लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

Posted On by &filed under समाज.


श्रीराम तिवारी

यह सर्वज्ञात है कि मरण धरमा एवं नित्य परिवर्तनीय सृष्टि में मनुष्य सबसे अधिक सचेतन प्राणी है.इसके वावजूद कि सभ्यता के आरम्भ से ही वह एक ओर तो पृकृति के अवदानों से प्रमुदित था ही किन्तु दूसरी तरफ दुर्दमनीय प्राकृतिक अबूझ आपदाओं से पराजित होकर चुपचाप हाथ पै हाथ धरे नहीं बैठा रहा.नदी घाटी सभ्यताओं और दोआब की सभ्यताओं के उत्थान -पतन के साथ-साथ जहां जहां भी उसकी जीवन्तता सुनिश्चित संभव थी मानव समुदाय के रूप में गाँव एवं नगरों में ;उसने अपनी जेविक श्रेष्ठता के झंडे गाड़े.यूरोप ,अमेरिका ,चीन और दक्षिण अमेरिकी राष्ट्रोंमें गाँव और शहर का अंतर मिटता जा रहा है.किन्तु इस से इतर भारतमें गाँवों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है.भारत में भी यदि पंजाब हरियाणा और यु पी के कुछ गाँव समृद्ध हैं भी तो वहां खापवाद ,जातिवाद ,सामंतवाद जैसी सामाजिक विषमताएं और कन्या भ्रूण हत्या के अमानवीय कृत्यों के चर्चे आम हैं.यदि बिहार,मध्यप्रदेश ,छतीसगढ़ और राजस्थान के गाँवों पर नज़र डालें तो सर्वत्र न्यूनतम मानवीय सुविधाओं वंचित हैं.गाँव सिर्फ शहरों के उदर भरण के निमित्त बनकर रह गए हैं.

सभ्यता के अधुनातन दौर में गाँव हासिये पर चला गया.है वैज्ञानिक तरक्की और संचार सूचना प्रौद्दौगिकि के अति उन्नत युग में भी आज का गाँव अपने समसामयिक नगरों से कोसों नहीं तो मीलों दूर जरुर हो गया है. वे गाँव जो बड़े शहरों के इर्द-गिर्द बसे हैं या किसी राष्ट्र्यीय राजमार्ग के विस्तारीकरण की जद में आये हैं उनके तो बाजारीकरण के वरदान स्वरूप मानो भाग्य ही खुल गए हैं.खास तौर से इन गाँवों के चंद दवंग और जमींदार वर्ग की तो पौ बारह हो रही है. कहीं इनके लिए ममता बेनर्जी ,कहीं राहुल गाँधी ,कहीं अग्निवेश्जी,कहीं मेघा पाटकर जी और कहीं स्वयम माननीय अदालतें अपनी कृपा दृष्टी से मालामाल कर रहीं हैं. किन्तु यह सौभाग्य देश के उन आठ लाख गाँवों को प्राप्त नहीं है जो सड़क बिजली और पेयजल जैसी मूलभूत न्यूनतम सुविधाओं से आज भी महरूम हैं.शिक्षा और स्वास्थ्य में तोइन दिनों हरों की भी हालत चिंताजनक है तब इन उपेक्षित गाँवों की क्या बखत होगी?जबसेबाज़ार ने भूमि अधिगृहण को पूँजी के सर्वोत्तम उत्पाद में रूपांतरित करने का फार्मूला ईजाद किया है,बड़े किसानों और भूतपूर्व जमीनदारों की बल्ले-बल्ले हो रही है.यह तबका भले ही गाँव की कुल आवादी का १०% ही क्यों न हो किन्तु वह ग्रामीण क्षेत्र की सकल संपदा के ८०%पर काबिज है.शेष ९० % ग्रामीण आबादी के हिस्से में मात्र २०%जमीन और अन्य सम्पत्ति आती है. पहले वाले हिस्से को शहरी पूंजीपतियों,अफसरों,नेताओं,समाजसेविओं,बिचोलियों और वित्तीय संस्थानों का अन्योंन आश्रित सहयोग प्रप्त है.इन्ही के हितों को साधने में सिंगूर,नंदीग्राम,भट्टापारसौल,अलीगढ,आगरा और तमाम उन जगहों पर जमीन को लेकर मारामारी चल रही है.सभी जगह जब सत्ता से समीकरण नहीं बैठ पता तो प्रतिरोध दरसाने के लिए गाँव के उन गरीव -मजदूर किसानो और वेरोजगारों को पुलिस और क़ानून के आगे ढाल बनाकर खड़ा करने में उक्त एलीट क्लासअर्थात बड़ी जोत के मालिकों की चालाकी का कोई सानी नहीं .यह आधुनिक सामंती प्रभु वर अपने पुरातन दंड विधान से ग्रामीण क्षेत्र की निरक्षर ,निरीह और लाचार जनता का श्रम शोषण तो करता ही है साथ में आधुनिक प्रजातांत्रिक अधिकारों को,न्याय व्यवस्था को और राजनीती को अपने पद प्रक्षालन के लिए तैनात कर सकने में भी सिद्धहस्त है.दिल्ली में चाहे एन ड़ी ऐ हो ,यु पिए हो,या कोई भी सरकार राज्यों में हो यदि कोई जन्कल्यान्कारी या ग्रामीण जनता के हित की योजना सरकार द्वारा लागू होती है तो यह गाँव के तथाकथित दवंगों और भू स्वमियों का स्वल्पाहार बनकर रह जाती है.

विगत दिनों एक ऐसे ही गाँव में मेरा जाना हुआ जो एक प्रख्यात राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसा हुआ है.उस गाँव के किनारे से होकर गुजरने बाले राष्ट्रीय राजमार्ग को ४-६ लेन में बदला जा रहा है.कहीं-कहीं काम अधूरा था.गाँव के भूतपूर्व जमींदार और वर्तमान सरपंच पति ने बड़े गर्व से बताया कि ५-६ साल पहले जब उसे इस राष्ट्रीय राजमार्ग के चौडीकरण कि खबर लगी ;तो उसने उन किसानों कि जमीन को ,;सस्ते ामों पर खरीद ली , जो कि सड़क के निमित्त अधिगृहीत किया जाना संभावित थी इन महाशय ने बड़े गर्व से अपनी और शाशन व्यवस्था कि काली करतूतकुछ इस तरह बताई मानों उनने सिंहगढ़ विजय किया हो.उनका कहना था कि गरीव किसानो को पहले तो उन्होंने डर दिखाया कि तुम लोग सरकार से मुआवजा हासिल नहीं कर पाओगे,मुआवजा तुम्हें जितना मिलना है वो पटवारी ,रेवेनु इन्स्पेक्टरया तहसीलदार से पता कर लो.गरीब सीमान्त िसानों ने जब इन भृष्ट अधिकारीयों से पता किया तो उन्होंने वही बताया जो सरपंच पति उर्फ़ जमीन्खोर ने उन अधिकारीयों को पहले से बता रखा था.वे सब आपस में मिले हुए थे और नाते रिश्ते लेन-देन के सहभागी थे.इस तरह प्रस्तावित सडक चौडीकरण कि प्रारंभिक प्रक्रिया से बहुत पहले ही रास्ता साफ़ कर लिया गया.जब शाशन ने राष्ट्रीय राजमार्ग के चौडीकरण हेतु जमीनों के अधिग्रहण बाबत सर्वे प्रकाशित किया  उन गरीब किसानों को भरी अफसोश हुआ.जब मुआवजे कि दरें घोषित हुईं तो गरीब किसानो के होश उड़ गए जो जमीन उन्होंने जमींदारों को ५० हजार रुपया एकड़ में बेचीं उसकी कीमत २ लाख रुपया एकड़ हो गई.इन स्वनामधन्य जमीन दार महोदय ने एक ओर चमत्कार किया कि उनकी अत्यंत उपजाऊ और सिंचित जमीन को बचाने के लिए सर्वेयरों तक को खरीद डाला.राष्ट्रीय राजमार्ग कि दिशा और दशा ही बदल डाली.उनका गर्वोक्ति पूर्ण यह कथन भी था कि हमने” ऊपर तक सबको साध रखा है”.प्रम ाण स्वरूप प्रदेश कि राजधानी में भव्य बंगले से लेकर ठेठ गाँव तक दारू कि कलाली का ठेका उन्ही के पास है.उनकी एक खूबी और है वे समय के साथ चलते हैं जबराज्य कि सत्ता में कांग्रेस होती थी तो उसके झंडावरदार हुआ करते थे ,अब जबकि मध्यप्रदेश में भाजपा का शाशन है तो ये श्रीमानजी पक्के ”भाईजी”बन बैठे हैं.उनके बारे में आम धरना है कि वे अपने निहित स्वर्थों के लिए किसी का भी गला काट सकते हैं.ये भारतीय ग्रामीण दुर्दशा के जीवंत प्रमाण हैं.गाँवों के वोटों का और विकाश के सरकारी नोटों का स्थाई ठेका इन जैसे लुच्चों लफंगों के हाथ में रहेगा तब तक अन्नाजी हों,रामदेवजी हों,लोकपालजी हों या माननीय उच्चतम न्यायालायजी हों ;कोई भी इस देश के गाँव के गरीबों का तब तक उद्धार नहीं कर सकता जब तक गाँव और शहरों में आ बसे जमीन्खोरों को हदबंदी क़ानून के तहत बेल कि तरह नाथ नहीं दिया जायेगा..चाहे मुग़ल हों अंग्रेज हों ,चाहे नेहरु युगीन कांग्रेस हो,चाहे इंदिरा युगीन कांग्रेस हो,चाहे अटल युगीन एन डी ऐ हो या वर्तमान मनमोहन सोनिया युगीन कांग्रेस सभी को साधने में माहिर यह पूरातन सामंती अवशेष अब पूंजीपती वर्ग से समन्वय स्थापित कर बाज़ार की ताकतों में शुमार हो चूका है.इस तरह गाँव से लेकर शहर और शहर से लेकर महानगरों तक और देश कि राजधानी के सत्ता केंद्र से लेकर विश्व बैंक और आई एम् ऍफ़ तक में अब भारत के बड़े भू स्वामियों के एजेंट मौजूद हैं.इसीलिये भारत के गरीब और छोटी जोत के किसानों ,खेतिहर मजदूरों,और वेरोजगार युवाओं को को वर्ग चेतना से लेस करने के प्रयासों कि महती जरुरत है. ,फ्रुस्टेशन,क़र्ज़ यातना,आत्म हत्या और शहरों कि ओर दिग्भ्रमित पलायन से भारतीय ग्रामीण क्षेत्र पंगु होता जा रहा है.शहरों कि चकाचोंध और अधुनातन जीवन शेली कि चाह में और अपनी अल्प खेती में गुजारा न हो सकने कि सूरत में गाँव के गरीबों ने शहरों में झुग्गियों में शरण ले रखी है.चूँकि शहरों में पहले से ही महंगाई ,गरीबी भुखमरी के विकराल टापुओं का डेरा है अतेव कोई आश्चर्य नहीं कि अपराधों में बृद्धि हो रही है.ह्त्या बलात्कार ,चोरियां और सेंधमारी आम बात हो चुकी अब तो ये हालत है कि सुदूर बिहार के गाँव से आने वाला एक वेरोजगार नौजवान विगत दिनों इंदौर केदेवी अहिल्या विश्वविद्याल य का ATM ही उखाड़ कर ले गया..शायद यह इस बात कि चेतावनी है कि गाँव हमारा और शहर तुम्हारा …नहीं चलेगा…नहीं चलेगा…

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz