लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

महर्षि दयानन्द महाभारत काल के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने संसार को ईश्वर, जीव व प्रकृति, इन तीन सत्ताओं का सिद्धान्त दिया जिसे त्रैतवाद के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त युक्ति, तर्क तथा प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी सिद्ध होता है। इस कारण इसके विपरीत अन्य सभी सिद्धान्त अपूर्ण व दोषपूर्ण होने से निरस्त हो जाते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार संसार में एक सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान, अनादि, अनन्त, नित्य, पवित्र व सृष्टि की रचना करने में सक्षम सृष्टिकत्र्ता सत्ता है जिसे ईश्वर व परमेश्वर आदि अनेक नामों से पुकारते हैं। यह तीन सत्ताओं में पहली व प्रमुख सत्ता है। दूसरी सत्ता चेतन जीव आत्मायें हैं जो आकार-प्रकार व परिमाण में एकदेशी, अल्पज्ञ, अल्पशक्तिवाली, जन्म-मरण-मोक्ष धर्मा, सूक्ष्म, आंखों से न दिखने योग्य सत्ता व सत्तायें हैं। यह जीवात्मायें मनुष्यों के ज्ञान की दृष्टि से संख्या में अनन्त हैं परन्तु ईश्वर के ज्ञान में समस्त जीवात्माओं की संख्या परिमित है। संसार की तीसरी प्रमुख सत्ता प्रकृति है। यह मूल प्रकृति सत्, रज व तम गुणों वाली अत्यन्त सूक्ष्म सत्ता है। इन्हीं के विकार से परमाणु व अणु आदि बनकर यह समस्त संसार बना है। सांख्य दर्शन के अनुसार (सत्व) शुद्ध, (रज) मध्य, (तमः) जाड्य अर्थात् जड़ता, यह तीन वस्तु व सूक्ष्म कण मिलकर जो एक संघात है, उस का नाम प्रकृति है। इस संघात वा परमाणुरूप प्रकृति से महत्तत्व बुद्धि, उससे अहंकार, उससे पांच तन्मात्रा, सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन बनता व बना है। पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत, ये चैबीस (पदार्थ) और पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीवात्मा और (छब्बीसवां) परमेश्वर है। इनमें से प्रकृति अधिकारिणी, और महतत्व, अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य, और इन्द्रियां, मन तथा स्थूल भूतों का कारण हैं। पुरुष (जीवात्मा व परमात्मा) न किसी की प्रकृति, उपादान कारण और न किसी का कार्य है।

 

इस त्रैतवाद सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर जीवात्माओं को उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार मनुष्यादि योनियों में जन्म देकर उन्हें उन्नति व सुख प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। जीवात्मा के पास जो उसका शरीर व अन्य सभी सुख-सुविधायें हैं, वह सब परमात्मा की देन हैं। मनुष्य रूप में जीवात्मा का कर्तव्य है कि वह अपने जन्मदाता व पोषण करने वाले ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करे। महर्षि दयानन्द के आगमन से पूर्व प्रचलित सभी मनुष्योक्त मत-मतान्तरों के अनुयायी अपनी अपनी पद्धति व शब्दावली में स्तुति व प्रार्थना करते थे। महर्षि दयानन्द ने वेद मन्त्रों के स्तुति व प्रार्थनापरक अर्थ करके जो व्याख्यान उपलब्ध करायें हैं, वह अन्य सभी मत-मतान्तरों की शब्दावलियों व उनमें निहित भावों से तुलना करने पर अद्वितीय, अनुपम व सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। वैसे तो महर्षि दयानन्द और उनके अनुयायी विद्वानों ने वेदों के भाष्य करते हुए अनेक अद्वितीय स्तुति व प्रार्थनाओं के व्याख्यान अपने वेदभाष्यों और इतर ग्रन्थो में किये हैं परन्तु आज हम अपना ध्यान ऋषि दयानन्द द्वारा अग्निहोत्र यज्ञ आदि के अवसर पर की जाने वाली स्तुति, प्रार्थना व उपासना के आठ मन्त्रों में अन्तिम आठवें मन्त्र के कुछ शब्दों पर केन्द्रित कर रहे हैं। यह मन्त्र है ‘ओ३म् अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जहुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नमऽउक्तिं विधेम।।‘ इस मन्त्र का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि हे (अग्ने) स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत् के प्रकाश करनेहारे, (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर ! आप जिससे (विद्वान्) सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके (अस्मान्) हम लोगों को (राये) विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए (सुपथा) अच्छे, धर्मयुक्त, आप्त लोगों के मार्ग से (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्म  (नय) प्राप्त कराइए और (अस्मत्) हमसे (जुहुराणम्) कुटिलतायुक्त (एनः) पापरूप कर्म को (युयोधि) दूर कीजिए। इस कारण हम लोग (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार की स्तुतिरूप (नमः उक्तिम्) नम्रतापूर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा किया करें और सर्वदा आनन्द में रहें।

 

महर्षि दयानन्द नेे मन्त्र के ‘राये’ पद के अर्थ में ‘विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए’ हिन्दी के पदों व शब्दों का प्रयोग किया है। विज्ञान व राज्यादि शब्दों का ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना में प्रयोग धार्मिक जगत में वस्तुतः एक नवीन व महत्वपूर्ण बात प्रतीत होती है। हमने देखा है कि कुछ धर्म ग्रन्थों में ईश्वर से सुबह व सायं के समय भोजन वा रोटी की प्रार्थना की गई है। इससे उन मतों के आचार्यों के विचार व ज्ञान का आभास होता है। महर्षि दयानन्द इस सृष्टि के रचयिता व वेदों के देने वाले ईश्वर के ऐसे अनुयायी हैं जिन्हें वेदों का ज्ञान होने के साथ योग द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार करने की सिद्धि भी प्राप्त है। अतः उनकी चमत्कारिक बुद्धि ने ईश्वर द्वारा ‘राये’ पद में विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति जैसे उत्तमोत्तम अर्थों को निहित जानकर उसका देश विदेश के सभी लोगों के लिए प्रकाश किया है। महर्षि अन्यत्र यह भी विधान करते हैं कि मनुष्य ईश्वर से जो प्रार्थना करे उसके लिए उस प्रार्थना के अनुरूप कर्म भी करने चाहिये। अतः ईश्वर से विज्ञान और राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति की प्रार्थना करते हुए हमें इनकी प्राप्ति के अनुरूप कर्म व पुरुषार्थ भी करने हैं, तभी हमें यह पदार्थ विज्ञान व राज्यादि ऐश्वर्य प्राप्त होते व हो सकते हैं। हम जानते हैं कि ऋषि दयानन्द के प्रचार से प्रभावित होकर उनके शिष्यों ने पराधीनता के काल में देश में दयानन्द ऐग्लों वैदिक स्कूल एवं गुरुकुलों की स्थापना की थी जिससे देश में सर्वत्र ज्ञान-विज्ञान की वृद्धि हुई। स्वामी दयानन्द जी व उनके आर्योंपदेशकों के प्रचार सहित आर्यसमाज की शिक्षण संस्थाओं से विद्या का प्रकाश हुआ जिससे देश को गुलामी के दुष्प्रभावों व हानियों का ज्ञान हुआ और देश में क्रान्तिकारी व अंहिसात्मक आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ जिसका परिणम राज्यादि ऐश्वर्य के रूप में देश की स्वतन्त्रता के रूप में मिला। आर्यसमाज द्वारा देश भर में संचालित शिक्षण संस्थाओं द्वारा अविद्या का नाश व विद्या की वृद्धि सहित विज्ञान की वृद्धि प्रमुख उत्पाद के रूप में हुई। हमें लगता है कि स्वामी जी ने इस वेद मन्त्र को प्रस्तुत कर लोगों को विज्ञान व राज्यादि ऐश्वर्य की वृद्धि करने के लिए विश्व में सर्वप्रथम प्रेरित किया था जिसका परिणाम देश में विज्ञान की वृद्धि के साथ स्वतन्त्रता की प्राप्ति रही। यदि आर्यसमाज व उसके अनुयायी स्वतन्त्रता आन्दोलन का नेतृत्व करते तो यह देश का सौभाग्य होता जिससे देश में सभी आर्योचित कार्य हो पाते। कोई देश के अहित का निर्णय न होता। आर्यसमाज द्वारा आजादी के आन्दोलन का नेतृत्व न करने का ही परिणाम है कि देश से जन्मना जातिवाद समाप्त नहीं हो सका, गोहत्या आज भी जारी है, संस्कृत व हिन्दी को उसका उचित स्थान नहीं मिला, अल्पसंख्यकवाद वा तुष्टिकरण सहित वोटबैंक राजनीति को प्रश्रय मिला और राष्ट्र भाषा हिन्दी होते हुए भी अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। देश के शहीदों सहित महर्षि दयानन्द, श्यामजी कृष्ण वर्मा, स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, वीर सावरकर आदि अनेक क्रान्तिकारियों को उनके योगदान के अनुरूप देश के इतिहास व परम्पराओं में स्थान नहीं दिया गया। अस्तु।

 

हम समझते हैं कि जिस देश व समाज में स्वामी दयानन्द जी द्वारा स्तुति, प्रार्थना उपासना मन्त्रों में उपर्युक्त मन्त्र के अनुरूप भावना होगी, कार्य व व्यवहार होगा वह देश गुलाम नहीं होगा और यदि भारत के समय गुलाम रहा हो तो भी इस मंत्र व प्रार्थना के अनुरूप देशवासियों का जीवन बनाकर देश को स्वतन्त्र तथा समाज को उन्नत बनाया जा सकता है। लेख को समाप्त करने से पूर्व हम यह कहना चाहेंगे कि यह वेद मन्त्र व इसका अर्थ स्तुति व प्रार्थना के अन्य मन्त्रों के समान व कुछ अधिक उत्तम व उपादेय है। इसका प्रयोग करते हुए हमें देश को स्वतन्त्र रखने के साथ उसे सामाजिक दृष्टि से भी उत्तम व श्रेष्ठ बनाने की ओर ध्यान देना चाहिये। समाज को टुकड़ों जाति, सम्प्रदाय, अगड़े व पिछड़े के रूप में न देख कर वेदों की पक्षपातरहित न्याय की भावना से सबके विकास व उन्नति की ओर ध्यान देना चाहिये और तुष्टिकरण सहित स्वार्थों से ऊपर उठकर देशहित को सर्वोपरि मान कर काम करना चाहिये। ऋषि दयानन्द लिखित साहित्य पढ़ने से यह भी विदित होता है कि वेद, वैदिक साहित्य वा दर्शन तथा सत्यार्थप्रकाश को पढ़ने वाला देश ज्ञान व विज्ञान से सम्बपन्न बनता है और अज्ञान व अन्धविश्वासों से दूर होता है। वैदिक राष्ट्र में सभी नागरिकों में सामाजिक दृष्टि से समानता होगी। शोषण व अन्याय नहीं होगा तथा वह देश कभी पराधीन व परतन्त्र नहीं हो सकता। जहां वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार राज्य होगा वहां के नागरिक सर्वाधिक स्वस्थ, सुखी, व दीर्घायु को प्राप्त करने वाले होंगे। वेदों में सामान्य लोगों द्वारा ईश्वर से विज्ञान व राज्यादि ऐश्वर्य की प्रार्थना होने से यह इस सृष्टि के सर्वोत्तम व महान धर्म ग्रन्थ हैं। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

 

 

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