लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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मजेदार बात है हमारी संसद अपने दोस्त राष्ट्र अमेरिका के राजनयिकों के केबलों पर संसद का बेशकीमती समय बर्बाद कर रही है। हम हर मामले में अमेरिका की नकल करते हैं लेकिन केबल के मामले में हमने अमेरिकी सीनेट की नकल नहीं की , हाँ, अमेरिका के शासकों की नकल करते हुए उसके बारे में मूल्यनिर्णय किया,फतबेबाजी की, यहां तक कि एक मंत्री ने तो विकीलीक को साइबर आतंकवाद तक कह डाला। उल्लेखनीय है अमेरिका में भी कई नेताओं ने जिनमें वहां के उपराष्ट्रपति भी शामिल हैं, उन्होंने जूलियन असांचे को साइबर आतंकवादी और देशद्रोही तक कहा था। उन जनाब की नकल करते हुए भारत की संसद में कांग्रेस के एकमंत्री ने विकीलीक को साइबर आतंकवाद कहा है। प्रधानमंत्री ने विकीलीक से एकदम पल्ला झाड़ लिया है। कांग्रेस और उनके सिपहसालार मंत्रियों-वकीलों को विकीलीक में कोई भी सारवान सत्य और तथ्य नजर नहीं आया। यह बात दीगर है कि वे अपनी रक्षा के सभी सूत्र और भाजपा पर हमले करने के सभी औजार विकीलीक के केबलों से ही जुटाकर बोल रहे हैं।

    विकीलीक के भारत संबंधी या अन्य केबलों के बारे में यह कहा जा सकता है कि ये सत्य केबल हैं। इनमें व्यक्त की गई राय भी संबंधित व्यक्ति या राजदूत या राजनयिक की है। ये वैध केबल हैं। लेकिन ये राजनयिकों के केबल हैं। इन्हें राजनयिक साइबर रोजनामचे के रूप में देखा जाना चाहिए। ये न तो नीति हैं,न प्रमाण हैं, और न ये आतंकी संदेश हैं और न इनका प्रसारण या प्रकाशन साइबर आतंकवाद है। ये तो मात्र अमेरिकी राजनयिकों का साइबर रोजनामचा है। ये मात्र साइबर कम्युनिकेशन हैं। राजनयिक जैसा देख-सुन रहे हैं उसकी दैनन्दिन हू-ब-हू रिपोर्टिंग अपने विदेश विभाग को कर रहे है। इसमें राजनयिकों की अपनी राय कम और अन्य घटनाओं के बारे में उनके द्वारा एकत्रित की गई सूचनाएं,जानकारियां और विश्लेषण हैं।

   विकीलीक वास्तव अर्थ में गुप्त राजनयिक कम्युनिकेशन का उदघाटन है। लेकिन अमेरिकी सिस्टम में यह सहज,सामान्य और वैध प्रक्रिया है औऱ विकीलीक के अधिकांश केबल जूलियन असांजे ने वैध तरीकों से हासिल किए हैं। अमेरिका एक अवधि के बाद गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाते हैं ,उन्हें कोई भी व्यक्ति हासिल कर सकता है। इनमें कुछ हैं जो अवैध स्रोतों से हासिल किए हैं। भारत में गोपनीय दस्तावेज सरकार कभी सार्वजनिक नहीं करती ,वे उन्हें जनता को देने की बजाय,लाइब्रेरी को सौंपने की बजाय दीमकों के हवाले करना,आग के हवाले करना पसंद करते हैं।

       अमेरिकी राजनयिक कैसे सूचनाएं एकत्रित करते हैं और वे इन सूचनाओं का क्या करते हैं, क्यों करते हैं आदि चीजों के अलावा राजनयिक की आंखें और मन किन चीजों में उलझा रहता है,इन सबका आईना है विकीलीक केबल। इन लीक में सनसनीखेज कुछ भी नहीं है। आम लोगों को सनसनीखेज इसलिए लग सकता है क्योंकि आम लोग विदेशनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते।आम लोगों की बात छोड़ दें, हमारा राष्ट्रीय मीडिया भी विदेश नीति में खास रूचि नहीं लेता। हमें पता करना चाहिए कि कितने ऐसे अखबार या मीडिया समूह या घराने हैं जिनके दुनिया के सभी बड़े देशों और घटनास्थलों पर नियमित संवाददाता काम कर रहे हैं ? हमें ज्यादातर अखबार विदेशी समाचार एजेंसियों से प्राप्त समाचारों से भरे रहते हैं। विदेश की खबरों को हम भारत की नहीं विदेशी लोगों की आंखों से देखते और पढ़ते रहे हैं। फलतः हमें देशी आंखों से देखा विदेश नहीं विदेशी आंखों से देखा विदेश देखने में सुंदर और लुभावना लगता है। इसीलिए विकीलीक भी अपील कर रहा है।

   हमारे देशी देशभक्त मीडिया में सप्ताह में विदेश नीति पर कितने विवेचनात्मक लेख,खबरें संबंधित पत्रकारों से लिखवाते हैं। सच यह है कि अधिकांश मीडिया घरानों के विदेशों में कोई नियमित संवाददाता नहीं हैं। आमतौर पर वे विदेशनीति के सवालों पर पत्रकारों की बजाय भारत के पूर्व राजनयिकों और सरकारी-अर्द्ध सरकारी थिंकटैंकों में काम करने वाले सरकारी पंडितों से लेख लिखवाते हैं। इन लेखों में अंदर -खाते की पेचीदगियों का जिक्र या रहस्योदघाटन कभी नहीं होता। ऐसी अवस्था में अमेरिकी राजनयिकों की केबलों पर हंगामा और संसद में भीषण चर्चा गले नहीं उतरती, यह संसद का समय बर्बाद करना है। जिन दलों की अमेरिका की राजनीति में रूचि है और अमेरिकी केबलों के आधार जो हंगामा कर रहे हैं ,खासकर भाजपा के सांसद कभी ठंडे दिमाग से सोचें कि वे पार्टी मुखपत्र और संघ परिवार के माध्यमों में विदेश नीति पर कितनी सामग्री नियमित छापते रहे हैं और उसमें भी कितनी रूटिन सामग्री है और कितनी मौलिक,यह भी देखा जाना चाहिए।

    विकीलीक के केबल प्रकाशित करके जूलियन असांजे ने एक बड़ा काम किया है उसने विदेशनीति को विश्वमीडिया का प्रधान एजेण्डा बनाया है। खासकर अमेरिकी विदेश नीति के मूल्यांकन के सवालों को खड़ा कर दिया है। वहीं पर दैनिक हिन्दू ने विकीलीक के केबलों का प्रकाशन करके विदेशनीति की अहमियत की ओर ध्यान खींचा है। उस बड़े सूचना प्रवाह की ओर ध्यान खींचा है जो अमेरिकी दूतावास से अमेरिका की ओर प्रवाहित हो रहा है और फिर पलटकर भारत की राजनीति और राजनीतिज्ञों को अपने घेरे में ले रहा है।

    कायदे से हिन्दू को उन पत्रकारों-लेखकों-बुद्धिजीवियों आदि को भी एक्सपोज करना चाहिए जो अमेरिका के पैरोल पर हैं और भारत में अमेरिकी प्रचारक के रूप में काम कर रहे हैं,कम से कम भारत के नागरिकों को उन महानुभावों की कलम की पोल से वाकिफ कराया जाना चाहिए।

     भारत के अंदर एक अच्छा-खासा तबका है जो अमेरिका के लिए विदेश नीति के मामलों में भारत में पैरोकारी करता रहा है। लिखने से लेकर नेताओं को पटाने तक का काम करता रहा है। इन लोगों की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

     काफी अर्सा पहले संभवतः 1981-82 में गिरफ्तार किए डबल-ट्रिपिल जासूस रामस्वरूप के घर से सीबीआई ने एक ट्रक गोपनीय सरकारी दस्तावेज पकड़े थे, ये जनाब बहुत कम पैसे में विदेशी जासूसों और दूतावासों को केन्द्र सरकार की गोपनीय फाइलें मुहैय्या कराने का काम किया करते थे। पता नहीं ये जनाब जेल में हैं बाहर हैं या मर गए ? लेकिन इन जनाब को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इनके यहाँ से जो एकट्रक गोपनीय दस्तावेज मिले थे उनमें जेएनयू के अनेक लब्धप्रतिष्ठित प्रोफेसरों के नाम भीथे जिनको सीआईए से सीधे पैसा मिलता था और इनमें से कई लोग भारत सरकार के गलियारों में नीति निर्धारकों बन गए। राजदूत की कुर्सियों पर विराजमान हो गए। रामस्वरूप के यहां पाए गए दस्तावेजों में पत्रकारों की भी सूची थी। नेताओं,युवानेताओं की भी सूची मिली थी,जिन्हें सीधे सीआईए से पैसा मिलता था और ये बातें सीआईए के वैध कागजों में पाई गई थीं । मैं उन दिनों जेएनयू में पढ़ता था और वहां की सक्रिय छात्र राजनीति का हिस्सा था। हमने सभी छात्रों के सामने उन चेहरों को बेनकाब भी किया था जो सीआईए के लिए काम करते थे। इस बात को रखने का मकसद यह है कि अमेरिका की हमारे देश की राजनीति में आज ही दिलचस्पी नहीं पैदा हुई,यह दिलचस्पी आरंभ से है।शीतयुद्ध के जमाने में तो और भी गहरी दिलचस्पी थी। चूंकि विकीलीक ने 1960 के बाद के अमेरिका के अधिकांश गोपनीय दस्तावेज,केबल आदि हासिल किए हैं अतः कोशिश करके शीतयुद्ध के दौरान और बाद के केबलों को सामने लाया जाना चाहिए। इस तरह के केबलों से वे परतें खुल रही हैं जिन्हें अमेरिकीतंत्र ने हमारे देश में नेताओं,मीडिया और व्यापारियों में बिछा दिया है।

    विकीलीक के केबल अमेरिकी तंत्र की कार्यप्रणाली,खासकर राजनयिकों की दैनंदिन कार्यप्रणाली और विचारधारात्मक मानसिक संरचनाओं को समझने का पुख्ता आधार देते हैं। ये राजनयिक प्रशिक्षणशास्त्र की अनेक नई दिशाओं पर रोशनी डाल रहे हैं। इन केबलों से यह भी पता चल रहा है कि अमेरिकी राजनयिक कूटनीतिज्ञ होने के साथ एक अच्छे जनसंपर्क अधिकारी भी होते हैं। इसलिए वे अच्छे अमेरिकी विचारों के प्रसारक होते हैं. अन्य को फुसलाने और पटाने की कला में निष्णात होते हैं।

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