लेखक परिचय

अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार

स्वतंत्र लेखक, कहानीकार व् टिप्पणीकार

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इंतज़ार… इंतज़ार इंतज़ार बाक़ी है.

तुझे मिलने की ललक और खुमार बाक़ी है.

 

यूँ तो बीती हैं सदियाँ तेरी झलक पाए हुए.

जो होने को था वो ही करार बाक़ी है.

 

खाने को दौड़ रहा है जमाना आज हमें.

*1यहाँ पे एक नहीं कितने ही जबार बाक़ी है.

 

वोही दुश्मन है, है ख़ास वोही सबसे मेरा.

दूरियां बरकरार, फिर भी इंतेज़ार बाक़ी है.

 

यूँ तो है इश्क़ हर जगह, फैला अनंत तलक.

मगर वो खुशबु इश्क़े जाफरान बाक़ी है.

 

तेरा कसूर नहीं पीने वाले दोषी हैं.

तू ग़म को करने वाला कम महान साक़ी है.

 

पलटती नांव से पूछो क्या डरती लहरों से हो.

कहेगी न, क्योंकि संग में उसके कहार माझी है.

 

जहां पहुंचे न रवि, कवि पहुंच ही जाता है.

हम क्यों हैं अब भी यहाँ पर मलाल बाक़ी है.

 

जब भी लिखें तो जमाने के आंसू बहने लगे.

अभी लिखने में मेरे यार धार बाक़ी है.

 

कभी कोई, कभी कोई मिज़ाज़ बदले तो हैं.

जो था बचपन में, वोही मिज़ाज़ बाक़ी है.

 

यूँ तो हम भूल गए बात सारी, शख्स सभी.

जो भी है संग उसमें माँ की याद बाक़ी है.

 

तराने यूँ तो बहुत हैं जिन्हें हम सुन लेते.

जिसे सुनने की चाह, तराना-जहान बाक़ी है.

 

जो बैठे हैं अपने में सिमट के, उठ खड़े हों.

आगे तुम्हारे सारा आसमान बाक़ी है.

 

कहाँ ढूँढू ऐ ‘आशू’ तुझको इन पहाड़ों में.

इनकी ऊँचाइयों में कहाँ प्यार बाक़ी है?

 

*1 (जबार- जाबिर- ज्यादती करने वाले)

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लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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waitingहै मुझे

इंतजार

कब होगी नयी सुबह

जब

फूलों के बीच

बच्चे

हंसते- कूदते- खेलते दौड़ते दिखेंगे

उनकी पीठों पर

नहीं होगा भारी बोझ,

निरर्थक शब्दों का गठ्ठर।

शब्द-

वाकई

असमर्थ

नहीं बदल पाते हैं

भाव-समाज-दुनिया।

अंधेरा छाया है

घना

मन व रिश्तों में

दिखती नहीं है राह

जिस पर

उल्लास से फुदकता है

बालक

कोई एक।

सच

आज नहीं दिखता

कहीं कोई बालक ?

पीठ पर शब्दों का गठ्ठर ढ़ोता कुली

कब तब्दील हो जाता है

हममें

नहीं मालूम ?

मेटामारफोसिस

की प्रक्रिया

निरंतर जारी है।

कभी

वनैले सूअर, कभी घड़ियाल- भेड़िये

का रूप धर

हम सब शब्दों को अब सिर्फ

बोते- खाते- चबाते हैं।

निरीह छटपटाता है

हमारे मन के कोने में

छिपा बालक एक

पुकारता है

बचाओ,

निकालो-

सभ्यता के इस दलदल से

निरर्थक शब्दों के भार से।

उल्लसित

खेलना चाहता है

वह सार्थक शब्दों से

उसने चुन रखे हैं

अपने लिए

शब्द

प्यार- खुशी- उछाह- मित्रता- संवेदना।

क्या आप

अपने गठ्ठर से

दे सकते हैं

ये शब्द

उधार ?

थोड़ी देर के लिए सही

बाकी जीवन के लिए सही।

-०-

कमलेश पांडेय

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1 Comment on "इंतजार"

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दीपक चौरसिया ‘मशाल’
Guest
Dipak Chaurasiya 'Mashal'

बहुत् सुन्दर क्रति सच‌ मॆ दिल सॆ दिमाग‌ तक कॆ तार झनझना दॆनॆ वाली रचना. बधाई

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