लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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ई मेल के जमाने मेंmann_chahe

पता नहीं क्यों

आज भी मेरा मन

ख़त लिखने को करता है।

मेरा मन

आज भी

ई टिकट की जगह

लाईन में लग कर

रेल का आरक्षण

करवाने को करता है।

पर्व-त्योहारों के संक्रमण के दौर में

मेरा मन

बच्चों की तरह

गोल-गप्पे खाने

को करता है।

फोन से तो

मैं हमेशा डरा रहता हूँ

पता नहीं

कौन, कब

कौन सी

खबर सुना दे

बिना किसी भाव के

बिना किसी संवेदना के

शायद इसीलिए

आज भी

मेरा मन

टेलीग्राम का इंतजार

करने को करता है।

ऐसे खतरनाक समय में

इसलिए लोगों

मेरा मन

गुजरे पलों में

जीने को करता है।

-सतीष सिंह

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3 Comments on "कविता / मेरा मन"

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लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
Guest

सतीश जी सप्रेम अभिवादन ……..
आशा है आप सानन्द होंगे …….आपके बहुत सारे कविताओ का अद्ययन किया बहुत अच्छा लगा ….
आप अपनी पीड़ा छुपाते नहीं है बस …. कविताओं से बया कर देते हैं बधाई हो आपको ……………..
लक्ष्मी नारायण लहरे ……..
युवा साहित्यकार पत्रकार
कोसीर ..छत्तीसगढ़ ……………………………………………………….

Jeet Bhargava
Guest

बढ़िया कविता सतीश जी. मन को छू गयी. हार्दिक साधुवाद. माँ सरस्वती की कृपा बनी रहे.

sadhak ummed singh baid
Guest

फूल ने पूछा
मूल से
नीचे कुछ पाया?
मूल पूछता है
फ़ूल से
ऊपर कुछ
हाथ आया?
ऐसे ही
विगत की स्मृतियों
और
भविष्य की
योजनाओं में
वर्तमान का
आनन्द चूक रहा है
जीवन
वर्तमान है
सतीश जी!
जी लें
वर्तमान हो लें.

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