरत नियमों व ज्ञान की खोज करते हैं। विज्ञान में जितने भी नियम हैं उनका ज्ञान व वह सभी नियम हमारी सृष्टि की आदि से ही संसार में विद्यमान हैं व कार्य कर रहे हैं। इनमें से अनेक नियमों का बीज रूप में ज्ञान वेद में सृष्टि के आरम्भ काल से ही विद्यमान है। हमारे ऋषियों ने वेदों का अध्ययन कर संसार में कार्यरत सभी नियमों को जाना था और इसके साथ ही जीवात्मा और परमात्मा के स्वरुप को भी जाना व समझा था। वह जानते थे कि जीवात्मा को सत्य का आचरण करने के साथ ईश्वरोपासना व पर्यावरण की शुद्धि के लिए यज्ञ आदि कार्यों को करना है जिससे अर्जित कर्माशय से वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर जन्म मरण के दुःख रूपी अभिविनेश क्लेश पर विजय प्राप्त कर सके। एकांगी विज्ञान को विकसित कर, उससे सुख-सुविधा की वस्तुएं और युद्ध की विध्वंशक सामग्री बनाकर यह लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता था। अतः उन्होंने सन्तुलित जीवन के महत्व को जानकर अपने जीवन व कार्यों में न्याय किया था। यदि गति के नियमों की बात करें तो हमारे पूर्वजों को खगोल ज्योतिष का उच्च कोटि का ज्ञान था। इसके आधार पर वह वर्षों पूर्व ही भविष्य में होने वाले सूर्य व चन्द्र ग्रहण की त्रुटिरहित गणना के साथ खगोल के अनेकानेक रहस्यों से परिचित थे। आयुर्वेद रोगों से मानव जीवन की रक्षा का शास्त्र व विद्या है। इसका भी प्राचीन काल में पूर्ण विकास हुआ था। प्राचीन काल में अकाल व अल्पायु में मृत्यु बहुत कम हुआ करती थीं। प्राचीन काल से महाभारत काल के बाद का समय अपेक्षित न होकर उससे पूर्व का समय अभिप्रेत है। इसी प्रकार से अनेकानेक तीव्र गति से चलने वाले रथ वा यान भी हुआ करते थे। हमारे पूर्वज समुद्र की यात्रायंे भी करते थे। अर्जुन की पत्नी उलोपी तो पाताल वा अमेरिका की निवासी थी। वैदिक विद्वान पाराशर अमेरिका में काफी समय तक रहे, इसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। अतः प्राचीन काल से महाभारत काल तक आध्यात्मिक व भौतिक विज्ञान का विकास अपनी चरम अवस्था में रहा है, इसका अनुमान प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययन से मिलता है। इन परा व अपरा विद्याओं का विकास वेदों के आधार पर हमारे ऋषियों ने किया था। अतः वेद मानव धर्म सहित सभी सत्य विद्याओं का भी प्रकाश करते हैं और अपने अध्येता को यह सामथ्र्य व बौद्धिक क्षमता प्रदान करते हैं कि व्यक्तिगत व संगठित रूप से अनेक विद्याओं व विज्ञान को विकसित कर सकें।

धर्म का सम्बन्ध मनुष्यों के आचरण से होता है। आचरण यदि सत्य पर आधारित है तो वह धर्म और इसके विपरीत अधर्म कहलाता है। सत्य की परीक्षा के लिए लक्षण व प्रमाणों के आधार पर निर्णय किया जाता है। वेदों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि यह परा व अपरा विद्याओं सहित मानव के सभी प्रकार के कर्तव्यों का शास्त्र भी है जिसकी प्रत्येक बात ईश्वर प्रदत्त होने से सत्य की कसौटी पर भी खरी है। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में संसार के सभी मतों के आचार्यों व विद्वानों को खुली चुनौती दी थी कि वह उनसे मिलकर किसी भी धार्मिक विषय में शंका समाधान सहित शास्त्रार्थ कर सकते है। किसी मत व उसके आचार्य में उनसे शास्त्रार्थ करने का उत्साह व साहस नहीं हुआ। जिन लोगों ने उनसे वार्तालाप व चर्चायें कीं, उनको उन्होंने पूर्ण सन्तुष्ट किया था। यह मानव जीवन की अपनी विशेषता ही है कि अनेक विद्वान भी तर्क व युक्ति से सिद्ध सत्य बातों को न मानकर उसके विपरीत असत्य व तर्कहीन बातों को ही मानते व आचरण में लाते हैं। इस मानव स्वभाव को पूर्णतः बदलना अर्थात् सुधार करना शायद् सम्भव नहीं है। यदि ऐसा होता तो संसार में केवल एक मत होता और लोगों में जिन विषयों पर भ्रान्तियां होती, उसका समाधान परस्पर वार्तालाप व गोष्ठी करके सद्भाव पूर्वक हो जाता। परीक्षा करने पर वेद ईश्वर प्रदत्त एवं सत्य ज्ञान से पूर्ण सिद्ध होते हैं। अन्य मतों की स्थिति यह है कि उनकी बहुत सी बाते सत्य हैं व अनेक सत्य नहीं हैं। नाना मतों में विद्यमान इन असत्य व अज्ञान की बातों पर उन-उन मतों के आचार्यों को विचार व चिन्तन कर उनका सुधार व संशोधन करना चाहिये। इसका संकेत व दिग्दर्शन महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में किया था और उनमें से कुछ का संकलन नमूने के तौर पर सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में किया है। महाभारत काल से पूर्व भी यह परम्परा समस्त विश्व में विद्यमान रही है। इसी कारण महाभारतकाल तक वैदिक मान्यतानुसार 1.96 अरब वर्षों में कोई वेदों से इतर नया मत अस्तित्व में नहीं आया था। भारत का बौद्ध, जैन व पौराणिक मत हो या विदेश के अन्य सभी मत, यह सभी अज्ञान व अन्धकार के उस काल मध्यकाल में आये जब वेदों का ज्ञान अस्त व विलुप्त हो गया था। महर्षि दयानन्द ने अपने अपूर्व पुरुषार्थ से वेदों के सत्य ज्ञान की खोज की और उसे देश-देशान्तर के लोगों के लिए उपलब्ध करा दिया। व्यवहारिक रूप से वर्तमान में वेद ही संसार के सभी मनुष्यों का सार्वभौमिक एक मात्र धर्म है। वेद में अज्ञानमूलक भ्रान्तिपूर्ण कोई बात नहीं है। किसी कुरीति व असमानता का प्रचलन वेद से नहीं हुआ और न ही वेद में ऐसी कोई बात है। देश-विदेश के सभी अन्धविश्वास व कुरीतियां मनुष्यों के वेद ज्ञान से दूर होने व उनके अपने अज्ञान के कारण उत्पन्न हुईं हैं। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य सत्य को जानकर उसका ग्रहण कर व आचरण में लाकर ईश्वरोपासना, यज्ञ, परोपकार, परसेवा, भलाई के काम करके मृत्यु पर विजय प्राप्त करना वा जन्म मरण से छूटकर मोक्ष के आनन्द की प्राप्ति करना है। यह केवल वैदिक धर्म की शरण में आने व उसके अनुरुप आचरण व व्यवहार करने से ही सम्भव हो सकता है। संसार के सभी लोग, मुख्यतः सभी धर्माचार्य, निष्पक्ष भाव से वेदों का अध्ययन कर अपने जीवन को सत्य मार्ग पर चलाने के साथ अपने अनुयायियों को प्रेरणा कर सभी धर्म-अर्थ-काम व मोक्ष की प्राप्ति करें, यही धर्म का प्रयोजन है। यह स्पष्ट है कि वेद सार्वभौमिक मानव धर्म के ग्रन्थ है। आईये, वेदों की शरण में चले और कृतकार्य हों।

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