लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सुरेश हिन्दुस्थानी
वर्तमान में भयंकर निराशा के दौर से गुजर रही कांग्रेस में धुरंधर कांग्रेसियों में तू चल मैं आया का खेल प्रारंभ हो गया है। कोई कांग्रेसी आज पार्टी छोड़कर कहीं जाता है, तो अगले ही दिन किसी दूसरे कांग्रेसी नेता के बारे में कयास लगना प्रारंभ हो जाते हैं। कांग्रेस के लिए इस दौर को अभी तक का सबसे कठिन दौर कहा जा सकता है। जिसमें अपने नेतृत्व के प्रति निष्ठा का अभाव साफ दिखाई दे रहा है। सोनिया और राहुल गांधी पर खुलेआम सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में कांग्रेसी पार्टी को सचेत हो जाना चाहिए।
वर्तमान में देश की सबसे पुराना राजनीतिक दल जर्जर अवस्था से गुजरता हुआ सा दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार से कांग्रेस में बड़े बड़े नेताओं का मोह भंग हो रहा है, उससे ऐसा तो लगने ही लगा है कि कांग्रेस आज वास्तव में डूबता हुआ जहाज है। जिस पर आज के वातावरण में कोई भी सवारी करने को तैयार नहीं हो रहा है। कांग्रेस में जिस प्रकार से बगावत की आग जल रही है, उससे निश्चित ही कांग्रेस के सिरमौर कहे जाने वाले गांधी परिवार को सचेत हो जाना चाहिए था, लेकिन सचेत होना तो दूर वह बार बार एक ही प्रकार की गलती को दोहराने की कवायद करते हुए दिखाई दे रही हैं। जिस राहुल गांधी के बारे में कांग्रेस में बेसुरे राग अलापे जा रहे हैं, उस राहुल गांधी को हमेशा की तरह फिर से कांग्रेस में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। जबकि यह सत्य है कि कांग्रेस में वर्तमान में आज ऐसे कई धुरंधर राजनीतिज्ञ हैं, जो भारतीय राजनीति के बारे में राहुल से कहीं ज्यादा ज्ञान रखते हैं। राहुल उनसे राजनीति की बारीकियां सीख सकते हैं।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री जयन्ती नटराजन का कांग्रेस छोड़ देना उतना बुरा नहीं है, जितना राहुल पर आरोप लगाना है। कांग्रेस को इस पर विचार करना चाहिए कि जिस प्रकार से राहुल को नेता बनाने का प्रयास किया जा रहा है, क्या वह तरीका लोकतांत्रिक कहा जा सकता है? यकीनन इसका जवाब नहीं ही होगा। अब सवाल उठता है कि जिस जयंती नटराजन के पूरे खानदान ने कांग्रेस को सींचा, आज उस परिवार की इस नेता को ऐसा क्या लगने लगा कि उसे कांग्रेस को तिलांजलि जैसा कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा। उनके इस कदम से यह तो स्पष्ट है कि कहीं न कहीं वह कांग्रेस के नेतृत्व से बेहद नाराज हैं। कार्य में दखलंदाजी के चलते उन्होंने परंपरागत पार्टी से किनारा कर लिया। कांग्रेस के लिए यह बेहद चिन्ताजनक बात कही जा सकती है कि पुराने कांग्रेसी वर्तमान में पार्टी की कार्यशैली से नाराज चल रहे हैं। मजेदार बात है कि मोदी के भाजपा नेतृत्व की कमान संभालने के ऐलान के बाद कांग्रेस के तमाम नेताओं के पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने की होड़ लग गई। इनमें प्रदेश नेताओं से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के नेता शामिल हैं। हालांकि पिछले 7-8 महीनों में कांग्रेस को तगड़े झटके लगे हैं। कई नेताओं ने पार्टी को अलविदा कहा। उनमें से कुछ भाजपा के पाले में जा बैठे तो कुछ ने अपना अलग रास्ता बनाया।
कांग्रेस में यूं तो कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं जिनमें कुछ प्रभाव शाली नाम चौधरी बीरेन्द्र सिंह, जीके वासन, जे. एस. बरार, कृष्णा तीरथ और जयंती नटराजन शामिल हैं। इसके अलावा पूर्व केन्द्रीय मंत्री चिदम्बरम, उनके सांसद पुत्र कार्ति चिदम्बरम और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के भी यदा कदा कांग्रेस छोडऩे की खबरें मिलने लगीं हैं। सवाल यह उठने लगा है कि कांग्रेस में इस प्रकार की स्थितियां किस कारणों से निर्मित हो रहीं हैं। क्या वास्तव में कांग्रेस के पास नेतृत्व का अभाव पैदा हो गया है या फिर कांग्रेसी नेताओं के अंदर वर्षों से दबा हुआ ज्वालामुखी फूट रहा है। इस प्रकार का दृश्य केवल तभी बनता है जब जबरदस्त असंतोष हो। यह सत्य है कि कांग्रेस केवल एक परिवार तक ही केन्द्रित रही है और आगे भी कुछ कांग्रेसी पार्टी को इसी परिवार तक ही केन्द्रित रखने का मन बना चुकी है। कांगे्रस में जब भी इस प्रकार के विरोध की राजनीति की जाती है तब कुछ चाटुकार नेताओं की जमात राहुल गांधी के समर्थन में ऐसे खड़ी हो जाती है कि जैसे इनके माई बाप यही हैं। दिग्विजय सिंह जैसे राजनेता के बयान हमेशा ही कांग्रेस को समाप्त करने की दिशा में ले जाने वाले प्रतीत लगते हैं।
कांग्रेस में उठ रही इस असंतोष की आवाज के पीछे कौन सी राजनीति की जा रही है, कहीं इसके पीछे यह भाव तो नहीं कि कांग्रेस समाप्त होने की कगार पर है। जिस प्रकार से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की बात करते थे, उससे कांग्रेसियों को भी संभवत: यही लगने लगा है कि आज भारत देश कांग्रेस से मुक्ति के मार्ग पर चल रहा है। ऐसे दौर में कांग्रेस के भविष्य के प्रति सशंकित कांग्रेस के नेताओं में निराशा का भाव पैदा होना स्वाभाविक ही है। लोकसभा चुनावों के बाद विधानसभा चुनावों के परिणामों ने भी कुछ इसी प्रकार के परिणाम पैदा किए। जिसमें कांग्रेस तीसरे या चौथे नम्बर पर खिसक गई। वास्तव में आज कांग्रेस की नीतियों के प्रति समाज का सरोकार समाप्त सा ही होता जा रहा है।
भारत की मूल आत्मा से खिलवाड़ करने वाली कांग्रेस के अस्तित्व के बारे में वर्तमान में जो सवाल उठ रहे हैं, वह सभी अनसुलझे ही हैं। और आने वाले दिनों में उसके जवाब मिलने की गुंजाइश भी दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में यह सत्य है कि प्रगति के सारे मार्ग बन्द हो जाते हैं। आज कांग्रेसी निराशावाद के चंगुल में हैं। यह स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार से कांग्रेस में तू चल मैं आया की स्थिति बन रही है, बह पहले भी हुआ है लेकिन पहले और आज की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है। अब तो कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि कांग्रेस लम्बे वनवास को भोगने की ओर ही कदम बढ़ा चुकी है।

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1 Comment on "कांग्रेस में तू चल मैं आया का दौर"

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mahendra gupta
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अन्न भंडार खाली हो जाने के बाद चूहे अपने बिल दूसरी जगह बना लेते हैं ,रोजगार न मिलने पर लोग अन्य स्थान के लिए पलायन कर जाते हैं ,यदि अब कांग्रेस में ऐसा हो रहा है तो कोई अलहदा नहीं है कोई अन्य पार्टी होती तो वहां भी ऐसा ही होता बिल्ली तो मलाई वाली कढ़ाई के आस पास ही मंडराती है , उसे चाटने के बाद वहां बैठे रहने से क्या लाभ ?

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