लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

विकीलीक ने इंटरनेट पर सूचनाओं का विस्फोट किया है। सारी दुनिया के राजनेता, मीडिया विशेषज्ञ परेशान हैं कि आखिरकार नेट से आने वाले सूचनाओं के बबंडर से कैसे बचा जाए। विकीलीक के मालिक बलात्कार के आरोप में फंसे हैं। विकीलीक ने सूचना क्रांति को चरमोत्कर्ष और विलोम पर पहुँचा दिया है। सूचना जब भी मीडिया में जाती है तो अपना रूप बदल लेती है। उसे बाहर समाज में जब भी प्रक्षेपित किया जाएगा वह कुछ और नजर आएगी,कुछ और प्रभाव पैदा करेगी। सूचना जैसी दिखती है वैसी संप्रेषित नहीं होती। जो होती है उससे ज्यादा निर्मित की जाती है। सूचना में बहानों का बबंडर होता है। आप जब भी सूचना पढ़ते हैं तो अनेक कारण दिमाग में दौड़ते हैं। विकीलीक की सूचनाओं ने भी यही काम किया है।

विकीलीक के लाखों दस्तावेज इंटरनेट पर हैं। इन दस्तावेजों के आने के बाद से अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं। इनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन दस्तावेजों के आने का मकसद क्या है ? इस तरह के एक्सपोजर का अर्थ क्या है ? क्या इन दस्तावेजों से किसी देश के लिए कोई खतरा पैदा हो सकता है ? क्या इससे सूचनाओं में इजाफा हुआ है ?

28 नवम्बर 2010 को विकीलीक ने 251,287 अमरीकी दस्तावेज और केबल संदेशों को इंटरनेट पर जारी किया। इनमें केबल संदेश 1966 से लेकर फरवरी 2010 तक के हैं। इनमें 274 एम्बेसियों के गुप्त संदेश हैं। इसके अलावा अमरीका के गोपनीय 15,652 केबल संदेश भी हैं। आने वाले कुछ महीनों तक विभिन्न देशों के गोपनीय केबल संदेशों का विकीलीक रहस्योदघाटन करेगा। इन संदेशों और दस्तावेजों से एक बात साफ हुई है कि अमरीका विभिन्न देशों में जासूसी करता रहा है। खासकर मित्र देशों के यूएनओ मिशनों की जासूसी करता रहा है। इन संदेशों ने अमरीकी लोकतंत्र की पोल खोलकर रख दी है। जो अमरीका को आदर्श लोकतंत्र मानते हैं वे जरा इन दस्तावेजों के आइने में नए सिरे से अमरीका को परिभाषित करें ? अमेरिका राजनयिक कामकाज की आड़ में किस तरह दूसरे देशों की संप्रभुता का हरण करता रहा है,जासूसी के नाम पर हस्तक्षेप करता रहा है, और अमेरिकी संविधान में जो वायदे किए गए हैं उनका अमरीकी सत्ता पर बैठे लोग कैसे उल्लंघन करते रहे हैं। यह भी पता चलता है कि अमेरिका दुनिया का भ्रष्टतम देश है। तकरीबन 251,287 दस्तावेज जारी किए गए हैं जिनमें 261,276,536 अक्षर हैं।यानी इराक युद्ध के बारे में जितने दस्तावेज जारी किए थे उससे सातगुना ज्यादा । इसमें 274 दूतावासों और कॉसुलेट्स के केबल संदेश हैं। इसमें 15,652 सीक्रेट हैं,101,748 कॉन्फीडेंशियल और 133,887 अनक्लासीफाइड हैं। इनमें सबसे ज्यादा इराक पर चर्चा है। तकरीबन 15,385 केबल संदेशों में 6,677 केबल संदेश इराक के हैं।अंकारा,तुर्की से 7,918 केबल हैं। अमरीका के स्टेट ऑफिस सचिव के 8017 केबल संदेश हैं। अमरीका के वर्गीकरण के अनुसार विदेशी राजनीतिक संबंधों पर 145,451 ,आंतरिक सरकारी कार्यव्यापार पर 122,898,मानवाधिकार पर 55,211, आर्थिकदशा पर 49.044,आतंकवाद और आतंकियों पर 28,801 और सुरक्षा परिषद पर 6,532 दस्तावेज हैं। असल में विकीलीक के बहाने से अमरीकी प्रशासन इंटरनेट पर अंकुश लगाना चाहता है। वे इंटरनेट उन तमाम राजनीतिक खबरों को सेंसर करना चाहते हैं जो अमेरीकी प्रशासन को नागवार लगती हैं। स्थिति का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि ओबामा प्रशासन ने सभी सरकारी कर्मचारियों के नेट पर विकीलीक पढ़ने पर पाबंदी लगा दी है। कई कांग्रेस सदस्य पाबंदी की मांग कर रहे हैं,कुछ ने विकीलीक के संस्थापक की गिरफ्तारी की मांग की है। लाइब्रेरी आफ कांग्रेस ने अपने सभी कम्प्यूटरों पर इस लीक को पढ़ने से रोक दिया है। यहां तक कि रीडिंग रूम में नहीं पढ़ सकते। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के डिप्लोमेटिक छात्रों को इस लीक को पढ़ने से वंचित कर दिया गया है,उनके पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गयी है। उन्हें कहा गया है कि इस रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी न करें। कई सीनेटरों ने ऐसे कानून बनाने का आधिकारिक प्रस्ताव दिया है जिसके आधार पर गुप्त दस्तावेज प्रकाशित करना और पढ़ना अपराध घोषित हो जाएगा। अमरीकी कानून संरक्षकों ने कॉपीराइट के उल्लंघन का बहाना करके कुछ इंटरनेट डोमेन को बंद करा दिया है। ये सारी बातें अमरीका में अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरे की सूचना दे रही हैं।

विकीलीक के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के लीक अमरीका में होते रहते हैं, खासकर जो व्यक्ति कल तक विदेश विभाग में राजनयिक की नौकरी कर रहा था वह ज्योंही सेवामुक्त होता है अपने साथ ढ़ेर सारे गुप्त दस्तावेज ले जाता है और उनका रहस्योदघाटन करने लगता है। इसी प्रसंग में न्यूयार्क स्थित राजनीतिविज्ञानी प्रोफेसर डेविड मिशेल (http://www.regressiveantidote.net/) ने महत्वपूर्ण बात कही है।

डेविड ने लिखा है कि इसमें रहस्योदघाटन जैसा कुछ भी नहीं है। विकीलीक के दस्तावेज महत्वपूर्ण है लेकिन उतने नहीं जितने कहे जा रहे हैं। ये पेंटागन के रूटिन दस्तावेज हैं। ये महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि इनमें अमरीकी सरकार की कथनी और करनी के भेद को साफ देखा जा सकता है। इस अंतर को ही ‘आकर्षक अमरीकी‘झूठ’ कहा जा सकता है। विकीलीक की सूचनाएं सामान्य सूचनाएं नहीं है,यह महज गॉसिप नहीं है,यह एक्सपोजर मात्र नहीं है,यह कोई षडयंत्र भी नहीं है,बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत जारी की जा रही राजनीतिक सूचनाएं हैं, कूटनीतिक सूचनाएं हैं। इनके गंभीर दूरगामी परिणाम होंगे। इसके बहुस्तरीय और अन्तर्विरोधी अर्थ हैं।

एक बात सामान्य रूप में कही जा सकती है कि विकीलीक के एक्सपोजर ने इंटरनेट स्वतंत्रता की परतें खोलकर रख दी हैं। इसने अमेरिका के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पाखण्ड को एकसिरे से नंगा कर दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहां तक आप राज्य की सत्ता और संप्रभुता को चुनौती नहीं देते।

विकीलीक का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश यह है संचार क्रांति ने अपना दायरा सीमित करना आरंभ कर दिया है। तीसरा संदेश यह है उत्तर आधुनिकतावाद का अंत हो गया है। विकीलीक ने संचार क्रांति के साथ आरंभ हुए उत्तर आधुनिकतावाद को दफन कर दिया है। यह नव्य उदारतावाद के अवसान की सूचना भी है।

शीतयुद्धोत्तर विचारधारात्मक संघर्ष को विकीलीक ने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया है। मजेदार बात यह है कि संचार क्रांति के साथ समाजवाद का अंत आरंभ हुआ था और विकीलीक ने संचार क्रांति के अवसान की घोषणा के साथ अमेरिकी जनतंत्र के मुखौटे को नोंच डाला है। नव्य उदार लोकतंत्र में निहित अधिनायकवादी राजनीति को उजागर किया है। उसका विलोम रचा है। यही वजह है कि विकीलीक के एक्सपोजर के साथ आज रूस के प्रधानमंत्री ब्लादीमीर पुतिन खड़े हैं। रूस का प्रधानमंत्री अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत कर रहा है और ओबामा प्रशासन ने विकीलीक के खिलाफ कड़े कदम उठाने आरंभ कर दिए हैं। अमेरिका में इंटरनेट को नियंत्रित करने के नए उपायों पर विचार चल रहा है जिससे नेट स्वतंत्रता पर बंदिशें थोपी जा सकें।

समाजवाद को ध्वस्त करने के लिए मीडिया और इंटरनेट से सभी बंदिशें हटाने की मांग की गई थी लेकिन अब बुर्जुआ लोकतंत्र के रौरव नरक के उदघाटन को रोकने के लिए तरह-तरह की बंदिशें लगायी जा रही हैं। विकीलीक ने बुर्जुआ लोकतंत्र और खासकर अमेरिकी लोकतंत्र की जो शक्ल सामने पेश की है वह इतनी कलुषित है कि माफिया गिरोह भी अपने को शर्मिंदा महसूस कर रहे होंगे। खासकर राजनयिकों की भाषा, संवाद और वास्तव जीवन में उनका सार्वजनिक व्यवहार किस तरह पाखंडपूर्ण, हिंसक, बर्बर होता है यह बात बड़ी ही खूबसूरती के साथ एक्सपोज हुई है। उल्लेखनीय है सन् 2006 में विकीलीक ने जब चीन को एक्सपोज करना आरंभ किया था तो पश्चिम का मीडिया और नेतागण उसे सिर पर बिठाए घूम रहे थे। लेकिन ज्योंही विकीलीक ने अमेरिकी बर्बरता, असभ्यता, स्वतंत्रताहरण,दूसरे देशों की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप आदि का खुलासा आरंभ किया है चारों ओर मीडिया से लेकर सरकारों तक तहलका मच गया है और बुर्जुआ खेमे में एक ही आवाज है असांजे को पकड़ो,मार डालो,इंटरनेट पर अबाध स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाओ।

विकीलीक के एक्सपोजर ने एक बात और सिद्ध की है कि प्रौपेगैण्डा में शीतयुद्ध बरकरार है। शीतयुद्धीय प्रौपेगैण्डा की विशेषता थी सफेद झूठ बोलना। अमेरिकी साम्राज्यवाद ने इराक,अफगानिस्तान,ईरान आदि को लेकर निरंतर सफेद झूठ बोला है। यह बात विकीलीक के खुलासे से सामने आयी है। यह बात भी पुष्ट हुई है कि इराक में जाने के जो बहाने बताए गए वे सब आधारहीन थे। मैनस्ट्रीम मीडिया लगातार यह आभास दे रहा है कि वह सच बोलता है और उसकी नजर सिर्फ खबर पर होती है,खबर की वस्तुगत प्रस्तुति पर होती है। ये सारी दलीलें गलत साबित हुई हैं। खासकर इराक और अफगानिस्तान के बारे में जो कुछ मीडिया के द्वारा जो बताया जाता रहा है वह गलत साबित किया है विकीलीक ने।

ग्लोबल मैनस्ट्रीम मीडिया की विशेषता है कि वह शस्त्र उद्योग के इशारों पर चल रहा है। शस्त्र उद्योग जो कहता है वही बात ये लोग छापते हैं। इसी तरह भारत में मैनस्ट्रीम मीडिया मूलतः वही कवरेज देता है जो यहां के कारपोरेट घरानों के हित में हो। इसके लिए वे सत्य प्रस्तुति का पाखंड करते हैं। इसके लिए वे ‘कुछ यहां की कुछ वहां की’ पद्धति का इस्तेमाल करते हैं। कभी भाजपा के खिलाफ तो कभी कांग्रेस के खिलाफ,कभी इस कारपोरेट घराने के बारे में तो कभी उस घराने के बारे में,थोड़ी इसकी-थोड़ी उसकी, थोडी घृणा इसके बारे में तो थोड़ा भय उसके बारे में,यही वह बुनियादी मीडिया नीति है जिसके तहत प्रौपेगैण्डा सामग्री परोसी जा रही है।

विकीलीक के एक्सपोजर ने यह भी धारणा पुष्ट की है कि अमेरिका सीधे हमलावर होकर युद्ध आयोजित करता रहा है। नए दौर में मुख्यधारा के मीडिया का काम सत्य का अनुसंधान करना नहीं है बल्कि सरकार जो कहे,उसका अनुपालन करना है। सरकार जो कहती है उसके बारे में मीडिया सवाल नहीं उठाता। विकीलीक के एक्सपोजर ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि बहुराष्ट्रीय मीडिया अमेरिकी विदेश और गृह नीति का अंधानुकरण करता रहा है।

अमेरिकी मीडिया की खासतौर पर विशेषता रही है वह अमेरिकी साम्राज्य विस्तार के लक्ष्यों को प्राथमिकता देता है। वे देश जो अमेरिका की आलोचना करते हैं उन्हें शत्रु या गैर भरोसेमंद मुल्क के रूप में चित्रित किया जाता है। बहुराष्ट्रीय मीडिया में निगमों का नियंत्रण इतना ताकतवर है कि कोई भी व्यक्ति सामान्य सी प्रतिक्रिया भी शस्त्र उद्योग के खिलाफ नहीं बोलता यदि कोई बोलता है तो उसे प्रकाशित नहीं किया जाता। मीडिया में चीजों को सारहीन और सीमित दायरे में रखकर देखने की बाढ़ आ गयी है। पहले यह बीमारी चंद अखबारों तक सीमित थी,किंतु आज यह मैनस्ट्रीम मीडिया की साझा विशेषता है। इन दिनों खबरें निर्मित की जाती हैं। वे घटती नहीं हैं।बल्कि निर्मित की जाती हैं। नीरा राडिया का मामला आदर्श उदाहरण है।

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1 Comment on "विकीलीक के राजनीतिक निहितार्थ"

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Dr.Rajendra
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कांग्रेस की मानशिकता धीरे धीरे सभी को समझ में आ रही हे, भविष्य को ध्यान में रख कर विकास की राजनीती पर जोर देना चाहिए न कि इस तरह धर्म के नाम पर बार बार लोगो को भड़काना चाहिए

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