लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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-वीरेन्द्र सिंह परिहार-
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प्रदेश का व्यापम घोटाला एक अबूझ पहेली बन चुका है। प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस जहां इस घोटाले की सीबीआई जांच की मांग को लेकर विधानसभा भी नहीं चलने दे रही है। तो दूसरी तरफ सत्ता पक्ष और मुख्यमंत्री का कहना है कि एसटीएफ बड़ी ईमानदारी एवं निष्ठा से जांच कर रही है। मप्र उच्च न्यायालय भी एसटीएफ के लिए कह चुकी है कि वह ठीक से और सही दिशा में काम कर रहा है इसलिए सीबीआई जांच की कोई जरुरत नहीं है।

इधर कांग्रेस का कहना है कि चूंकि एक तो एसटीएफ राज्य सरकार के अधीन है, दूसरे इस घोटाले में मुख्यमंत्री निवास की भी संलिप्तता है। ऐसी स्थिति में एसटीएफ जो राज्य सरकार के अधीन है, कैसे निष्पक्ष जांच कर सकती है ? दूसरी तरफ मुख्यमंत्री का कहना है कि यदि उनके खिलाफ कोई आरोप सिद्ध हो गया तो वह राजनीति से ही नहीं सदैव-सदैव के लिए सभी चीजों से सन्यास ले लेंगे। वैसे तकनीकी दृष्टि से यह बात सच है कि इस घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की जरुरत नहीं है, क्योंकि उच्च न्यायालय स्वतः यह प्रमाण दे चुकी है कि एसटीएफ अपना काम ठीक से कर रहा है।

इतना ही नहीं, उनका कहना है कि वर्ष 1993 से 2003 के मध्य भी सरकारी नियुक्तियों में भी काफी गड़बड़-झाला और अवैधता बरती गई है, इसलिए उन नियुक्तियों की भी जांच की जाएगी। अब जहां तक कांग्रेस के राज में हुई नियुक्तियों की जांच का सवाल है, उसमें कोई भी बुराई नहीं है। देर से ही सही जिन्होंने सत्ता और पद का दुरुपयोग किया है, उन्हें कठघरे में खड़ा ही किया जाना चाहिए। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा होता है कि दस वर्षों तक प्रदेश की भाजपा सरकार क्यों सोती रही ? पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी जो पद के दुरुपयोग के चैम्पियन माने जाते हैं, उनका हवाला दिया जा रहा है। जबकि स्थिति यह है कि कुछ वर्षों पूर्व प्रदेश की भाजपा सरकार उनके भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और अवैध नियुक्तियों को लेकर जांच कराने को तैयार बैठी थी। लेकिन पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि सारा मामला एकाएक दब गया। इससे तो लोगों में यही संदेशा जाता है कि ‘तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय।’ अब जब स्वतः पर आरोपों की बौछारें पड़ने लगी तो कांग्रेस-राज में हुई गड़बडि़यों का बखान करने लगे। कुछ इस तर्ज पर जब 2-जी स्पेक्ट्रम और कोलगेट घोटाले पर यूपीए सरकार फंसी तो वह इसके लिए एनडीए सरकार को दोषी ठहराने लगे। यह बात सच है कि यूपीए सरकार अपना बचाव करने के लिए ऐसा कह रही थी, जबकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार में ये सब करना जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता था। क्योंकि इनके लिए सत्ता सेवा का नहीं भोग का माध्यम है। यहां तक कि अपने अपराधों को छिपाने के लिए ये जनमत की आड़ लेने में कोई संकोच नहीं करते थे। जैसे जुलाई-2008 में ‘नोट के बदले वोटकाण्ड’ में मनमोहन सिंह ने यह कहकर पर्दा डालने की कोशिश की थी कि इस विषय पर वर्ष-2009 के आम चुनाव में जनता अपना फैसला दे चुकी है। गनीमत है कि शिवराज सिंह ने कहीं भी ऐसा नहीं कहा कि वर्ष-2013 में विधानसभा के चुना में जनता इस विषय पर फैसला दे चुकी है। उल्टे उन्होंने अपने खास मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा की संलिप्तता पाए जाने पर उन्हें भी कतई बचाने का प्रयास नहीं किया। वैसे कांग्रेस जनों से यह अपेक्षा जरुर है कि चाहे वह जो आरोप लगाए, पर कम से कम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर कोई आरोप लगाने के पूर्व हजार बार सोंचे। क्योंकि सभी जानते हैं कि वह राष्ट्रभक्ति का पर्याय और चरित्र-निर्माण करने वाली संस्था है। ऐसे में संघ पर आरोप लगाकर कांग्रेस जन अपनी बची-कुची शाख भी मिट्टी में मिला रहे हैं।

इसमें कोई दो मत नहीं कि शिवराज सिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने विकास की नई ऊचाइयों को छुआ है, पर यह बात सोलह आने सच है कि एस.टी.एफ. प्रदेश सरकार के पूरी तरह अधीन है। आखिर में अन्ना हजारे का लोकपाल आंदोलन इसीलिए था कि सीबीआई केन्द्र सरकार के अधीन होने के चलते केन्द्र सरकार के विरुद्ध निष्पक्ष ढंग से जांच नहीं कर सकती। इसलिए उच्च न्यायालय की बात अपनी जगह पर है। चूंकि इस विषय में जनता में पर्याप्त शंकाएँ और भ्रांतियां व्याप्त है और भाजपा के साख की समस्या पैदा हो गई है। खास कर ऐसी स्थिति में जब कांग्रेस पार्टी और दिग्विजय सिंह जैसे लोग आएदिन मुख्यमंत्री की पत्नी साधना सिंह और दूसरे रिश्तेदारों पर गंभीर आरोप लगा रहे हों। जैसा कि कहावत है- ‘सिर्फ सीजर को नहीं सीजर की पत्नी को भी संदेह के परे होना चाहिए।’ वैसे भी कहा जाता है कि ‘सांच को आंच क्या।’ लोगों को वह प्रसंग याद होगा जब वर्ष-1979 में भारत के तत्कालिक प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अपने पुत्र कांति देसाई के ऊपर लगे गंभीर आरोपों को लेकर स्वतः ही न्यायिक जांच आयोग बैठा दिया था। जैसा कि कहा गया है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए, न्याय होते दिखना भी चाहिए। ऐसी स्थिति में यदि शिवराज सिंह सी.बी.आई. जांच की पहल कर सके तो निश्चित रूप से वह मोरारजी देसाई की ईमानदारी और निष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत कर सकेंगे। अब ऐसी कोई आशंका तो है नहीं कि सी.बी.आई. निष्पक्ष जांच नहीं करेगी। हो सकता है कि घोटाले की व्यापकता को देखकर कही उच्च न्यायालय ही सीबीआई जांच करने को कह दे या भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व को इसमें हस्तक्षेप करने की स्थिति में आए। इसके पूर्व ही शिवराज सिंह को सीबीआई जांच की ‘अब न चूक चौहान’ की तर्ज पर घोषणा कर एक अप्रतिम उदाहरण तो प्रस्तुत करना ही चाहिए, उन सन्देह के बादलों को भी छांट देना चाहिए जो समय-समय पर उनकी पत्नी और दूसरे रिश्तेदारों पर लगते आ रहे हैं।

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