लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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हरिहर शर्मा

भारतीय जीवन दर्शन सनातन, अनादि, अनन्त है। बंगाल में जन्मे एक महान विभूति श्री रामकृष्ण परमहंस इसी दर्शन का मूर्तिमंत स्वरूप थे। वो स्वयं नहीं उनका जीवन बोलता था। उसी दर्शन का मुखर स्वरुप थे स्वामी विवेकानंद। केवल स्वामी नहीं, विश्व विजेता। जिस व्यक्ति ने अपने सम्मुख सारे विश्व को नतमस्तक करा दिया, उसके स्वांस स्वांस, रोम रोम में एक ही चिंता थी – भारत का पुनरुत्थान। इसी चिंता के कारण वे भारत भ्रमण पर निकले। समूचे राजस्थान, फिर सुदूर दक्षिण में कन्याकुमारी तक। तीन समुद्रों के बीच स्थित शिलाखंड ने मानो पुकारा दृआओ मेरी गोदी में बैठो। सामान्य व्यक्ति तैरकर बहां नहीं पहुँच सकता था, किन्तु ये गये और बैठकर क्या चिंतन किया ?

भारत भ्रमण के दौरान जो चित्र देखा था उससे चिंताक्रांत बन गए। भूखा, प्यासा, कपडे विहीन, घर विहीन महा दरिद्रता देखी थी। इस गरीब भारत के दर्शन ने द्रवित कर दिया था। सारे विश्व को खिलाने वाला भारत आज दरिद्र, दयनीय क्यों ? यह चिंतन किया।

दूसरा चित्र – एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को घर में नहीं आने देता। अश्पृश्यता। “आत्मवत सर्व भूतेषु” बाले भारत के अंदर यह कैसा पागलखाना। क्या हो गया मेरे भारत को ?

तीसरा चित्र – पढेलिखे अहंकारी लोग। अपने मजे में रहने बाले लोग। और दूसरी और निरक्षरता।

निरक्षरता, अश्पृश्यता, गरीबी, शोषण के देखे दृश्यों ने उन्हें रुदन करा दिया। नरेंद्र से सच्चिदानद फिर विविधसानंद बना यह युवा सन्यासी कष्ट दीनता से समरस हो, केवल रोया नहीं, वरन संकल्प भी लिया। विश्व नत मस्तक हो ऐसा भारत खडा करना है। पहले ढाई साल संचार कर समझा, फिर संकल्प लिया। संचार के दौरान मैसूर महाराज, रामनाड महाराज आदि से संपर्क आया था। ये सब शिष्य बन गए थे। खेत्री के महाराज ने कहा – आपको अमरीका में विश्व धर्म सम्मलेन में ज्ञान का प्रकाश, भारत का परिचय कराने जाना चाहिए। आर्थिक व्यवस्था हुई और नया नामकरण भी – विवेकानंद। वे यही सोचकर विदेश गए कि बहां प्रभाव छोडकर वापस आने पर लोग ज्यादा ध्यान से उनकी बात सुनेंगे। सन्यासी जीवन की प्रथम शर्त है अभय। जो सबसे प्रेम करे उसे किससे भय। शिकागो सर्व धर्म सम्मलेन में वे इसी भावना से पहुंचे। मुम्बई से जलमार्ग द्वारा पूर्णतः अपरिचित देश अमरीका पहुंचे इस सन्यासी ने क्या कुछ नही सहा ? जाकर मालूम हुआ कि सम्मलेन की तिथि दो महीने आगे बढ़ गई है। अनजान स्थान पर जहां भारत की तरह मांग कर भी नही खाया जा सकता था, कैसे वे रहे होंगे, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। कोई गाली देता तो कोई थूकता। निंदा करते इन लोगों के व्यवहार को विवेकी होने के कारण सहन करते रहे। इस अपरिचित देश को अपना बनाने आये थे दृ इसलिए कोई प्रतिरोध नहीं। एसे में एक व्यक्ति मिला। उसने पूछा किसको ढूँढते हो ? इन्होने उत्तर दिया दृ आपको ही। विस्मय से उसने पूछा दृ कोई मित्र है ? हाँ है ना – आप हैं न, इन्होने उत्तर दिया। आश्चर्य और आनंद से अभिभूत बह व्यक्ति इन्हें अपने घर ले गया। बह अनजान व्यक्ति विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राईट थे। उन्होंने ही परिचयपत्र देकर विवेकानंद जी को सर्वधर्म सम्मलेन में भेजा।

सम्मलेन में दिया गया भाषण ही नहीं तो भाषण के पूर्व दिया गया संवोधन ही इतिहास रच गया। ब्रदर्स एंड सिस्टर्स ऑफ अमरीका। लेडीज एंड जेंटिलमेन के संवोधन सुनने के आदी लोगों को यह अनूठा और नया संवोधन इतना भाया कि पूरा सभागृह दस मिनट तक तालियों से गूंजता रहा। लोग उल्लास से झूम उठे। संदेह से चकित युवा सन्यासी ने पास में अध्यक्ष से इसका कारण पूछा। उन्होंने कहा दृ लोग आनंद के कारण ऐसा कर रहे हैं।

आगे जब विवेकानंद ने इस संवोधन को स्पष्ट किया कि सारा विश्व एक परिवार और हम सब भाई बहिन, तो मानो कुछ ही शव्दों में समूचे भारतीय दर्शन का परिचय करा दिया। श्रोताओं ने उनके कपड़ों का चुम्बन लिया। अपना अतिथि बनाने की होड लग गई। अगले दिन समाचार पत्रों ने उन्हें विश्व विजेता भारतीय युवा सन्यासी लिखा। अपमान से सम्मान तक की यह अनूठी यात्रा थी। रात्री विश्राम के लिए अमरीका का सबसे धनी व्यक्ति अपने घर ले गया। किन्तु इन्होने एक चटाई पर रात्री जागरण किया। बहां खुली खिड़की से भारत की और देखते रोने लगे। यह विवेकानंद अमरीका की संपत्ति तथा भारत की गरीबी का सोचकर चिंतन करने लगा दृ भारत का आध्यात्मिक चिंतन और अमरीका की संपत्ति यदि एकरूप हो तो कितना अच्छा होगा। अमरीका का अर्थ और काम तथा भारत का धर्म और मोक्ष यदि मिल जाए तो इन दोनों देशों का ही नहीं, विश्व का कल्याण होगा। ऐसा चिंतन करने बाले जीवन का नाम – विवेकानन्द।

ढाई साल भारत में संचार करने के बाद साढे चार साल विश्व भ्रमण किया युवा विवेकानंद ने। १८९७ में लौटते समय मातृभूमि के दर्शनों की प्यास से व्याकुल थे। रामनाड रामेश्वरम का महाराज समुद्र तट पर रेड कारपेट बिछाकर स्वागत को तत्पर था। धूल का कण भी पैरों को ना लगे एसी व्यवस्था की थी। किन्तु यह क्या। जहाज से उतरते ही मिटटी पर पाँव नहीं, मिट्टी को सर पर रखा विवेकानंद ने। मिट्टी से मानो स्नान करने लगे। यह द्रश्य देखकर लोगों ने कहा ये क्या हो गया स्वामी को ? एक भक्त ने पूछा तो बोले दृ जाते समय तो केवल पागल था, किन्तु लौटकर महापागल हो गया हूँ। मेरी भारत भक्ति दस गुना बढ़ गई है। जैसी दृष्टि बैसी सृष्टि।

भारत लौटकर विवेकानद फिर पूरे देश में घूमते हैं। भारत पुनरुत्थान के लिए कहते हैं – मुझे मनुष्य चाहिए। करोड़ों जनसँख्या के जन को देखकर मनुष्य नही लग रहा। जो भारत भक्ति अपनाता है, उसे ही मनुष्य कहने को तत्पर। भारत भक्ति अर्थात क्या ? निरक्षर को देखकर उसे सुशिक्षित करने की जिसमें चाह हो, गरीबी को देखकर अपनी संपत्ति बांटने की इच्छा हो, भूखे को घर बुलाकर खाना खिलाने का भाव हो, तो ही देशभक्त। भारत का पुनरुत्थान एसे ही मनुष्यों के माध्यम से संभव है।

अतः मनुष्य को मनुष्य बनाने बाली शिक्षा शहरी और ग्रामीण सबको मिलना चाहिए। “व्ही वांट मैन मेकिंग एजूकेशन, केरेक्टर बिल्डिंग एजूकेशन”। अंतर्भूत प्रतिभाओं का विकास। परमात्मा हरेक को किसी प्रतिभा के साथ भेजता है। मनुष्य चाहिए, इसलिए मनुष्य बनाने बाली, चरित्रवान बनाने बाली, प्रतिभा विकास करने बाली शिक्षा चाहिए।

सेवा और त्याग भरतखंड का जन्मजात आदर्श है। इस पर पश्चिमी भोगवादी संस्कृति का धूल बैठ गया है। सेवा के स्थान पर शोषण के मार्ग पर चल रहे हैं। शिक्षित युवा “एजूकेटेड ब्रूट” शिक्षित बर्बर बन रहे हैं। एसी शिक्षा नही चाहिए। मनुष्य को राक्षस बनाने बाली शिक्षा नही चाहिए। मनुष्य को मनुष्य बनाने बाली, अशिक्षा को दूर करने बाली शिक्षा चाहिए। यही चिंतन देशवासियों के सम्मुख स्वामी विवेकानंद ने रखा। उनका दृढ विश्वास इन शव्दों में व्यक्त हुआ दृ देश और समाज की नींव मजबूत है। मुझे कोई आशंका नहीं है। भवन जर्जर हुआ है, जिसका नवनिर्माण करना है। यही नई पीढ़ी का दायित्व है।

आध्यात्म कोई धार्मिक रीति रिवाज नहीं वरन जीवन द्रष्टि है। भारतीय दर्शन में युद्ध व सेवा दोनों में अध्यात्म है। ऐसा क्या है जिसे जानने से सब जाना जाये ? जग में सब परिवर्तनशील है। जहां आज सागर है कल बहां पर्वत हो सकता है। एसा क्या है जो कभी नही बदलता ? नचिकेता का प्रश्न – मृत्यु के बाद क्या ? वेद उपनिषद में ऋषियों ने इन प्रश्नों के जो उत्तर दिए हैं वे ही स्वामी जी ने युगानुकूल सरल भाषा में समझा दिए। भारतीय संस्कृति की विशेषता – अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम, सम्पूर्ण स्रष्टि में बही चैतन्य तत्व विराजित है। विनाशशील शरीर पर हम अविनाशी। एक ही चेतना का प्रगटीकरण परिवार, उसके आगे समाज, राष्ट्र व विश्व में हो रहा है। सब परस्परावलम्बी हैं। किसी का नाश करेंगे तो स्वयं का नाश होगा। भारतीय संस्कृति के इस एकात्म भाव का स्वामी जी ने सन्देश दिया।

एक बड़े प्रोफेसर ने पूछा कि एक तमिल और पंजाबी में क्या समानता ? ना पहनावे में न खानपान में ना रीति रिवाजों में। भारत तो मानव संग्रहालय है। समानता क्या ? पूरे भारत में पूछ लो एक ही जबाब आएगा – ईश्वर सर्वत्र, आत्मा अविनाशी, स्रष्टि अनादी अनंत। ये जोडने बाले तत्व समझना आवश्यक। लाहौर में स्वामी जी को सिक्ख, सनातनी, आर्यसमाजी सब अलग अलग बुलाना चाहते थे किन्तु उन्होंने कहा कि सब एक साथ आओगे तो ही भाषण होगा। और अत्यंत सफल कार्यक्रम हुआ, सब साथ आये। स्वामी जी ने कहा कि जो राष्ट्र और मानवता के लिए सब कुछ छोड़ सकें एसे युवा चाहिए। जब यहाँ शक्तिपूर्ण, अभय, सेवाभावी, त्यागी लोग होंगे तभी भारत भारत होगा।

रामकृष्ण परमहंस के शिष्य ब्रह्मानंद ने रामकृष्ण की एक मूर्ती बनाकर उसकी पूजा प्रारम्भ की। विवेकानंद जी ने कहा कि इससे उनकी आत्मा को शान्ति नही मिलेगी। ढोंगवाद का कठोरता से खंडन करते हुए, मातृदेवो भव, पितृदेवो भव के आगे राष्ट्रदेवो भव, दरिद्र नारायण देवो भव, चांडाल देवो भव, मूर्ख देवो भव – ये विवेकानंद के शव्द थे। गरीब को संपन्न, मूर्ख को बुद्धिमान, चांडाल को अपने जैसा बनाना ही भगवान की पूजा है। इससे ही राष्ट्र निर्माण, भारत पुनरुत्थान होगा। आने बाले कुछ वर्षों तक सब देवी देवताओं को कोने में रखकर भारत माता की पूजा करना चाहिए। यदि भारत रहेगा, तो ही देवी देवता भी रहेंगे। अन्य देशों में देवता नही आते उनके दूत या पूत आते हैं। यहाँ भगवान स्वयं आते है, इसीलिये यह देवभूमि है। उनके हर शव्द, हर श्वांस में भारत ही गूँज रहा था। यही स्थिति हर देशवासी की होगी, तभी होगा भारत पुनरुत्थान।

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