लेखक परिचय

सोनू मिश्र

सोनू मिश्र

लेखक 'मिथिला आवाज' समाचार-पत्र से जुड़े हैं।

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सोनू मिश्र

vibrant darbhangaआँखें स्क्रीन पर टिकी थीं। अपने स्वर्णिम अतीत को देख कर मन बस एक ही बात कह रहा था- काश! अगर संरक्षण होता तो आज हमारी पहचान कुछ और होती। जिस समय देश में सिर्फ एक सरकारी एयरलाईन्स हुआ करती थी उस समय हमारे दरभंगा की अपनी एयरलाइन्स कंपनी थी जहाँ से दर्जनों जहाज उड़ानें भरती थीं। जिस समय देश के लोग चीनी से अपरिचित थे उस समय हमारे दरभंगा महाराज ने लोहट में आधुनिक मशीन युक्त चीनी मिल लगाकर ना सिर्फ हज़ारों लोगों को रोजगार मुहैया कराए बल्कि लोगों को चीनी चखाया, उसकी मिठास के स्वाद से भी अवगत कराया। हमारे राजनगर के महलों की खूबसूरती भारत के किसी भी महल की खूबसूरती को कड़ी चुनौती दे रही थी। सिंहद्वार की खूबसूरती को देख आँखे हटाये नहीं हट रही थीं। शहर के खूबसूरत पोलो मैदान में पोलो के अंतराष्ट्रीय मैच तो भारतीय फुटबाल एसोसिएशन की नींव इसी शहर में रखी गई थी। सपनों सा अपना इस सुन्दर अतीत को देख कर मन हर्षित हो उठा तो वत्तर्मान देख मुख से अनायास निकल पड़ा- उफ़ ! अगर हम अपने इस सुन्दर अतीत को संभाल कर रखते तो आज हमारी मिथिला की पहचान, हमारी अपनी मिथिला की समृद्धि कुछ और ही होती।

अपने बीते हुए कल को देखने का मौका 28 नवम्बर को बेला पैलेस स्थित विश्वेश्वर सिंह ऑडिटोरियम में (जिसके एक-एक ईंट में इतिहास समाया है) ई-समाद द्वारा आयोजित ‘वाइव्रन्ट दरभंगा’ में मिला।1903 से 1941 के बीच दरभंगा महाराज के द्वारा बनवाई गई कुछ फिल्मों को एक साथ संग्रहित कर 12 गुना 10 के स्क्रीन पर अपने सुनहरे कल को देख कर उत्साह से शरीर के रोएँ खड़े हो गये। ब्लैक एंड ह्वाइट के साथ ही रंगीन भी, लेकिन पूर्ण स्पष्ट नहीं, बावजूद इसके मधुबनी स्थित राजनगर में महाराज का किला (जो 1934 के भूकम्प में खण्डहर हो गया) का 1934 से पहले बनाया गया वीडियो उस महल की भव्य सुंदरता का आज एकलौता गवाह है तो 1903 में स्थापित भारत का पहला अत्याधुनिक मशीन युक्त लोहट चीनी मिल का भ्रमण कुछ ब्रिटेन साथी के संग इस बात को दर्शाता है कि दरभंग महाराज एक दूरदर्र्शी व्यवसायिक सोच भी रखते थे। वहीं फिल्म में दिख रहा सिंहद्वार की सुंदरता महाराज के शानो-शौकत के साथ ही यहाँ आने-जाने वाले लोगों को अवगत करा रहा था तो रेलवे का स्पेशल सैलून इस रियासत के रसूख का गवाह था। पोलो मैदान में विदेशी खिलाड़ियों को इस शहर के दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से उत्साहित कर रहे थे। इस भारतीय फुटबाल एसोसिएशन की नीब इसी दरभंगा में रखे जाने को देश तो भूल गया। तभी तो एसोसिएशन के पहले अध्यक्ष विश्वेश्वर सिंह के नाम पर शुरू कप बन्द हो गया। वहीं सचिव के नाम पर शुरू सन्तोष ट्रॉफी आज भी चल रहा है। देश भूल गया तो क्या वीडियो ने इसकी याद तो दिला ही दी है। 1941 का एक विडियो जो तात्कालिक राजकुमार जीवेश्वर सिंह के उपनयन में बनाया गया था, उस समय भारत का पहला रंगीन वीडियो था। यह वीडियो महाराज के शानो-शौकत का तो गवाह है ही महाराज की लोकप्रियता और उनके मिलनसार स्वभाव को भी दर्शाता है। जिस समय देश में सिर्फ एक सरकारी विमानन कंपनी थी उस समय हमारे दरभंगा के पास अपनी एयरलाइन्स कंपनी थी, क्या यह भूलाने वाली बात है? जीवेश्वर सिंह के उपनयन में महाराज ने अपने मेहमानों के लिए विशेष विमान की व्यवस्था की थी जिसका गवाह दरभंगा का एअरपोर्ट और यह फ़िल्म है। मेहमानों के लिए आयोजित खास पार्र्टी, तो महमानों के लिए विशेष अतिथिशाला यूरोपियन गेस्ट हाउस की सुंदरता इस राजशाही की दास्तान दुनिया तक पहुचती थी। दरभंगा की प्रशानिक व्यवस्था हो या फिर सुन्दर सरपट सड़क पर दौड़ती बग्गी या रोल्स रॉयल की नाचते पहिये, सपनो सी लगने वाली यह हकीकत अब फिर सपना में ही रह गयी है।

दरभंगा को बनाने में दरभंगा महाराज समेत देश के विभिन्न हिस्सों से आए परिवार के योगदान की गाथा मंच से कार्यक्रम के उद्घोषक और इस आयोजन के सूत्रधार आशीष झा बता रहे थे।

दरभंगा के लिए हमेशा कुछ सोचने वाले और सामान्य से हटकर कुछ अलग करने वाले आशीष झा और ई-समाद.कॉम की संपादक कुमुद सिंह का इस आयोजन के लिए मै जितना शुक्रिया करूं वो कम है। एक बात और जेहन में आ रही है। आयोजन के वक्त उपस्थित सभी लोगों के चेहरे पर गौरवशाली अतीत का गर्व और वर्त्तमान की पीड़ा का मिश्रण था, क्या हम बस फिल्म देखकर रह जाएंगे या फिर अपने दरभंगा के सुनहले अतीत को लौटाने के लिए भी कुछ करेंगे? अगर हम चन्द लम्हे भी इसमे लगाएं तो आयोजन की सार्थकता होगी। क्या हम आयोजन की सार्थकता के लिए कम से कम संकल्प लेंगे? आइए विचारें और एक कदम तो आगे बढ़ाएं। कारवाँ जरूर बनेगा।

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