लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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संजय सक्सेना

इस समय देश ‘युवा’ सा लगता है। सभी राजनैतिक दलों में युवा नेताओं का बोलबाला है। बीते कुछ सालों की बात की जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि मल्टीनेशनल कम्पनियों ने भारतीय युवाओं के लिए काफी तादात में काम के नए अवसर प्रदान किए हैं।लोगो के जीवन स्तर बढ़ा है। शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव का ही नतीजा है जो आज मध्य वर्गीय परिवार के युवक-युवतियां भी डाक्टर इंजीनियर ही नहीं आइएएस और पीसीएस जैसी परीक्षाओं में अपना परचम लहरा रहे हैं, लेकिन तमाम उपलिब्धयों के बीच दुखत पहलू यह भी है कि आज भी युवाओं का एक बड़ा वर्ग अपने भविष्य को लेकर अंधकारमय स्थिति में है। यह वो वर्ग है जो सपने तो देखता है लेकिन ‘अर्थव्यवस्था’ के मामले में पिछड़ा हुआ है। आर्थिक रूप से कमजोर इस वर्ग के युवाओं को आज भी सरकारी नौकरियों में अपना भविष्य तलाशना पड़ता है।इसमें से कई खुशनसीब होते हैं जिन्हें अपनी मंजिल आसानी से मिल जाती है लेकिन यह संख्या बेरोजगारों की जमात में मुट्ठी भर होती है। लाखों-करोड़ों युवा बेरोजगारों की फौज बढ़ाने में न चाहते हुए भी अहम भूमिका निभाते है।यह फौज कहीं भी कोई नौकरी निकलती है,उसकी तरफ हुजूम बना कर दौड़ पड़ती है। ऐसे युवाओं को अकसर खाने की पोटली के साथ जड़ा-गर्मी-बरसात की चिंता न करते हुए रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन या फिर कालेज के बाहर(जहां परीक्षा होनी है)रात गुजारते देखा जा सकता है। परीक्षा देने आए युवाओं का हुजूम देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानों यह लोग किसी रैली में भाग लेने आए हों। परीक्षा देने से पहले ही अपनी आधी उर्जा खो चुकने वाले यह युवा,परीक्षा खत्म होते ही घर पहुंचने को बेताब हो जाते हैं जो लाजिमी भी है। क्योंकि इन युवाओं के मॉ-बाप किसी तरह से अपनी जेब काट कर बच्चों को परीक्षा दिलाने के लिए भेजते हैं।अक्सर इनके पास इतना पैसा भी नहीं होता है कि वह कहीं ठीकठाक जगह बैठ कर खा भी खा पाए। यह लोग लद-फंद के आते हैं और ऐसे ही चले जाते हैं। इनकी सुरक्षा का ख्याल किसी को नहीं होता। इसका बात का प्रमाण 01 फरवरी को उत्तर प्रदेश के रोजा जंक्शन (जिला शाहजहांपुर) पर देखने को मिला।जब बरेली में मंगलवार को भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में टे्रडमैन की भर्ती की परीक्षा देकर लौट रहे उत्तर भारत के 11 राज्यों से आए हजारों छात्रों के लिए हिमगिरी एक्सप्रेस मौत का सफर बन गई।घर जाने की जल्दी और जगह की कमी के कारण छत पर चढकर अपनी मंजिल की तरफ चल दिए इन इन मासूम युवाओं को इस बात का आभास नहीं था कि उनकी यह नादानी कितनी खतरनाक साबित हो सकती है,जिसका खामियाजा 19 छात्रों को मौत की कीमत और करीब एक दर्जन को गंभीर रूप से जख्मी होकर चुकाना पड़ा। इससे अधिक दुख की बात यह थी कि इन मासूमों की मौत की जिम्मेदारी भी किसी ने नहीं ली।बल्कि बखेड़ा इस बात पर ज्यादा हुआ कि भर्ती परीक्षा देने आए युवाओं ने जगह-जगह उपद्रव और तोड़फोड़ तथा आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया।

इन मौतों ने एक बार साबित कर दिया कि असमय कालकवलित होते जवान देश के लिए अभिशाप बनते जा रहे है। जिस बच्चे को माता पिता पाल पोषकर पढ़ा लिखाकर देश के लिए तैयार करते हैं। इन युवाओं को देश परदेश भेजते हैं, भविष्य के खातिर। पर देश के सेवायोजक इनकी जोशीली ताकत के लिए बिल्कुल बेखबर हैं। कभी अध्ययन के वक्त रैंगिंग, कभी सड़क हादसों, कभी रेल हादसों और कभी पारिवारिक वजहों से उनकी मृत्यु दिन प्रतिदिन अखबारों की सुर्खियों में बनने लगी है। वहीं शराब,शौकीनी, व अपराधी संगत, वह बुरी लतों में पड़ने के कारण भी वे असमय मरजाते हैं। बरेली में हुआ रेल हादसा उसी की एक कड़ी के रूप में घटित हुआ है। आर्थिकवाद के चक्कर में सरकार देश का भविष्य खो रही है। भारत अंतरिक्ष में खोज कर रहा है, लेकिन भारत की जमीन में आग लगी है।

सुरक्षा बलों में भर्ती के दौरान तरह-तरह के हादसों से दो चार होने के बावजूद जिस तरह बरेली में भारत तिब्बत सीमा पुलिस की भर्ती के समय अव्यवस्था का परिचय दिया गया, उससे यही पता चलता है कि पुरानी भूलों से कोई भी सबक सीखने के लिए तैयार नहीं, न तो इस तरह की भर्ती का आयोजन करने वाले सुरक्षा बल और न ही स्थानीय प्रशासन । भारत तिब्बत सीमा पुलिस के अधिकारियों को इसका अहसास होना ही चाहिए था कि भर्ती के दौरान बड़ी संख्या में छात्र आ सकते है। ऐसा लगता है कि इस बारे में खानापूर्ति करने के अलावा कहीं कोई गंभीर प्रयास ही नहीं किया गया था। परिणाम यह रहा कि जब भर्ती में अनुमान से अधिक प्रतिभागी आ गये तो आईटी बीपी के अधिकारियों के हाथ पांव फूल गये और उन्होंने प्रतिभागियों को टरकाने की कोशिश की। इस स्थिति में भर्ती के लिए आए प्रतिभागियों में आक्रोश उमड़ना स्वाभाविक ही था, लेकिन यह समझना कठिन है कि उन्होंने अपना गुस्सा वाहनो, दुकानों और रेलगाड़ियों पर क्यों उतारा? ऐसा लगता है कि स्थानीय प्रशासन भी इस सबसे अनजान था कि आईटीबीपी की भर्ती में बड़ी संख्यामें प्रतिभागी आ सकते हैं और भारी भीड़ के कारण कई तरह की समस्याएं पेदा हो सकती हैं।

भर्ती से लोट रहे प्रतिभागियों के साथ शाहजहांपुर में जो दुर्घटना हुई वह भी अव्यवस्था का ही परिचायक हैं । आखिर किसी ने छात्रों को ट्रेल की छत पर चढ़ने से क्यों नहीं रोका गया ? रेलकर्मियों ओर अधिकारियों को तो यह पता ही होगा कि ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा करना वाले छात्र हाईटेंशन तारों की चपेट में आ सकते हैं। करीब अस्सी किलोमीटर का सफर इन युवाओं ने टे्रन की छत पर बैठ कर पूरा कर लिया लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया जबकि बीच में कई छोटे-बडे स्टेशन पड़ते हैं। इससे अधिक दुर्भायपूर्ण और क्या होगा कि छात्रों के साथ हुई इस दुर्घटना और बरेली में तोड़फोड़ तथा आगजनी की घटनाओं को लेकर दोषरोपण का सिलसिला आरंभ हो गया।, भारत तिब्बत सीमा पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच अव्यवस्था के लिए जिस तरह एक दूसरे को दोषी ठहराने का सिलसिला आरंभ हो गया है, इस खेल में केन्द्र और राज्य सरकारें भी एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में पीछे नहीं रहीं। आरोप-प्रत्यारोप के इस सिलसिले को देखते हुए इस पर आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता कि भर्ती के लिए आवश्यक इंतजाम करने में लापरवाही करने वाले लोगों को दंडित किया जा सकेगा। हॉ, यूपी ने केन्द्र को चिट्ठी लिखकर पूरी जिम्मेदारी आईटीबीपी पर मढ़ते हुए इसे केन्द्रीय बल के अफसरों की अदूरदर्शिता का नतीजा बताते हुए दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पत्र जरूर भेजा हैं।

बहरहाल, रेलवे ने हादसे की जांच शुरू कर दी है लेकिन उसने मृतकों और घायलों को किसी तरह का मुआवजा देने से साफ मना कर दिया है। आईटीबीपी भर्ती परीक्षा से लौट कर आ रहे युवकों की मौत पर केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम के वक्तव्य, ‘आईटीबीपी के अफसरों के पूर्व में सूचना देने के बाद भी सुरक्षा व्यवस्था कम मुहैया कराई गई,’ को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था बृजलाल ने भी भर्ती प्रक्रिया और प्रबंधन पर सवाल खड़े कर दिए।उन्होंने कहा कि 11 राज्यों के अभ्यार्थियों को आमंत्रित करने के बाद भी आईटीबीपी ने न तो कोई समन्वय स्थापित किया और न ही कारगर योजना बनाई।

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