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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-विजय कुमार-

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दिल्ली में ‘नमो सरकार’ बनने से सामाजिक संस्थाओं का रुख भी बदला है। जिस संस्था ने मुझे कभी श्रोता के रूप में बुलाने लायक नहीं समझा, पिछले दिनों उसके सचिव का फोन आया कि स्वाधीनता दिवस पर ‘संभ्रांत’ लोगों की सभा में मुझे भाषण देना है। यह सुनकर मैं डर गया। सम्भ्रान्त (सम्यक रूप से भ्रांत) लोगों को मैं क्या बता सकूंगा ? फिर भी मैं भाषण तैयार करने लगा; पर जैसे-जैसे विचारों का प्रवाह आगे बढ़ा, मैं खुद ही भ्रान्ति का शिकार हो गया। भाषण का विषय बड़ा रोचक था। स्वामी विवेकानंद ने 1897 में विदेश प्रवास से लौटकर मद्रास में दिये गये एक भाषण में देशवासियों से कहा था कि अगले 50 साल सब देवी-देवताओं को छोड़कर केवल भारतमाता की पूजा करें। उनकी बात कितनों ने मानी, यह तो शोध का विषय है; पर यह सच है कि 50 साल बाद 1947 में देश स्वतन्त्र जरूर हो गया।

उस संस्था के सचिव ने कहा कि मैं इस संदर्भ में यह बताऊं कि अब किन नये देवी-देवताओं की पूजा होनी चाहिए ?
मैंने सोचना प्रारम्भ किया, तो सबसे पहले मुझे भगवान विष्णु के दस अवतारों की याद आयी। कहते हैं कि मत्स्य से लेकर गौतम बुद्ध तक नौ अवतार तो हो चुके हैं; पर दसवें अवतार ‘कल्कि’ की अभी प्रतीक्षा ही है। मैंने सबको प्रणाम करते हुए कल्कि भगवान से निवेदन किया कि हो सके, तो मेरे जीवित रहते ही अवतरित हो जाएं। वरना मेरे लिए तो आपका आना और न आना एक सा ही होगा। फिर मुझे ध्यान आया कि भारत में 33 करोड़ देवी-देवताओं की बात भी कही गयी है। कुछ विद्वानों का मत है कि इनका हिसाब लगाते समय दुनिया की जनसंख्या ही 33 करोड़ थी। अतः सभी को देवी-देवता मानकर यह संख्या निर्धारित कर ली गयी।

भारत में माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवता कहा गया है। विवेकानंद ने इसमें ‘दरिद्र देवो भव’ भी जोड़ा था। यद्यपि अब तो ‘पैसा देवो भव’ का ही चलन है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने भी ‘अतिथि देवो भव’ को स्वीकार किया है। चिंतन धारा आगे बढ़ी, तो कुछ नये देवी-देवता ध्यान आये। ‘जय संतोषी मां’ फिल्म से संतोषी माता प्रसिद्ध हो गयीं, तो ‘शिरडी वाले साईं बाबा’ के कारण साईं बाबा के हजारों मंदिर बन गये। दूरदर्शन के कारण ‘शनि देवता’ का प्रभाव भी लगातार बढ़ रहा है। अमिताभ बच्चन के एक प्रशंसक ने कोलकाता में उनका मंदिर बनाया है, तो एक राजनेता अंग्रेजी देवी के मंदिर बनाने की वकालत कर रहे हैं। आशा है भविष्य में कुछ और देवी-देवता भी प्रकट होंगे। क्योंकि जब दुनिया की जनसंख्या बढ़ रही है, तो उन्हें संभालने के लिए नये देवता भी चाहिए। जब वैज्ञानिक नये आविष्कार कर रहे हैं, तो धर्म वाले पीछे क्यों रहें ?

मैंने कई साल पहाड़ों की खाक छानी है। वहां कई तरह के देवता होते हैं। कुछ गांव के होते हैं, तो कुछ क्षेत्र के। कुछ स्थिर होते हैं, तो कुछ चलायमान। कुछ नदी पार नहीं करते, तो कुछ घाटी को नहीं छोड़ते। कुछ भव्य मंदिर में रहना पसंद करते हैं, तो कुछ खुले में या फिर पेड़ के नीचे। कुछ खड़े हैं, तो कुछ बैठे या लेटे। कुछ अकेले रहते हैं, तो कुछ सपरिवार। इनके रंग-रूप, खान-पान और वेशभूषा भी अलग-अलग हैं। जाति और बिरादरी से लेकर खेती, मौसम और पर्वों तक के देवता हैं। भीम, कर्ण और दुर्योधन के मंदिर भी हैं। मेलों में इनका मिलन होता है। हरिद्वार के पिछले पूर्ण कुंभ में पहाड़ के सैकड़ों देवी-देवता भी स्नान करने आये थे।

चिंतन करते हुए काफी देर हो गयी, तो मैं ताजी हवा खाने बाहर निकल पड़ा। सामने नुक्कड़ पर एक चुनावी सभा हो रही थी। नेता जी बड़े श्रद्धाभाव से हाथ जोड़े, सिर झुकाए अपनी बात कह रहे थे। वे हर दूसरे वाक्य में वोट देवता, वोटर माई बाप, वोट भगवान आदि का मंत्र जप रहे थे। इससे मुझे सोचने की एक नयी दृष्टि मिली। जो नेता जी पिछले कई साल से दिखायी नहीं दिये, वे आज गंदगी से बजबजाती हमारी गली में पधारे हैं। जो अपने कलफदार कपड़ों पर धूल का एक कण भी नहीं बैठने देते थे, आज वे झनकू मोची से गले मिल रहे हैं। 25 लाख रु. वाली कार से पांव नीचे न रखने वाले आज पैदल सड़कों की खाक छान रहे हैं।

मैं समझ गया कि इस युग का असली भगवान यह वोट ही है। इसके लिए राजनेताओं को जाने क्या-क्या करना पड़ता है ? उन्हें मठ, मंदिर और गुरुद्वारे से लेकर मजारों तक को सिर झुकाना पड़ता है। जाति, भाषा, प्रान्त, मजहब और माफिया के गीत गाने पड़ते हैं। भ्रष्ट आचरण करना और खुली आंखों से करते हुए देखना पड़ता है। गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए कभी इस, तो कभी उस डाल पर जाना पड़ता है। एक वर्ग विशेष के थोक वोट पाने के लिए खूंखार आतंकियों को बिरयानी और कबाब खिलाने पड़ते हैं। मरने के बाद उनके नाम में ‘श्री’ और ‘साहब’ लगाते हुए उनके गांव में हाजिरी देनी पड़ती है। वीर सैनिकों और उनके परिजनों की उपेक्षा करनी पड़ती है। मजहबी दंगों के समय मामला बैलेंस करने के लिए कुछ लोगों को झूठे आरोप में भी जेल भिजवाना पड़ता है।

वोट के लिए लोग गधे को बाप और बाप को गधा बनाने में देर नहीं लगाते। चुनाव के दौरान लोग बाप को छोड़कर बीमार वोटर को देखने चल देते हैं। इस नवदेवता की प्रशंसा में जो भी कहें, कम है। मैंने उन्हें प्रसन्न करने के लिए एक आरती लिखी है। आप भी उसका एक छन्द सुनें और जीवन धन्य बनाएं।
वोट देवता नमो नमः जयकार तुम्हारी
सभी व्यवस्थाएं तुम पर ही हैं बलिहारी।
वोट मिले तो जीवन धन्य-धन्य हो जाए
कृपा करो, यह जन्म व्यर्थ ना जाने पाए।
इसकी खातिर नेता अपनी नाक रगड़ता
कलियुग में सब पर भारी तुम वोट देवता।।
बोलिये वोट देवता की जय.

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