लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


-अरविंद जयतिलक- mulayam

कल्पना कीजिए कि समाजवादी पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया आज जिंदा होते तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के गैर-जिम्मेदराना बयान कि ‘बलात्कार के लिए फांसी देना गलत है’ पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? क्या इस शर्मनाक बयान से फूले समाते या समाजवाद के उस छद्म मुखौटे को ही नोच डालते जिसका खोल पहन मुलायम सिंह यादव आधुनिक समाजवाद के झंडाबरदार बने हैं? क्या यह विचित्र नहीं है कि जिस पुरुषवादी मानसिकता के खिलाफ डॉ. लोहिया आजीवन संघर्ष करते रहे, जो पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर थोपी गयी पराधीनता के खिलाफ थे, उस विचारधारा का झंडा उठाने वाले मुलायम सिंह यादव और उनकी मंडली बलात्कारियों की फांसी का विरोध कर रही है? आखिर मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी की सोच किस तरह स्त्री-पुरुष समानता के पक्षधर डॉ. लोहिया के विचारों से मेल खाती है और किस तरह वे लोहिया के अनुयायी होने का दंभ भरते हैं? लोहिया एक ऐसे राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने स्त्री की गुलामी की जड़ों को काटने का प्रयास किया और स्त्री स्वातंत्र की वकालत की। उन्होंने स्त्री के संबंध में समाज की उन तमाम प्रचलित मान्यताओं को ध्वस्त किया जो स्त्री को गुलाम, निस्तेज और असहाय बनाती थी।

क्या मुलायम सिंह और उनकी पार्टी इस कसौटी पर खरा है? जिस मुरादाबाद की चुनावी सभा में उन्होंने मुंबई के शक्ति मिल कांड के तीन दोशियों को फांसी की सजा पर सवाल दाग फांसी को गलत ठहराया आखिर वह किस लिहाज से महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता है? जो राजनेता यह कहता हो कि लड़के नादानी में बलात्कार कर जाते हैं और उन्हें फांसी नहीं दी जानी चाहिए वह किस प्रकार से महिलाओं को सुरक्षा की गारंटी दे सकता है? क्या ऐसा नेता लोहिया का अनुगामी कहलाने का नैतिक अधिकार रखता है? जो राजनेता यह कहता हो कि वह सत्ता में आने पर बलात्कार कानून की समीक्षा कर उसमें बदलाव करेगा, सिर्फ इसलिए कि कानून में बलात्कारी के खिलाफ फांसी की सजा है उससे न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है? समझना कठिन है कि जब पूरा देश बलात्कार के खिलाफ आंदोलित और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित है, ऐसे में मुलायम सिंह यादव बलात्कारियों की पैरोकारी क्यों कर रहे हैं? क्या यह उम्र का तकाजा है जो उनकी जुबान फिसल गयी? या यह समझा जाए कि शक्ति मिल कांड के तीनों आरोपी एक खास समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और उस समुदाय को लुभाने के लिए यह बयान दिया है? इससे इंकार नहीं किया जा सकता। पिछले दिनों जिस तरह अखिलेश सरकार ने आतंकी घटनाओं में षामिल खास समुदाय के लोगों को छुड़ाने के लिए जमीन-आसमान एक की उससे स्पश्ट है कि समाजवादी पार्टी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। अभी चंद रोज पहले ही पार्टी के नेता आजम खान ने रामपुर की एक सभा में कहा कि ‘कारगिल की लड़ाई हिंदू जवानों ने नहीं लड़ी। वास्तव में जिन्होंने पहाड़ी पर विजय दिलायी वे मुसलमान सैनिक थे।’ उन्होंने षहीदों के नाम भी गिनाए। उनसे पूछा जा सकता है कि चुनावी बेला में इस जुगाली का क्या मतलब है? क्या यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने की कोषिष नहीं है? अल्पसंख्यकों का ध्रुवीकरण कराने के मामले में स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने रामपुर की सभा में कहा कि देष की अर्थव्यवस्था में हिंदू समाज से अधिक मुसलमानों का योगदान है। सवाल यह उठता है कि समाजवादी पार्टी विकास के मुद्दों के बजाए समाज को बांटने वाले मसलों पर दिमाग क्यों खपा रही है? क्या यह रेखांकित नहीं करता है कि वह अल्पसंख्यक मतों को अपने पक्ष में लामबंद करना चाहती है? अगर ऐसा कुछ नहीं तो फिर मुलायम सिंह यादव को स्पश्ट करना चाहिए कि इस शर्मनाक बयान के लिए उन्होंने मुरादाबाद को ही क्यों चुना? अगर वह और उनकी पार्टी वाकई में बलात्कार के मामले में फांसी के खिलाफ है तो वह उचित मंच पर भी अपना विचार रख सकती थी। न्यायालय का दरवाजा भी खुला हुआ है। खटखटा सकते थे। लेकिन यह क्या कि वह इसे चुनावी मुद्दा बनाए? देश अच्छी तरह समझ रहा है कि मुलायम सिंह की पीड़ा शक्ति मिल कांड के गुनाहगारों के मामले में ही क्यों छलकी? इससे पहले भी तो बलात्कार के मामले में न्यायालय कई लोगों को फांसी की सजा सुना चुका है। लेकिन उन मामलों में मुलायम सिंह और उनकी पार्टी ने तल्ख तेवर नहीं दिखाए। आखिर क्यों? बेशक मुलायम सिंह का यह कहना सही है कि दहेज उत्पीड़न कानून, अनुसूचित जाति कानून और निर्भया कांड के बाद बनाए गए कानून का दुरुपयोग हो रहा है। लेकिन क्या दुनिया में ऐसा कोई कानून है जिसका दुरुपयोग न होता हो? क्या इस डर से कानून को कमजोर किया जाना उचित होगा? शायद मुलायम सिंह यादव की इच्छा ऐसी ही है। जबकि यह तथ्य है कि कड़े कानून के बाद भी देष में बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि विगत पांच वर्शों में देश में बलात्कार के मामले में 20 फीसद की वृद्धि हुई है। हर एक घंटे में बलात्कार के 22 मुकदमें दर्ज होते हैं। देष की अदालतों में 95000 हजार से अधिक बलात्कार के मुकदमे दर्ज हैं। क्या बलात्कार कानून को कमजोर करने से पाशविक व बर्बर आचरण वाले समाजद्रोही अपने कुकर्मों के दंड से बच नहीं निकलेंगे? शीशे की तरह साफ है कि बलात्कार के अधिकतर मामले में अपराधी सजा से बच निकलते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 2006 में यौन उत्पीड़न के 9906 मामले दर्ज हुए लेकिन सजा की दर सिर्फ 51.8 फीसद रही। इसी तरह 2007 में 10950, 2008 में 12214 व 2009 में 11009 मामले दर्ज हुए। जबकि सजा दर 49.9, 50.5 और 49.2 फीसद रही। आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में केवल 30 फीसद गुनाहगारों को सजा मिल पाता है। शेष तीन-चौथाई बच जाते हैं। अगर ऐसे में कानून को कमजोर किया जाता है तो बलात्कार की घटनाएं कैसे थमेंगी? बेशक कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और न ही निर्दोश को सजा मिलनी चाहिए। लेकिन इसकी आड़ में बलात्कारियों के प्रति उदारता और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को गुनाह के बजाए गलती मानना कहां तक न्यायसंगत है? क्या इस खतरनाक सोच से महिलाएं अपने को सुरक्षित महसूस करेंगी? मुलायम सिंह का यह तर्क उचित नहीं कि लड़के-लड़की दोस्त होते हैं और बाद में मतभेद होने पर लड़की मुकदमा दर्ज करा देती है और फांसी की सजा हो जाती है। वस्तुतः यह दलील बलात्कारियों का हौसला बढ़ाने वाला और बलात्कार शिकार महिलाओं को कठघरे में खड़ा करने जैसा है। क्या इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश में कोई महिला बलात्कार के खिलाफ थाने में मुकदमा दर्ज कराने का हिम्मत दिखाएगी? क्या पुलिस-प्रशासन बलात्कारियों के खिलाफ सख्ती से पेष आएगा? क्या बलात्कारियों का हौसला बुलंद नहीं होगा? यह भी किसी से छिपा नहीं है कि मुलायम सिंह के सुपुत्र अखिलेश यादव के दो साल के षासन में दो हजार से अधिक महिलाएं बलात्कार का षिकार हो चुकी हैं। आष्चर्य यह कि इसके बावजूद भी समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह के इस बेतुके बयान का बचाव कर रही है। समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी ने दलील दी है कि बलात्कारियों के साथ-साथ उन महिलाओं को भी फांसी की सजा दी जानी चाहिए जो षादी से पहले या षादी के बाहर षारीरिक संबंध स्थापित करती हैं। गौर करें तो समाजवादी पार्टी के नेताओं की यह महिला विरोधी मानसिकता नई नहीं है। अनेक अवसरों पर जहर उगलते रहते हैं। गत वर्श पहले बाराबंकी की एक जनसभा में खुद मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि ‘केवल उच्च वर्ग की महिलाएं ही जिंदगी में तरक्की कर सकती हैं। तुम ग्रामीण महिलाओं को कभी मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि तुम उनकी तरह आकर्षक नहीं हो।’ इस बयान के बाद राजनीतिक दलों और महिला संगठनों ने उनकी तीखी आलोचना की जैसे आज कर रही हैं। लेकिन अचरज कि लोहिया का माला जपने वाली समाजवादी पार्टी शर्मसार नहीं है। वोटबैंक का समाजवाद लोहिया के समाजवाद का माखौल उड़ा रहा है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz